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जंतर-मंतर पर ही क्यों होता है हर प्रोटेस्ट ?वजह जानकर चौंक जाएंगे।

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2003 में एक फिल्म आई थी आज नाना पाटेकर, परेश रावल और सुचिंद्र बाली की फिल्म। इस फिल्म की शूटिंग हुई थी बनारस में। नाना पाटेकर शूटिंग के लिए बनारस के चिटौनी गांव पहुंचते हैं। यहां उनकी मुलाकात संतोष मूरत सिंह से होती है। नानाlसंतोष को अपने साथ मुंबई लेकर चले आए। साल था 2000 का। संतोष उनके कुक के रूप में काम करने लगे वहां। मुंबई में ही उनकी मुलाकात सुप्रिया अंडागले से हुई। दोनों ने शादी कर ली।

2002 में जब संतोष अपने गांव लौटा तो एक दलित लड़की से शादी करने की वजह से परिवार और गांव ने तमाम लोगों ने गांव के उनका सामाजिक बहिष्कार कर दिया। गालियां दी, मारपीट की। सिर्फ इतना ही नहीं राजस्व विभाग विभाग की मदद से संतोष की पैतृक जमीन पर कब्जा भी कर लियागया और सरकारी रिकॉर्ड में उसे घोषित करवा दिया गया। संतोष ने कई साल खुद कोजीवित साबित रखने की लंबी लड़ाई लड़ी।

देश की राजधानी में बैठे अभिजात्य को यह पता होना चाहिए कि कुछ साल पहले 2017-1 के आसपास वह संतोष ही था जो इसी जंतरमंतर पर सर्दी की रात में अपने इकलौते दोस्त उस भूरेlकुत्ते को गले लगाकर सो जाता था। प्रेमचंद की कहानी दिल्ली की सड़कोंlपर खुद को चरितार्थ कर रही थी।

वो संतोष ही था जो सफेद चादर लपेट कर और हाथ में तख्तीलेकर इसी जंतरमंतर पर अकेला बैठा रहता था जिस पर लिखा होता था साहब मैं जिंदा 30 साल से अधिक की अपनी यात्रा में दिल्ली का जंतरमंतर ऐसे अनेक और अनोखे छोटे-बड़े विरोध प्रदर्शनों का गवाह रहा है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में विरोध की आवाज का एक कोना असहमति की एक लंबी और छायादार सड़क इन दिनों में ही एक प्रोटेस्ट को लेकर यह सड़क यह जंतरमंतर चर्चा में है। लेकिन जंतरमंतर का आविष्कार सिर्फ विरोध प्रदर्शनों या धरने के लिए नहीं हुआ था। सदियों पहले यह एक दूरगामी वैज्ञानिक सोच का नतीजा था। कल्पनाओं में आकार लेने से लेकर अस्तित्व को प्राप्त करने और फिर ऐतिहासिक धरोहर बनने के अपने लंबे सफर में जंतरमंतर कई कहानियां सुनाता है।

तो आइए आज आपको भी सुनाते हैं कहानी इसी जंतरमंतर की जो शायद कभी इतने बड़े-बड़े प्रदर्शनों को स्थान नहीं दे पाता। अगर दिल्ली के बीचोंबीच 5 लाख किसान और उनके [संगीत] गायों ने कब्जा ना किया होता। नमस्कार स्वीकार कीजिए। मैं हूं अभिषेक और आप देख रहे हैं किस्सों का टाइम ट्रेवल और इतिहास की ललना टॉप कहानियों वाला आपका शो तारीख। दिल्ली का जंतरमंतर ना कोई मकबरा है ना कोई मंदिर। ना तो इसमें मुगल शैली की सजावट है ना हिंदू मंदिरों में मिलने वाले धार्मिक प्रतीक ना इसके ऊपर गुंबद है ना कोई बारीक जालीदार नक्काशी वास्तुकला के लिहाज से यह भारतीय उपमहाद्वीप की पारंपरिक स्थापत्य परंपरा से कुछ अलग सा लगता है। लाल चूने के पलस्तरलंगा यह स्मारक आकार में पूरी तरह जामतीय है। जामती यानी ज्योमेट्रिकल। पहली नजर में यह अपने समय से आगे कीचीज लगता है।

