14 जून 2020 एक खबर आई और पूरा देश जैसे कुछ देर के लिए रुक गया। सुशांत सिंह राजपूत नहीं रहे। सुशांत सिंह का यूं जाना हर किसी को रुला गया है। हर कोई हैरान है। हदप्रभ है कि आखिर 34 साल की उम्र में इस अभिनेता ने यूं क्यों जान दी। सुशांत की मौत का सुशांत सिंह राजपूत हमारे बीच नहीं है। सुशांत सिंह राजपूत की मौत का। सुशांत सिंह राजपूत लेकिन उस दिन सिर्फ एक एक्टर की मौत की खबर नहीं आई। और उसके बाद सिर्फ एक एक्टर की नहीं बल्कि पूरे बॉलीवुड की बात बदल गई। पहले लोग फिल्मों की बात करते थे। अब लोग कास्टिंग की बात करते हैं। पहले बॉक्स ऑफिस की चर्चा होती थी। अब नेबेटिज्म पर बहस होने लगी। पहले लोग पूछते थे ये फिल्म कैसी है?
अब लोग पूछने लगे इस हीरो को मौका कैसे मिला? तो सवाल यह है क्या सच में सुशांत सिंह राजपूत के बाद बॉलीवुड बदल गया? या बॉलीवुड नहीं हम बदल गए? मैं हूं सुहानी और आप देख रहे हैं फिल्मी जाट कल। आज कहानी सिर्फ सुशांत सिंह की नहीं है। पूरे बॉलीवुड की है। देखो भाई बॉलीवुड में आउटसाइडर होना कोई नई बात नहीं थी। शाहरुख खान भी आउटसाइडर थे। अक्षय कुमार भी नवाजुद्दीन सिद्दीकी भी लेकिन 2020 से पहले यह बातें सिर्फ इंडस्ट्री के अंदर तक होती थी। आम ऑडियंस को फर्क नहीं पड़ता था। अगर फिल्म अच्छी लगी तो टिकट खरीद लिया। अगर स्टार किड आया तो चलो देख लेते हैं। बहुत कम लोग पूछते थे क्या सबको बराबर मौका मिलता है? यानी फैसले ज्यादातर इंडस्ट्री करती थी ऑडियंस नहीं। और आज आज बदलाव की इस कहानी को समझने के लिए सुशांत की पूरी बायोग्राफी नहीं सुनाऊंगी। लेकिन उस बदलाव को समझने के लिए पहले सुशांत को थोड़ा सा समझना पड़ेगा।
पटना का एक लड़का इंजीनियरिंग पढ़ रहा था। अच्छा स्टूडेंट सेफ करियर सामने था लेकिन उसने सब छोड़ दिया। क्यों? क्योंकि उसे एक्टर बनना था। अब जरा सोचो उस दौर में ना कोई फिल्मी फैमिली, ना कोई गॉड फादर, ना कोई ब्रोंज, सिर्फ एक सपना और मुंबई। मुंबई ने उन्हें खुले हाथों से नहीं अपनाया। बॉलीवुड डांसर बने, थिएटर किया, छोटे-छोटे मौके मिले। फिर पवित्र रिश्ता आया और मानव घर-घर का नाम बन गया। यहीं रुक जाना आसान नहीं था। [नाक से की जाने वाली आवाज़] टीवी का सबसे बड़ा चेहरा बन चुके थे सुशांत। आराम से पूरी जिंदगी निकल जाती। लेकिन सुशांत ने फिर रिस्क लिया।
टीवी छोड़ा बॉलीवुड आ गए। 2013 में काय पोची अपनी पहली फिल्म की और लोगों ने समझ लिया कि यह लड़का अलग है। यह सिर्फ हीरो बनने नहीं आया है। यह कैरेक्टर को जीने आया है। फिर आई एमएस धोनी। आज भी लोग कहते हैं सुशांत ने धोनी की एक्टिंग नहीं की थी। धोनी को जी लिया था। महीनों भर की प्रैक्टिस, घंटों बैटिंग, बार-बार वही शॉट ताकि स्क्रीन पर एक्टर ना दिखे बल्कि धोनी दिखे। यही फर्क था। बाकी सारे स्टार्स में और सुशांत में। लेकिन मुझे पता है क्या लगता है? सुशांत की सबसे बड़ी पहचान उनकी फिल्मों से भी कहीं बड़ी थी। बाकी लोग बॉक्स ऑफिस की बात करते थे। यह टेलिस्कोप खरीद रहे थे। बाकी लोग लग्जरी कार्स दिखा रहे थे। यह रात को आसमान देख रहे थे। बाकी लोग पार्टीज में थे। यह क्वांटम फिजिक्स पढ़ रहे थे। यह अजीब नहीं था। ये क्यूरियस थे। और शायद यही बात लोगों को उनसे जोड़ती थी। उन्होंने अपने लिए 50 सपनों की लिस्ट बनाई थी।
