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एक मुसलमान के लिए हर बार क्यों रुकती है जगन्नाथ रथयात्रा ?जानकर चौंक जाएंगे।

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पूरी में भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा शुरू हुई है। इस यात्रा में भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ रथों पर सवार होकर अपने मूल निवास गुंडचा मंदिर के लिए निकले जो जगन्नाथ मंदिर से करीब 3 किलोमीटर की दूरी पर है। पूरी का जगन्नाथ मंदिर सनातन के सबसे बड़े चार धामों में एक है। और आज जब भगवान जगन्नाथ, उनके भाई भगवान बलभद्र और उनकी बहन देवी सुभद्रा जगन्नाथ धाम के सिंह द्वार पर खड़े तीन अलग-अलग रथों पर सवार हुए तो वहां मौजूद लाखों श्रद्धालुओं में उनके रथों को खींचने की होड़ लग गई।

आज पाठशाला में भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा की भव्य दिव्य अलौकिक तस्वीरें दिखाऊंगा। साथ ही जगन्नाथ धाम के अलौकिक चमत्कार और रहस्यों की भी बात होती है। एक मुसलमान के लिए हर बार हर साल रथ यात्रा क्यों रुकती है? क्या होता है? उसकी कहानी क्या है? यह भी बताऊंगा। लेकिन पहले इस भव्य रथ यात्रा की एक झलक देख। आज शाम 4:00 बजे सभी अनुष्ठान और विधिविधान पूरे होने के बाद भगवान जगन्नाथ के रथ यात्रा की शुरुआत हुई। सबसे पहले भगवान बलभद्र का रथ खींचा गया।

इसके बाद सुभद्रा और जी का और जगन्नाथ जी के रथ खींचे गए। पहले दिन कुछ दूरी तक पहुंचने के बाद रथ यात्रा आज के लिए रुक गई। रथ यात्रा अब अगले दिन शुरू होगी क्योंकि सूर्यास्त के बाद रथ नहीं खींचे जाते। यह रथ यात्रा कल भगवान जगन्नाथ मंदिर से करीब 3 किमी दूर गुंडीचा मंदिर पहुंचेगी। इसके बाद 9 दिन तक भगवान जगन्नाथ हुडनीचा में रहेंगे जो उनकी मौसी का घर माना जाता है। 5 जुलाई को भगवान जगन्नाथ मुख्य मंदिर में वापस लौट आएंगे। भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा की झलक पाने और रथों को खींचने के लिए देश विदेश से श्रद्धालु पूरी पहुंचे हुए हैं। क्योंकि ऐसी मान्यता है कि किसी ने उस रस्सी को भी छू लिया जिससे आप रथ को खींच रहे हैं तो मतलब आपका जीवन धन्य हो गया।

पूरी में श्रद्धालुओं का ऐसा सैलाब उमड़ा है कि सड़क तो कहीं नजर ही नहीं आ रही। भाई आप देखिए ना सड़क दिख ही नहीं रही है। उमस भरी गर्मी में श्रद्धालुओं को किसी तरह की परेशानी ना हो इसके लिए उन पर पानी की बौछार की जा रही है। देखिए पानी का लगातार छिड़काव चल रहा है क्योंकि भयंकर उमस वाली गर्मी है। उससे गर्मी से श्रद्धालुओं को फर्क पड़ा नहीं। सब आए हैं। आस्था का सैलाब दिख रहा है वहां पर। भक्तों का सैलाब दिख रहा है। तो वहां पानी डाल के जो भक्त हैं उनको थोड़ी राहत दी जा रही है। रथ यात्रा की शुरुआत से पहले भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा को पूरे विधिविधान के साथ उनके रथों पर विराजमान किया गया। भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा को उनके रथों तक पहुंचाने के अनुष्ठान को पहांडी अनुष्ठान कहा जाता है।

जिसमें मंदिर के पुजारी पूरी श्रद्धा के साथ तीनों मूर्तियों को रथ तक लाते हैं। रथों पर विराजमान होने के बाद उन्हें भोग लगाया गया और रथ यात्रा की शुरुआत की। अच्छा ये अपने आप में आप सोचिए कि कितने कमाल की बात है कि किसी मंदिर में भगवान जो हैं, ठाकुर जी जो हैं वो मंदिर के बाहर नहीं आते। अगर कभी यात्रा होती भी है भगवान की तो उनका एक प्रतिरूप जो है वो यात्रा करके वापस मंदिर में आ जाता है। मूल मूर्ति जो है वो मंदिर से बाहर नहीं आती।