यानी मध्यकालीन के बजाय आधुनिक वास्तकला का कोई नमूना। जब इस इमारत को हम 18वीं सदी के शुरुआती दौर की ऐतिहासिक परिस्थितियों में रखकर देखते हैं तब इसका वास्तविक [संगीत] उद्देश्य थोड़ा-थोड़ा समझ आने लगता है। यह वो समय था जब राजनीतिकत्वाकांक्षाएं, [संगीत] वैज्ञानिक जिज्ञासाएं और ज्ञान को लेकर कई बहसें [संगीत] चल रही थी और विचार एक दूसरे से टकरा रहे थे। दिल्ली का यह जंतरमंतर आमेर के राजपूत शासक सवाई जय सिंह द्वितीय द्वारा बनवाई गई पांच वेधशालाओं में सबसे पहला था। वेधशाला का मतलब ऑब्जरवेटरीज। बाद में जयपुर, उज्जैन, वाराणसी और मथुरा में भी ऐसी वेधशालाएं बनाई गई।

दिल्ली स्थित जंतरमंतर का निर्माण 1724 में पूरा हुआ था। इसे शाहजहानाबाद के दक्षिण में बनवाया गया और उस समय के मुगल सम्राट के लिए एक उपहार के रूप में देखा गया। कुछ विद्वान इसे पूरी तरह भारतीय खगोल विज्ञान की परंपरा का हिस्सा मानते हैं तो कुछ इसे समरकंद की वेधशालाओं और इस्लामी खगोलीय परंपराओं से जोड़ते हैं। वहीं कुछ शोधकर्ताओं को इसमें यूरोप [संगीत] का प्रभाव भी नजर आता है। एंड्रूट इंडियन हिस्ट्री के लिए एक लेख व जंतरमंतर वाज मोर देन जस्ट एन ऑब्जरवेटरी में श्रेया कंबोज लिखती हैं कि सवाई जय सिंह द्वितीय की सभी पांच वेदशालाओं को आज आमतौर पर जंतरमंतर कहा जाता है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि जयपुर रियासत के आधिकारिक अभिलेखों [संगीत] में यह नाम मिलता ही नहीं है। सवाई जय सिंह एंड हिज एस्ट्रोनॉमी के लेखक वी एन शर्मा के अनुसार दस्तावेजों में लगातार जंत्र शब्द का इस्तेमाल [संगीत] होता है। यह संस्कृत से निकला शब्द है जिसका अर्थ खगोलीय उपकरणों से जुड़ा है। [संगीत] आज जो शब्द चलन में है यानी जंतर यह संभवत जंत्र या यंत्र का बोलचाल वाला रूप हो। जबकि मंत्र या तो तुक मिलाने के लिए जोड़ा गया होगा जैसा कि हिंदुस्तानी भाषा में अक्सर होता है।

या फिर यह मंत्र शब्द से जुड़ा हुआ हो सकता है जिसका अर्थ पवित्र उच्चारण या जादुई शब्द होता है। दिलचस्प बात यह है कि दिल्ली की वेदशाला के लिए जंतरमंतर नाम का सबसे पुराना ज्ञात उल्लेख 200 वर्ष से भी पहले का मिलता है। 1803 में इस स्थल का दौरा करने वाले मेजर विलियम थर्ड ने अपने विवरण [संगीत] में इस नाम का इस्तेमाल किया। इससे यह संभावना बनती है कि जंतरमंतर शब्द सबसे पहले दिल्ली में स्थानीय रूप में प्रचलित हुआ। बाद में जयपुर, उज्जैन, मथुरा, वाराणसी के अन्य वेधशालाओं के लिए इसका इस्तेमाल होने लगा। दिल्ली की वेदशाला के निर्माण की कहानी 1719 में मुगल दरबार में हुए एक विवाद से जुड़ी है।

उस समय हिंदू और मुस्लिम ज्योतिषी इस बात पर सहमत नहीं हो पा रहे थे कि सम्राट मोहम्मद शाह के किसी सैन्य अभियान पर निकलने की कौन सी तारीख सबसे शुभ होगी। इस [संगीत] पूरे घटनाक्रम के केंद्र में सवाई जय सिंह द्वितीय थे। जिन्हें खगोल विज्ञान और गणित में बहुत दिलचस्पी थी। जय सिंह का मानना था कि उस समय इस्तेमाल किए जा रहे छोटे उपकरणों से सटीक माप नहीं मिलती है। इस वजह से उनके मन में एक वेधशाला का विचार आया। उन्होंने [नाक से की जाने वाली आवाज़] सम्राट मोहम्मद शाह से [संगीत] इसके अनुमति मांगी। अब सवाल यह आता है कि आखिर सम्राट ने अपने एक अधीनस्थ शासक को राजधानी के भीतर इतनी बड़ी और भव्य वेधशाला बनाने की अनुमति क्यों दी? दिल्ली में वेधशाला बनवाने की जय सिंह की योजना को इस तरह से भी देखा जा सकता है कि वह सीधे मुगल सत्ता को चुनौती दिए बिना विज्ञान के माध्यम से अपनी प्रतिष्ठा और प्रभाव को अपनीरियासत की सीमाओं से बाहर तक पहुंचाना चाहते थे। दूसरी ओर सम्राट के भी अपने राजनीतिक कारण थे। उस समय भारतीय उपहाद्वीप में शुभ अशुभ मुहूर्त और ज्योतिषीय मान्यताओं का गहरा प्रभाव था।

