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मुगल मक्का क्यों नहीं जाते थे?सच जानकर रूह कांप जाएगी।

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300 साल तक भारत की धरती पर राज करने वाले बाबर से लेकर औरंगजेब तक हर मुगल बादशाह ने खुद को इस्लाम का रक्षक कहा। दरबार में कुरान की आयतें गूंजती थी। मस्जिदें बनती थी। उलेमाओं को नवाजा जाता था। लेकिन इन्हीं मुगलों की लाइफ में एक ऐसा राज छिपा हुआ था जिसे इतिहास की किताबों से बड़ी सफाई से हटा दिया गया।

300 साल के इस पूरे दौर में 20 से भी ज्यादा मुगल बादशाह हुए। लेकिन इनमें से एक भी बादशाह कभी भी मक्का नहीं गया। आप जानते हैं कि हज इस्लाम के पांच बुनियादी स्तंभों में से एक है। इस्लाम कहता है कि जो हज करने के काबिल है उसका फर्ज है कि वो जिंदगी में एक बार हज जरूर करें।

मुगलों के पास ना पैसों की कमी थी ना ही रिसोर्सेज की कमी थी। तो फिर क्या था वो जिसने दुनिया के सबसे ताकतवर सुन्नी शासकों को अपने ही धर्म की सबसे पवित्र यात्रा से दूर रखा। क्या यह महज एक इत्तेफाक था या एक सोची समझी चुप्पी थी? इसका जवाब किसी मजहबी किताब में नहीं मिलता बल्कि 16वीं सदी की उस भयंकर सत्ता की लड़ाई में मिलता है जिसने दो सबसे बड़े इस्लामी साम्राज्यों को एक दूसरे का दुश्मन बना दिया। कैसे भारत के इन ताकतवर बादशाहों को समंदर में बैठे कुछ विदेशी लुटेरों के सामने घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया गया।

कौन से वो फैक्टर्स थे जिनकी वजह से मुगलों ने मक्का की तरफ रुख नहीं किया और मुगलों के खानदान से वो कौन था या कौन थी जिसने मक्का की यात्रा की थी। कैसे मक्का की यात्रा ना करने से उनकी सबसे बड़ी कमजोरी एक्सपोज हुई। ये सब जानेंगे आज के वीडियो में। तो वीडियो को पूरा देखिएगा क्योंकि अपना इतिहास नहीं जानोगे तो खुद को कैसे पहचानोगे। मुगलों के मक्का ना जाने की असली वजह को जानने से पहले हमें समझनी होगी उस दौर की पॉलिटिक्स। उस दौर का इस्लाम और सबसे बड़ी बात मुगलों की ताकत और मुगलों की कमजोरियां।

क्योंकि मक्का का सवाल एक बहुत छोटा सा सवाल है। असल में इस एक सवाल से जुड़ा हुआ है मुगलों की समुद्री ताकत का सवाल। ये भी आपको कहानी में धीरे-धीरे समझ में आता रहेगा। देखिए, 16वीं सदी की दुनिया आज की जैसी नहीं थी। तब आज के जैसे नेशन या राष्ट्र नहीं बल्कि एंपायर हुआ करते थे। और अक्सर एंपायर की पहचान उसके राजा के धर्म से होती थी। इस तरह अगर उस दौर की इस्लामी दुनिया को देखें तो तीन बड़ी इस्लामिक गन पाउडर ताकतें दिखाई देती हैं। इन तीनों में से एक थे मुगल।

भारत पर मुगलों का राज था। ईरान और मध्य एशिया पर एक दूसरी ताकत थी जिसे हम शिया सफवी साम्राज्य कहते हैं और तुर्की से लेकर मध्य पूर्व तक ऑटोमन एंपायर का डंका बजता था। अब जमीन पर ये तीनों इतने ताकतवर थे कि कोई बड़ी ताकत इन्हें जंग में हरा नहीं पाती थी। लेकिन इन तीनों के बीच भी एक बात को लेकर होड़ थी। होड़ इस बात की कि इस्लामी दुनिया का असली और अकेला नेता कौन है? जाहिर है कि अपनी नेतागिरी को साबित करने के लिए मक्का पर कंट्रोल जरूरी है। इसीलिए साल 1517 में जब भारत में मुगल आए भी नहीं थे तब ऑटोमन सुल्तान सलीम फर्स्ट ने मिस्र के मामलूक सुल्तानों को हरा दिया और इसके साथ ही मिस्र और हिजाज पर उनका डायरेक्ट कंट्रोल हो गया।

