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1981 में राजेश खन्ना के जीवन में हुआ ऐसा चमत्कार की हिल गए अमिताभ।

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राजेश खन्ना के डूबते करियर के बारे में हम सब जानते हैं लेकिन क्या आपको पता है कि उनके करियर में एक ऐसा चमत्कार भी हुआ था जिसको देखकर अमिताभ बच्चन और पूरी इंडस्ट्री हल चुकी थी।

फिल्म इंडस्ट्री में एक कहावत है कि उगते सूरज को सब सलाम करते हैं. 1970 के दशक के बीच से 1980 के दशक के आखिर तक का समय राजेश खन्ना के लिए एक बुरे सपने जैसा था. जहां उनकी फिल्में लगातार फ्लॉप हो रही थीं, वहीं अमिताभ बच्चन की ‘लावारिस’, ‘नसीब’ और ‘कालिया’ जैसी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सैकड़ों करोड़ कमा रही थीं. सबको लगा कि राजेश खन्ना का दौर खत्म हो गया है. लेकिन 1981 में राजेश खन्ना ने एक जोरदार पलटवार किया, ऐसी फिल्में दीं जिन्होंने क्रिटिक्स को भी हैरान कर दिया.

1981 में राजेश खन्ना ने 2 खास फिल्मों में अपनी शानदार एक्टिंग रेंज दिखाई. पहली थी डायरेक्टर चेतन आनंद की ‘कुदरत’, जिसमें राज कुमार, हेमा मालिनी और विनोद खन्ना ने एक्टिंग की थी. पुनर्जन्म पर बनी इस सस्पेंस ड्रामा में दर्शकों ने राजेश खन्ना की सीरियस परफॉर्मेंस को पसंद किया और यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त हिट साबित हुई.

उसी साल, उनकी दूसरी बड़ी फिल्म ‘दर्द’ रिलीज हुई, जिसमें उन्होंने डबल रोल किया था. फिल्म के गाने और काका का जबरदस्त स्टाइल दर्शकों को इतना पसंद आया कि इसने अपनी सिल्वर जुबली भी मनाई. कहा जाता है कि इन दो लगातार सफलताओं ने अमिताभ बच्चन के कैंप में हलचल मचा दी, क्योंकि थिएटर एक बार फिर काका के नाम के नारों से गूंजने लगे.

1981 में इस जबरदस्त वापसी के तुरंत बाद, राजेश खन्ना ने कुछ बेहतरीन स्क्रिप्ट पर काम करना शुरू कर दिया, जिसमें कल्ट क्लासिक ‘डिस्को डांसर’ भी शामिल है, जो 1982 के आखिर में रिलीज हुई थी.

इस फिल्म में मिथुन चक्रवर्ती लीड रोल में थे. मिथुन ने फिल्म में ‘जिमी’ का जबरदस्त किरदार निभाया और अपने डांसिंग मूव्स से ऐसा जादू चलाया कि वह रातोंरात फिल्म इंडस्ट्री के नए सुपरस्टार बन गए.

ट्रेड पंडितों का मानना ​​है कि अमिताभ बच्चन 1981 के इस चमत्कार से हैरान थे, क्योंकि राजेश खन्ना ने बिना किसी जबरदस्त एक्शन या फाइटिंग के, सिर्फ अपनी दमदार एक्टिंग, रोमांटिक स्टाइल और बेहतरीन म्यूजिकल सेंस के दम पर वापसी की थी. जहां 80 के दशक की शुरुआत में जबरदस्त एक्शन फिल्मों की बाढ़ आ गई थी, वहीं राजेश खन्ना ने 1981 में अपनी वापसी के साथ ‘सौतन’ (1983) और ‘अवतार’ (1983) जैसी फैमिली फिल्मों की नींव रखी, जिससे यह साबित हो गया कि काका को इतनी आसानी से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

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