लेकिन भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा यह सिर्फ जगन्नाथ पुरी में होता है। इस रथ यात्रा में होता है कि भगवान खुद मंदिर से बाहर निकल कर भक्तों के बीच आते हैं। ये अपने आप में अलौकिक है। कोविड का कालखंड चल रहा था। दुनिया थम गई थी। लेकिन यह रथ यात्रा नहीं रुकी थी। तब भी भगवान मंदिर से बाहर आए थे। यह है इस रथ यात्रा की खासियत। पूरी में होने वाली भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा के लिए हर साल तीन भव्य और विशाल रथ तैयार किए जाते हैं। यह रथ भगवान जगन्नाथ, उनके भाई भगवान बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा को समर्पित होते हैं। इन तीनों रथों के बारे में भी आपको बताता हूं। पहला रथ जो है वह भगवान जगन्नाथ का होता है जिसे नंदीघोष रथ कहते हैं। यह रथ सबसे बड़ा होता है और इसकी ऊंचाई लगभग 45 फीट होती है। इसमें कुल 16 पहिए होते हैं और इसका रंग लाल और पीला होता है।

रथ की छत पर गरुड़ ध्वज और सुदर्शन चक्र का निशान होता है। दूसरा रथ भगवान बलभद्र का। तालध्वज रथ। यह रथ नंदघोष रथ से छोटा होता है थोड़ा सा। इसकी ऊंचाई करीब 44 फीट होती है। इसमें 14 पहिए होते हैं। इसका रंग गहरा नीला और लाल होता है। इस रथ की ध्वजा पर ताल के पेड़ का चिन्ह होता है। तीसरा जो रथ होता है वो देवी सुभद्रा का होता है जिसे दर्पदन रथ कहते हैं। यह रथ तीनों रथों में सबसे छोटा होता है और इसकी ऊंचाई करीब 43 फीट होती है।

12 पहिए होते हैं। इसका रंग लाल और काला होता है। सुभद्रा जी का रथ सबसे बीच में चलता है और इस पर कमल का चिन्ह बना हुआ होता है। भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा के लिए कई महीनों पहले से तैयारियां शुरू हो जाती है। रथ यात्रा कब शुरू हुई इस सटीक जानकारी इसकी सटीक जानकारी किसी के पास नहीं। किसी को मतलब एग्जैक्ट नहीं पता है। लेकिन रथ यात्रा को लेकर अलग-अलग मान्यताएं हैं। पहली मान्यता है कि जब राजा इंद्रदुमन ने भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी की मूर्तियों को स्थापित किया तो उस वक्त आकाशवाणी हुई कि भगवान जगन्नाथ साल में एक बार अपनी जन्मभूमि जरूर जाएंगे। स्कंद पुराण के उत्कल खंड के मुताबिक राजा इंद्रदुन ने आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की दूसरी तिथि को भगवान जगन्नाथ के उनकी जन्मभूमि जाने की व्यवस्था की। तभी से यह परंपरा रथ यात्रा के रूप में चली आ रही है। दूसरी मान्यता है कि देवी सुभद्रा के द्वारिका दर्शन की इच्छा को पूरी करने के लिए भगवान जगन्नाथ और भगवान बलभद्र ने अलग-अलग रथों में बैठकर यात्रा की थी। इसी की याद में पूरी में हर साल रथ यात्रा का आयोजन किया जाता है। इस रथ यात्रा का जिक्र स्कंद पुराण, नारद पुराण, पद्म पुराण और ब्रह्म पुराण में भी किया गया है।

