एक था राजा एक थी रानी एक दिन दोनों का प्लेन हो गया और यहीं से शुरू होती है यह कहानी जोधपुर के स्थानीय लोगों का आज भी मानना है कि जुबैदा की आत्मा उमेद भवन पैलेस और रॉयल फैमिली के स्कूल में भटकती है स्कूल के कई कमरे बड़े-बड़े तालों और तंत्र मंत्र से बंद कर दिए गए हैं।
स्थानीय लोग बताते हैं कि ऐसा उनकी रूह को कैद करने के लिए किया गया है लेकिन बड़े ही रहस्यमय ढंग से 17 अप्रैल 1981 को टूटू बना यानी कि हुकुम सिंह का सर हुआ शरीर उनके कमरे में मिला हालांकि कहीं-कहीं यह जिक्र भी मिलता है कि उनका शरीर जोधपुर की एक सड़क पर मिला था अचानक जुबैदा भी मंच पर आई और उन्होंने गाना शुरू कर दिया ।
हर किसी की नजर जुबैदा पर थी एक तो वोह थी बेहद खूबसूरत और ऊपर से आवाज में वो मिठास जो हर किसी का ध्यान खींच ले राजस्थान के मशहूर लेखक अयोध्या प्रसाद की किताब द रॉयल ब्लू के हिसाब से तो जुबैदा ने बीमार होने का बहाना ही इसलिए किया था ताकि हनुवंत सिंह से दोबारा मुलाकात हो सके क्योंकि अंदर ही अंदर तो जुबैदा भी तन्हाई भरा जीवन काट रही थी मां को मनाने के लिए एक दिन जुबैदा ने महाराजा को घर बुला लिया।
इस मुलाकात में मां फयाज ने महाराजा को साफ इंकार कर दिया उन्होंने कह दिया कि हम मुस्लिम हैं और हम हमारी बेटी ना तो धर्म बदलेगी और ना ही दूसरी औरतों के साथ सौतन बनकर रहेगी मां का मन बदला तो जरूर लेकिन उन्होंने जुबैदा के सामने एक मुश्किल शर्त रख दी शर्त ये थी कि अगर जुबैदा महाराजा से शादी करना चाहती हैं तो उन्हें अपने 2 साल के बेटे खालिद को छोड़कर जाना होगा धर्म बदलने पर जुबैदा का नाम विद्यारानी रखा गया धर्म परिवर्तन के लिए मंदिर में हवन भी करवाया गया था।
जिसका सबूत आज भी ब्यावर के मंदिर में दर्ज है महाराजा भी अक्सर शाही फैसले बड़ी रानी कृष्णा कुमारी से सलाह मशवरे के बाद ही लिया करते थे हनुवंत सिंह ने खुद सरदारपुरा की विधानसभा सीट के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री जयनारायण व्यास के सामने ताल ठोक दी और जीत भी गए ।
लेकिन अपने जीतने की औपचारिक घोषणा वह सुन नहीं पाए एक था राजा एक थी रानी एक दिन दोनों का प्लेन क्रैश हो गया और यहीं से शुरू होती है यह कहानी दरअसल यह कहानी है जुबैदा बेगम और जोधपुर के महाराजा हनवंत सिंह की मोहब्बत और सियासी साजिशों की और शायद भरी जवानी में इनका एक साथ दुनिया से रुखसत हो जाना भी एक साजिश का ही हिस्सा था अगर आप जुबैदा के बारे में ज्यादा नहीं जानते तो आप श्याम बेनेगल की यह फिल्म जरूर देख सकते हैं जिसका स्क्रीन प्ले जुबैदा की पहली शादी से हुए बेटे मोहम्मद खालिद ने लिखा है।
अगर आप महाराज हनुमंत सिंह के बारे में नहीं जानते तो आप हमारी पिछली वीडियो देख सकते हैं जिसमें हमने बताया था कि किस तरह से आजादी के वक्त एक ऐसा समय भी आया था जब महाराजा जोधपुर अपनी रियासत का विलय पाकिस्तान में कर देना चाहते थे हालांकि बाद में सरदार पटेल और वीपी मेनन की कोशिशों के चलते महाराजा जोधपुर को अपना इरादा बदलना पड़ा और भारत के साथ विलय पत्र पर हस्ताक्षर करने पड़े दरअसल युवराज हनुमंत सिंह की पहली शादी महज 20 साल की उम्र में 1943 में गुजरात की एक छोटी सी रियासत ध्र दरा की राजकुमारी कृष्णा कुमारी के साथ हुई थी।