अब अगर आप हिजाज के बारे में नहीं जानते तो यह वही इलाका है जहां मक्का और मदीना दोनों पवित्र शहर बसे हुए हैं। इस कब्जे के साथ ही ऑटोमन सुल्तान ने खुद को दोनों पवित्र मस्जिदों का सेवक घोषित किया और पूरी सुन्नी दुनिया का खलीफा होने का दावा ठोक दिया। अब इसका मतलब साफ था अब से दुनिया भर के हर मुसलमान खासतौर पे सुन्नी मुसलमान को चाहे वो किसी भी साम्राज्य में क्यों ना रहे उसे ऑटोमन सुल्तान को अपना सर्वोच्च लीडर या रहनुमा मानना होगा। टाइमलाइन को देखें तो इस वक्त तक मुगल कोई बड़ी ताकत नहीं थे।

बाबर ने 1526 में पानीपत जीतकर मुगल सल्तनत की नींव रखी थी। लेकिन बाबर बहुत दिनों तक रूल नहीं कर पाए और 1530 के आसपास उनकी मृत्यु हो गई। बाबर की मौत के बाद हुमायूं को शेरशाह सूरी के हाथों बुरी तरह हराया गया और हुमायूं को भागकर ईरान के शिया दरबार में शरण लेनी पड़ी। इस तरह 1526 से लेकर हुमायूं की मौत यानी 1556 तक का टाइम पीरियड मुगलों के लिए बहुत ही क्रूशियल था।

मुगल तब इतनी बड़ी ताकत नहीं थे कि ऑटोमन एंपायर को आंख दिखा सकें या फिर मक्का पर अपना किसी भी तरह का दावा दिखा सके। मुगलों में जो असली स्टेबिलिटी आती है वो आती है अकबर के टाइम पीरियड में और इसी टाइम पीरियड में मुगलों और ऑटोमंस के बीच में एक कोल्ड वॉर शुरू हुई जिसने मुगलों को मक्का से हमेशा के लिए दूर कर दिया। अकबर सिर्फ एक बादशाह नहीं थे। वो बहुत ही ज्यादा एंबिशियस स्ट्रेटजिस्ट यानी महत्वाकांक्षी रणनीतिकार थे। वो खुद को खलीफाउ जमान यानी अपने युग का खलीफा मानते थे। मुगल दरबार में फर्रेइ यानी डिवाइन लाइट भी अकबर को माना जाता था और अकबर को जिल्ले इलाही भी कहा जाता है।

जिसका मतलब होता है ईश्वर की परछाई। कुल मिलाकर अकबर अपने इन सभी टाइटल से और अपने रुतबे से दिखाना चाह रहे थे कि उन्हें सीधे ईश्वर से या अल्लाह से शासन का अधिकार मिला है। इसीलिए वो किसी ऑटोमन सुल्तान के अंडर नहीं आ सकते। अधीन नहीं हो सकते और बस यहीं पर पूरा पेंच फंस जाता है। मक्का पर ऑटोमन सुल्तान का सीधा कंट्रोल था। अगर अकबर या कोई भी मुगल बादशाह हज करने जाता तो प्रोटोकॉल के मुताबिक उसे वहां पर एक स्वतंत्र शासक की तरह नहीं बल्कि ऑटोमन सुल्तान के मेहमान या फिर उससे भी बुरा एक सबोर्डिनेट अधीनस्थ की तरह जाना पड़ता। जरा सोचिए दुनिया के सबसे रईस बादशाह के लिए मक्का की जमीन पर किसी दूसरे सुल्तान के आगे सिर झुकाना क्या मायने रखता होगा।