तीसरी मान्यता के अनुसार एक बार राधा रानी कुरुक्षेत्र में भगवान श्री कृष्ण से मिलने पहुंची थी और उन्होंने भगवान श्री कृष्ण से वृंदावन आने का निवेदन किया। राधा रानी के निवेदन पर भगवान श्री कृष्ण अपने भाई भगवान बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा के साथ वृंदावन पहुंचे। जहां राधा रानी, गोपियों और वृंदावन के लोगों ने तीनों को रथ पर बैठाया और रथ से घोड़े हटाकर खुद अपने हाथों से खींचा। तभी से यह यह रथ यात्रा और उसे हाथों से खींचने की परंपरा शुरू हुई। एक चौथी मान्यता भी है। द्वारिकाधीश भगवान श्री कृष्ण के साथ भगवान बलराम और देवी सुभद्रा का समुद्र के किनारे किया गया था। कहते हैं उस वक्त समुद्र में तूफान आ गया और तीनों के अधले पार्थिव शरीर बहते हुए पूरी के समुद्र तट पर पहुंच गए। पूरी के राजा ने तीनों को अलग-अलग रथों में विराजित करवाया और पूरे नगर में लोगों ने खुद रथों को खींच कर घुमाया।

इसी घटना की स्मृति में आज भी रथ यात्रा की परंपरा को निभाया जाता है। चारण परंपरा की किताबों में इसका जिक्र किया गया है। यानी अलग-अलग मान्यताएं हैं। भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा में जिस तरह आस्था का सैलाब उमड़ रहा है, यह कोई नई बात नहीं है। ऐसा सदियों से होता रहा है। पहली आप साल 1937 की देख रहे हैं। इस में भी भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा में भारी संख्या में जुटे हुए श्रद्धालु दिखते हैं। 1937 की तस्वीर दिखा रहा हूं। और दूसरी आज की रथ यात्रा की है। उसमें भी पूरी में ऐसा लग रहा है जैसे कोई महाकुंभ चल रहा हो। भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा पूरी आस्था के साथ निकलती है।

इस यात्रा से जुड़ी एक मान्यता यह भी है कि यात्रा से ठीक पहले भगवान जगन्नाथ बीमार पड़ जाते हैं। मान्यता है कि रथ यात्रा से पहले पड़ने वाली स्नान पूर्णिमा के दिन भगवान जगन्नाथ को 108 कलश पानी से स्नान कराया जाता है। जिसकी वजह से भगवान जगन्नाथ की तबीयत बिगड़ जाती है। देखिए डॉक्टर जो है वह चेकअप कर रहे हैं। और वह 15 दिन के लिए एकांत वास में चले जाते हैं। यह तो खैर एआई इमेज है। इस दौरान मंदिर के कपाट बंद रहते हैं और भगवान जगन्नाथ का इलाज चलता है। इलाज के बाद भगवान स्वस्थ होकर भक्तों को दर्शन देते हैं और इसके अगले दिन भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा के लिए तैयार होते हैं। और इसीलिए कहा जाता है कि अगर आप जगन्नाथ मंदिर में जा रहे हैं, भगवान जगन्नाथ के मंदिर में जा रहे हैं तो मतलब आप समझिए कि साक्षात भगवान श्री कृष्ण से मिल रहे हैं। पूरी में हर साल निकलने वाली भगवान जगन्नाथ की यात्रा हर बार मंदिर से चलकर करीब 200 मीटर की दूरी पर कुछ देर के लिए रुकती है। और इसके पीछे का रहस्य भी आपको बताता हूं।

भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा मंदिर के पास बनी सालबेग की मजार के सामने कुछ देर के लिए रुकती। सालबेग मुस्लिम परिवार में जन्मे थे। उनके पिता मुगल साम्राज्य के सूबेदार थे। सालबेग की पढ़ाई वृंदावन में हुई। लेकिन एक बार वह किसी काम से पूरी आए। जहां उन्होंने भगवान जगन्नाथ की महिमा के बारे में जाना। उनके मन में भगवान के दर्शन करने की इच्छा हुई। लेकिन जब सालबेग मंदिर पहुंचे तो उन्हें दरवाजे पर रोक दिया गया कि भाई मुसलमान का अंदर क्या काम? इस बात से सालबेग का दुख को दुख हुआ। लेकिन भगवान जगन्नाथ को लेकर उनकी भक्ति और गहरी होती चली। वो भजन कीर्तन और भगवान जगन्नाथ का नाम जपने लगे। मान्यता है कि एक रात सालबेग को सपना आया जिसमें भगवान जगन्नाथ ने स्वयं प्रकट होते हुए सालबेग से कहा कि उसकी भक्ति से वह प्रसन्न है। भगवान जगन्नाथ ने सालबेग से यह भी कहा कि भले ही वह मंदिर में उनके दर्शन नहीं कर पाए लेकिन वो उन्हें दर्शन जरूर देंगे।

