साल 1995 तारीख 2 जून उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की स्टेट गेस्ट हाउस में हुड़दंग मचा हुआ है। गेस्ट हाउस के कमरा नंबर दो में एक औरत डर कर छुपी हुई है। कमरे के बाहर एक भीड़ है जो कमरे का दरवाजा तोड़ने पर आमादा है। भीड़ में मौजूद लोग भद्दी भद्दी दे रहे हैं। जब कमरे का दरवाजा नहीं खुलता है तो भीड़ और उग्र हो जाती है। कमरे की बिजली काट दी जाती है। यह भीड़ केवल तक नहीं रुकती।
यह दिन दहाड़े उस औरत तक करने की देती है। अगला दिन यानी 3 जून 1995। इसी राजधानी लखनऊ में एक मंच पर वह महिला खड़ी है। उसके हाथ में एक पर्चा है। वह सूबे के सबसे ताकतवर पद यानी मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रही है। मंच के सामने बीजेपी के कद्दावर नेता अटल बिहारी वाजपेई और दलित आइकॉन मान्यवर कांशीराम बैठे हैं। जिस महिला को कुछ ही घंटे पहले की धमकी दी जा रही थी, वह अब सूबे की मुखिया थी।
इस महिला का नाम था मायावती जिन्हें उनके समर्थक प्यार से बहन मायावती कहते हैं। 1995 का साल था। गुड़गांव के एक अस्पताल में बसपा सुप्रीमो कांशीराम भर्ती थे। कांशीराम बहुत बीमार थे। उनके पास खड़ी मायावती रो रही थी। कांशीराम ने मायावती की ओर करवट फेरी। इशारे से उन्हें बुलाया और फुसफुसाकर कहा, यूपी की मुख्यमंत्री बनोगी। मायावती चौंक गई। उनको इस बात पर यकीन नहीं हो रहा था। कांशीराम ने मायावती के हाथ में कागज का टुकड़ा थमा दिया।
इस कागज पर लिखा था बीजेपी यूपी में बसपा का समर्थन करेगी। मायावती लखनऊ के लिए रवाना हो गई। उसके बाद अगले तीन दिन यूपी की राजनीति के सबसे अहम दिन साबित होने वाले थे। 1 जून 1995। इसी दिन मायावती ने करीब डेढ़ साल से चले आ रहे सपा, बसपा गठबंधन के खात्मे का ऐलान किया। [संगीत] उस समय यूपी के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव थे। मुलायम सिंह यादव मायावती के इस ऐलान से बौखला उठे। अभी कुछ ही साल तो बीते थे जब पूरी यूपी में नारा लगा था। मिले मुलायम कांशीराम हवा हो गए जय श्री राम। लेकिन उसी कांशीराम ने जय श्री राम वालों से हाथ मिलाकर मुलायम सिंह यादव को लखनऊ की गद्दी से बेदखल कर दिया था।
2 जून 1995। इस रोज मायावती बसपा विधायकों के साथ स्टेट गेस्ट हाउस में मीटिंग कर रही थी। तभी सपा के कुछ विधायक अपने समर्थकों के साथ स्टेट गेस्ट हाउस पहुंचे और बसपा विधायकों को अगवा करने की कोशिश करने लगे। मायावती के साथ भी बदसलूकी करने की कोशिश की गई। उन्हें भद्दी [संगीत] गालियां दी गई। 3 जून 1995 को मायावती ने उसी राजधानी लखनऊ में सूबे की पहली दलित महिला मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेकर इतिहास रच दिया।
मायावती चार बार यूपी की मुख्यमंत्री रहीं। [संगीत] उन्होंने चार लोकसभा चुनाव भी जीते और तीन बार राज्यसभा सांसद भी रही। 1990 का दशक भारतीय राजनीति में मायावती नाम के फिनोमिना का दशक साबित हुआ। पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने मायावती को मिरेकल ऑफ डेमोक्रेसी यानी लोकतंत्र का चमत्कार कहा था। तो दुनिया रोज बनती है कि इस एपिसोड में कहानी बसपा सुप्रीमो और चार बार यूपी की मुख्यमंत्री रही मायावती की। इस एपिसोड में हम जानेंगे कि एक प्राइमरी स्कूल टीचर मायावती कैसे बनी यूपी की चार बार मुख्यमंत्री। मायावती अपना घर छोड़कर कांशीराम के घर रहने क्यों चली गई थी?