यह दिखाता कि ग्लोबल हैसियत में अकबर की असल में कोई औकात ही नहीं है। आसान भाषा में समझे तो आज अगर दो सबसे बड़े देशों के मुखिया किसी तीसरे देश में मिले और वहां जाकर एक आदमी को दूसरे के नियम मानने पड़े उनके आगे झुकना पड़े तो कोई भी बड़ा नेता वहां जाने से पहले 100 बार सोचेगा। क्यों? क्योंकि इससे उसकी अपनी ताकत छोटी दिखने लगती है। मुगल बादशाह के लिए मक्का भी ठीक ऐसी ही जगह बन गई थी। वहां जाकर उसे ऑटोमन सुल्तान के इशारों पर चलना पड़ता और यह बात उसकी शान में गुस्ताखी थी।

इसीलिए मुगल एक अजीब सी उलझन में फंस गए थे। अगर मक्का ना जाओ तो अपनी ही जनता सवाल पूछेगी कि इस्लाम का रक्षक भला हज क्यों नहीं करता? और अगर चले जाओ तो ऑटोम्स के सामने झुकना पड़ता। यानी सीधे-सीधे अपनी हार माननी पड़ती। इस कंफ्यूजन के जाल से निकलने के लिए मुगलों ने इस्लामिक किताबों को पलटवाना शुरू किया और उनको मिल गया एक ऐसा टूल जिससे यह अपने आप को मक्का जाने से बचा सकते थे। इस्लामी थियोलॉजी या न्याय शास्त्र में एक शब्द का जिक्र है मसलाहा इसका मतलब होता है पब्लिक इंटरेस्ट। तो मसलाहा का कांसेप्ट कहता है कि अगर किसी शासक के राज्य छोड़ने से उसकी सत्ता पर खतरा हो या की आशंका हो तो उसके लिए उसे खुद पर्सनली हज करना जरूरी नहीं है। मुगलों ने इस कांसेप्ट का सहारा लिया। हालांकि मुगलों का यह डर बेबुनियाद भी नहीं था। मुगल दरबार साजिशों का अड्डा था।

अकबर को अपने सौतेले भाई के विद्रोह का सामना करना पड़ा। जहांगीर ने अकबर के खिलाफ बगावत की थी। शाहजहां ने जहांगीर के खिलाफ बगावत की थी और औरंगजेब ने तो अपने ही पिता को कैद तक कर लिया था। वहीं हज की यात्रा में अगर आप देखें तो महीनों या कभी-कभी सालों लग जाते थे। इतने लंबे वक्त तक राजधानी से दूर रहने का मतलब था अपने दुश्मनों को तख्ता पलट का खुला निमंत्रण देना। सोचिए कि अगर बादशाह खुद समंदर पार करके मक्का में गया हुआ है और उसी बीच आगरा या दिल्ली में कोई शहजादा या कोई भी व्यक्ति खुद को नया बादशाह घोषित कर दे तो खबर पहुंचने में ही महीने लग जाएंगे।

तब तक तख्त पर किसी और का कब्जा हो चुका होगा और बादशाह इरिलेवेंट हो जाएंगे। इसीलिए यह वाला रिस्क कोई भी समझदार बादशाह तो उठाने को तैयार नहीं था। इंटरेस्टिंग बात ये भी है कि खुद ऑटोमन एंपायर जिनके कब्जे में हिजाज था उनके भी 36 सुल्तानों में से एक ने भी कभी भी हज नहीं किया जबकि मक्का उन्हीं के एंपायर का हिस्सा था। कहने का मतलब है कि डर सबको लगता है गला सबका सूखता है। लेकिन क्या ये डर सिर्फ इस बात का था कि उनकी कुर्सी छीन जाएगी? क्या मुगल सेना बादशाहों को सेफली मक्का नहीं ले जा सकती थी? इस सवाल के जवाब में एक नई दिक्कत शुरू होती है जिसकी वजह से भी मुगल मक्का नहीं गए।