4 साल बाद 1947 में हनुवंत सिंह जोधपुर रियासत के महाराजा बने और 1948 में उन्होंने अपने से छ साल छूटी स्कॉटिश नर्स सैंड्रा से दूसरी शादी की शादी से पहले उन्होंने स्रा का धर्म परिवर्तन करवाया और उसे शांता देवी का नाम दिया लेकिन आपसी अनबन के चलते महज डेढ़ साल के बाद ही सैंड्रा इंग्लैंड लौट गई तो महाराजा ने उन्हें मनाकर लाने की काफी कोशिश की लेकिन वह नहीं लौटी वहीं दूसरी तरफ जुबैदा उस वक्त बम्बे में रहती थी उन दिनों मुंबई को बम्बे ही कहा जाता था उनके पिता मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री के नामी गिरामी व्यक्ति कासिम भाई मेहता थे जो कि एक अच्छे खासे फिल्म स्टूडियो के मालिक थे उनकी मां फयाज बाई सिंगर थी वह अपने मां-बाप की इकलौती संतान थी पिता का हिंदी सिनेमा में इतना नाम और रुतबा था कि फिल्म इंडस्ट्री की कई हस्तियों का उनके घर पर आना जाना लगा रहता था उस जमाने की एक मशहूर अदाकारा से उनके पिता के काफी करीबी संबंध थे फिल्मी माहौल में पली बढ़ी जुबैदा भी एक फिल्म कलाकार बनना चाहती थी उन्होंने अपने पिता से चोरी छुपे एक फिल्म में भी काम किया था।
लेकिन उनके पिता जुबैदा के फिल्मों में काम करने के खिलाफ थे और कासिम भाई ने जुबैदा अभिनीत एकमात्र फिल्म रिलीज ही नहीं होने दी फिर भी जुबैदा की जिद जारी रही तब उनके पिता ने उनकी शादी अपने करीबी दोस्त के बेटे से करवा दी जो कि विदेश से पढ़कर आए थे कुछ समय बाद जुबैदा ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम रखा गया खालिद मोहम्मद पुत्र के जन्म के बाद घर जमाई बनकर रह रहे जुबैदा के पति ने अब परमानेंटली कराची जाने की ख्वाहिश जताई लेकिन जुबैदा के पिता अपनी इकलौती संतान को हर वक्त अपने साथ ही रखना चाहते थे इसीलिए उन्होंने जुबैदा के पति की इस बात को मानने से इंकार कर दिया और इसी के चलते जुबैदा और उनके पति का जबरदस्ती तलाक भी करवा दिया गया रईस परिवार से होने के चलते जुबैदा का स्टैंडर्ड ऑफ लिविंग लगातार अच्छा बना रहा वह समय-समय पर फिल्मी पार्टियों में भी जाती रही और अपनी माता से मिले गायकी के गुण के चलते कभी-कभी वह कुछ महफिलों में गुनगुना भी लिया करती थी बात 1950 की है जब 22 अप्रैल को जोधपुर राजघराने की बेटी राजेंद्र कुमारी की शादी थी।
बड़ौदा राज घराने के युवराज फतेह सिंह गायकवाड़ बारात लेकर जोधपुर पहुंचे इस शाही शादी में जोधपुर और बड़ौदा से नाच गाने के लिए कई बड़े कलाकारों को बुलाया गया था उस महफिल में 24 साल की जुबैदा भी अपनी आंटी के साथ शामिल हुई यह वही आंटी थी जिनका जुबैदा के पिता के साथ बेहद खास रिश्ता था खैर महफिल शुरू हुई और मंच पर एक-एक करके कलाकार राजा महाराजाओं के लिए नाच गाना पेश कर रहे थे अचानक जुबैदा भी मंच पर आई और उन्होंने ने गाना शुरू कर दिया हर किसी की नजर जुबैदा पर थी एक तो वो थी बेहद खूबसूरत और ऊपर से आवाज में वह मिठास जो हर किसी का ध्यान खींच ले उस महफिल में मारवाड़ रियासत के महाराजा हनुवंत सिंह भी शामिल हुए थे जब उन्होंने जुबैदा का गाना सुना तो सुनते ही रह गए महफिल खत्म होते-होते महाराजा जुबैदा से बात करने में कामयाब रहे अगले दिन जुबैदा बारात के साथ वापस बड़ौदा लौटने वाली थी।