तो सालबेग ने भगवान से पूछा कि कब दर्शन दीजिएगा? तो भगवान ने कहा कि जब रथ यात्रा निकलेगी तो मेरा रथ तुम्हारे सामने आकर रुकेगा और सब जान जाएंगे कि तुम मेरे सच्चे भक्त हो। जब यात्रा का दिन आया तो जैसे ही भगवान जगन्नाथ का रथ उस जगह पर पहुंचा जहां सालबेग ठहरे थे। रथ वहीं पर अटक गया। हजारों लोग मिलकर भी रथ का पहिया आगे नहीं बढ़ा सके। इसके बाद भगवान जगन्नाथ की फूलों की माला सालबेग तक पहुंचाई गई। लोगों को समझ में आ गया कि प्रभु सालबेग को दर्शन दे रहे हैं और तब जाकर रथ आगे बढ़ पाया। बाद में पूरी के राजा ने उस जगह पर एक मंदिर बनवाया जिसे लोग सालबेग की मजार भी कहते हैं। और आज भी रथ यात्रा के समय भगवान जगन्नाथ का रथ यहां पर जरूर रुकता है। यानी आप देखिए भगवान के लिए सब बराबर हैं और अपने भक्त के लिए वह कुछ भी कर सकते हैं। यह इसका जीता जागता प्रमाण है। भगवान जगन्नाथ और उनकी रथ यात्रा से जुड़ी यह मान्यता बताती है कि भगवान की भक्ति के लिए ना धर्म देखा देखना जरूरी है और ना जाति। जरूरत सिर्फ सच्चे मन और विश्वास की है। भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा में उमड़े आस्था के सैलाब के बीच मंदिर के शिखर पर लगने वाली ध्वजा की भी चर्चा हो रही है। हर रोज मंदिर का एक पुजारी बिना किसी सुरक्षा इंतजाम के ध्वजा लेकर मंदिर के शिखर पर चढ़ता है जो करीब 214 फीट ऊंची है। आजकल आप देखते हैं कि लोग जो है वो ऐसे रस्सी लगा के सेफ्टी गियर लगा के चढ़ते हैं कहीं भी ऊपर। भाई यह रोज रोज यह ध्वजा चेंज होती है और जो व्यक्ति ऊपर 214 फीट चढ़ता है वह कोई रस्सी लगा के नहीं चढ़ता।

लेकिन प्रभु की कृपा है कि कोई दिक्कत नहीं आती उसको। शिखर पर चढ़ने के बाद पुजारी हर रोज ध्वजा को बदलता है। इस पर लगे ध्वज को हर दिन शाम को 4:00 से 5:00 बजे के बीच बदला जाता है। जो लोग इस ध्वज को बदल रहे हैं वो पूरी के एक चोला परिवार से आते हैं और पिछले 800 साल से ध्वज बदलने का काम कर रहे हैं। जगन्नाथ मंदिर की ध्वजा की खासियत होती है कि यह हवा की उल्टी दिशा में लहराती है। कहा जाता है। यानी हवा अगर पूरब की तरफ चल रही है तो झंडा पश्चिम की दिशा में लहराता है। ऐसा ऐसी मान्यता है। मंदिर की ध्वजा को लेकर मान्यता है कि अगर किसी वजह से पुजारी एक दिन भी ध्वजा नहीं बदलने से ध्वजा बदलने से चूक गया, तो मंदिर अगले 18 साल के लिए बंद हो जाएगा। और इसीलिए ऐसा कभी नहीं हुआ कि ये ध्वजा ना बदली गई हो। अब आपके दिमाग में भी यह सवाल आ रहा होगा कि ऐसा कैसे हो सकता है कि एक झंडा हवा की उल्टी दिशा में लहरा रहा है?

