क्या कोई इंसान मरने के बाद फिल्म बना सकता है? सुनने में नामुमकिन लगता है। लेकिन भारतीय सिनेमा में एक ऐसी फिल्म बनी जिसके निर्देशक की मौत उसकी रिलीज से 3 साल पहले हो चुकी थी। फिर भी वो फिल्म रिलीज हुई सुपरहिट बनी। भारत ही नहीं बल्कि पाकिस्तान जैसे मुल्क में भी पसंद की गई। और तो और वो फिल्म सिनेमा की दुनिया के सबसे बड़े अवार्ड ऑस्कर अवार्ड तक भी पहुंची। आखिर ये चमत्कार हुआ कैसे? 50 से लेकर 80 के दौर तक एक ऐसा डायरेक्टर था जिसकी हर फिल्म एक उत्सव बन जाती थी। लेकिन तमाम सफलताओं के बीच उसका एक सपना अधूरा था।
भारत और पाकिस्तान की सरहद पर इंसानियत और मोहब्बत की कहानी कहना। सालों की मेहनत के बाद फिल्म की तैयारी शुरू हुई। लेकिन 1988 में उनकी अचानक मौत हो गई। पूरी इंडस्ट्री को लगा उनके साथ उनका यह ख्वाब भी खत्म हो गया। लेकिन असली कहानी यहीं से शुरू होती है। डायरेक्टर तो चला गया था। लेकिन उनका ख्वाब अभी जिंदा था। उनके परिवार ने फैसला किया कि फिल्म बंद नहीं होगी। डायरेक्शन की जिम्मेदारी उनके बड़े बेटे ने संभाली। लेकिन चुनौती नई फिल्म बनाने की नहीं थी। बल्कि अपने फादर के विज़न को बिना बदले पर्दे तक पहुंचाने की थी। उन्होंने स्क्रिप्ट, नोट्स और स्टोरी बोर्ड को बारीकी से स्टडी किया। लेकिन एक सबसे बड़ा सवाल तब भी बाकी था। फिल्म की हेरोइन कौन होगी? यहीं से इस कहानी ने ऐसा मोड़ लिया जिसका किसी को गुमान तक नहीं था।
डायरेक्टर यानी स्वर्गीय राज कपूर अपनी फिल्म में एक नया चेहरा चाहते थे। लिहाजा तलाश भारत में शुरू हुई लेकिन जाकर रुकी पाकिस्तान पर। वहां की उभरती अदाकारा जेबा बख्तियार को स्क्रीन टेस्ट के लिए बुलाया गया। कैमरे के सामने आते ही पूरी टीम को लगा उनकी हिना मिल चुकी है। लेकिन अब एक नई मुश्किल सामने थी। कहानी पाकिस्तान की थी, नायका पाकिस्तान की थी। तो क्या शूटिंग भी पाकिस्तान में होगी? और यहीं से शुरू हुई इस फिल्म की सबसे मुश्किल लड़ाई। फिल्म की टीम चाहती थी कि इस कहानी की रूह सिर्फ किरदारों में ही नहीं बल्कि उसकी लोकेशनेशंस में भी नजर आए। इसलिए कोशिश की गई कि शूटिंग पाकिस्तान में हो। लेकिन उस दौर में दोनों मुल्कों के रिश्ते इतने आसान नहीं थे। इजाजत नहीं मिली और वक्त भी हाथ से निकलता जा रहा था। मजबूरन फैसला हुआ कि पाकिस्तान को भारत में ही बसाया जाएगा। मनाली की वादियों को कैमरे के ऐसे जादू से फिल्माया गया कि पर्दे पर वो बिल्कुल पाकिस्तान का हिस्सा लगने लगी। मगर किस्मत को शायद इस कहानी में एक और मोड़ लिखना था। कुछ महीनों बाद पाकिस्तान से शूटिंग की इजाजत मिल गई। यूनिट ने इस मौके का फायदा उठाया और कुछ अहम सींस इस्लामाबाद और मरी में शूट किए। बाद में इन्हें पहले से शूट किए गए सींस के साथ इस खूबसूरती से जोड़ा गया कि आज भी ज्यादातर लोग फर्क नहीं कर पाते कि कौन सा सीन भारत में शूट हुआ था और कौन सा पाकिस्तान में। लेकिन यकीन मानिए हिना की सबसे बड़ी ताकत इसकी लोकेशन नहीं थी। उसकी असली जान अभी पर्दे पर आना बाकी थी। हर यादगार फिल्म की एक पहचान उसकी कहानी होती है और दूसरी उसका संगीत। हेना को यह दौलत मिली रविंद्र जैन जैसे बेमिसाल संगीतकार से। उन्हें आंखों से दुनिया भले ही दिखाई नहीं देती थी। लेकिन सुरों की दुनिया पर उनकी नजर कमाल की थी। शायद यही वजह थी कि राज कपूर को उनके हुनर पर बेइंतहा भरोसा था। मैं हूं खुश रंग हिना। मैं हूं खुश रंग ही ना देर ना हो जाए कहीं देर ना हो जाए कहीं देर ना हो जाए नारदाना नारदाना और अनारदाना जैसे गीत सिर्फ गाने नहीं थे। यह फिल्म की धड़कन थे।