प्लेन उड़ाना, नई चीजें सीखना, बच्चों की मदद करना, पेड़ लगाना, हर सपना सिर्फ पैसे कमाने का नहीं था। कुछ नया सीखने का था। आज के समय में जहां सोशल मीडिया पर लोग परफेक्ट दिखने की कोशिश करते हैं। सुशांत अलग दिखने से नहीं डरते थे। फिर आई छोरी किस्मत देखो। जिस फिल्म में उन्होंने लोगों से कहा हार मत मानना। वही फिल्म आज लाखों लोग उन्हें याद करते हुए देखते हैं। फिर आया 14 जून 2020। उस दिन क्या हुआ? यह पूरा देश जानता है। लेकिन उसके बाद जो हुआ वो शायद उतना ही बड़ा था। पूरे देश में एक सवाल उठने लगा। क्या बॉलीवुड में आउटसाइडर और स्टार किड को बराबर के मौके मिलते हैं? क्या बड़े बैनर्स, बड़ी एजेंसी सिर्फ इंडस्ट्री का पावर स्ट्रक्चर है? नए लोगों के लिए मुश्किलें बढ़ाता है। इन सवालों पर टीवी डिबेट्स हुई। सोशल मीडिया पर लाखों लोग बोले।
इंडस्ट्री के अंदर भी अलग-अलग सामने से राय आई। कुछ लोगों ने नेपोटेटिज्म को बड़ी समझ से बताया। बहस बढ़ा चढ़ाकर पेश की जा रही थी। लेकिन एक बात साफ थी। अब यह मुद्दा दबा हुआ नहीं था। पूरा देश इस पर बात कर रहा था। अब यहां सबसे दिलचस्प बात आती है। 2020 के बाद क्या बदला? स्टार किड लॉन्च होना बंद हो गए? नहीं। बड़े बैनर खत्म हो गए? नहीं। नेपोटिज्म पूरी तरह खत्म हो गया। बिल्कुल भी नहीं। फिर बदलाव कहां आया? बदलाव आया ऑडियंस में। पहले ट्रेलर देखकर टिकट बिकती थी। अब कास्टिंग भी चर्चा का हिस्सा बन गई है। पहले सोशल मीडिया पर प्रमोशन काफी होता था। लोग पूछते थे एक्टर को चुना क्यों गया? ओटीटी ने भी इस बदलाव को तेज किया। पंकज त्रिपाठी, जयदीप एहलावत, प्रतीक गांधी, जितेंद्र कुमार, विजय वर्मा जैसे कई कलाकार को पहले से कहीं ज्यादा पहचान मिली। क्या इसका पूरा श्रेय सुशांत को जा सकता है? नहीं। ओटीटी पहले भी आ चुका था। ऑडियंस की पसंद भी बदल रही थी। लेकिन क्या 2020 के बाद इस बदलाव की रफ्तार तेज हुई?
मेरे हिसाब से हां क्योंकि पहली बार ऑडियंस ने खुलकर सवाल पूछने शुरू किए। लेकिन मेरे हिसाब से सुशांत की सबसे बड़ी जीत कोई फिल्म नहीं थी। कोई अवार्ड नहीं था। उनकी सबसे बड़ी जीत थी कि लाखों छोटे शहर के बच्चों को यकीन दिलाया कि अगर पटना का लड़का बिना किसी फिल्मी बैकग्राउंड के इतनी तेजी तक आगे बढ़ सके है। तो शायद हम भी पढ़ सके है। लेकिन क्या वो बॉलीवुड को बदल सके? आज इतने सालों के बाद भी जब सुशांत का नाम आवे है ना तो लोग सिर्फ एक एक्टर को याद नहीं करते भाई। उन्हें एक क्यूरियस माइंड याद आता है। एक मेहनती छोरा याद आवे है। एक ऐसा इंसान जिसने सीखना कभी बंद नहीं किया और शायद इसीलिए वो आज भी लाखों लोगों के दिलों में जिंदा है। लेकिन फिर भी बॉलीवुड ने उनसे कुछ सीखा कुछ बदला। शायद इसका जवाब ना है। मैं आपसे पूछना चाहूं जब सुशांत सिंह राजपूत को याद करते हो तो सबसे पहले थ ध्यान में के आवे है धोनी छिचोरे उनकी मुस्कान या उनका सपना देखने का तरीका कमेंट में जरूर बताइएयो। मैं हूं सुहानी। कमेंट में रोज पढ़ती हूं। अगर ऐसी ही बॉलीवुड की सच्ची और इंस्पिरेशनल कहानियां सुनना तुम्हें पसंद है तो चैनल ने सब्सक्राइब कर लो या छोरी यही मिलेगी थाम फिल्मी चार्ट पे।