मायावती ने समाजवादी नेता राज नारायण को क्यों डांटा था? किसने यह अफवाह फैलाई थी कि मायावती की 12 साल की एक बेटी है। मायावती की देह से बदबू आने की कहानी क्या है? और आखिर में मायावती ने राज्यसभा से अचानक इस्तीफा क्यों दे दिया था? नमस्ते। मेरा नाम है मुकुल सिंह चौहान और आप देख रहे हैं जि पेशकश दुनिया रोज बनती है। 3 जून 1995 को राज्यपाल मोतीलाल बोरा ने मायावती को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई थी। यह एक ऐतिहासिक मौका था। देश की सबसे बड़ी आबादी वाले सूबे की कमान पहली बार किसी दलित महिला के हाथों में थी।
जब मायावती की ओथ सेरेमनी समाप्त हुई तब तक शाम हो चुकी थी। राज्यपाल मोतीलाल बोरा भी अपने आधिकारिक आवास पर चले आए थे। रात 11:00 बजे राज्यपाल के दरवाजे की घंटी बजी। मोतीलाल बोरा को खबर दी गई कि मुख्यमंत्री मायावती उनसे मिलने आई हैं। यह राज्यपाल के लिए किसी शौक से कम नहीं था। अमूमन ऐसी परंपरा रही है कि कोई भी मुख्यमंत्री राज्यपाल से मिलने से पहले उन्हें सूचना देता है। इसे एक प्रोटोकॉल की तरह देखा जाता है।
लेकिन मायावती अचानक राज्यपाल के आवास पर आधी रात को पहुंच गई थी। राज्यपाल ने कुछ ही घंटे पहले मुख्यमंत्री बनी मायावती का स्वागत किया। मायावती के पैर कांप रहे थे। वह बहुत सहमी हुई थी। मायावती ने राज्यपाल से कहा, मैं आज आपके गेस्ट हाउस में रहूंगी। मैं बाहर सुरक्षित महसूस नहीं कर रही हूं। मायावती कुछ ही घंटे पहले हुए गेस्ट हाउस कांड के खौफ से बाहर नहीं निकल पाई थी। उन्हें डर था कि सपा के समर्थक उनके ऊपर फिर से हमला कर देंगे।
गवर्नर मोतीलाल बोरा ने मायावती को समझाया कि ऐसा नहीं होगा। आप सूबे की मुख्यमंत्री हैं। जब आप ही डरेंगी तो काम कैसे चलेगा? मगर मायावती नहीं मानी और उस रात वह गवर्नर हाउस के गेस्ट क्वार्टर में ही ठहरी। यह बात अपने आप में बहुत विडंबना से भरी है कि किसी सूबे के मुख्यमंत्री को डर के साए में अपने ही प्रदेश की राजधानी में रात गुजारनी पड़ी। क्या मायावती के साथ ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि वह दलित समुदाय से आती थी और वह महिला थी।
देश की राजधानी दिल्ली। साल था 1956 का। जनवरी महीने की 15 तारीख को मायावती का जन्म दिल्ली में हुआ। मायावती के पिता प्रभुदास दयाल डाक विभाग में क्लर्क थे। मायावती का परिवार आठ भाई-बहनों का था। मायावती का बचपन में ही छुआछूत और जातिगत भेदभाव से पाला पड़ गया था।
साल 2006 में प्रकाशित अपनी आत्मकथा मेरे संघर्षमय जीवन और डीएसपी के इन्वेंट का सफरनामा में मायावती याद करती हैं।
मैं जहां रहती थी वहां जातियों के आधार पर मोहल्ले बने हुए थे। अगर बाहर किसी को पता चलता कि हम लोग चमार हैं तो वह लोग हमसे दूरी बना लेते और बात तक करना पसंद नहीं करते। मायावती ने जब पढ़ाई की शुरुआत की उस समय ही उनके आदर्श बाबा साहब भीमराव अंबेडकर थे। मायावती के पिता चाहते थे कि मायावती आईएएस बने।
मायावती का भी आईएएस बनने का ही सपना था। मायावती [संगीत] ने अपनी नौवीं, 10वीं और 11वीं की परीक्षा एक बार में ही दी। मायावती ने एक साथ तीन क्लास की छलांग लगाई। यह मायावती की मेहनत और जुनून था। मायावती ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के कालिंदी कॉलेज में दाखिला लिया और जब उन्होंने ग्रेजुएशन कर ली तो उसके बाद उन्होंने गाजियाबाद के कॉलेज से बीएड किया। फिर वह स्कूल में टीचर बन गई और साथ में वह यूपीएससी की तैयारी करने लगी।
