असम एक ऐसा राज्य जो अपनी खूबसूरत वादियों, चाय के बागानों और ब्रह्मपुत्र नदी के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। लेकिन हर साल मॉनसून आते ही यही खूबसूरती तबाही की [संगीत] तस्वीर में बदल जाती है। गांव पानी में डूब जाते हैं। लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं। खेत बर्बाद हो जाते हैं और हजारों परिवार राहत शिविरों में जिंदगी [संगीत] बिताने लगते हैं। इस बार भी हालात कुछ ऐसे ही हैं। बाढ़ का पानी धीरे-धीरे [संगीत] उतर जरूर रहा है लेकिन मुश्किलें अभी भी कम नहीं हुई है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर असम में हर साल इतनी भयानक बाढ़ क्यों आती है? क्या इसकी वजह सिर्फ बारिश है या इसके पीछे कुछ और भी बड़ी वजह हैं? चलिए बताते हैं।
असम में बाढ़ की स्थिति पहले से थोड़ी बेहतर हुई है [संगीत] लेकिन जनजीवन अभी भी पूरी तरह पटरी पर नहीं लौट पाया है। पिछले 24 घंटों में चरायदेव जिले में पानी में डूबने [संगीत] से दो और लोगों की मौत हो गई। इसके साथ ही इस साल बाढ़ से जान गवाने वालों की संख्या बढ़कर 68 हो गई है। एएसडीएमए के मुताबिक राज्य के पांच जिलों में अब भी करीब 5,25,000 से ज्यादा लोग बाढ़ की मार झेल [संगीत] रहे हैं। हालांकि शनिवार तक यह आंकड़ा करीब 6,55,000 था। यानी [संगीत] पानी जरूर कम हुआ है लेकिन संकट अभी भी बहुत बड़ा है। सबसे ज्यादा असर ऊपरी असम के जिलों में देखने को मिल रहा है। चरायदेव सबसे ज्यादा प्रभावित जिला बना हुआ है। जहां करीब 1 लाख 90 हजार लोग अभी भी [संगीत] बाढ़ से घिरे हैं। शिवसागर में 1.5 लाख से ज्यादा लोग मुश्किलों का सामना कर रहे हैं।
जबकि जोरहाट में करीब 1ज़ [संगीत] लोग बाढ़ की चपेट में हैं। गोलाघाट और नगांव में भी हजारों परिवारों की जिंदगी अभी नॉर्मल नहीं हो पाई [संगीत] है। बाढ़ से निपटने के लिए राहत और बचाव का काम लगातार जारी है। भारतीय सेना, एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, [संगीत] अग्निशमन विभाग और स्थानीय पुलिस मिलकर लोगों को सुरक्षित जगहों तक पहुंचाने में जुटे हुए हैं। राज्य में 354 [संगीत] राहत शिविर और राहत वितरण केंद्र चलाए जा रहे हैं। जहां 37,724 से ज्यादा विस्थापित लोगों को ठहराया गया है। [संगीत] लेकिन मुश्किल सिर्फ लोगों के घरों तक सीमित नहीं है। इस बाढ़ ने असम की ग्रामीण अर्थव्यवस्था [संगीत] को भी बड़ा झटका दिया है। पूरे राज्य के 7 63 गांव पानी में डूब चुके हैं। करीब 48,742 हेक्टेयर [संगीत] खेती की जमीन बर्बाद हो गई है और किसानों की फसल पूरी तरह तबाह हो चुकी है। [संगीत] कई जगह सड़कें टूट गई हैं।