साम्राज्य की स्थिरता को भी कई बार धार्मिक अनुष्ठानों और ग्रह नक्षत्रों से जोड़कर देखा जाता था। इसलिए ग्रहों की स्थिति का सटीक ज्ञान बहुत महत्वपूर्ण माना जाता था। जय सिंह ने अपनी प्रसिद्ध किताब जीजे मोहम्मद शाही में 1018 तारों की एक नई और बिल्कुल सटीक सूची दी। कछवाहा राजपूतों की सूर्यवंशी परंपरा से जुड़े जय सिंह स्वयं को सूर्यदेव और भगवान राम का वंशज मानते थे। किताब जी मोहम्मद शाही [संगीत] की शुरुआत ही इस बात से होती है कि वे इन वेदशालाओं का निर्माण भारतीय पंचांग प्रणाली को और ज्यादा सटीक बनाने के उद्देश्य से कर रहे हैं ताकि धार्मिक अनुष्ठानों और कृषि से जुड़े कार्यों के लिए आवश्यक खगोलीकर गणनाएं और अधिक विश्वसनीय हो सके। अब जंतरमंतर में बने कुछ विशालकाय यंत्रों की भी बात। पहला है सम्राट यंत्र जिसे सर्वोच्च उपकरण कहा जाता है। मूल रूप से पारंपरिक सूर्य घड़ी का एक विशाल रूप जिसे अत्यंत सटीक समय मापने के लिए बनाया गया था।

वहीं राम यंत्र और जय प्रकाश यंत्र जैसे उपकरणों के ज्योमेट्रिकल स्ट्रक्चर में वैदिक यज्ञ वेदियों यानी यज्ञ करने के लिए बनाई गई वेदियों की झलक [संगीत] साफ दिखाई देती है। इसके अलावा ष्टांग यंत्र, दक्षिणोत्तर भित्ति, मिश्र यंत्र, आगरा यंत्र भी हैं। सबका अलग-अलग काम। जय सिंह की इस खगोलीय परियोजना पर इस्लामी दुनिया का भी गहरा प्रभाव दिखाई देता है। समरकंत [संगीत] और मराखा जैसी मशहूर वेदशालाओं की परंपरा और जीस सुल्तानी जैसी खगोल विज्ञान की किताबों का उस समय काफी असर था। दिल्ली जंतरमंतर के कम से कम दो उपकरण राम यंत्र और सम्राट यंत्र समरकंड की वेधशाला के उपकरणों से काफी मिलते जुलते हैं। एनरूट इंडियन हिस्ट्री के अपने लेख में श्रेया कंबोज लिखती हैं कि यूरोपीय खगोलीय ज्ञान के साथ जय सिंह का संवाद सबसे जटिल था। यह संवाद [संगीत] मुख्य रूप से मुगल दरबार में सक्रिय जैसिविट मिशनरियों के जरिए से हुआ था।

इसमें फादर इमैनुअल डी फिगरेदो सबसे खास थे। उन्होंने गणित औरखगोल विज्ञान से जुड़े विषयों पर जय सिंह को सलाह दी। जय सिंह ने फिगरेद्रो को लिसबन भेजा ताकिवह यूरोप से खगोल विज्ञान की नई-नई जानकारियां और आंकड़े लेकर आए। इसके बदले जय सिंह ने अपने राज्य में मिशन गतिविधियों के लिए चर्च स्थापित करने की अनुमतिदी।

