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इस टीवी ऐक्ट्रेस ने नरेंद्र मोदी से मांग लिया था इस्तीफा? फिर जो हुआ..

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मैं आज इस सदन में कांग्रेस के मुखिया विराजमान है। उनसे पूछना चाहती हूं यू सेंशन द ह्यूमिलिएशन ऑफ द्रोपदी मुर्मू। साल 2004 भारतीय राजनीति का माहौल पूरी तरह बदल चुका था। इंडिया शाइनिंग का नारा फीका पड़ गया था। भाजपा सत्ता से बाहर हो चुकी थी और पार्टी के अंदर भी हलचल मची हुई थी। कई नेताओं को लगता था कि [संगीत] गुजरात दंगों की वजह से पार्टी को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। ऐसे समय में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार सवालों के घेरे [संगीत] में थे। इसी बीच 12 दिसंबर 2004 को गुजरात के सूरत शहर में एक दुकान के उद्घाटन के दौरान एक साल पहले ही भाजपा पार्टी ज्वाइन की थी। अचानक मीडिया के सामने नरेंद्र मोदी से इस्तीफे की मांग कर देती हैं। वह कहती हैं कि अगर नरेंद्र भाई इस्तीफा देते हैं तो यह साबित हो जाएगा कि भाजपा अलग तरह की राजनीति करती है और अगर उन्होंने ऐसा नहीं किया तो मैं अटल जी के जन्मदिन 25 दिसंबर से आमरण अनशन शुरू कर दूंगी। इफ नरेंद्र भाई गिव्स अप हिज पोस्ट चीफ मिनिस्टर ऑफ़ गुजरात यस इट वुड फाइनली प्रूव दैट द पार्टी विद अ डिफरेंस इफ ही डज नॉट देम ऑन द 25th ऑफ़ दिसंबर व्हिच इज़ अटल जीस बर्थडे। आई वुड लाइक टू गो ऑन टू अ पास्ट टिल ही गिव्स अप हिज पोस्ट। उस बयान ने पार्टी के अंदर भूचाल ला दिया क्योंकि यह बात किसी विपक्षी नेता ने नहीं बल्कि भाजपा की अपनी नई सदस्या ने कहा था। हालांकि उसी शाम दबाव बढ़ने पर उन्होंने अपना बयान वापस ले लिया। लेकिन उस दिन शायद किसी ने नहीं सोचा था कि यह टीवी अभिनेत्री आगे चलकर खुद नरेंद्र मोदी की सरकार में कैबिनेट [संगीत] मिनिस्टर बनने वाली है। वो अभिनेत्री थी स्मृति ईरानी। हम जिएंगे तो इस भारत के लिए और मरेंगे तो इस भारत के लिए और मरने के बाद भी गंगाजल में बहती हुई हमारी अस्थियों को कोई कान लगाकर सुनेगा तो एक ही आवाज आएगी भारत माता की जय। वो नेता जिसने कभी कांग्रेस की नींव हिला दी थी। राष्ट्र के इतिहास में पहली बार हुआ है कि गांधी खानदान का एक बेटा सरेआम कहता हो आओ हिंदुस्तान में बलात्कार करो। एक ऐसा नाम जिसने गांधी परिवार के घर जाकर उनकी हार की पटकथा लिखी थी। अमेठी अमेठी के नतीजे पर मैं कहना चाहूंगा कि स्मृति ईरानी जीती हैं।

उनको मैं बधाई देना चाहता हूं। बीजेपी की सबसे बड़ी महिला स्टार जिसने संसद भवन को कई बार हिला कर रख दिया था। [संगीत] के भी रूप बदलते हैं। [संगीत] सोचे लेकिन आज उसी स्मृति ईरानी के लिए कहा जाने लगा है कि वो खत्म हो चुकी है। बीजेपी की लीडरशिप उनसे खुश नहीं है और वो शायद राजनीति छोड़कर टीवी इंडस्ट्री में वापस कर सकती हैं। [संगीत] जरूर आऊंगी क्योंकि हमारा 25 सालों का रिश्ता जो है वक्त आ गया है आपसे फिर मिलने का। लेकिन सवाल यह है कि एक मिडिल क्लास [संगीत] परिवार की