यानी कि ये हमारे वीडियो का आप दूसरा पॉइंट समझ सकते हैं। ये दिक्कत दरअसल दरबार की नहीं बल्कि उस रास्ते की थी जिसके थ्रू मक्का जाया जाता था। भारत से मक्का जाने के दो रास्ते थे। एक रास्ता जो जमीन से होकर जाता था और दूसरा रास्ता जिसमें समुद्र की यात्रा करनी होती थी। जमीनी रास्ते को अगर देखें तो यह ईरान के शिया सफी साम्राज्य से होकर गुजरता था। मुगल कट्टर सुन्नी थे और सफी कट्टर शिया थे। मैंने अपने इस वाले वीडियो में बताया था कि कैसे कंधार को लेकर दोनों के बीच लगभग हमेशा ही टेंशन बनी रहती थी। अब किसी सुन्नी बादशाह का अपनी बहुत बड़ी सेना और खजाने के साथ दुश्मन के इलाके से होकर गुजरना जैसा कदम होता।

तो यानी कि कहने का मतलब है जमीन वाला रास्ता प्रैक्टिकली आप बंद ही मानो। अब बचा दूसरा रास्ता यानी समुद्र वाला रास्ता। यह रास्ता गुजरात के सूरत बंदरगाह से अरब सागर होते हुए लाल सागर और फिर जिद्दा तक जाता था जो कि मक्का का एंट्री गेट माना जाता है। अब इतनी बातें सुनने के बाद आप इमेजिन करो। सूरत के बंदरगाह पर एक बहुत बड़ा मुगल जहाज खड़ा है। उसमें सैकड़ों तीर्थ यात्री हैं। उनका सामान है और उनकी मक्का जाने की उम्मीदें हैं।

लेकिन जहाज हिल नहीं सकता। क्यों? क्योंकि समंदर पर मुगलों का नहीं बल्कि एक यूरोपियन देश का राज चलता है। जी हां। पुर्तगाली भारत में मुगलों से भी पहले आए थे। 1498 में वास्कोडिगम आया था। आपको याद होगा। और अकबर के काल तक आते-आते इन पुर्तगालियों ने हिंद महासागर और अरब सागर पर अपना तगड़ा कंट्रोल किया हुआ था। पुर्तगाली कार्टेज नाम का एक डॉक्यूमेंट जारी करते थे जो लोगों को समुद्र में जहाज उतारने की इजाजत देता था। यानी कि मुगल जिन्होंने भारत में कई राजाओं को झुकाया। वो बिना इस एक डॉक्यूमेंट के अपना जहाज समुद्र में नहीं निकाल सकते थे। यही मुगलों की सबसे बड़ी कमजोरी भी थी जिसके बारे में मैंने वीडियो की शुरुआत में आपसे कहा था कि मक्का ना जाने की इस बात ने मुगलों की एक कमजोरी को भी एक्सपोज किया था। दोस्तों मुगल मेनली जमीनी लड़ाके थे।

घोड़ों और तोपों के माहिर थे। समंदर पर उनका कभी कोई डायरेक्ट कंट्रोल नहीं रहा। यहां आपको एक बात समझनी जरूरी है। वेस्टर्न हिस्टोरियंस अक्सर मुगलों पर तंज कसते हुए उनकी सिचुएशन को सी ब्लाइंडनेस कहते हैं। यानी कि मुगल इतने बेवकूफ थे कि उन्होंने कभी नेवी बनाने की सोचा ही नहीं। लेकिन सही मायनों में देखा जाए तो मुगल इतने भी बेवकूफ नहीं थे। बल्कि अगर उनकी कहानी आपको पता चलेगी तो वो आपको प्रगमेटिक लगेंगे। मुगलों ने नेवी अपनी बेवकूफी की वजह से नहीं बल्कि रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट और एक भयंकर ऐतिहासिक सच के चलते नहीं बनाई थी। अकबर के सत्ता में आने से कुछ दशक पहले ही ऑटोमन एंपायर ने हिंद महासागर से पुर्तगालियों को खदेड़ने के लिए अपनी बहुत बड़ी नेवी भेजी। लेकिन पुर्तगालियों ने उन्हें बुरी तरह से हरा दिया। जब मुगलों ने देखा कि दुनिया की सबसे बड़ी इस्लामिक नेवी पुर्तगालियों के एडवांस और जंगी जहाजों का कुछ नहीं बिगाड़ सकी तो उन्हें समझ आ गया कि जीरो से नई नेवी बनाना असल में पैसे की बर्बादी होगी।