1734 तक फ्रांसीसी जे स्वीट इस काम में प्रमुख भूमिका निभाने लगे और बाद में जर्मन पादरियों ने तकनीक की सहायता का जिम्मा संभाला। फिर भी जय सिंह ने यूरोपीय ज्ञान को आंख मूंदकर स्वीकार नहीं किया। उन्होंने भारतीय [संगीत] इस्लामी और यूरोपीय खगोलीय तालिकाओं की तुलना की और कई अंतर पाए। हालांकि उनके पास दूरबीन उपलब्ध थी लेकिन जय सिंह ने उन्हें अपनाने का फैसला नहीं लिया। जी मोहम्मद शाही में उन्होंने [संगीत] लिखा कि उनकी गणनाएं नंगी आंखों से किए जाने वाले ऑब्जरर्वेशन पर आधारित है क्योंकि दूरबीन सामान्य व्यक्ति के लिए आसानी से उपलब्धlनहीं होती।

तो इस तरह यूरोपीय प्रभाव सिर्फ गढ़ती रहा। उपकरणों में यह नहीं आया। दिल्ली का जंतरमंतर ईंटों के मलबे की चिनाई और लाल चूने के पलस्तर से बनाया गया था जो 18वीं सदी की राजपूत वास्तुकला में [संगीत] आम सामग्री थी। जहां अधिक सटीकता की जरूरत थी वहां संगमरमर का इस्तेमाल किया गया ताकि टिकाऊपन और स्पष्टता बनी रहे। जंतरमंतर का निर्माण खगोल में दो गणतज्ञ और कुशल राजमस्त्रियों ने मिलकर किया। इसी सहयोग ने इन उपकरणों को सदियों तक सटीक और मजबूत बनाए रखाआज जंतरमंतर केवल एक वैज्ञानिक स्थल नहीं बल्कि एक सांस्कृतिक स्मारक भी है। यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर स्थल माना है जो [संगीत] दिखाता है कि भारत के ज्ञान और स्थापत्य इतिहास में इसकी कितनी खास जगह है।

लेकिन जंतरमंतर का एक स्वरूप और है। इतिहास की इस कहानी से बिल्कुल जुदा बिल्कुल अलगआज का जंतरमंतर वेधशाला के परिसर से बाहर तक फैला है और हर तरह के विरोध और असहमतियों को यह बढ़-चढ़कर स्थान भी देता है। एक प्रोटेस्ट साइट के रूप में जंतरमंतर [संगीत] की कहानी शुरू होती है साल 1993 से। हालांकि इसके लिए ना कोई अध्यादेश जारी हुआ और ना ही कोई आधिकारिक घोषणा की गई।

फिर भी टॉलस्टॉय रोड को अशोका रोड के गोलचक्कर से जोड़ने वाली पेड़ों से घिरी यह सड़क धीरे-धीरे नई दिल्ली की ऐसी जगह बन गई जहां धारा 144 लागू नहीं होती थी। तो इस तरह 1993 में देश की राजधानी को असहमति और विरोध जताने के लिए एक नया अड्डा एक नया सार्वजनिक स्थल मिल गया जंतरमंतर। यह वो वक्त था जब दक्षिण और पूर्व की तरफ दिल्ली का इतना विस्तार नहीं हुआ था। विरोध प्रदर्शनों के लिए लोग बोट क्लब पर जमा होते थे। यहां से जनपद, राजपथ और संसद भवन साफ दिखाई देता था।

इसलिए यह प्रतिरोध और जन आंदोलनों का एक प्रमुख केंद्र था। इसी दौरान देश में राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद आंदोलन जोर पकड़ रहा था। केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी जो 1988 के एक बड़े आंदोलन से पहले ही परेशान थी, सतर्क थी। ऐसे माहौल में सरकार ने बोट क्लब पर सभाओं और प्रदर्शनों के आयोजन पर रोकलगा दी। 1988 का वो आंदोलन और सरकार का यह प्रतिबंध ही आगे चलकर वह पृष्ठभूमि बना जिसके बाद जंतरमंतर धीरे-धीरे दिल्ली में विरोध और धरना प्रदर्शनों की सबसे महत्वपूर्ण जगह बनता गया।

तो वह आंदोलन क्या था? 1988 का आंदोलन महेंद्र सिंह टिकटैत के नेतृत्व में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों ने चलाया था। कहा जाता है कि करीब 5 लाख किसान और उनके मवेशियों ने दिल्ली की रफ्तार को पूरी तरह रोक दिया था। किसान राजघाट पहुंचे और फिर बोट क्लब पर डट गए। आखिर में उन्होंने बैलगाड़ियों के साथ इंडिया गेट के लॉन पर डेरा डाला। कई हफ्ते तक वहीं पर जमे रहे। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार उस समय संसद मार्ग थाने में तैनात एक पुलिस अधिकारी ने कहा वो पूरा आंदोलन हमारे लिए किसी बुरे सपने जैसा था। उस दौर की दिल्ली की कल्पना कीजिए। एक शांत शहर, बहुत कम गाड़ियां और बेहद साफ सुथरी और व्यवस्थित सी सड़कें।