साल 1977 आजादी के बाद भारत के राजनीतिक इतिहास का सबसे दिलचस्प साल। इसी साल इंदिरा गांधी की सरकार द्वारा लगाई गई इमरजेंसी खत्म हुई और देश में आम चुनाव हुए। चुनाव के नतीजे भारत के राजनीतिक इतिहास में कई अनोखे अध्याय जोड़ रहे थे। इस चुनाव में इंदिरा गांधी के खिलाफ पूरे देश में लहर थी। जयप्रकाश नारायण की अगुवाई में देश की सारी विपक्षी पार्टियों ने मिलकर एक नई पार्टी बनाई थी। इस पार्टी का नाम था जनता पार्टी।
जनता पार्टी को 1977 के आम चुनाव में प्रचंड जीत मिली। खुद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को अपने गढ़ रायबरेली से हार का सामना करना पड़ा। इंदिरा गांधी को हराने वाले शख्स थे कद्दावर समाजवादी नेता राज नारायण। हम यहां राजनारायण का जिक्र इसलिए कर रहे हैं क्योंकि मायावती और राज नारायण का एक किस्सा बेहद मशहूर है। जनता पार्टी की जीत के बाद राजारायण को कैबिनेट मंत्री बनाया गया।
उन्हें स्वास्थ्य मंत्रालय दिया गया। सितंबर 1977 की बात है। नई नवेली सरकार थी। इन्हीं दिनों दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में एक बैठक हुई। इस बैठक में मायावती भी शामिल थी। राजनारायण मंच पर बोलने के लिए आए। राजनारायण ने अपने भाषण में कई बार हरिजन शब्द का प्रयोग किया। यह बात बैठक में शामिल मायावती को बेहद बुरी लगी। जब आखिर में मायावती के बोलने की बारी आई तो इस 21 साल की लड़की ने दिग्गज राजनारायण को इस एक शब्द हरिजन के लिए खूब खरी-खोटी सुनाई। मायावती ने अपने भाषणों से राजनारायण की खूब फजीहत की।
मायावती ने गरजते हुए कहा हमारे भगवान बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने कभी हरिजन शब्द का प्रयोग नहीं किया। उन्होंने संविधान बनाया और उसमें हमारे लिए शेड्यूल्ड कास्ट शब्द का इस्तेमाल किया। फिर मंत्री राजारायण की हिम्मत कैसे हो गई कि वह हमें हरिजन बोले। राजनारायण मंच पर ही बैठे थे और वह पसीने से तर-बतर थे। जब मायावती बोलकर मंच से उतरी तो राजारायण मुर्दाबाद के नारे लग रहे थे। यह मायावती [संगीत] का पहला भाषण था जिसने उस दौर के कद्दावर नेता रहे राज नारायण के पसीने [संगीत] छुड़ा दिए थे। पूरी दिल्ली के राजनीतिक हलकों में यह बात आग की तरह फैल गई कि मायावती ने राज नारायण को भरी सभा में खरी-खोटी सुनाई है।
कुछ ही दिन बीते होंगे सर्दी का मौसम था। मायावती का परिवार उस समय इंद्रपुरी के एक छोटे से घर में रहता था। रात का समय था। सब लोग खाना खाकर सोने ही जा रहे थे कि किसी ने दरवाजा खटखटाया। जब दरवाजा खोला गया तो एक आदमी गले में मफलर डाले और सिकुड़ी हुई शर्ट पहने खड़ा था। वह सीधे घर में दाखिल हुआ और मायावती के पास गया। उस आदमी ने मायावती को अपना परिचय देते हुए कहा कि मैं कांशीराम हूं। कांशीराम मायावती के जीवन की कहानी का सबसे अहम किरदार और सिर्फ मायावती के जीवन की कहानी का नहीं देश की दलित राजनीति का सबसे मजबूत किरदार। कांशीराम जो कहते थे बाबा साहब अंबेडकर ने किताबों को इकट्ठा किया और मैंने लोगों को इकट्ठा किया। वहीं कांशीराम जिनसे एक बार अटल बिहारी वाजपेई ने कहा था आप हमें समर्थन दे दीजिए।
हम आपको देश का राष्ट्रपति बना देंगे। तो कांशीराम ने जवाब देते हुए तपाक से कहा कि अटल जी अगर राष्ट्रपति का पद इतना ही बड़ा है तो आप बन जाइए राष्ट्रपति और मुझे प्रधानमंत्री बना दीजिए। जवाब सुनकर अटल बिहारी वाजपेयी कुछ देर तक सन्न रह गए थे। कांशीराम ने मायावती से पूछा कि आगे क्या करना चाहती हो? मायावती का जवाब था आईएएस बनूंगी और दलितों के लिए काम करूंगी। कांशीराम ने लगभग मुस्कुराते हुए कहा आईएएस बनकर बस नेताओं के आदेश को मानना होता है। समाज के लिए काम करने के लिए तुम्हें मिशन के साथ आना होगा।