लड़की जिसने कभी मशहूर McDonald’s में काम किया था वो टीवी की दुनिया की सबसे मशहूर [संगीत] बहू कैसे बनी? तुलसी बेटी। नहीं वाह। आप कुछ मत कहिए। [संगीत] आप रोकेंगे तो मैं जा नहीं पाऊंगी। वाह। कैसे तुलसी वीरानी का किरदार निभाने वाली एक अभिनेत्री ने राजनीति में कदम रखा। कैसे वह अमेठी में गांधी परिवार को हराने वाली पहली बड़ी नेता बन गई और क्यों हुआ पॉलिटिक्स में स्मृति [संगीत] ईरानी का डाउनफॉल? जानेंगे इस वीडियो में। साल 1976 दिल्ली के लेडी हार्डिंग हॉस्पिटल [संगीत] में एक बच्ची का जन्म होता है। नाम रखा जाता है स्मृति। इस बच्ची के पिता अजय मल्होत्रा पंजाबी खत्री परिवार से थे। जबकि उनकी मां शिवांगी बागची एक बंगाली ब्राह्मण परिवार से आती थी। दोनों ने परिवार की मर्जी के खिलाफ शादी की थी। कहा जाता है कि जब उन्होंने घर छोड़ा तब उनके पास सिर्फ ₹150 थे।

दिल्ली के मुनरका इलाके में एक छोटे से कमरे में दोनों ने अपनी जिंदगी की शुरुआत की। वह कमरा भी किसी आलीशान घर में नहीं बल्कि [संगीत] एक तबेले के ऊपर बना हुआ था। उसी संघर्ष भरी जिंदगी के बीच स्मृति का जन्म हुआ। घर के हालात अच्छे नहीं थे। खर्च चलाना मुश्किल हो रहा था। इसलिए कुछ समय बाद परिवार दिल्ली [संगीत] छोड़कर गुड़गांव शिफ्ट हो गया क्योंकि उस दौर में गुड़गांव आज की तरह चमकता शहर नहीं बल्कि अपेक्षाकृत सस्ता इलाका माना जाता था। स्मृति के पिता धौला कुआं के पास आर्मी [संगीत] क्लब के बाहर किताबें बेचा करते थे। सुबह बस पकड़ कर दिल्ली आते और शाम को वापस लौट जाते। कई बार छोटी सी स्मृति भी उनके साथ आती और घंटों [संगीत] वहां बैठकर आर्मी ऑफिसर्स को देखती रहती। दूसरी तरफ उसकी मां शिवानी घर-घर जाकर मसाले बेचती थी। [संगीत] बाद में उन्होंने ताज मानसिंह होटल में हाउस कीपिंग का काम भी किया। जहां वह बाथरूम साफ करने से लेकर फर्श तक पहुंचा करती थी। लेकिन आर्थिक तंगी के साथ-साथ घर में तनाव भी [संगीत] बढ़ने लगा। स्मृति के बाद उनकी मां को दो और बेटियां हुई लेकिन बेटा नहीं हुआ। इसी बात को लेकर आसपास के लोग [संगीत] ताने मारते थे। धीरे-धीरे पति-पत्नी के बीच झगड़े बढ़ने लगे और हालात इतने खराब हो गए कि साल 1983 के आसपास [संगीत] स्मृति की मां को घर छोड़ना पड़ा। उस समय स्मृति की उम्र सिर्फ 7 साल थी। इसके बाद स्मृति अपनी मां के साथ दिल्ली के नाना नानी के घर रहने लगी। उनके नाना आरएसएस से जुड़े हुए थे और उन्हीं के बनाए एक टेंट वाले स्कूल में स्मृति ने

[संगीत] शुरुआती पढ़ाई की। 16 साल की उम्र में स्मृति ने दिल्ली के जनपद पर ब्यूटी प्रोडक्ट्स बेचना शुरू कर दिया। उन्हें रोज के करीब ₹200 मिलते थे। बाद में जब उनके पिता को पता चला कि उनकी बेटी फुटपाथ [संगीत] पर सामान बेच रही है तो उन्होंने स्मृति को अपने कूरियर बिजनेस में लगा दिया। अब सुबह-सुबह वह आनंद विहार आईएसबीटी न्यू दिल्ली रेलवे स्टेशन और फलाम एयरपोर्ट से पार्सल्स कलेक्ट करती। फिर ऑफिस जाकर उनकी एंट्रीज करती। एक आम मिडिल क्लास लड़की की तरह वो भी जिंदगी की भागदौड़ में लगी हुई थी। लेकिन उनके सपने आम नहीं थे। साल 1993 में 12वीं पूरी करने के बाद उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ [संगीत] ओपन लर्निंग से बीकॉम में एडमिशन लिया, लेकिन पढ़ाई में उनका मन नहीं लग रहा था। शायद कहीं ना कहीं उन्हें महसूस होने लगा था कि उनकी जिंदगी का रास्ता कुछ और है। फिर 18 साल की उम्र में बिना किसी पहचान और बिना किसी गारंटी के स्मृति दिल्ली छोड़कर सपनों की नगरी मुंबई पहुंच गई। मुंबई पहुंचने के बाद स्मृति ईरानी ने सबसे पहले मॉडलिंग और ऑडिशंस में हाथ आजमाना शुरू किया। साथ ही वह छोटे-मोटे थिएटर शोज़ [संगीत] और स्टेज परफॉर्मेंस भी करने लगी। इसी दौरान एक दोस्त ने मजाकमज़ाक में उन्हें मिस इंडिया 1998 के लिए फॉर्म भरने का चैलेंज दे दिया। स्मृति ने भी बिना ज्यादा सोचे अप्लाई कर दिया और हैरानी की बात यह रही कि उन्हें ऑडिशन कॉल भी आ गया। कंपटीशन में उन्होंने अच्छा परफॉर्म किया और टॉप कंटेस्टेंट्स में पहुंच गई लेकिन जीत नहीं पाई। लेकिन यहां हमें स्मृति की पॉलिटिक्स में दिलचस्पी की एक झलक दिखी। 11 स्मृति गुड इवनिंग। [संगीत] आई एम स्मृति एंड एट 21 इयर्स एज आई स्टैंड 5 फीट 8 इंच टोल। खैर, अब स्मृति ने कई टीवी शोज़ के लिए ऑडिशंस दिए मगर लगभग हर जगह रिजेक्ट कर दी गई। इसी दौरान घर चलाने और खुद को सर्वाइव करने [संगीत] के लिए स्मृति ने बांद्रा के McDonalds आउटलेट में नौकरी कर ली। वहां वो टेबल साफ करने से लेकर कस्टमर सर्व करने तक हर काम करती [संगीत] थी। कहा जाता है कि उस दौर में वो सुबह ऑडिशंस देती थी और शाम को McDonald’s की यूनिफार्म पहनकर काम पर पहुंच जाती थी। इन्हीं दिनों उनकी मुलाकात पारसी बिजनेसमैन जुबिन ईरानी [संगीत] से हुई। धीरे-धीरे दोनों के बीच दोस्ती बढ़ने लगी। उधर स्मृति को छोटे-मोटे एड्स और म्यूजिक वीडियो में काम मिलने लगा। शक्ति भोग पास है देश का एहसास है। [संगीत] रोटी मेरा दीन धर्म रोटी मेरा ईमान। रोटी से है जिंदगी। [संगीत][गाना गाने की आवाज़] रोटी में है जान। रोटी मेरी पूजा रोटी मिलती करके [संगीत] भक्ति। शक्ति पास है। देश का एहसास है। उन्होंने कुछ कमर्शियल्स किए और म्यूजिक वीडियो में भी नजर आई। लेकिन असली [संगीत] सफलता अभी बाकी थी। फिर एक दिन किस्मत ने करवट ली। दरअसल एक टीवी शो की होस्ट नीलम कोठारी अचानक बीमार पड़ गई और [संगीत] लास्ट मोमेंट पर रिप्लेसमेंट के तौर पर स्मृति को बुलाया गया। उसी शो में प्रोड्यूसर शोभा [संगीत] कपूर की नजर स्मृति पर पड़ी। उनकी स्क्रीन प्रेजेंस और चेहरे की सिंपलीसिटी ने सबका ध्यान खींच लिया। उस समय एकता कपूर अपने नए सीरियल [संगीत] क्योंकि सास भी कभी बहू थी के लिए ऐसी लड़की ढूंढ रही थी जो भारतीय दर्शकों को एक आदर्श बहू की तरह लगे और यहां से स्मृति की जिंदगी पूरी तरह बदल गई। बिना किसी बड़े ऑडिशन के उन्हें तुलसी वीरानी का ट्रोल मिल गया। 