इसके अलावा मुगल एंपायर की 90% से ज्यादा इकॉनमी जमीन के लगान पर टिकी थी। उनके असली दुश्मन उज़बेक और अफगान ये जमीन से हमला करते थे। इसीलिए मुगलों ने एक स्मार्ट कॉर्पोरेट स्ट्रेटजी अपनाई। उन्होंने अपनी समुद्री सुरक्षा जंजीरा जो कि कोंकर तट पर पड़ता है वहां के सिद्धियों को आउटसोर्स कर दी। मुगल खजाने से इन अफ्रीकी मूल के नाविकों को हर साल ₹ लाख दिए जाते थे ताकि वो मुगल जहाजों की सुरक्षा करें। लेकिन अपनी पर्सनल मुगल नेवी के ना होने का फायदा पुर्तगालियों ने उठाया। वास्कोडि गामा के आने के बाद पुर्तगालियों ने अरब सागर और लाल सागर पर लगभग अपनी मोनोपोली बना ली थी। उन्होंने एक बहुत ही क्रूर लाइसेंस सिस्टम शुरू किया जिसे कार्टेज सिस्टम कहा जाता है। बिना पुर्तगाली परमिट के कोई जहाज समंदर में नहीं उतर सकता था। अगर कोई जहाज बिना परमिट के पकड़ लिया जाता तो उसके जहाज को लूट लिया जाता। यात्रियों को गुलाम बना लिया जाता और फिर जहाज को कभी-कभी डूबा भी दिया जाता।

अब सोचिए दुनिया के सबसे अमीर एंपायर को अपने ही बंदरगाह से जहाज निकालने के लिए कुछ मुट्ठी भर विदेशी लोगों की परमिशन की जरूरत पड़ती थी। और इस अपमान में एक धार्मिक कांटा और भी था। इन परमिट्स पर वर्जिन मैरी और ईसा मसीह की तस्वीरें छपी होती थी। यह मूर्ति पूजा के सख्त विरोधी सुन्नी मुसलमानों के लिए एक तरह से हराम वाला डॉक्यूमेंट था। फिर भी मजबूरी में मुगलों को यह अपमान झेलना पड़ता था। लेकिन सवाल है कि पुर्तगाली आखिर तीर्थ यात्रियों को क्यों रोक रहे थे? क्या यह सिर्फ एक धार्मिक टकराव था? बिल्कुल नहीं। धर्म सिर्फ एक मुखौटा था। असली खेल पर्दे के पीछे पैसे का चल रहा था। उस दौर में जो हज था वो सिर्फ एक धार्मिक यात्रा नहीं थी बल्कि 16वीं सदी के सबसे बड़े ग्लोबल एक्सपो में से एक था। भारतीय तीर्थ यात्री अपने साथ सूती कपड़े, रेशम, नील और मसाले ले जाते।

मक्का के बाजार में इसको वो बेचते और बदले में भारी मात्रा में सोना और चांदी लेकर लौटते। यह चांदी अमेरिका की खदानों से निकलकर यूरोपियन व्यापारियों के जरिए अरब तक पहुंचती थी। भारत में अपनी चांदी बहुत कम थी। मगर मुगल सिक्के इसी इंपोर्टेड चांदी से ढलते थे। आज के दौर से कंपेयर करें तो ये कुछ वैसा ही था जैसे आज कोई देश अपनी ज्यादातर विदेशी मुद्रा भंडार यानी फॉरेन रिजर्व के लिए एक ही ट्रेड रूट पर निर्भर हो और वो रास्ता किसी और की मुट्ठी में हो। मतलब मक्का के बाजार पर जिसका कब्जा दुनिया की चांदी और अर्थव्यवस्था पर उसी का दबदबा। पुर्तगाली इस बात को अच्छे से समझते थे। हज के रुकने का मतलब था मुगलों की इकॉनमी पर भी चोट करना। उधर अकबर को भी यह पूरा खेल समझ में आता था। इसलिए उसने की बजाय डिप्लोमेसी का रास्ता अपनाया।