मिशन माने बामसेफ। पूरा नाम ऑल इंडिया बैकवर्ड एंड माइनॉरिटी कम्युनिटीज एंप्लाइज फेडरेशन। बामसेफ की स्थापना साल 1973 में मान्यवर कांशीराम ने अंबेडकर जयंती के दिन की थी। कांशीराम एक समय खुद सरकारी कर्मचारी थे। जब उन्होंने देखा कि कैसे जो दलित सरकारी कर्मचारी भी हैं उनके साथ भेदभाव किया जा रहा है तो उन्होंने बामसेफ नाम से संगठन बनाया। उसे यह मिशन का नाम देते थे। जब कांशीराम ने मायावती को मिशन के बारे में बताया तो मायावती काफी प्रभावित हुई। [संगीत] मायावती ने आईएएस बनने का इरादा बदल दिया और बामसेव से जुड़ गई। यह बात मायावती के पिता प्रभुदास को बेहद बुरी लगी। मायावती के घर में कलाह शुरू हो गई।
प्रभुदास अब भी चाहते थे कि उनकी बेटी मायावती आईएएस बने और घर बसा लें। लेकिन मायावती ने केवल आईएएस बनने से ही इंकार नहीं किया बल्कि उन्होंने ता उम्र अविवाहित रहने का भी फैसला किया। जब घर में झगड़ा बढ़ने लगा तो एक दिन मायावती ने अपना बैक पैक किया और बामसेफ के कार्यालय में रहने चली आई। उस समय कांशीराम कहीं बाहर गए थे। जब कांशीराम वापस आए तो उन्होंने मायावती से कहा कि मैं तो हमेशा बाहर ही रहता हूं। तुम मेरे ही घर में चलकर रुको। मायावती मान गई। बाद में मायावती ने अपने छोटे भाई सिद्धार्थ को भी कांशीराम के घर बुला लिया। यह 1980 के दशक की शुरुआती साल थे। मायावती की उम्र तब करीब 22 साल थी।
मायावती और कांशीराम को लेकर लोग तरह-तरह की अफवाह उड़ाने लगे। हालांकि मायावती इन झूठी अफवाहों पर ध्यान दिए बगैर कांशीराम के साथ बहुजन समाज उत्थान के लिए काम करती रही। 1981 की बात है। उस समय दिल्ली की राजनीति में दो किनारे थे। पहला किनारा इंदिरा गांधी की कांग्रेस का था और दूसरा किनारा था जेपी की संपूर्ण क्रांति से निकले हुए जनता पार्टी के नेताओं का। इन दो किनारों के बीच की नदी में कांशीराम ने साल 1981 में डीएस4 नाम की एक नाव उतार दी। डीएस4 का पूरा नाम दलित शोषित समाज संघर्ष समिति था। डीएस4 बामसेफ से अलग संगठन था। यह पूरी तरह से एक राजनीतिक संगठन था जो दलितों की राजनीतिक मौजूदगी के लिए काम कर रहा था। ठाकुर ब्राह्मण बनिया छोड़ बाकी सब हैं डीएस4 अपने बनने के एक साल बाद ही डीएस4 ने साल 1982 में हुए हरियाणा विधानसभा चुनाव में अपने कैंडिडेट उतारे| अब तक कांशीराम को यह समझ आ गया था कि बिना राजनीतिक दल बनाए चुनाव में उतरना समझदारी नहीं है।
6 दिसंबर 1984 को एक नई पार्टी का ऐलान हुआ। पार्टी का नाम था बहुजन समाज पार्टी यानी बसपा। नीले रंग के झंडे पर बना हाथी का चुनाव चिन्ह। दिसंबर महीने में बसपा की स्थापना हुई और पार्टी ने इसी साल होने वाले आम चुनाव में शामिल होने का ऐलान कर दिया। इसी साल प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या हुई। भारत के आज तक के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब पद पर रहते हुए किसी प्रधानमंत्री [संगीत] की गोली मारकर हत्या कर दी गई। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद इंदिरा गांधी के बेटे राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री बने। पूरे देश में कांग्रेस के लिए सहानुभूति की [संगीत] लहर थी। बसपा पहली बार चुनावी मैदान में थी। मायावती ने टीचर की नौकरी से इस्तीफा दे दिया था और उत्तर प्रदेश के कैराना से चुनावी मैदान में उतर गई थी।
यह बात भी हैरत भरी है कि मिशन के लिए 7 साल काम करने के बाद भी मायावती ने अपनी टीचर की नौकरी नहीं छोड़ी थी। मायावती यूपी के कैराना से चुनावी मैदान में थी और वहीं उनके गुरु कांशीराम मध्य प्रदेश के जांजगीर चांपा से चुनाव लड़ रहे थे। हालांकि यह सीट अब छत्तीसगढ़ में है। मायावती को कैराना में करारी हार का सामना करना पड़ा और वह तीसरे स्थान पर रहीं। उन्हें केवल 44,445 वोट मिले। लेकिन मायावती भी मायावती ठहरी। उन्होंने हार नहीं मानी। कैलेंडर का पन्ना बदला और साल आया 1985 का। यूपी के बिजनौर लोकसभा सीट पर एक बार फिर से उपचुनाव की डुगडुगी पीटी जा चुकी थी। मायावती को किसी तरह हाथी के निशान के साथ दिल्ली पहुंचना था।
