कानपुर की एक सड़क दो लोग बाइक पर जा रहे थे। बैग में थे ₹25 लाख। अचानक कुछ बदमाश आए बैग छीना और फरार हो गए। पुलिस को लगा यह एक साधारण लूट है।
लेकिन जब पुलिस ने पूछा यह 25 लाख आए कहां से? तो जो जवाब सामने आए उसने एक ऐसे रहस्यों की कब्र खोल दी जिससे निकले ने पुलिस और पूरे यूपी प्रशासनके साथ ही दिल्ली तक अधिकारियों के पैरों तले से जमीन खिसका दी।
12 बैंक, 68 खाते और ₹200 करोड़ का नेटवर्क। कानपुर के श्यामनगर में हुई इस लूट की कहानी शुरू तो सिर्फ लाखों से हुई थी। लेकिन [संगीत] जांच आगे बढ़ी तो पता चला कि जिस रकम को लूटा गया वो किसी सामान्य व्यापारी के दिन भर की कमाई नहीं थी। पहले एक बैंक से करीब सवा5 करोड़ [संगीत] नकद निकाले गए थे। बड़ी रकम अलग-अलग लोगों तक पहुंचाई जा चुकी थी और बची नकदी महफूज़ आलम तक पहुंचनी थी। लेकिन उसकीकिस्मत खराब थी।
उसके पापों का घड़ा भर चुका था। इसलिए रास्ते में ही रकम लूट ली गई और वहीं से खुली महफूज आलम की कुंडली। अब पुलिस के सामने लूट से बड़ा सवाल था एक बैंक खाते से करोड़ों की नकदी क्यों निकाली गई? पैसा किसका था? किसे दिया जाना था? और [संगीत] इतने बड़े लेनदेन का असली कारोबार कहां था? यहीं से एक मामूली लूट एक वित्तीय थ्रिलर में तब्दील हो गई। लूट के बाद जिन लोगों ने शिकायत की उनके बयान बार-बार बदल रहे थे। कभी कहा पैसा लूटा गया, कभी कहा कुछ हुआ ही नहीं।
लेकिन सीसीटीवी कैमरे झूठ नहीं बोलते। फुटेज में वारदात दिखाई दी यानी लूट सच थी। लेकिन रकम की कहानी छिपाई जा रही थी। पुलिस ने पैसे [संगीत] की दिशा उल्टी पकड़नी शुरू की। लुटेरों से पीड़ितों तक, पीड़ितों से बैंक तक और बैंक से उस आदमी तक जिसका नाम था महफूज़ आलम उर्फ पप्पू छुड़ी। महफूज़ कोई बड़ा उद्योगपति नहीं था। उसने छोटे कारोबारों से शुरुआत की।
फिर टेनरी और स्क्रैप कारोबार से जुड़े [संगीत] लोगों के संपर्क में आया। बाद में उसने ऐसे बैंक खातों और फर्मों का नेटवर्क खड़ा किया जिनका इस्तेमाल बड़ी रकम घुमाने में किया जाता था। लेकिन इस नेटवर्क की सबसे जरूरी चीज पैसा नहीं थी। सबसे जरूरी चीज थी पहचान। किसी मजदूर का आधार कार्ड, किसी गरीब का पैन कार्ड, किसी बेरोजगार का फोटो और किसी ऐसे व्यक्ति के दस्तावेज जिसे जीएसटी का मतलब भी ना पता हो। लोगों को लोन, बीमा या सरकारी लाभ दिलाने के बहाने यह दस्तावेज लिए जाते।
फिर उन्हीं दस्तावेजों से फर्जी सिम, जीएसटी पंजीकरण, फर्म और बैंक खाते तैयार किए जाते और फिर कागजों में मजदूर बन जाता करोड़ों की कंपनी का मालिक। लेकिन उसे खबर तक नहीं थी। कल्पना कीजिए [संगीत] एक व्यक्ति सुबह मजदूरी करने निकलता है। उसे महीने में कुछ ₹1000 मिलते हैं। [संगीत] लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में उसके नाम पर एक कंपनी चल रही है। जिसके खाते से करोड़ों रुपए गुजर रहे हैं। ऐसे ही एक मामले में एक युवक के दस्तावेज से रवि एंटरप्राइजेस नाम की फर्म बनाई गई औरकुछ महीनों में उसके खाते से करोड़ों का लेनदेन हुआ। दूसरे कई लोगों के नाम पर भी ऐसे ही अलग-अलग फर्में बनाई गई। अब सवाल है इन खातों में पैसा डाल कौन रहा था? पुलिस और मीडिया रिपोर्ट की माने [संगीत] तो संदिग्ध रकम का संबंध मुख्य रूप से टेनरी, चमड़ा कारोबार, स्क्रैप, स्लॉटर हाउस, डाइंग इकाइयों और दूसरे व्यापारिक नेटवर्क से बताया गया है। आरोप है कि कारोबारी रकम इन फर्मों के खाते में भेजते थे। कागजों में खरीद बिक्री दिखाईजाती। फिर पैसा अलग-अलग खातों से घूमता और आखिर में नकद निकालकर कथित तौर पर वापस पहुंचाया जाता। बीच में नेटवर्क अपना कमीशन रखता।
