कहा जाता है कि बच्चों को मन से ज्यादा प्यार कोई नहीं कर सकता लेकिन क्या हो अगर मैन खुद ही कह दे कि वह अपने बच्चों को मार देगी। यह कोई कहानी नहीं, एक असली मां का असली बयान है।
अगर यही मां यह कहने लगे कि उसे अपने बच्चे से दूर रहना चाहिए, वरना वह उसे चोट पहुंचा देगी या मार देगी, तो यह बात सुनकर कोई भी हैरान रह जाएगा। हालांकि, कुछ मामलों में मां के भीतर ऐसी सोच जैसी गंभीर मेडिकल कंडीशन का हिस्सा हो सकती है।
पीडियाट्रिशियन डॉक्टर संतोष आनंद एक फिल्म का छोटा-सा सीन दिखाते हैं, जिसमें एक महिला, जो संभवतः बच्चे की मां है, घबराई हुई भागते हुए आती है और सामने खड़े एक पुरुष, जो संभवतः डॉक्टर हैं, से कहती है, ‘प्लीज, इसे ले लीजिए।’ इस पर डॉक्टर पूछते हैं, ‘बताइए, क्या हुआ? क्या परेशानी है?’ तब महिला जवाब देती है, ‘परेशानी मैं हूं… मैं उसे मार दूंगी।’
इस क्लिप को दिखाने के बाद डॉक्टर समझाते हैं कि एक बच्चे को पालने के लिए पूरे गांव के जितने सहयोग की जरूरत होती है। उनका कहना है कि पता नहीं यह सोच कहां से आ गई कि बच्चे की देखभाल सिर्फ मां की जिम्मेदारी है। बच्चा रो रहा हो, उसे भूख लगी हो, उसने पॉटी कर दी हो या उसे कहीं बाहर ले जाना हो, हर छोटी-बड़ी जिम्मेदारी सिर्फ मां की है। यह सोच ठीक नहीं है। डॉक्टर के मुताबिक, बच्चे की परवरिश केवल मां नहीं, बल्कि पूरे परिवार की साझा जिम्मेदारी होती है।
डॉक्टर आगे कहते हैं कि अगर नई मां को पूरे परिवार का साथ और सहयोग नहीं मिलता, तो शुरुआत में दिखाई गई वीडियो जैसी स्थिति भी बन सकती है, जिसे कहा जाता है। ऐसी स्थिति में मां के मन में यह विचार आ सकते हैं कि वह बच्चे को संभाल नहीं सकती, उसकी अच्छी तरह देखभाल नहीं कर पाएगी या फिर उसे बच्चा नहीं चाहिए।