3 जुलाई 2000 को जब [संगीत] क्योंकि सास भी कभी बहू थी स्टार प्लस पर शुरू हुआ तो शायद किसी ने नहीं सोचा था कि यह सीरियल भारतीय टेलीविजन का इतिहास बदल [संगीत] देगा। रिश्तों के भी [संगीत] रूप बदलते हैं। नई-नई साझे में ढलते हैं। धीरे-धीरे तुलसी वीरानी हर घर की पहचान बन गई। लोग उन्हें सिर्फ एक्ट्रेस नहीं बल्कि अपने परिवार का हिस्सा मानने लगे। उस दौर में हालात ऐसे थे कि शादी के एडवर्टाइजमेंट्स [संगीत] में लोग लिखने लगे हमें तुलसी जैसी बहू चाहिए। शो लगातार सुपरहिट होता गया। 1800 से ज्यादा एपिसोड्स चले और स्मृति ईरानी भारत की [संगीत] सबसे मशहूर टीवी एक्ट्रेस में शामिल हो। इसी दौरान उनकी जिंदगी में जुबिन [संगीत] ईरानी एक बार फिर लौटे। दोनों की दोस्ती प्यार में बदली और साल 2001 में उन्होंने शादी कर ली। शादी के बाद स्मृति [संगीत] बनी स्मृति ईरानी। शादी के कुछ महीनों बाद या अक्टूबर 2001 में स्मृति और जुबीन को एक बेटा होता है जिसका नाम रखा गया जौहर। इसी बीच साल 2003 में यह खबरें फैलने लगी कि कांग्रेस पार्टी स्मृति [संगीत] ईरानी को अपने साथ जोड़ना चाहती हैं।

जब यह बात महाराष्ट्र बीजेपी की नेता मनीष चौधरी तक पहुंची तब उन्होंने तुरंत स्मृति को भाजपा ज्वाइन करने का ऑफर दे दिया। फिर आया 15 नवंबर 2003 का [संगीत] दिन जब स्मृति ईरानी आधिकारिक तौर पर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गई। जॉइनिंग के दौरान हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में जब उनसे सोनिया गांधी को लेकर सवाल पूछा गया तो स्मृति ने ऐसा [संगीत] जवाब दिया जिसने सबका ध्यान खींच लिया। उन्होंने कहा सभी महिलाओं का सम्मान होना चाहिए। लेकिन हमारा आत्मसम्मान हमें यह सोचने की इजाजत नहीं देता कि विदेश में जन्मी महिला हम पर राज करें। उधर उसी दौरान उनके घर बेटी का जन्म हुआ जिसका नाम रखा गया जोश और राजनीति में [संगीत] बीजेपी ने उन्हें महाराष्ट्र यूथ विंग का वाइस प्रेसिडेंट बना दिया और फिर साल 2004 में लोकसभा चुनाव में पार्टी ने एक बड़ा दांव [संगीत] खेला स्मृति ईरानी को दिल्ली की चांदनी चौक सीट से चुनावी मैदान में उतार दिया जहां सामने थे कांग्रेस के दिग्गज नेता कपिल सिब्बल। बीजेपी ने कैंपेन चलाया घर-घर की रानी तुलसी वीरानी। लेकिन टेलीविजन की पॉपुलैरिटी वोटों में नहीं बदल पाई। कपिल सिब्बल के लाखों वोटों के सामने स्मृति बुरी तरह चुनाव हार गई और भाजपा भी लोकसभा चुनाव हार गई। यह हार इतनी बड़ी थी कि कई लोगों को लगा कि उनकी अब पॉलिटिकल जर्नी यहीं खत्म हो जाएगी लेकिन बीजेपी ने उन्हें नजरअंदाज नहीं किया। हार के बावजूद पार्टी ने स्मृति ईरानी को अपनी केंद्रीय समिति का सदस्य बना दिया जिसके बाद वो किस्सा हुआ जिसका जिक्र हमने वीडियो की शुरुआत में किया था। हालांकि स्मृति [संगीत] के इस बयान के लगभग 2 महीने बाद आडवाणी ने अपने घर पर एक डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग रखी जिसमें स्मृति ईरानी भी शामिल हुई। यहीं पर स्मृति ने झुककर मोदी के पैर छुए [संगीत] और मोदी ने भी उनके सर पर हाथ रखकर उन्हें आशीर्वाद दिया और गुजरात की बेटी कहा। लेकिन वाजपेई की तबीयत खराब होने और मई 2006 में प्रमोद