जुबैदा बड़ौदा के लिए रवाना जरूर हुई लेकिन तबीयत नासाज होने पर अगले स्टेशन पर ही वह ट्रेन से उतर भी गई उन्हें शाही मेहमान की तरह जोधपुर वापस बुला लिया गया वापस लौटकर जुबैदा महाराजा के विश्वास पात्र भारतेंद्र सिंह के बंगले में मेहमान बनकर रुकी जुबैदा की मौजूदगी में भारतेंद्र सिंह ने शाम को बंगले में एक महफिल रखी जिसमें महाराजा हनुमंत सिंह मेहमान बन कर पहुंचे और यहीं से इन दोनों के बीच बातचीत का एक नया सिलसिला शुरू हुआ जो इजहार मोहब्बत पर जाकर खत्म हुआ राजस्थान के मशहूर लेखक अयोध्या प्रसाद की किताब द रॉयल ब्लू के हिसाब से तो जुबैदा ने बीमार होने का बहाना ही इसलिए किया था ताकि हनुवंत सिंह से दोबारा मुलाकात हो सके क्योंकि अंदर ही अंदर तो जुबैदा भी तन्हाई भरा जीवन काट रही थी खैर कुछ दिनों बाद जुबैदा ने जोधपुर से बम्बे लौटने का मन बना लिया महाराजा ने उन्हें अपने पास रोकने की खूब कोशिश की लेकिन सख्त पिता और उनकी इजाजत ना होने के चलते उन्होंने लौटना ही ठीक समझा जुबैदा के बम्बे लौटते ही महाराजा हनुमंत सिंह बेचैन रहने लगे वह जुबैदा से मिलने के लिए ऐसे उतावले हुए कि उन्होंने अपने करीबी खुशवंत सिंह को जुबैदा को खोजने के लिए बमबे भेज दिया।
खुशवंत सिंह कामयाब हुए और सही पता मिलते ही महाराजा खुद ब मुंबई पहुंच गए महाराजा हनुमंत सिंह मुंबई आकर चर्च गेट के पास स्थित एस्टोरिया होटल में आकर रुके आखिरकार उन्होंने अपने करीबी की मदद से जुबैदा को मिलने के लिए बुला ही लिया मुलाकातें हुई और दोनों ने एक दूसरे के साथ जिंदगी गुजारने का फैसला कर लिया लेकिन ऐसा होना आसान नहीं था हनुमंत सिंह जोधपुर के राजा थे और जुबैदा एक मुस्लिम एक्ट्रेस वहीं दूसरी तरफ जुबैदा के पिता भी सख्त मिजाज आदमी थे जो उनकी जिंदगी का हर फैसला खुद लिया करते थे दोनों के रिश्ते का खुलासा तब हुआ जब महाराजा के भेजे जा रहे कीमती तोहफे की भनक जुबैदा की मां पयाज बेगम को लग गई मां को मनाने के लिए एक दिन जुबैदा ने महाराजा को घर बुला लिया इस मुलाकात में मां फयाज ने महाराजा को साफ इंकार कर दिया उन्होंने कह दिया कि हम मुस्लिम हैं और हमारी बेटी ना तो धर्म बदलेगी और ना ही दूसरी औरतों के साथ सौतन बनकर रहेगी महाराजा ने उन्हें विश्वास दिलाया कि उनका प्यार कोई दिखावा नहीं है और व ता उम्र जुबैदा का साथ निभाएंगे मां का मन बदला तो जरूर लेकिन उन्होंने जुबैदा के सामने एक मुश्किल शर्त रख दी शर्त यह थी कि अगर जुबैदा महाराजा से शादी करना चाहती हैं तो उन्हें अपने 2 साल के बेटे खालिद को छोड़कर जाना होगा जुबैदा अड़ गई कि वो किसी भी हाल में अपने बेटे को नहीं छोड़ेगी।
लेकिन मां ने ने कहा कि जुबैदा के शादी करके हिंदू बनने के बाद उनकी अपनी कोई संतान नहीं होगी ऐसे में खालिद की परवरिश वह खुद करेंगी जो उनके बुढ़ापे का सहारा बनेगा आखिरकार जुबैदा को अपनी मां की शर्त माननी पड़ी हालांकि पिता इन सब बातों से अनजान थे एक दिन मौका पाते ही महाराजा हनुमंत सिंह जुबैदा को अपने साथ जोधपुर ले गए 23 साल की जुबैदा ने 17 दिसंबर 1950 को ब्यावर के आर समाज मंदिर में आर्य समाजी रीति रिवाजों के साथ महाराजा हनुवंत सिंह से शादी की और हिंदू धर्म अपना लिया धर्म बदलने पर जुबैदा का नाम विद्यारानी रखा गया धर्म परिवर्तन के लिए मंदिर में हवन भी करवाया गया था।