इसे ऐसे समझ सकते हैं कि कागज कहता था माल खरीदा गया। बैंक कहता था भुगतान हुआ। जस्ट रिकॉर्ड बताता था कि व्यापार हुआ है। लेकिन असलियत में जमीन पर माल था भी या सिर्फ पैसा घूम रहे थे। यह पुलिस अभी पता कर रही है। जांच गहराई तो पुलिस को महफूज़और उसके रिश्तेदारों और सहयोगियों से जुड़े 12 बैंकों के 68 खातों का पता चला। शुरुआत में इन खातों [संगीत] से करीब ₹1600 करोड़ के लेनदेन की बात सामने आई। बाद में जब जांच डीप में गई तो पता चला कि ट्रांजैक्शन का आंकड़ा करीब ₹3200 करोड़ का है। लेकिन यहां कहानी को समझना जरूरी है। ₹3200 करोड़ का मतलब यह नहीं कि इतना पैसा महफूज़ के घर से मिला है।
यह कुल लेनदेन का आंकड़ा है। एक ही पैसा अगर कई खातों में बार-बार घूमे तो बैंकिंग टर्नओवर [संगीत] कई गुना दिख सकता है। यानी असली रकम कितनी थी, कितनी बार घुमाई गई? सरकार का वास्तविक [संगीत] नुकसान कितना हुआ और आरोपियों ने कितना कमीशन कमाया यह अलग-अलग सवाल है। अब कहानी का दूसरा बड़ा किरदार सामने आता है। बैंकिंग सिस्टम नई फर्म कम आय वाला खाताधारक अचानक करोड़ों रुपए का टर्नओवर बड़ी नगद निकासी। कई राज्यों से आने वाला पैसा फिर भी इतने लंबे समय तक किसी ने अलार्म क्यों नहीं बजाया? केवाईसी कहां था?
ट्रांजैक्शन रिपोर्ट बनी या नहीं? बैंक कर्मचारी ने सवाल क्यों नहीं किए? जीएसटी सिस्टम ने नई फर्मों का असामान्य कारोबार क्यों नहीं पकड़ा? इस मामले ने सिर्फ एक कथित गिरोह नहीं पूरे वित्तीय निगरानी तंत्र [संगीत] पर सवाल खड़े कर दिए।
लुटेरे शायद जानते नहीं थे कि उन्होंने क्या लूटा। जिन बदमाशों ने ₹25 लाख छीने शायद उन्हें लगा होगा कि उन्होंने एक बड़ा हाथ मार लिया। लेकिन असल में उन्होंने एक पैसा नहीं एक राज लूटा था। उनकी लूट ने शिकायत करवाई। शिकायत ने सीसीटीवी खुलवाया। सीसीटीवी ने नकदीकी कहानी खोली। नकदी ने बैंक खाता खोला और बैंक खाते ने 3200 करोड़ के नेटवर्क का दरवाजा खोल दिया। अपराधियों ने जो लूट अपने फायदे के लिए की, वही पूरे कथित सिंडिकेट के खिलाफ सबसे बड़ा सबूत बन गई।
इस कहानी में महफूज़ कथित रूप से 3200 करोड़ का मालिक नहीं था। [संगीत] उसकी असली ताकत थी दूसरों के पैसे को रास्ता देना। गरीब के नाम पर खाता, फर्जी फर्म का बिल, बैंक से डिजिटल भुगतान और फिर नकद वापसी। पुलिस और मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक यह रकम सैकड़ों कारोबारियों और फर्मों से जुड़ी बताई गई है। कुछ रिपोर्ट में लगभग 400 कारोबारियों के लेनदेन [संगीत] की जांच का दावा किया गया है। यानी स्क्रीन पर दिखाई देने वाला यह आदमी केवलचेहरा हो सकता है। असली कहानी उन लोगों की भी है जिन्होंने उसे पैसा दिया। पूछताछ में कुछ स्क्रैप, स्लॉटर और दूसरे कारोबारियों के नाम सामनेआने की रिपोर्ट्स हैं। एक दूसरे आरोपी संजीव दीक्षित की गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने फर्जी फर्म और कथित इनपुट टैक्स क्रेडिट नेटवर्क खंगालने की बात कही है। हालांकि जिन नामों का उल्लेख हुआ उनकी भूमिका अदालत में साबित होनी अभी बाकी है और यही सबसे बड़ा सस्पेंस बचा हुआ है। क्या कारोबारी जानते थेकि पैसा फर्जी खातों में जा रहा है। क्या वे नकद वापस लेने के लिए नेटवर्क इस्तेमाल करते थे? क्या यह जीएसटी चोरी थी? क्या यह काले धन को सफेद दिखाने का तरीका था?