इसलिए वह बिजनौर की सीट से उपचुनाव लड़ने पहुंच गई। लेकिन बिजनौर में तो अलग ही मजमा सजा हुआ था। दिग्गज दलित नेता जगजीवन बाबू की बेटी मीरा कुमार और दलित युवा तुर्क रामविलास पासवान पहले से वहां के चुनावी मैदान में जोर आजमाइश कर रहे थे। मायावती के लिए यह चुनाव बेहद मुश्किल रहा। वह एक बार फिर से तीसरे स्थान पर रही। मायावती ने मई 1987 में होने वाले हरिद्वार उपचुनाव में भी पर्चा भरा। वहां उन्होंने अच्छा चुनाव लड़ा और 12,25,399 वोट मिले। यह तब की बात है जब बसपा अपनी नवजात अवस्था में थी। कांशीराम और मायावती ने तय कर लिया था कि उन्हें दिल्ली दरबार में नीले झंडे के साथ दस्तक देनी ही है। 1984 के लोकसभा चुनाव से लेकर 1989 के लोकसभा चुनाव तक यानी 5 साल के भीतर मायावती ने चार चुनाव लड़े। 1989 का साल था। दिल्ली की हुकूमत के गलियारों में बोफोर्स का शोर गूंज रहा था। मिस्टर क्लीन के नाम से मशहूर प्रधानमंत्री राजीव गांधी के ऊपर वो फफोर्स तोप की खरीददारी में हुए घोटाले के आरोप लग रहे थे।
और यह आरोप कौन लगा रहा था? यह आरोप लगा रहे थे एक समय राजीव गांधी के जिगरी दोस्त रहे वीपी सिंह। वीपी सिंह अपनी जेब में एक पर्ची लेकर घूमते थे और कहते थे कि इसी पर्ची में है वह फ़ घोटाला करने वालों का नाम। एक बार फिर से जनता पार्टी की तर्ज पर जनता दल का गठन हुआ। लेकिन इन सबके बीच बसपा ने भी अपनी राजनीतिक जमीन तैयार कर ली थी। बसपा ने 1989 के आम चुनाव में अपना चुनावी खाता खोल लिया था। इस लोकसभा चुनाव में बसपा ने तीन लोकसभा सीटें जीती। यह सीटें थी यूपी की बिजनौर और आजमगढ़ और पंजाब का फिल्लौर।
मायावती ने बिजनौर लोकसभा से जीत दर्ज की और 33 साल की उम्र में सांसद बनकर दिल्ली पहुंची। मगर हिंदुस्तान की सियासत इस बात के लिए अभिशप्त है। यहां की राजनीति में रसूक, जाति, धर्म, रंग सब कुछ देखा जाता है। यहां उस घटना का जिक्र करना बेहद जरूरी है। मायावती दिल्ली सांसद बनकर पहुंची थी। लेकिन वहां भी उन्हें अपमान का सामना करना पड़ा। यह बात सोच से भी परे है कि जिस संसद में छुआछूत और भेदभाव को खत्म करने के लिए कानून बनाए जाते हैं और जो लोग इस कानून को बनाते हैं, वही लोग मायावती के साथ भेदभाव करते थे। मायावती की बायोग्राफी लिखने वाले अजय बोस ने अपनी किताब बहन जी अ पॉलिटिकल बायोग्राफी ऑफ मायावती में लिखा है। मायावती जब पहली बार लोकसभा में चुनकर आई तो उनके तेल लगे बालों और देहाती पहनावे का मजाक उड़ाया गया।
कई महिला सांसदों ने मायावती के साथ बैठने से इंकार कर दिया। उन महिला सांसदों का कहना था कि मायावती को अधिक पसीना आता है जिसकी वजह से उनकी देह से बदबू आती है। सच कहा जाए तो यह बदबू शायद मायावती [संगीत] की देह से नहीं हमारे समाज की तथाकथित उस सोच से आ रही थी जो किसी महिला सांसद को दलित होने के कारण अपमानित कर रही थी। और ऐसा कई बार हुआ जब मायावती का मजाक उड़ाया गया। उन्हें बड़ी-बड़ी रैलियों में जलील किया गया। साल 1995 में जब मायावती के साथ चर्चित गेस्ट हाउस कांड हुआ था, उसके बाद मायावती ने बयान दिया था कि उन्हें उस रोज डर था कि कहीं उनके साथ ना हो। इस बयान के बाद मुलायम सिंह यादव ने एक रैली में विवादित बयान देते हुए कहा, क्या मायावती इतनी सुंदर हैं कि उनका कोई करना चाहेगा?