महाजन की हत्या के बाद बीजेपी में स्मृति की स्थिति और खराब होती चली जाती है और उन्हें साइड लाइन कर दिया जाता है। जिसके बाद वह फिर से टीवी इंडस्ट्री में हाथ आजमाती हैं और अपना प्रोडक्शन हाउस भी शुरू करती हैं। लेकिन उसमें उन्हें [संगीत] कोई सफलता नहीं मिलती। फिर आता है 2009 का चुनाव। जिसमें स्मृति ईरानी को टिकट तो नहीं दिया गया लेकिन वह बंगाली, हिंदी, पंजाबी और इंग्लिश कई भाषाएं बोल सकती थी। जिसका फायदा उठाने के [संगीत] लिए बीजेपी ने उन्हें देश भर में प्रचार कराने के लिए लगाया। जिसके अगले साल स्मृति ईरानी को बीजेपी महिला मोर्चा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया जाता है और 2011 में उन्हें गुजरात से [संगीत] राज्यसभा भेज दिया जाता है। अब स्मृति सिर्फ एक टीवी एक्ट्रेस नहीं रही बल्कि संसद तक पहुंच चुकी थी। [संगीत] राज्यसभा में उन्होंने शिक्षा, महिलाओं और सामाजिक मुद्दों पर कई बार अपनी बात रखी। जब गुलामी से स्वतंत्रता मिली तब क्या मर्यादाओं की परिस्थिति थी उसका उल्लेख किया कि हां तब भी जब देश आजाद हुआ तब भी कई प्रदेशों की साधारण परिवारों की महिलाओं ने कहा कि हमारा संवैधानिक अधिकार आरक्षित करें। लेकिन तब साधारण परिवारों की वो महिलाएं जिन्होंने राष्ट्र को आजाद करने में अपनी भूमिका निभाई जो दूरदर्शी थी जानती थी कि साधारण वंचित समाजों की महिलाओं को अगर मौका अनोखे ढंग से संविधान की मर्यादा में ना दिया गया तो शायद आगामी वर्षों में महिलाओं के लिए एक चुनौती बन जाएगा। लेकिन सच कहें तो उस वक्त भी बहुत कम लोग उन्हें एक सीरियस नेशनल लीडर मानते थे। फिर आया साल 2014 और इसी साल ईरानी की जिंदगी ने सबसे बड़ा [संगीत] मोड़ लिया। देश भर में मोदी वेव चल रही थी। नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद के लिए सबसे बड़े [संगीत] दावेदार बन चुके थे। ऐसे में बीजेपी ने एक ऐसा फैसला लिया जिसने पूरे देश को चौंका दिया। पार्टी ने स्मृति ईरानी को उत्तर प्रदेश की अमेठी सीट से चुनाव लड़ने के लिए उतार दिया। कि त्यागो उस राजनीति को जिसने रिश्तों का सौदा किया लेकिन इस परिवार को कभी कुछ नहीं दिया। 7 मई को घर के बाहर आओ कमल का बटन दबाओ और अपने भाग्य को एक बार फिर उज्जवल बनाओ। अमेठी यानी गांधी परिवार का सबसे मजबूत गढ़। वहीं सीट जहां से संजय गांधी, राजीव गांधी और फिर राहुल गांधी चुनाव जीतते आए थे। बड़े-बड़े नेता वहां हार चुके थे। ऐसे में जब लोगों ने सुना कि बीजेपी ने एक पूर्व टीवी एक्ट्रेस को राहुल गांधी के खिलाफ उतारा है तो कई लोगों ने इसे मजाक समझा लेकिन स्मृति लोगों [संगीत] के घरों में गई। महिलाओं से मिली। स्थानीय मुद्दों पर बात की। हालांकि 2014 चुनाव तो वह हार गई लेकिन उन्होंने एक चीज हासिल कर ली थी। अमेठी के लोगों के बीच अपनी पहचान। जी हां, 2009 में यहां राहुल गांधी 3,70,000 वोटों से जीते। वहीं 2014 में उनकी जीत का अंतर घटकर 107,923 [संगीत] वोट रह गया। स्मृति को 3 लाख से ज्यादा वोट मिले और शायद यही वो ग्राउंड वर्क था जिसने आगे