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म्यांमार में बगावत तेज, भारत के पड़ोस में बनने वाला है नया देश?

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बंदूके, बगावत और आजादी की मांग। क्या अब दुनिया देखने वाली है एक नए देश का जन्म? क्या भारत के पड़ोस में बनने वाला है दुनिया का सबसे नया देश? और क्या बदल जाएगा पूरे साउथ एशिया का नक्शा? एक ऐसा इलाका जो सालों से आजादी की मांग कर रहा है। अब वहां नए देश की सुगबुगाहट तेज हो चुकी है। जी हां। हम म्यांमार की धरती पर एक ऐसा तूफान उठ चुका है जो पूरे साउथ एशिया का नक्शा बदल सकता है। रखाइन प्रांत में वर्षों से चल रही बगावत अब अपने सबसे खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुकी है। अराकान आर्मी ने म्यांमार की सेना को खुली चुनौती देते हुए राजधानी सिटवे को चारों तरफ से घेर लिया है। सड़कों पर गोलियों की आवाज गूंज रही है। आसमान [संगीत] में धुआं छाया हुआ है और हजारों लोग डर के साए में जीने को मजबूर हैं। विद्रोही लड़ाके इसे आखिरी निर्णायक जंग बता रहे हैं। दावा किया जा रहा है कि अगर सिटवे [संगीत] उनके कब्जे में चला गया तो उसी पल रखाइन को म्यांमार से अलग एक नए देश के रूप में घोषित कर दिया जाएगा। यानी भारत की सीमा के बेहद करीब जन्म ले सकता है एक नया राष्ट्र। लेकिन सवाल यह है क्या म्यांमार की सेना इतनी जल्दी आसानी से ही हार मान लेगी और अगर सच में नया देश बन सकता है तो उसका असर भारत, चीन और पूरे एशिया की राजनीति पर क्या पड़ा होगा? सभी बातें विस्तार से जानेंगे। रखाइन में अब हालात सिर्फ एक सामान्य विद्रोह तक सीमित नहीं रहे हैं।

बल्कि यह संघर्ष धीरे-धीरे एक संभावित नए देश की नीव बनता जा रहा है। स्थानीय अखबारों की रिपोर्ट के मुताबिक अराकान आर्मी ने रखाइन के 17 में से 14 इलाकों पर अपना कब्जा मजबूत कर लिया है। यानी म्यांमार की सेना अब इस प्रांत के बेहद छोटे हिस्से तक सीमित होती जा रही है। अब अराकान आर्मी की नजर उन आखिरी तीन इलाकों पर है जिनमें सबसे अहम है राजधानी सिटवे। यही वजह है कि सिटवे के आसपास विद्रोही लड़ाकों ने अपने ठिकाने बना लिए हैं और हर तरफ से शहर को घेरने की कोशिश की जा रही है। माना जा रहा है कि अगर सिटवे उनके नियंत्रण में आ गया तो यह सिर्फ एक सैन्य जीत नहीं होगी बल्कि म्यांमार से अलग एक नए राष्ट्र की घोषणा की शुरुआत बन सकती है। लेकिन इस कहानी की शुरुआत आज से [संगीत] नहीं हुई है। इसके पीछे वर्षों पुराना असंतोष और पहचान की लड़ाई छिपी हुई है। साल 2009 में रखायन की अराकान जाति जो मुख्य रूप से बौद्ध समुदाय से जुड़ी है। उसने म्यांमार सरकार से ज्यादा प्रशासनिक अधिकारों की मांग शुरू की थी। उनका कहना था कि रखायन के संसाधनों और राजनीतिक फैसलों पर स्थानीय [संगीत] लोगों का अधिकार होना चाहिए। इसी आंदोलन के दौरान अराकान आर्मी का गठन किया गया। शुरुआत में इसे केवल एक जातीय विद्रोही संगठन माना गया। लेकिन धीरे-धीरे यह संगठित सैन्य ताकत में बदल गया। रखायन की भौगोलिक स्थिति में इस संघर्ष को बेहद अहम बनाती है। [संगीत] यह इलाका बांग्लादेश और म्यांमार की सीमा के पास स्थित है और समुद्री रास्तों के कारण रणनीतिक रूप से काफी [संगीत] महत्वपूर्ण भी माना जाता है। यही वजह है कि इस क्षेत्र पर नियंत्रण सिर्फ म्यांमार की आंतरिक राजनीति का मुद्दा नहीं है बल्कि इसमें क्षेत्रीय ताकतों की दिलचस्पी भी जुड़ती चली गई है। साल 2016 के बाद यहां हालात तेजी से बिगड़ने लगे और विद्रोह खुलकर सामने आ गया। इसी दौरान सबसे भयावह अध्याय शुरू हुआ रोहिंग्या समुदाय के खिलाफ हिंसा का। रखाई में रोहिंग्या मुसलमान आबादी अल्पसंख्यक [संगीत] थी।