यह बेशक एक बेतुका बयान था। ऐसा नहीं है कि मायावती पर केवल पुरुषों ने ही विवादित कमेंट किए हो। महिला नेताओं ने भी मायावती को निशाना बनाया। साल 2009 में उस समय की कांग्रेसी नेता रीता बहुगड़ा जोशी ने मायावती के खिलाफ एक विवादित बयान दिया। उन दिनों मायावती यूपी की मुख्यमंत्री हुआ करती थी। मायावती ने पीड़िताओं के लिए मुआवजा बढ़ाने का ऐलान किया था। इसी बीच रीता बहुगुणा जोशी ने मायावती को निशाना बनाते हुए कहा था। मायावती को शर्मिंदा करने के लिए उन पर मुआवजे की रकम फेंक कर कहना चाहिए कि अगर तुम बलात्कार के लिए राजी हो जाओ तो तुम्हें ₹1 करोड़ दिए जाएंगे। यह बयान किसी देश की सबसे अधिक आबादी वाले राज्य की मुख्यमंत्री के लिए दिया जाता रहा। मायावती भी विवादित बयान देने से कभी पीछे नहीं हटी। एक बार मायावती ने मुलायम सिंह यादव के खिलाफ एक रैली में बोलते हुए कहा था कि मान्यवर की बदौलत मुलायम सिंह यादव यूपी का मुख्यमंत्री बना बैठा है।
वरना किसी जमींदार के यहां गाय भैंस चरा रहा होता या तो हल जोत रहा होता। एक बार और जब मुलायम सिंह यादव ने इलाहाबाद की गंगा में स्नान किया तो मायावती ने कहा कि वह पापी है। पाप धोने गंगा में गया था। गंगा को ही मैला कर दिया। गंगा में नहाएगा तो गंगा और मैली कर आया उधर। लोग तो यही बोलते हैं कि इसके नहाने से गंगा और मैली हो गई। इन सबके बीच यूपी में बसपा का दलित आंदोलन पांव पसार रहा था। साल 1992 में बाबरी मस्जिद को कार सेवकों की भीड़ ने गिरा दिया। मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को बर्खास्त कर दिया गया और राज्य में राष्ट्रपति शासन लग गया। साल 1993 में मध्यावधि चुनाव की घोषणा हुई। मुलायम सिंह यादव और कांशीराम के बीच गठबंधन हुआ। 1993 विधानसभा चुनाव के नतीजे कुछ इस प्रकार रहे।
कांशीराम और मुलायम सिंह यादव के गठबंधन को मिली 176 सीट और बीजेपी को मिली 177 सीट। दोनों में से किसी के गुट के पास सरकार बनाने के लिए बहुमत ही नहीं था। लेकिन बाकी पार्टियों के समर्थन से मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने। महज डेढ़ साल बाद 2 जून 1995 को मशहूर गेस्ट हाउस कांड हुआ। इसमें मायावती के साथ बदसलूकी की गई और अगले रोज मायावती यूपी की मुख्यमंत्री बनी। 1990 का आखिरी दशक उत्तर प्रदेश की राजनीति के लिए जोड़तोड़ का दशक था। राज्य में रोज किसी ना किसी पार्टी के गठबंधन की चर्चा होती थी। मायावती जून 1995 में यूपी की मुख्यमंत्री बनी थी। लेकिन 4 महीने बाद ही अक्टूबर 1995 में बीजेपी ने मायावती से अपना समर्थन वापस ले लिया। दैनिक जागरण ने अपने 7 दिसंबर 1995 के संस्करण में एक पूर्व बीएसपी नेता का इंटरव्यू छापा। इस इंटरव्यू में लिखा गया कि मायावती की एक 12 साल की बेटी है। पूरे सूबे की राजनीति में भूचाल आ गया। मायावती इस खबर से आग बबूला हो गई।
उन्होंने दैनिक जागरण अखबार के संपादक नरेंद्र मोहन गुप्ता के खिलाफ केस कर दिया। मामला यहीं नहीं रुका। बसपा एक कैडर बेस्ड पार्टी है। बसपा के कैडर के कार्यकर्ताओं ने दैनिक जागरण के कार्यालय पर हमला कर दिया। एक दिन में बीएसपी के 9000 कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया। यहां एक बात और गौर करने वाली है। जिस दैनिक जागरण अखबार ने मायावती की 12 साल की बेटी की अफवाह फैलाई थी, उसके संपादक नरेंद्र मोहन गुप्ता को बीजेपी ने 1 साल बाद 1996 में राज्यसभा भेजा। निधि शर्मा अपनी किताब शी द लीडर वुमन इन इंडियन पॉलिटिक्स में इसी तरह की एक घटना का और जिक्र करती हैं। शर्मा लिखती हैं, साल 2004 में दैनिक जागरण ने अपनी एक हेडलाइन में मायावती के लिए चमारिन जैसे जातिचक शब्द का इस्तेमाल किया। उस वक्त तक मायावती तीन बार यूपी की मुख्यमंत्री बन चुकी थी।