जिसका सबूत आज भी ब्यावर के मंदिर में दर्ज है जब महाराजा जुबैदा को लेकर जोधपुर के उमेद भवन गए तो शाही घराने ने एक मुस्लिम एक्ट्रेस को बहू के रूप में अपनाने से साफ इंकार कर दिया जाहिर है कि हनुमंत सिंह महाराजा जरूर थे लेकिन घर में पहले से एक पत्नी कृष्णा कुमारी मौजूद थी और राज परिवार के कुछ बड़े बुजुर्ग जैसे कि हनुमंत सिंह की माता भी मौजूद थी ऐसे में महाराजा ने जुबैदा को मेहरानगढ़ के किले में रखा जुबैदा को महाराजा ने शादी के बाद छोटी रानी का दर्जा भी दिया लेकिन राजघराने और राजपूत समाज ने उन्हें कभी नहीं अपनाया जुबैदा को उमेद पैलेस भवन में होने वाली किसी भी चर्चा में शामिल होने की अनुमति नहीं थी।
उन्हें कभी शाही सलाहकारों में शामिल नहीं किया गया महाराजा भी अक्सर शाही फैसले बड़ी रानी कृष्णा कुमारी से सलाह मशवरे के बाद ही लिया करते थे यह बात शायद जुबैदा को खटकती भी थी हालांकि वो और बड़ी रानी अच्छी दोस्त भी बन चुकी थी समय बीतता गया और शादी के एक साल बाद 2 अगस्त 1951 को जुबैदा ने महाराजा हनुवंत सिंह के छोटे बेटे राव राजा हुकुम सिंह को जन्म दिया राजा हुकुम सिंह को टुटू बना भी कहा जाता था महाराजा जुबैदा को समय समय पर उनके परिवार से मिलवाने के लिए बॉम्बे भी लेकर जाया करते थे हालांकि व महज चंद मिनटों के लिए ही अपने पहले बेटे खालिद मोहम्मद से मिल पाती थी दूसरी तरफ भारत को आजादी मिलने के बाद और खास तौर पर संविधान लागू होने के बाद धीरे-धीरे राजशाही खत्म की जा रही थी और चुनी हुई सरकारें बन रही थी।
1949 में राजस्थान राज्य बना और वहां के मुख्यमंत्री कांग्रेस के जयनारायण व्यास चुने गए जोधपुर में अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए 1952 में महाराजा हनुमंत सिंह ने अखिल भारतीय राम राज्य परिषद पार्टी बनाई और खुद चुनाव मैदान में उतरे उन्होंने लोकसभा और विधानसभा चुनाव में पूरे मारवाड़ से अपने प्रत्याशी खड़े किए और लगभग सभी सीटों पर कांग्रेस के खिलाफ जीत हासिल की हनुमंत सिंह ने खुद सरदारपुरा की विधानसभा सीट के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री जयनारायण व्यास के सामने ताल ठोक दी और जीत भी गए लेकिन अपने जीतने की औपचारिक घोषणा वह सुन नहीं पाए चुनाव जीतने के लिए महाराजा हनुमंत सिंह ज्यादातर समय अपनी पहली पत्नी महारानी कृष्णा कुमारी के साथ चुनाव प्रचार करते हुए बिताते थे ऐसे में जुबैदा और उनके बीच दूरियां बढ़ने लगी।