चलकर भारतीय राजनीति का इतिहास बदल दिया। आज अमेठी में ऐसे किसान भी मिलने आए जिनसे तेजान दादा ने पूछा कि आज तुम आकर प्रत्यक्ष रूप से नरेंद्र मोदी को देखने वाले हो। कभी राहुल गांधी को देखा कभी राहुल गांधी ने आकर तुम्हारी पीठ थपथपाई तो किसान ने कहा, क्या मजाक करते हो दादा? पीठ तो नहीं थपथपाई लेकिन खाद की लाइन में जब किसान खड़ा था तो पुलिस से लाठी चार्ज करवा के पीठ लाल करवाने का काम जरूर किया है। इसका इनाम भी उन्हें मिला और मोदी ने उन्हें सरकार में मानव संसाधन मंत्री बनाया जिसमें देश का एजुकेशन डिपार्टमेंट [संगीत] भी आता है। एक तरह से स्मृति ईरानी देश की शिक्षा मंत्री बन जाती हैं। मैं स्मृति जुबिन ईरानी ईश्वर की शपथ लेती हूं कि मैं विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखूंगी। मैं भारत की प्रभुता और अखंडता अक्षुण रखूंगी। इसलिए मंत्री बनते स्मृति ईरानी की खुद की एजुकेशन को लेकर भी विवाद खड़ा हो जाता है। कांग्रेस का कहना था कि 12वीं पास भी नहीं है वह। वह मानव संसाधन विकास मंत्रालय कैसे संभालेंगी? दरअसल स्मृति ने 2004 के लोकसभा चुनाव में अपने हलफनामे में लिखा था कि उन्होंने 1996 में डीयू से बीए पास किया था। लेकिन 2014 में अमेठी से चुनाव लड़ते वक्त उन्होंने जो हलफनामा दिया [संगीत] उसमें उन्होंने लिखा था कि उन्होंने डीयू के स्कूल ऑफ ओपन लर्निंग से केवल एक साल बीकॉम की पढ़ाई की। बस फिर क्या था? विपक्ष [संगीत] को हमला करने का मौका मिल गया। संसद से लेकर टीवी डिबेट्स तक हर जगह उनकी डिग्री पर चर्चा होने लगी। लेकिन स्मृति ईरानी पीछे हटने वालों में से नहीं थी। उन्होंने पलट कर जवाब दिया, डिग्री नहीं काम [संगीत] बोलता है और फिर अपने अग्रेसिव अंदाज में वह लगातार विपक्ष पर हमला करती रहीं। हालांकि शिक्षा मंत्री के तौर पर उनका कार्यकाल भी विवादों से भरा रहा। हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के छात्र रोहित बेमुला की हत्या का मामला हो या फिर जेएनयू [संगीत] कंट्रोवर्सी। कई बार विपक्ष ने सीधे स्मृति ईरानी को घेर लिया। लेकिन हर बार संसद में उनका जवाब देने का तरीका अलग ही चर्चा ले आता था। वो घंटों तक बिना कागज देखे भाषण देती और विपक्षी नेताओं पर तीखे पलटवार करती। भारत मां की हत्या की बात की और कांग्रेस पार्टी यहां पर तालियां बजाती रही जो भारत की हत्या की बात पर कांग्रेस पार्टी ने ताली पीटी आज इस सदन में इस बात का संकेत पूरे देश को दिया कि मन में गद्दारी किसकी है? धीरे-धीरे बीजेपी सपोर्टर्स उन्हें पार्टी [संगीत] की सबसे अग्रेसिव महिला नेताओं में गिनने लगे। इधर अमेठी में भी स्मृति लगातार एक्टिव रहीं। चुनाव हारने के बाद भी उन्होंने अमेठी नहीं छोड़ी। वो बार-बार वहां जाती, लोगों से मिलती, स्थानीय समस्याओं पर काम करती। यही वजह थी कि धीरे-धीरे अमेठी में राहुल गांधी के खिलाफ नाराजगी बढ़ने लगी और स्मृति की पकड़ मजबूत होती चली गई। फिर आया साल 2019 और एक बार फिर बीजेपी ने स्मृति ईरानी को राहुल गांधी के खिलाफ अमेठी [संगीत] से चुनाव मैदान में उतार दिया। कांग्रेस के अन्य दलों के कुछ नेता हैं जो रात के अंधेरे में आकर कार्यकर्ता से कह रहे हैं कि संभल कर चलना यह कांग्रेस पार्टी का गढ़ है। कुछ कार्यकर्ताओं को कहीं ना कहीं यह संकेत दिया जा रहा है कि ज्यादा दोष मत दिखाओ। 