मायावती ने दैनिक जागरण अखबार से फिर से माफी मांगने के लिए कहा और अखबार ने इसे टाइपिंग मिस्टेक बताते हुए एक माफीनामा छापा। फरवरी 1997 की बात है। चेन्नई की एक शादी में लालकृष्ण आडवाणी और काशीराम की मुलाकात हुई। वहीं पर यूपी में एक बार फिर बसपा और बीजेपी के बीच गठबंधन [संगीत] के लिए चर्चा हुई। दूसरी बार दोनों दल बीएसपी और बीजेपी यूपी में साथ आए। 21 मार्च 1997 को मायावती दूसरी बार यूपी की मुख्यमंत्री बनी। बीजेपी और बीएसपी गठबंधन में यह तय था कि 6 महीने बीएसपी का मुख्यमंत्री होगा और आगे के छ महीने बीजेपी का। जब 6 महीने बीते तो मायावती ने अपनी कुर्सी छोड़ने से इंकार कर दिया। बीजेपी ने अपना समर्थन वापस खींच लिया और महज 6 महीने में ही मायावती को मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ी। मायावती को केवल कुर्सी ही नहीं छोड़नी पड़ी। मायावती की सभाओं से वह नारा भी गायब होने लगा जो कई साल पहले तक बसपा के हाथी निशान वाले नीले झंडे को लहराते हुए लगाया जाता था। वह नारा था तिलक तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार। दिग्गज दलित नेता और मायावती के गुरु कांशीराम अब अस्वस्थ रहने लगे थे। दिसंबर 2001 की बात है।
लखनऊ के लक्ष्मण मेला मैदान में एक विशाल जनसभा का आयोजन किया गया। इस जनसभा में बसपा के लाखों कार्यकर्ता पहुंचे। रैली के बीच में कांशीराम ने मायावती को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। मायावती को अपना उत्तराधिकारी बनाया। साल 2002 में एक बार फिर से बीजेपी और बीएसपी साथ आए। मायावती तीसरी बार मुख्यमंत्री बनी। इस समय मायावती को काम करने का समय मिला। उन्होंने दलितों और पिछड़े मुस्लिम वोट बैंक को साधने के लिहाज से कई जरूरी काम किए। कई योजनाएं ऐसी लागू की जिनमें दलितों के विकास का लक्ष्य रखा गया था। लेकिन इन्हीं दिनों में मायावती के ऊपर पैसे वसूलने के आरोप भी लगे। उत्तर प्रदेश कैडर के 1981 बैच के सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी अनिल स्वरूप ने मायावती के मुख्यमंत्री रहते हुए सचिवालय में काम किया था।
स्वरूप अपनी पुस्तक एथिकल डायलेमाज़ ऑफ ए सिविल सर्वेंट में लिखते हैं। अपने पूरे जीवन में मैंने उनके जैसा भ्रष्ट और तुच्छ व्यक्ति कभी नहीं देखा। एक ऐसा राजनेता जो केवल पैसे को महत्व देता है। मायावती धन इकट्ठा करने के लिए किसी भी हद तक जा सकती हैं। मायावती और उनकी पार्टी बसपा को यह अच्छी तरह से समझ आ चुका था कि केवल दलित वोट बैंक की बदौलत यूपी को नहीं जीता जा सकता। इसके लिए पार्टी ने अपनी रणनीति में बदलाव किया और मुस्लिम और ब्राह्मण कम्युनिटी को अपने पाले में लाने की कोशिश तेज कर दी। इस बात को सोच कर ही हैरत होती है कि जिस बसपा ने अपनी राजनीति की शुरुआत ही दलितों की अस्मिता की लड़ाई के लिए की थी। जिनका पहला निशाना ब्राह्मण थे। उन्हें सरकार बनाने के लिए ब्राह्मणों को ही साथ लाना पड़ा और दुगनी हैरत इस बात से होती है कि ब्राह्मणों ने भी मायावती को जमकर वोट दिया। नारे बदल गए। अब बसपा की रैलियों में कहा जाने लगा हाथी नहीं गणेश है। ब्रह्मा विष्णु महेश है। साल 2007 के यूपी विधानसभा चुनाव में यह नारा काम कर गया। यूपी में विधानसभा की 403 सीटें हैं। जहां सरकार बनाने के लिए 202 सीटों की जरूरत होती है। बीएसपी 2007 के विधानसभा चुनाव में 206 सीटें जीतने में कामयाब हुई। दशकों बाद यूपी में पूर्ण बहुमत से सरकार बनी थी। मायावती ने 13 मई 2007 को चौथी बार यूपी के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