जुबैदा को चुनावी मामलात से दूर रखा जाता था क्योंकि मुस्लिम जुबैदा के चलते उनके राजपूताना वोटर कम हो सकते थे इन सब दायरों ने जुबैदा को अकेलेपन में ढकेल दिया जल्द ही चुनावी नतीजों का वक्त भी आ गया व 26 जनवरी 1952 का दिन था चुनाव के नतीजों की घोषणा में बस कुछ ही समय बाकी था कहा जाता है कि महाराजा हनुमंत सिंह बड़ी महारानी कृष्णा कुमारी के साथ हड़बड़ी में एक दूसरे शहर शायद दिल्ली के लिए रवाना होने वाले थे कि तभी जुबैदा ने खुद उनके साथ जाने की जिद्द पकड़ ली महाराजा हनुमंत सिंह समझाते रहे कि उनका साथ जाना ठीक नहीं होगा लेकिन जुबैदा नहीं मानी और एयरक्राफ्ट की सीट पर जाकर बैठ गई उस एयरक्राफ्ट में सिर्फ दो ही सीटें थी ऐसे में कृष्ण कुमारी को जोधपुर में ही रुकना पड़ा उड़ान भरने के कुछ समय बाद ही सुमेरपुर के पास उनका प्लेन क्रैश हो गया जिसमें 26 साल की जुबैदा और 28 साल के महाराजा हनुमंत सिंह की हो हो गई जोधपुर के अधिकतर लोगों ने महाराजा की के लिए जुबैदा की जिद को जिम्मेदार ठहराया वहीं कुछ लोगों का कहना था कि महाराजा महज चार घंटे की नींद लेकर प्लेन उड़ा रहे थे जिससे यह हादसा हुआ कुछ लोगों का यह भी मानना था कि महाराजा को चुनाव में जीता देखकर अपोजिशन ने उनकी मौत की साजिश रची।
जुबैदा पर बनी साल 2001 में रिलीज हुई फिल्म जुबैदा के अनुसार खुद जुबैदा नहीं चाहती थी कि महाराजा उनसे दूर रहे इसीलिए संभवतः उन्होंने महाराजा के साथ कर ली उस फिल्म का स्क्रीन प्ले जुबैदा की पहली शादी से हुए बेटे खालिद मोहम्मद ने ही लिखा था खालिद की परवरिश उनके नाना नानी ने की थी जुबैदा की मौत के समय उनका बेटा हुकुम सिंह महज चार महीने का था जिसकी परवरिश अब राजमाता बन चुकी कृष्ण कुमारी ने की थी हुकुम सिंह की शादी अलवर के राव राजा दलजीत सिंह की बेटी राव रानी राजेश्वरी कुमारी राठौड़ से हुई इनका एक बेटा और एक बेटी भी हुई ।
लेकिन बड़े ही रहस्यमय ढंग से 17 अप्रैल 1981 को टूटू बना यानी कि हुकुम सिंह का सर कटा हुआ शरीर उनके कमरे में मिला हालांकि कहीं-कहीं यह जिक्र भी मिलता है कि उनका मृत शरीर जोधपुर की एक सड़क पर मिला था उन्हें उन्हीं की तलवार से मारा गया था और शरीर पर 20 गहरे जख्म भी थे उनकी हत्या की गुथी आज भी अनसुलझी है जोधपुर के स्थानीय लोगों का आज भी मानना है कि जुबैदा की आत्मा उमेद भवन पैलेस और रॉयल फैमिली के स्कूल में भटकती है स्कूल के कई कमरे बड़े-बड़े तालों और तंत्र मंत्र से बंद कर दिए गए हैं स्थानीय लोग बताते हैं कि ऐसा उनकी रूह को कैद करने के लिए किया गया है उधर महाराजा की पहली पत्नी कृष्ण कुमारी जिन्हें आगे चलकर राजमाता की उपाधि दी गई उन्होंने ही नौजवान महाराजा हनुवंत सिंह की असमय मृत्यु के बाद राज घराने को संभाला और 1971 में बाकायदा लोकसभा चुनाव लड़कर मेंबर ऑफ पार्लियामेंट होने का दर्जा भी हासिल किया।
अगर इतिहासकार डॉकर मोहन लाल गुप्ता की माने तो जुबैदा और हनुमंत सिंह ने कभी शादी ही नहीं की कुछ समय पहले आर्य समाज से जुड़े ओम मुनि ने एक अखबार के पत्रकार को बताया था कि ब्यावर के मंदिर में सिर्फ जुबैदा के धर्म परिवर्तन के प्रमाण हैं शादी के नहीं शादी पर सवाल इसलिए भी उठाया गया क्योंकि आर्य समाज के नियमों के अनुसार एक पत्नी के होते हुए दूसरी शादी करना संभव नहीं था।
एक इंटरव्यू में जोधपुर घराने के मुखिया महाराजा गज सिंह ने बताया था कि जुबैदा उनके पिता की रानी नहीं बल्कि सिर्फ अयादत यानी कि महज पार्टनर थी खैर जो भी रहा हो लेकिन इतना तय है कि जुबैदा और हनुमंत सिंह की यह कहानी इतिहास के पन्नों में दर्ज जरूर हो गई है और आज भी जोधपुर के लोग इस वाकए को भूले नहीं है