1575 में अकबर ने पूरी इस्लामी दुनिया को चौंका दिया। इन्होंने एक बहुत बड़ा कारवां मक्का में भेजा। इंटरेस्टिंग बात यह है कि इस कारवा को किसी सेनापति या शहजादे ने नहीं बल्कि मुगलशाही महिलाओं ने लीड किया। इस कारवा की मुखिया थी अकबर की बुआ और बाबर की बेटी गुलबदन बेगम। गुलबदन बेगम को भेजने के पीछे एक बहुत चालाक सोच थी। अगर कोई मुगल शहजादा खुद जाता मक्का की यात्रा के लिए तो ऑटोमन सुल्तान उसे सीधे अपनी सत्ता के लिए खतरा मानता। लेकिन महिलाओं को कोई सुल्तान अपने तख्त के लिए खतरा नहीं मान सकता था।

यहां आपको यह भी समझना जरूरी है कि मुगल दौर की औरतें कमजोर या महलों में कैद कोई सामान्य औरतें नहीं थी। वो व्यापारिक टकून होती थी। अपने जहाजों और जागीरों की मालकिन थी। अपने फैसले खुद लेती थी। गुलबदन बेगम ने खुद हुमायूंनामा जैसी किताब लिखी थी। अपने पिता और अपने भाई के दौर की आंखों देखी गवाह बनकर उन्होंने ये किताब लिखी। यानी अकबर ने किसी कमजोर औरतों का जत्था नहीं भेजा। उसने भेजा था अपने एंपायर का सबसे भरोसेमंद, सबसे एक्सपीरियंस्ड और शायद सबसे ज्यादा इंपैक्टफुल डिप्लोमेटिक चेहरा। बस तलवार की जगह उसके हाथ में दान की थैली थी। जब यह कारवा सूरत पहुंचा तो पुर्तगालियों ने वहां भी रंगदारी वसूली। अपना कारतज देने में आनाकानी की।

आखिरकार गुलबदन बेगम को अपने निजी और कीमती जागीर उन्हें सौंपनी पड़ी। तब जाकर रास्ता मिला। अकबर ने इस यात्रा के लिए इतना पैसा दिया जिसको आज इमेजिन करना भी मुश्किल हो जाएगा। हिस्टोरिकल डॉक्यूमेंट के हिसाब से लगभग ₹6 लाख जो आज के हिसाब से अरबों में बैठते हैं। जब यह कारवा जिद्दा पहुंचा तो वहां के लोग मुगलों की शानो शौकत देखकर दंग रह गए। लेकिन असली खेल मक्का पहुंचने के बाद शुरू हुआ। गुलबदन बेगम और उनकी साथी महिलाएं 4 साल तक मक्का मदीना में डटी रही। इन्होंने खुद को यहां का परमानेंट रेजिडेंट घोषित कर दिया और इतना दान दिया कि पूरा माहौल बदल गया। मक्का का लोकल शासक यानी जो गवर्नर होता है वो ऑटोमन खलीफा से ज्यादा अकबर के प्रति लॉयल दिखने लगा। यह एक तरह से मुगल सॉफ्ट पावर की सबसे बड़ी जीत थी।

लेकिन इस अनलिमिटेड पैसे ने कुछ ऐसा भी किया जिसकी उम्मीद शायद खुद अकबर को नहीं थी। मक्का की आबादी उस वक्त 2000 से ज्यादा नहीं थी। एक डेजर्ट का शहर जो हर चीज बाहर से मंगाता था। जब इतनी भारी मात्रा में सोना चांदी अचानक इस बाजार में उतरा तो बहुत तेजी से मुद्रास्फीति यानी इनफ्लेशन आया। पानी, अनाज, ऊंट का चारा सब कुछ आसमान छूने लगा। जो पैसा दान बनकर आया था वो लोकल लोगों के लिए एक तरह से शार्प बनने लगा। इस्तांबुल में बैठे सुल्तान मुराद तृतीय ये सब बहुत गौर से देख रहे थे। मक्का में मुगल एक पैरेलल गवर्नमेंट चला रहे थे और यह उसके खलीफा होने के दावे पर सीधा-सीधा अटैक था। 1580 में इन्होंने एक नहीं बल्कि तीन बहुत ही सख्त फरमान जारी किए। मुगल महिलाओं को तुरंत हिजाज से बाहर निकाला दिया जाए।