7 मई के बाद तो स्मृति दीदी चली जाएंगी। तुम्हें अकेला छोड़ जाएंगी। जो लोग हमारे कार्यकर्ता और समर्थक को डरा रहे हैं, उनसे आज मैं डंके की चोट पर कहना चाहती हूं कि छेड़ेंगे नहीं तुम्हें लेकिन अगर हमारे कार्यकर्ता और समर्थक का एक भी बाल बांका हुआ तो छठी का दूध याद दिलाने की ताकत इस बहन में है। लेकिन इस बार हालात अलग थे। अभिस्मृति सिर्फ टीवी एक्ट्रेस या पहली बार चुनाव लड़ने वाली नेता नहीं थी। वो केंद्र सरकार की पावरफुल मिनिस्टर बन चुकी थी और पिछले 5 सालों से लगातार [संगीत] अमेठी में ग्राउंड वर्क कर रही थी। राहुल गांधी की गांधी परिवार की और कांग्रेस पार्टी की राजनीति ऐसी अद्भुत हो गई है कि सत्ता पाने के लालच में कुछ भी कहीं भी कैसे भी बोलते। पहले चुनाव में बोल रहे थे कि मशीन ऐसी बनाएंगे कि एक छोर से आलू डालोगे तो दूसरी छोर से सोना निकलेगा। इस चुनाव में राहुल गांधी बोल रहे हैं खटाखट फटाफट टकाटक गरीबी हटा देंगे। हम कहे लल्ला 15 साल तो तुम अमेठी में रहे सांसद। तब काहे अमेठी में खटाखट फटाफट टकाटक गरीबी नहीं हटाए हो। कैंपेन के दौरान उन्होंने राहुल गांधी पर सीधा हमला बोलते हुए कहा, “जिस व्यक्ति ने अमेठी के कंधे पर चढ़कर 15 साल सत्ता का सुख भोगा, वह आज अमेठी छोड़कर दूसरी सीट तलाश रहा है। यह अपने आप में एक बहुत बड़ा संकेत है कि जिस व्यक्ति ने अमेठी के कंधे पर चढ़कर सत्ता 15 साल तक भोगी, वो व्यक्ति आज अमेठी छोड़कर किसी और लोकसभा क्षेत्र में अपना पर्चा भरने जा रहा है। क्योंकि इस बार राहुल गांधी ने केरल की वायनाड सीट से भी चुनाव लड़ने का फैसला किया था। फिर 23 मई 2019 को चुनावी नतीजे आए और भारतीय राजनीति का एक बड़ा इतिहास बदल गया। स्मृति ईरानी ने राहुल गांधी को हरा दिया। 1977 के बाद यह पहला मौका था जब गांधी परिवार का कोई सदस्य अमेठी से चुनाव हार गया था। जिस सीट को कांग्रेस का अवैध किला माना जाता था, वहां एक पूर्व टीवी अभिनेत्री ने गांधी परिवार को हरा दिया था और इस जीत के बाद स्मृति ईरानी का राजनीतिक कद अचानक बहुत बड़ा हो गया। मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में उन्हें महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी गई। अब वह बीजेपी की सबसे चर्चित महिला चेहरों में शामिल हो चुकी थी। संसद में उनके भाषण, विपक्ष पर उनके आक्रमक हमले और टीवी डिबेट्स में उनका कॉन्फिडेंस लगातार सुर्खियों में रहने लगा। अध्यक्ष महोदय, कोर्ट में जाकर वक्तव्य दे दिया कि कश्मीर में रेफरेंडम की तलाशना चाहिए संभावना। मैं आज कांग्रेस पार्टी से पूछना चाहती हूं। क्या उनके आदेश अनुसार यह वक्तव्य कि कश्मीर का खंडन हो, भारत विभाजित हो? क्या यह कांग्रेस के नेतृत्व के आदेश के अनुसार है? हालांकि राजनीति में जितनी