इन धुनों ने मोहब्बत को सरहदों से बड़ा बना दिया और शायद इसी वजह से आज भी यह गीत सुनते ही पूरी फिल्म आंखों के सामने घूम जाती है। फिल्म अब पूरी हो चुकी थी। अब फैसला सिर्फ दर्शकों को करना था। 15 जुलाई 1991 हिना सिनेमाघरों तक पहुंच चुकी थी। तुम इतनी जल्दी कैसे आ गए? लोर से आओ तो गुस्सा, जल्दी आओ तो गुस्सा। अब बहुत हो चुका। जो कुछ भी कर रहा है, नाटक कर रहा है। कर देता हूं। चंद्र बेटे चंद्र बैठी हो गई सारी। एक अपना मजदूर दब कर बुरी तरह जख्मी हो गया। बड़ा किस्मत वाला है वो लड़का। लेकिन चंदन आपका क्यों नहीं आ रहा? देर ना हो जाए कहीं देर ना हो जाए। संभाल के रहना। संभाल के। पानी का भाव बहुत तेज है। अगर गिर जाएगा सीधा पाकिस्तान पहुंच जाएगा। वो भी बिना पासपोर्ट के। बाबा जान बी खुद को खबर कर दो फौरन हमारे घर आ जाए पर चंद्र का क्या हुआ कुछ कह नहीं सकता बस आज की एक ही रात भारी है ये इंशााल्लाह निकल गई तो ये बच गया उसे होश आ गया बाबा जान हमारे मुल्क की सरहदों में घुसा देते हैं होश आ गया बाबा जान क्या नाम है उसका लेकिन सवाल सिर्फ इतना नहीं था कि फिल्म चलेगी या नहीं सवाल यह था कि क्या लोग उस ख्वाब को अपनाएंगे जिसका खालिक अब इस दुनिया में नहीं था। पहला शो खत्म हुआ। कुछ पल सन्नाटा रहा। फिर पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा। यह तालियां सिर्फ कलाकारों के लिए नहीं थी बल्कि उस फिल्म सास के लिए थी जिसने इस कहानी को जम तो दिया मगर उसे पर्दे पर जिंदा होते कभी नहीं देख पाया। फिल्म को दर्शकों और समीक्षकों दोनों ने सराहा। इसकी मोहब्बत, इंसानियत और रवींद्र जैन के संगीत ने इसे उस दौर की सबसे खास फिल्मों में ला खड़ा किया। हिना सिर्फ हिट नहीं हुई
बल्कि राज कपूर की आखिरी सिनेमाई विरासत भी बन गई। इतना ही नहीं हिना भारत की तरफ से ऑस्कर की बेस्ट फॉरेन लैंग्वेज फिल्म कैटेगरी में ऑफिशियल एंट्री भी बनी। अवार्ड भले ना मिला हो, लेकिन यह सम्मान ही इस फिल्म की अहमियत बयान करने के लिए काफी था। वीडियो की शुरुआत में हमने आपसे एक सवाल पूछा था। क्या कोई इंसान मरने के बाद फिल्म बना सकता है? जवाब है नहीं। लेकिन अगर कोई इंसान अपने ख्वाब को इतनी सच्चाई, इतनी मोहब्बत और इतनी शिद्दत से जी ले कि उसके जाने के बाद भी लोग उसे उसी एहतराम के साथ पूरा करें। तो उसका ख्वाब कभी नहीं मरता। हिना सिर्फ एक फिल्म नहीं है। यह एक बाप के ख्वाब, बेटों के वादों और पूरे परिवार की वफादारी की दास्तान है। और शायद इसीलिए आज भी जब भारतीय सिनेमा के सबसे जज्बाती पर्दे के पीछे की कहानियों का जिक्र होता है, तो हिना का नाम बड़े एहतराम के साथ लिया जाता है। फिल्में खत्म हो जाती हैं, लेकिन कुछ दास्ताने कभी खत्म नहीं होती। तो दोस्तों अगर आपको भी सिनेमा के पर्दे के पीछे छिपे ऐसे अनसुने किस्से पसंद हैं तो वीडियो को लाइक कीजिए, कमेंट कीजिए और आईजी प्लस को सब्सक्राइब जरूर कीजिए क्योंकि अगली बार भी हम लेकर आएंगे एक और दास्तान। अब अपनी दोस्त सना को दीजिए इजाजत। मिलते हैं अगली वीडियो में ऐसी ही किसी दिलचस्प दास्तान के साथ। तब तक के लिए टेक केयर। लव यू।