चाहे जबरदस्ती ही क्यों ना करनी पड़े। अकबर के भेजे दान को गरीबों में बांटने पर रोक भी लगा दी गई। मजबूरी में गुलबदन बेगम का कारवा भारी अपमान के साथ मक्का छोड़ने पर मजबूर हुआ। लेकिन यह अपमान यहीं खत्म नहीं हुआ। जब ये कारवा वापसी में अदन बंदरगाह पहुंचा तो वहां के ऑर्थोतमन गवर्नर ने मुगल महिलाओं को महीनों तक रोके रखा। उनके साथ बुरा बर्ताव किया। जो औरतें रानियों जैसी थी वो बंधक की हालत में रखी गई। इस बीच भारत में अकबर एक अलग ही आइडियोलॉजिकल जंग लड़ रहे थे। इसका सीधा असर मक्का के रिश्तों पर भी पड़ने वाला था। 1579 में मुगल महिलाओं के मक्का से निकाले जाने से यानी 1580 से ठीक एक साल पहले अकबर ने दरबार के उलेमाओं की बढ़ती ताकत को कुचलने का फैसला किया। इसके लिए इन्होंने एक हिस्टोरिकल डॉक्यूमेंट जारी किया जिसे महजर कहा जाता है। अकबर मखतूम उल मुल्क जैसे कट्टरपंथी उलेमाओं से परेशान थे जो उसकी लिबरल पॉलिसीज का विरोध करते थे। महजर का सीधा मतलब था कि अब से भारत में इस्लामी कानून की जो एक्सप्लेनेशन है उसका सर्वोच्च अधिकार मुगल बादशाह के पास होगा। उलेमाओं की सत्ता को कुचलने के लिए उठाया गया यह कदम ऑटोमंस के लिए एक सीधा-सीधा मैसेज था।

मैसेज ये कि भारत के मुसलमानों का फैसला अब इस्तांबुल के खलीफा से नहीं बल्कि आगरा के मुगल बादशाह से होगा। इसके बाद जब 1580 में गुलबदन बेगम का अपमान हुआ और मक्का से निकाले जाने की खबर अकबर तक पहुंची तो उसने तुरंत मक्का को मिलने वाला राजकीय दान बंद कर दिया। अकबर ने सूफिज्म को बढ़ावा दिया और अजमेर शरीफ जैसी दरगाहों की जियारत को प्रोत्साहित किया ताकि भारतीय मुसलमान मक्का जाने की बजाय भारत में ही अपनी आस्था को पूरा कर सके। लेकिन दोस्तों यहां एक और दिलचस्प मोड़ आता है। मुगल दरबार के इतिहासकारों ने इस पूरे इंसिडेंट को इतिहास से मिटाने की कोशिश की। अकबर के दरबारी इतिहासकार अबुल फजल ने अपनी मशहूर किताब अकबरनामा में लिखा कि मुगल महिलाएं इसलिए वापस लौटी क्योंकि वो अकबर को बहुत याद कर रही थी। ऑटोमन सुल्तान के उस अपमानजनक फरमान का कहीं कोई जिक्र नहीं मिलता।