फिर अचानक हर तरफ आपको किसान गाय दिखाई देने लग जाए। इस आंदोलन के आगे राजीव गांधी सरकार को भी झुकना पड़ा था और किसानों की 35 सूत्रीय मांगे मानने के लिए मजबूर होना पड़ा था। बाद की सरकारों को महसूस हुआ कि विरोध प्रदर्शन की जगह पर भी कुछ नियंत्रण होना चाहिए। उस समय जंतरमंतर इसके लिए सबसे उपयुक्त जगह लगा। यह संसद के करीब तो था लेकिन इतना बड़ा नहीं था कि वहां बहुत सारी भीड़ जमा हो सके। इसके अलावा जंतरमंतर की बनावट भी ऐसी थी कि इसके एंट्री और एग्जिट पॉइंट्स सीमित थे। इसलिए वहां व्यवस्था संभालना बोट क्लब की तुलना में जरा आसान था। शुरुआत में थोड़े-थोड़े लोग आने लगे और फिर सिलसिला एक बड़ी धारा में बदल गया।

प्रदर्शनकारी जंतरमंतर पहुंचने लगे। कई लोग अपने घरों से सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा करके आते थे और तब तक यहां रहते थे जब तक उनका संघर्ष जारी रहता था। संघर्ष जारी रखने का हौसला रहता। यही जंतरमंतर उनका घर बन जाता था। वे इस उम्मीद से आते थे कि उनकी बात भी कोई सुने। इंडियन [संगीत] एक्सप्रेस के 2018 के एक लेख के अनुसार वास्तु संरक्षण विशेषज्ञ और जंतरमंतर महाराजा सवाईजय सिंह ऑब्जरवेटरी इन दिल्ली नाम की किताब की लेखिका अनीषा शेखर मुखर्जी यह मानती हैं कि विरोध स्थलों को शहर के केंद्र से दूर ले जाना दरअसल शहर के खंडित होजाने की प्रवृत्ति को दिखाता है। वो कहती हैं कि मूल रूप से जंतरमंतर का इलाका शाहजहानाबाद यानी आज की पुरानी दिल्ली से बाहर था।

1857 के विद्रोह के बाद अब अंग्रेजों ने शाहजहानाबाद के लोगों को शहर से बाहर निकाल दिया था। तब यह इलाका उनके लिए चरण स्थली बना था। लेकिन जब एडविन लुटियंस नई दिल्ली की योजना [संगीत] बना रहे थे तब उन्होंने पहले से मौजूद बस्तियों और लोगों को लगभग नजरअंदाज कर दिया। नई राजधानी आम लोगों के लिए नहीं बनाई गई थी। वही सोच [संगीत] आज भी दिखाई देती है। मुखर्जी यह भी कहती हैं कि सड़क पर होने वाले प्रदर्शन कभी भी ऐतिहासिक वेधशाला के लिए खतरा नहीं बने। हाल के वर्षों में केवल 2009 की किसान रैली के दौरान ही प्रदर्शनकारी वेधशाला परिसर के भीतर गए थे। इतिहासकार सोहेल हाशमी के अनुसार समय के साथ जंतरमंतर के भीतर भी [संगीत] विरोध की जगह लगातार छोटी होती गई। सूखे के कारण कर्ज में डूबा किसान हो, निर्भया के लिए इंसाफ की मांग हो, लोकपाल का आंदोलन हो, खुद को कागजों पर जिंदा रखने की लड़ाई हो, पहलवानों का धरना, पेपर लीक के खिलाफ लाठी खाते छात्र, इतने वर्षों की यात्रा में जंतरमंतर ने विरोध की तमाम आवाजों को सुना। कुछ आंदोलन धीरे-धीरे खत्म हो गए। जबकि कुछ ने देश की राजनीति की [संगीत] दिशा ही बदल कर रख दी। इन आंदोलनों का भविष्य कुछ भी रहा हो लेकिन इन सभी की आवाज में सुर एक ही था। हमारीबात को सुना जाए।

लोकतंत्र में हम भी जरूर हैं। तो यह थी कई दशकों तक देश के विरोध और असहमति को अपनी आवाज देने वाली, अपनी जगह देने वाली जंतरमंतर की कहानी।

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