साइंस के हिसाब से तो ऐसा संभव नहीं है। लेकिन इसके पीछे एक पौराणिक कहानी है। मान्यता है कि समंदर की तेज लहरों की आवाज से भगवान जगन्नाथ को नींद लेने में दिक्कत हो रही थी। तब हनुमान जी ने समंदर से आग्रह किया कि लहरों की गति को कम कर दो। लेकिन समंदर ने कहा कि यह संभव नहीं है। इसके बाद हनुमान जी ने पवन देव से कहा कि आप अपनी स्पीड कुछ कम कर लीजिए। तो उन्होंने भी मना कर दिया। इसके बाद पवन पुत्र हनुमान जी ने मंदिर के चारों तरफ तेज गति से उड़ना शुरू कर दिया। इसे इससे समंदर से आ रही लहरों की आवाज बंद हो गई और ध्वज हवा की उल्टी दिशा में लहराने लगा। दुनिया भर से लाखों करोड़ों लोग इस चमत्कार को देख चुके हैं। लेकिन यह कैसे हो रहा है? इसका जवाब पौराणिक मान्यता के अलावा किसी के पास नहीं है। सनातन धर्म में हर देवी देवता का अलग-अलग स्वरूप भी है। जगन्नाथ पुरी में भगवान की मूर्ति से जुड़ी भी कई पौराणिक कथाएं हैं। इस मूर्ति में भगवान जगन्नाथ की आंखें काफी बड़ी नजर आती हैं और मूर्ति में हाथ और पैर नहीं है। भगवान जगन्नाथ की आंखों के पीछे का रहस्य क्या है? इसके बारे में भी बताता हूं। पौराणिक कथाओं के मुताबिक जब भगवान जगन्नाथ राजा इंद्रदुन के राज्य में गए तो उनका दिव्य रूप देखकर वहां के लोगों की आंखें आश्चर्य से बड़ी हो गई। उनकी भक्ति देख भगवान जगन्नाथ ने भी अपनी आंखें बड़ी कर ली। और भगवान जगन्नाथ की मूर्ति के हाथ और पैर इसलिए नहीं हुए क्योंकि उसको भी लेकर अलग-अलग मान्यताएं हैं कि जब राजा इंद्रदुमन ने भगवान जगन्नाथ की मूर्ति बनाने का काम विश्वकर्मा जी को दिया तो भगवान विश्वकर्मा ने शर्त रखी कि जब तक वो मूर्ति बनाएंगे तब तक कमरे में कोई प्रवेश नहीं करना चाहिए। लेकिन जब मूर्ति बनाने में काफी लंबा वक्त लगा तो राजा इंद्रधुमन कमरे के बाहर खड़े होकर मूर्ति बनाने की आवाज सुनने लगे।

एक दिन राजा को अंदर से कोई आवाज नहीं आई तो उन्हें लगा कि मूर्ति बनाने का काम पूरा हो गया है और उन्होंने दरवाजा खोल दिया। इससे नाराज होकर विश्वकर्मा जी मूर्तियों को अधूरी छोड़कर चले गए। मान्यता है कि तभी से भगवान जगन्नाथ, भगवान बलराम और देवी सुभद्रा की मूर्ति अधूरी है। भगवान जगन्नाथ के मंदिर को लेकर एक मान्यता यह भी है कि जब मुगलों ने भगवान जगन्नाथ के मंदिर पर हमला किया तो मंदिर की मूर्तियों को सुरक्षित स्थान पर लेकर छुपा दिया गया। वो जगह उड़ीसा के कांकण सीखरी में जो चिल्का झील के बीचोंबीच मौजूद एक टापू है। इसलिए आज भी किंकण सीखरी में नाव पर भगवान जगन्नाथ यात्रा निकलती है। इस यात्रा में शामिल होने दूर-दूर से श्रद्धालु भी पहुंचते हैं। भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा में लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी।

प्रशासन के मुताबिक आज 10 लाख से ज्यादा लोग पूरी पहुंचे थे। हालांकि श्रद्धालुओं की सुरक्षा का पूरा इंतजाम था। लेकिन कुछ श्रद्धालु भीषण गर्मी की वजह से बेहोश हो गए। उन्हें तुरंत अस्पताल पहुंचाने का इंतजाम किया गया। जिसके लिए आरएसएस समेत कुछ संगठनों ने एंबुलेंस के पहुंचने के लिए कॉरिडोर भी बनाया। पूरी में ही नहीं देश के अलग-अलग हिस्सों में आज भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा निकली। अहमदाबाद में गुजरात के सीएम भूपेंद्र पटेल ने रथ यात्रा से पहले झाड़ू लगाने की परंपरा निभाई और उसके बाद खुद रथों को खींचा। अहमदाबाद में निकली भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जो है वह नजर आई। गृह मंत्री अमित शाह ने रथ यात्रा शुरू होने के पहले मंदिर में भगवान जगन्नाथ की आरती भी उतारी है।