सदियों तक इतिहासकार इसी कहानी को सच मानते रहे। सच्चाई सामने तब आई जब मॉडर्न इतिहासकारों खासकर एन आर फारूकी और माइकल पियर्सनर ने इस्तांबुल के टॉप कापी पैलेस आर्काइव्स खंगाले। वहां मिले मुहिम में दफ्तर लेरी यानी महत्वपूर्ण मामलों के रजिस्टर में सुल्तान मुराद तृतीय के वही सख्त आदेश दर्ज मिले जिन्होंने अबुल फजल के लिखे को झूठा साबित कर दिया। तो क्या इतने बड़े पॉलिटिकल और डिप्लोमेटिक टकराव के बाद मुगलों ने अपनी नेवी बनाई? क्या उन्होंने सबक सीखा कि उनकी कमजोरी है? जवाब है नहीं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वो समुंदर पर पूरी तरह बेबस थे। 1613 में इसका सबसे बड़ा सबूत सामने आया। जहांगीर की मां यानी मरियम उज जमानी जिनको कई बार जोधाबाई कहकर भी हम जानते हैं उनका बहुत बड़ा जहाज था रहीमी।

इसे पुर्तगाली लुटेरों ने वैलिड कारतताज होने के बावजूद हाईजैक कर लिया। अक्सर कहा जाता है कि जहांगीर समंदर में बेबस रहा और मुगल सिर्फ खत लिखते रहे लेकिन सच्चाई इसके उलट है। जहांगीर ने एसिमिट्रिक वॉरफेयर की स्ट्रेटजी अपनाई। इन्होंने तुरंत सूरत में पुर्तगालियों का सारा ट्रेड और गोदाम बंद करा दिए। दमन की घेराबंदी कर दी और आगरा में जेसुई पादरियों के चर्च बंद करवा दिए। जमीन पर हुए इस भयंकर आर्थिक नुकसान की वजह से पुर्तगालियों को घुटने टेकने पड़े और मुगलों को हर्जाना देना पड़ा। मुगल अपनी जमीनी ताकत से समुंदर की कमजोरियों को बैलेंस करना जानते थे। सबसे पहला मामला औरंगजेब का था। सत्ता हथियाने के बाद उसने मक्का के शरीफ को भारी खजाना भेजा। लेकिन जब मक्का के शरीफ की तरफ से बार-बार और पैसों की लालची मांग आने लगी तो औरंगजेब ने पैसे भेजना बंद कर दिया यह कहकर कि अरब के लालची अमीरों की जेबें भरने से बेहतर है कि वो पैसा भारत के गरीबों में बांट दिया जाए। औरंगजेब ने भी अपनी नेवी नहीं बनाई बल्कि उसने अपनी पूरी नेवी की सिक्योरिटी सिद्धियों को आउटसोर्स कर रखी थी। 1689 1689 की चाइल्ड्स इसका सबसे बड़ा सबूत है। जब ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने मुगल जहाजों को लूटा तो औरंगजेब के आदेश पर सिद्धि याकूत खान ने अपनी नेवी के साथ बॉम्बे में अंग्रेजों को बुरी तरह खदेड़ दिया। अंग्रेजों को औरंगजेब के दरबार में जमीन पर नाक रगड़ कर माफी मांगनी पड़ी और ₹1.5 लाख का हर्जाना देना पड़ा। कुल मिलाकर मुगल बादशाहों का मक्का ना जाना कोई लाचारी नहीं थी

बल्कि डिप्लोमेटिक घमंड और बैलेंस ऑफ पावर का खेल था। उन्होंने नेवी ना बनाने का जो फैसला लिया वो उनकी अज्ञानता नहीं बल्कि उस दौर के हिसाब से एक प्रैक्टिकल और इकोनॉमिक डिसीजन था। लेकिन बहुत लंबे टाइम पीरियड में यही प्रैक्टिकिटी उनकी सबसे बड़ी ऐतिहासिक भूल साबित हुई। मुगल ये भांप ही नहीं पाए कि फ्यूचर की सत्ता जमीन से नहीं बल्कि ग्लोबल समुद्री ट्रेड से तय होगी। जब तक वो ये समझ पाते यूरोपियन ताकतों ने समंदर पर इतना मजबूत शिकंजा कसा कि आखिरकार ये जमीन के अजय शेर अपने ही महलों में कैद होकर रह गए। तो दोस्तों ये थी कहानी कि मुगल मक्का क्यों नहीं गए और उससे एक बहुत ही कनेक्टेड चीज कि मुगल मक्का नहीं गए और उनसे उनकी समुद्री ताकत की कमजोरी भी एक्सपोज होती थी।

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