पुलों को नुकसान पहुंचा है और तटबंध भी क्षतिग्रस्त [संगीत] हुए हैं। नुमालीगढ़ में धनसरी नदी अब भी खतरे के निशान से ऊपर [संगीत] बह रही है। वहीं 88,000 से ज्यादा पालतू पशु और पोल्ट्री भी इस [संगीत] बार से प्रभावित हुए हैं। अब सवाल यह है कि आखिर असम में हर साल यही हालात क्यों [संगीत] बनते हैं? इसकी सबसे बड़ी वजह है ब्रह्मपुत्र नदी। ब्रह्मपुत्र नदी सिर्फ भारत ही नहीं दुनिया की सबसे बड़ी नदियों में से एक है। यह तिब्बत [संगीत] से यालुंग सांगू नाम से निकलती है। अरुणाचल प्रदेश से होकर असम में प्रवेश करती है। इसके बाद मानस, सुबंनसरी, [संगीत] कोपिली जैसे 50 से ज्यादा नदियां इसमें आकर मिल जाती हैं। यानी बरसात के मौसम में पानी की मात्रा कई गुना बढ़ [संगीत] जाती है। लेकिन असली परेशानी सिर्फ पानी की नहीं है। हिमालय से बहते हुए ब्रह्मपुत्र अपने साथ भारी मात्रा [संगीत] में मिट्टी, गाद और पत्थर भी लेकर आती है। सालों तक यही गाद नदी के तल में जमा होती रहती है।
इससे नदी की गहराई कम हो जाती है और इसकी पानी रोकने की क्षमता भी घट जाती [संगीत] है। नतीजा यह होता है कि थोड़ी ज्यादा बारिश होते ही नदी उफान पर आ जाती है और आसपास के इलाके पानी में डूब [संगीत] जाते हैं। दूसरी बड़ी वजह है बदलता मौसम जलवायु परिवर्तन का असर अब पूर्वोत्तर भारत में [संगीत] भी साफ नजर आ रहा है। पहले जहां बारिश कई दिनों में होती थी, अब कुछ घंटों में ही रिकॉर्ड बारिश हो जाती है। जब इतना ज्यादा पानी एक साथ गिरता [संगीत] है तो ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियां उसे संभाल नहीं पाती। इतना ही नहीं लगातार बारिश की वजह से पहाड़ों पर भूस्खलन भी होता है। पहाड़ों से आने वाला मलबा नदियों में जमा हो जाता है जिससे पानी का बहाव और धीमा पड़ जाता है। [संगीत] ऐसे में बाढ़ और ज्यादा खतरनाक हो जाती है। लेकिन सिर्फ प्रकृति को जिम्मेदार ठहराना भी सही नहीं [संगीत] होगा। इसमें इंसानों की भी बड़ी भूमिका है।
असम में कई प्राकृतिक जलभराव वाले इलाकों पर कब्जे हो चुके हैं। जंगलों की लगातार कटाई हुई है। जब जंगल कम होते हैं तो बारिश का पानी जमीन में समाने की बजाय सीधे नदियों में पहुंच जाता है। इससे नदियों [संगीत] का जल स्तर बहुत तेजी से बढ़ता है और बाढ़ का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। इसके अलावा राज्य के कई तटबंध काफी पुराने और कमजोर हो चुके हैं। तेज दबाव [संगीत] पड़ते ही यह टूट जाते हैं और पानी गांव में घुस जाता है। ऊपर से ब्रह्मपुत्र की एक [संगीत] और खासियत है कि ये वक्त-वक्त पर अपना रास्ता भी बदलती रहती है। इसलिए [संगीत] सिर्फ तटबंध बनाकर इस नदी को पूरी तरह कंट्रोल करना आसान नहीं [संगीत] है और इसीलिए हर साल असम में लगभग वही तस्वीर देखने को मिलती है। बारिश होती है, नदी उफान पर आती है, गांव डूबते हैं, लोग बेघर होते हैं, राहत अभियान चलता है और फिर अगले साल वही कहानी दोबारा दोहराई जाती है। यानी अगर इस समस्या का स्थाई समाधान निकालना है तो सिर्फ राहत सामग्री बांटने या लोगों को सुरक्षित जगह पहुंचाने से बात नहीं बनेगी। मजबूत तटबंध, नदियों की नियमित सफाई, जंगलों का संरक्षण, प्राकृतिक जलभराव वाले इलाकों को बचाना और जलवायु परिवर्तन से निपटने की लंबी योजना इन सभी पर एक साथ काम करना होगा। तभी असम को हर साल आने वाली इस बाढ़ की तबाही से सच में राहत मिल पाएगी। [संगीत]