या इस पैसे का [संगीत] कोई और अंतिम ठिकाना था? इतनी बड़ी रकम सामने आई तो आतंक फंडिंग और हवाला जैसी आशंकाएं भी उठी। तो सवाल यह कि क्या यह पैसा किसी आतंक विधि गतिविधियों में शामिल [संगीत] हो रहा था? पुलिस इस एंगल पर भी जांच कर रही है। महफूज़ के फरार होनेके बाद पुलिस ने उस पर इनाम घोषित किया। वो पश्चिम बंगाल में छिपा था और जब कानपुरलौटा तो पुलिस ने उसे दबोच लिया। बाद में महफूज का साला मेहताब आलम, उसका बेटा मासूम, गिरोह का राजदार फिरज़ खान और महफूज़ का दूसरा बेटा फैज भीगिरफ्तार किया गया। इसके साथ ही इनके एक साथी नूर आलम ने कोर्ट में सरेंडर किया।
पुलिस ने मामले में चार्जशीट दाखिल कर दी है। लेकिन गिरफ्तारी इस कहानी का अंत नहीं है। शुरुआत है क्योंकि अब जांच को पता करना है कि कौन खाता खोलता था। कौन दस्तावेज देता था? कौन फर्जी बिल बनाता था? कौन पैसे भेजता था? कौन नकद वापस लेता था? और किसने सिस्टम के भीतर बैठकर रास्ता साफ किया। इस कहानी में सबसे डरावनी चीज ₹3200 करोड़ नहीं है। सबसे डरावनी चीजयह है कि एक गरीब व्यक्ति अपने नाम पर चल रहे करोड़ों के कारोबार से बेखबर था। उसका आधार असलीथा। उसका पैन असली था। उसके नाम का बैंक खाता भी असली था।
बस कारोबार नकली था और उसी नकली कारोबार में असली पैसा घूम रहा था। एक तरफ वो आदमी था जो रोज कमाने [संगीत] के लिए संघर्ष कर रहा था। दूसरी तरफ उसके नाम पर करोड़ों के बिल बन रहे थे। यह सिर्फ एक [संगीत] आरोपी की कहानी नहीं है। यह उस सिस्टम की कहानी है जिसमें पहचान किसी और की, फर्म किसी और की, पैसा किसी और का और फायदा किसी तीसरे का था। और शायद इस पूरे मामले [संगीत] का सबसे बड़ा सच अभी भी किसी बैंक स्टेटमेंट की हजारों लाइनों के बीच छिपा हुआ है। क्योंकि पुलिस ने रास्ता खोज लिया है।
लेकिन सड़क के आखिर में बैठाअसली मालिक कौन है? यह सवाल अभी बाकी है। एक 25 लाख की लूट [संगीत] ने ₹3200 करोड़ के नेटवर्क का दरवाजा खोल दिया। लेकिन अब देश जानना चाहता है उस दरवाजे के [संगीत] पीछे सिर्फ महफूज आलम था या उससे भी बड़े चेहरे अब भी अंधेरे में छिपे हैं। यह जांच जारी है और कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। इसलिए इस कहानी पर हमारी नजर भी बनी हुई है। आगे भी इस मामले में जो अपडेट होगा हम आपको देते रहेंगे। यह खबर आपको अगर अच्छी लगीहो तो इसे लाइक करें, शेयर जरूर करें ताकि आप जैसे हमारे जैसेलोग अवेयर हो सके कि इस देश में आपके हमारे कागजों पर क्या खेल चल रहा है। यह खबर सावधान और सतर्क करने वाली भी है कि हमारे दस्तावेज हमारे हाथों में महफूज़ होने चाहिए। कौन इसका क्या इस्तेमालकर रहा है, इसकी जानकारी हमें होनी चाहिए।