दुनिया के नक्शे पर जब हम दो देशों की दोस्ती देखते हैं तो अक्सर उनके बीच साझा इतिहास, धर्म या संस्कृति का आधार होता है। लेकिन अज़र-बैजान और इजराइल की दोस्ती इन सभी मापदंडों से परे विशुद्ध रूप से स्ट्रेटेजिक और जिओपॉलिटिकल हितों पर टिकी है। एक तरफ जहां अज़र-बैजान एक मुस्लिम बाहुल्य देश है, वहीं दूसरी तरफ इजराइल यहूदी राष्ट्र है।
फिर ऐसा क्या है कि यह दोनों देश एक दूसरे के इतने करीब आ गए हैं। इन सवालों पर दोस्ती की सबसे बड़ी कड़ी ईरान है। आइए इस सवाल का जवाब विस्तार से समझते हैं। दरअसल, इन सवालों पर दोस्ती की सबसे बड़ी कड़ी ईरान है।
अज़र-बैजान और ईरान के बीच लंबी सीमा है। दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक और धार्मिक संबंध होने के बावजूद राजनीतिक रूप से हमेशा एक तनाव रहा है। अज़र-बैजान एक शिया मुल्क है। उसके बावजूद उसका मानना है कि ईरान उसकी आंतरिक राजनीति में दखल देता है और कट्टरपंथी समूहों को बढ़ावा देता है। व
हीं दूसरी तरफ इजराइल के लिए ईरान उसका सबसे बड़ा दुश्मन है। दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है। यही सिद्धांत यहां काम कर गया। अज़र-बैजान के साथ दोस्ती करके इजराइल को ईरान की नाक के नीचे एक रणनीतिक ठिकाना मिल गया है।
जहां से वह ईरान की गतिविधियों पर नजर रख सकता है। इजराइल और अज़रबैजान के संबंधों का एक बड़ा हिस्सा डिफेंस डील है। अज़रबैजान अपनी सीमा को आधुनिक बनाने के लिए लंबे समय से इजराइल का मुख्य ग्राहक रहा है। इजराइल से मिलने वाली एडवांस्ड ड्रोन तकनीक, मिसाइल डिफेंस सिस्टम और सर्विलांस उपकरणों ने अज़र-बैजान की सेना को इस क्षेत्र में सबसे शक्तिशाली बना दिया है।
विशेष रूप से नागार्नो काराबाग संघर्ष के दौरान इजराइली हथियारों ने निर्णायक भूमिका निभाई थी। बदले में इजराइल को अज़र बैजान से वो मिलता है जिसकी उसे सबसे ज्यादा जरूरत है। यानी तेल और गैस। इजराइल अपनी ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा अज़र-बैजान से आयात करता है। अज़र-बैजान का तेल इजराइल की अर्थव्यवस्था की धमनियों में दौड़ता है।
यह लेनदेन दोनों देशों को एक दूसरे पर आर्थिक रूप से निर्भर बनाता है। इजराइल के साथ दोस्ती का एक और आधार अज़र-बैजान में रहने वाला यहूदी तबका है। सदियों से अज़र-बैजान में यहूदी सुरक्षित और सम्मान के साथ रह रहे हैं। यह एक ऐसा दुर्लभ मुस्लिम राष्ट्र है जहां यहूदियों के खिलाफ कोई वाला माहौल नहीं है। यह मल्टीकल्चरल पहचान इजराइल के साथ संबंधों को और ज्यादा सहज बनाती है।
यह दोस्ती राहों में कांटों के बिना नहीं है। अज़र बैजान को अपने मुस्लिम पड़ोसियों खासतौर पर ईरान के गुस्से का सामना करना पड़ता है। लेकिन अज़र बैजान ने बहुत ही कुशलता से अपने संतुलन को बनाए रखा है। वो इजराइल के साथ अपने संबंधों को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बहुत ही ज्यादा जरूरी मानता है। अज़र बैजान और इजराइल की ये दोस्ती अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक मिसाल है। यह दिखाती है कि कैसे कूटनीति में धर्म से ऊपर राष्ट्रहित होता है।
जहां एक तरफ इजराइल को एक बहुत ही ज्यादा ट्रस्टवर्दी मुस्लिम देश दोस्त के तौर पर मिला है। वहीं अज़र बैजान को एक ऐसा तकनीकी और सैन्य भागीदार मिला है जिसने उसे क्षत्रिय शक्ति बनाने में मदद की है। वहीं इजराइल के सबसे अच्छे दोस्तों में से एक भारत की बात करें तो भारत और अज़रान के बीच तनाव का मुख्य कारण कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान को अज़रबैजान का समर्थन और अर्मेनिया के साथ भारत की बढ़ती रणनीतिक साझेदारी है।
यही वजह है कि इस समय भारत और अज़रबैजान के बीच में तनावपूर्ण रिश्ते हैं। आने वाले समय में जैसे-जैसे पश्चिम एशिया में समीकरण बदलेंगे, इन सभी देशों की यह साझेदारी और अधिक गहरी और खास हो जाएगी। तो यह थी अज़र बैजान, इजराइल और भारत के संबंधों