तेजी से उनका राइज हुआ, उतनी ही तेजी [संगीत] से कंट्रोवर्सीज भी उनके साथ जुड़ती चली गई। कई मुद्दों पर उनके अग्रेसिव रवय की [संगीत] तारीफ हुई तो कई बार उन्हें आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ा। लेकिन एक बात साफ थी स्मृति ईरानी अब भारतीय राजनीति का ऐसा चेहरा बन चुकी [संगीत] थी जिसे नजरअंदाज करना आसान नहीं था। लेकिन राजनीति में वक्त हमेशा एक जैसा नहीं रहता। जिस अमेठी ने 2019 में स्मृति को ऐतिहासिक जीत दिलाई वही अमेठी 2024 आते-आते फिर देश की सबसे चर्चित सीट बन गई थी। इस बार सबकी नजर राहुल गांधी [संगीत] पर थी। लोगों को लग रहा था कि वह स्मृति से बदला लेने के लिए फिर अमेठी से चुनाव लड़ेंगे। लेकिन कांग्रेस ने अचानक ऐसा फैसला लिया जिसने सबको चौंका दिया। राहुल गांधी खुद मैदान में नहीं उतरे और उनकी जगह कांग्रेस ने किशोरी [संगीत] लाल शर्मा को उम्मीदवार बनाया। किशोरी लाल शर्मा कोई बड़ा नेशनल चेहरा नहीं थे। लेकिन वो पिछले लगभग 40 सालों से गांधी परिवार के सबसे भरोसेमंद नेताओं में गिने जाते थे। अमेठी की जमीन वहां के कार्यकर्ता और स्थानीय समीकरण वो सब कुछ बहुत अच्छी तरह समझते थे। उधर बीजेपी ने राहुल गांधी के अमेठी से ना लड़ने का खूब मजाक उड़ाया। हम लोग अतिथियों के स्वागत में कोई कसर छोड़ेंगे नहीं। इतना ही कह दूं कि अमेठी से गांधी परिवार का ना लड़ना इस बात का संकेत है कि कांग्रेस पार्टी चुनाव में एक वोट पड़ने से पहले ही अमेठी से अपना हार स्वीकार कर चुकी। स्मृति ईरानी ने भी चुनावी सभाओं में कहा अगर गांधी परिवार को जीत की थोड़ी भी उम्मीद होती तो वह खुद मैदान छोड़कर नहीं भागते। किशोरी लाल शर्मा जैसे प्रॉक्सी कैंडिडेट [संगीत] को आगे वो नहीं करते। कहूंगी कांग्रेस का नेतृत्व इस बात की तैयारी कर रहा है कि वह किस प्रकार से अमेठी हारेंगे उसका विश्लेषण वो चुनाव बाद करें। लेकिन अपने आप में यह हास्यास्पद है कि जहां पर कांग्रेस पार्टी ने विशेषता गांधी परिवार ने चुनाव ना लड़कर अपनी हार पहले से ही घोषित कर दी है। वहां पर निश्चित रूप से वो कांग्रेस की हार का निरीक्षण करने आएंगे। लेकिन राजनीति का खेल कई बार बड़े दिग्गजों का गणित भी पलट देता है। जब 2024 के चुनावी नतीजे आए तो अमेठी से सबसे बड़ी खबर [संगीत] सामने आई। स्मृति ईरानी चुनाव हार चुकी थी और उन्हें हराने वाले थे वही [संगीत] किशोरी लाल शर्मा। जिस नेता ने 2019 में राहुल गांधी को हराकर इतिहास बदल दिया वो सिर्फ 5 साल बाद खुद अमेठी [संगीत] में हार गई। यह हार सिर्फ एक सीट की हार नहीं थी बल्कि बीजेपी की सबसे हाई प्रोफाइल हारों में से एक मानी [संगीत] गई। इसके बाद मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल में स्मृति ईरानी को कोई मंत्री पद नहीं मिला। [संगीत] ना उन्हें कैबिनेट में जगह दी गई और ना ही तुरंत राज्यसभा भेजा गया। धीरे-धीरे राजनीतिक गलियारों में चर्चा शुरू हो गई कि क्या बीजेपी लीडरशिप अब उनसे दूरी बना रहा है।

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