उन्होंने पूरे 5 साल तक यूपी में सरकार चलाई। लेकिन साल 2012 के विधानसभा चुनाव में उन्हें समाजवादी पार्टी से मात मिली और मुलायम सिंह यादव के बेटे अखिलेश यादव यूपी के मुख्यमंत्री बने। यूपी की सत्ता से हटने के बाद मायावती के राजनीतिक रसूख में गिरावट आती रही। 2014 के बाद यूपी में बीजेपी की लहर सी आ गई। बसपा का 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में भी प्रदर्शन बहुत खराब रहा। 2019 के लोकसभा चुनाव में कभी दो दशकों की दुश्मनी को भुलाकर बीएसपी और सपा साथ-साथ आए। मायावती और अखिलेश यादव ने एक साथ मंच भी साझा किया और अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव ने मायावती के पैर भी छुए। लेकिन चुनाव के बाद यह गठबंधन भी पुवाल की आग की तरह बिखर गया। मायावती के लिए सबसे बुरा समय 2022 का यूपी विधानसभा चुनाव रहा। जब 403 सीटों में उनकी पार्टी केवल एक सीट जीतने में सफल हुई। यह सीट बलिया की रसड़ा है। जहां से एकमात्र बसपा विधायक उमाशंकर सिंह ने जीत दर्ज की। आखिरी बार सदन में मायावती को जुलाई 2017 में बोलते हुए सुना गया था। मायावती राज्यसभा में उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में दलितों के साथ हुई कथित हिंसा का मुद्दा उठा रही थी। उन्हें 3 मिनट का समय दिया गया। मायावती अपनी बात पूरी नहीं कर पाई।
तभी उनका समय समाप्त हो गया। मायावती ने बोलना चाहा पर उन्हें बोलने नहीं दिया गया। बस क्या था? उन्होंने सदन में ही इस्तीफे का ऐलान कर दिया और बाद में सभापति को इस्तीफा भेज भी दिया। यू कैन आस्क डिस्कशन में रहने का अधिकार मैं हाउस का इस्तीफा दे रही हूं। राज्यसभा से इस्तीफा देने का फैसला [संगीत] लिया। हाउस में भी कहा और अभी मैं माननीय सभापति जी को अपना इस्तीफा देकर आ रही हूं। मायावती की उम्र अब 70 साल हो चुकी है। अब उनके उत्तराधिकारी और बीएसपी के नए नेतृत्व की चर्चा हो रही है। पहले बसपा ने घोषणा करते हुए कहा कि मायावती के भतीजे आकाश आनंद बहन कुमारी मायावती के उत्तराधिकारी होंगे। इसके कुछ महीने बाद मायावती ने उन्हें पद से हटा दिया। लेकिन फिर से एक मंच पर मायावती ने ऐलान किया कि उनके बाद आकाश आनंद के हाथों में ही पार्टी की कमान होगी। यहां मायावती की ऑटोबायोग्राफी के एक पन्ने का जिक्र करना लाजिम हो जाता है। मायावती अपनी आत्मकथा मेरे संघर्षमय जीवन एवं बीएसपी के मूवमेंट का सफरनामा में लिखती हैं।
मैं अपने परिवार के सभी सदस्यों को राजनीति से बहुत दूर रखती हूं ताकि मुझ पर भाई भतीजावा बात का आरोप ना लगे। लेकिन आकाश आनंद मायावती के भतीजे ही हैं। यही तो राजनीति का कर्तव्य है। राजनीति के कर्तव को देखने वाला तो चौंकता ही है लेकिन उस कर्तव्य को दिखाने वाला भी हैरत में पड़ जाता है। आज भी जब मायावती की रैली होती है तो उसमें हम देखते हैं कि लाखों दलित कार्यकर्ता फटे कपड़ों में चप्पल पहने और नीले रंग के हाथी के निशान को अपने कंधे पर टिकाए भरी धूप में मायावती की ओर इकटक देखते हैं। मायावती अब भी उनके लिए उम्मीद की किरण हैं। मायावती का हेलीकॉप्टर गरजते हुए उतरता है। वे पर्चे पर लिखा भाषण पढ़ती हैं और चली जाती हैं।
भारी मन से कार्यकर्ता भी घर की तरफ चल पड़ते हैं। आज की मायावती को देखकर यकीन करना मुश्किल होता है कि एक दौर में उनके ऊपर हिंदी के महान कवि नागार्जुन ने कविता लिख डाली थी। वह कविता कुछ यूं थी।
मायावती मायावती दलितेंद्रकी छायावती छायावती। जय जय हे दलितेंद्र प्रभु आपकी चाल ढाल से दहशत में है केंद्र मायावती मायावती गुनगुन मायावती