देखिए। वहीं पश्चिम बंगाल के पूर्वी मिदनापुर में बने दीगा जगन्नाथ धाम में इस बार पहली रथ यात्रा निकली है। सीएम ममता बनर्जी भी इस रथ यात्रा में शामिल। अहमदाबाद में रथ यात्रा की शुरुआत से पहले उस वक्त अफरातफरी मच गई जब रथ यात्रा में शामिल 17 हाथियों में एक हाथी बेकाबू हो गया और उसने इधर-उधर दौड़ना शुरू कर दिया। हालांकि मौके पर मौजूद वन विभाग की टीम ने तुरंत हाथी को काबू में कर लिया और उसके बाद धूमधाम से रथ यात्रा की शुरुआत हो गई। लेकिन आप सोचिए प्रभु की कृपा ही है कि बड़ा हादसा टल गया। इतने लाखों लोग हैं और उस बीच हाथी बेकाबू हो जाए तो सोचिए क्या से क्या हो सकता। जगन्नाथ मंदिर से जुड़ा एक फैक्ट यह भी है कि मंदिर के शिखर पर किसी भी पक्षी को बैठा हुआ आज तक नहीं देखा गया। आमतौर पर मंदिर और दूसरे धार्मिक स्थलों के आसपास पक्षी तो बैठते ही हैं।

लेकिन इस मंदिर के ऊपर से कोई पक्षी ना गुजरता है ना बैठता है। ऐसी मान्यता है। ऐसा क्यों होता है? इसका जवाब अब तक किसी के पास नहीं। इसी मान्यता के तहत मंदिर को नो फ्लाई ज़ोन में भी रखा गया है। यानी कोई भी विमान इस मंदिर के ऊपर से नहीं उड़ सकता। इस मंदिर को लेकर दूसरा रहस्य यह भी है कि इस मंदिर में प्रवेश करते हुए जब सिंह द्वार के पास खड़े होते हैं तो समंदर की लहरों की आवाज सुनाई देती है। लेकिन जैसे ही सिंह द्वार को पार करके मंदिर के अंदर प्रवेश करते हैं तो लहरों की आवाज सुनाई देनी बंद हो जाती है। कोई वास्तु या शिल्पकारी से जुड़ा विषय हो सकता है। लेकिन अभी तक कोई पुख्ता प्रमाण भी नहीं है। भगवान जगन्नाथ के मंदिर में ऐसे-ऐसे चमत्कार हैं जिनका जवाब विज्ञान के पास भी नहीं दिखता। लेकिन यह आस्था का सबसे बड़ा पर्व आप कह सकते हैं जहां आप देखिए लाखों लोग पहुंचे हुए हैं और जिस तरह की तस्वीरें हैं वहां पर जिस तरह से लोग झूम रहे हैं और जैसा मैंने आपको शुरू में कहा था कि अपने आप में अलौकिक है कि भगवान खुद मंदिर से बाहर निकलते हैं।

भक्तों के बीच जाते हैं रथ यात्रा निकलती है। कोई भी उस रस्सी से खी को अगर छू लेता है उतने भर में उसको लगता है कि भाई मैंने जो है वो पुण्य प्राप्त कर लिया। अच्छा इसमें 22 सीढ़ियां हैं इस मंदिर में और उसमें तीसरी सीढ़ी जो है वो यम की सीढ़ी मानी जाती है। कहा जाता है कि अगर आप भगवान जगन्नाथ के दर्शन करके आए तो सारे पाप धुल गए।

लेकिन अगर आपने ती तीसरी सीढ़ी पर पैर रख दिया तो आप जो है आपके पाप तो धुल गए लेकिन आप जाएंगे यमलोक। तो इसलिए लोग तीसरी सीढ़ी पर जो है वह पैर नहीं रखते। तो कमाल की मान्यताएं हैं।

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