लेकिन तनाव लगातार बढ़ रहा था। आरोप लगे कि अराकान आर्मी और दूसरे उग्र समूहों की गतिविधियों के कारण इलाके में हिंसा भड़क उठी है। हालात इतने खराब हो गए कि लाखों रोहिंग्या लोगों को अपना घर छोड़कर भागना पड़ा। बड़ी संख्या में लोग सीमा पार करके बांग्लादेश पहुंचे। इस पलायन ने पूरी दुनिया का ध्यान रखायन की ओर खींच लिया और म्यांमार पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ गया। लेकिन इसी अराजकता के बीच अराकान आर्मी ने अपने प्रभाव को और मजबूत करना शुरू कर दिया। फिर म्यांमार की राजनीति में एक बड़ा भूचाल आया। देश की सरकार कमजोर पड़ी और सेना यानी जुटा ने सत्ता पर कब्जा कर लिया। आमतौर पर माना जाता है कि सेना के नियंत्रण में आने के बाद विद्रोही समूहों का दबाव जाएगा लेकिन रखाई में इसका उल्टा असर देखने को मिला। अराकान आर्मी ने इस राजनीतिक अस्थिरता को अपने लिए अवसर में बदल लिया और उसने गांव और छोटे शहरों में अपनी पकड़ मजबूत करनी शुरू कर दी। शुरुआत में म्यांमार की सेना ने एयर स्ट्राइक के जरिए विद्रोह को कुचलने की कोशिश की।

लड़ाकू विमानों से लगातार हमले किए गए। जिनकी वजह से ऐसा लगने लगा था कि अराकान आर्मी ज्यादा समय तक टिक नहीं पाएगी। लेकिन धीरे-धीरे तस्वीरें बदलने लगी। अराकान आर्मी ने गोरिल्ला रणनीति अपनाई। [संगीत] घने जंगलों, पहाड़ी इलाकों और सीमावर्ती क्षेत्रों का फायदा उठाकर उन्होंने सेना पर लगातार दबाव बनाए रखा। स्थानीय स्तर पर उन्हें समर्थन मिलने लगा और विद्रोही संगठन ने अपनी सैन्य ताकत को तेजी से बढ़ाया। अब उनकी मांग सिर्फ ज्यादा अधिकारों तक सीमित नहीं रही बल्कि खुलकर अलग राज्य और पूरी तरह मुक्त अराकान की बात होने लगी। अराकान सेना के कमांडर इन चीफ टुन न्यानायक ने साफ शब्दों में कहा कि 2027 तक एक पूरी तरह मुक्त अराकान का लक्ष्य घोषित कर दिया जाए। उनका दावा है कि आने वाले वर्षों में उनकी सेना इतनी मजबूत हो जाएगी कि म्यांमार की जुटा सेना को रखायन छोड़कर भागना पड़ेगा। यह बयान सिर्फ एक राजनीतिक घोषणा नहीं माना जा रहा है बल्कि इसे युद्ध की खुली चुनौती के रूप में देखा जा रहा है। अब हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि सिटवे के आसपास लगातार बड़े सैन्य संघर्ष देखने को मिल रहे हैं। स्थानीय अखबार के मुताबिक अराकान आर्मी ने जुटा सेना की रसद आपूर्ति रोकने के लिए कई इलाकों में बारूदी सुरंगे बिछा दी है। सैन्य टैंकरों और सप्लाई वाहनों को निशाना बनाया जा रहा है ताकि राजधानी तक सेना की पहुंच कमजोर हो जाए। यानी यह लड़ाई अब केवल आमने-सामने की गोलीबारी तक सीमित नहीं रही है बल्कि पूरी सैन्य [संगीत] रणनीति के साथ लड़ी जा रही है।

29 मई से 1 जून के बीच सिटवे के आसपास भीषण झड़प हुई है। जुटा सेना के लगभग 40 सैनिक मारे गए हैं। यह हमला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे साफ संकेत मिला है कि अराकान आर्मी अब पहले से कई ज्यादा संगठित और खतरनाक हो चुकी है। पहले म्यांमार सेना की एयर स्ट्राइक विद्रोहियों पर भारी पड़ती थी। लेकिन हाल के महीनों में अराकान लड़ाकों ने नई तकनीक और आधुनिक हथियार हासिल कर लिए हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक अब उनके पास ड्रोन और कंधे से दागी जाने वाली मिसाइलें भी मौजूद हैं। इन हथियारों ने युद्ध का पूरा संतुलन बदल दिया है। पहले जहां म्यांमार की सेना आसमान से लगातार हमले करके विद्रोहियों को पीछे धकेल देती थी। वहीं अब हवाई हमले करना भी जटा सेना के लिए जोखिम भरा होता जा रहा है। ड्रोन के जरिए निगरानी और मिसाइलों के खतरे ने सेना की रणनीति को कमजोर कर दिया है। यही कारण है कि अब पूरी दुनिया की नजर रखाइन पर टिकी हुई है। क्योंकि अगर अराकान आर्मी सिटवे पर कब्जा करने में सफल हो जाती है तो यह सिर्फ म्यांमार का आंतरिक संकट नहीं रहेगा। यह साउथ एशिया के लिए एक बड़ा भू राजनीतिक बदलाव बन सकता है। भारत, बांग्लादेश और चीन जैसे देशों के लिए भी यह स्थिति बेहद संवेदनशील होगी। फिलहाल सिटवे की सड़कों पर गोलियों की गूंज है। जंगलों में बारूदी सुरंगे बिक चुकी हैं और आसमान में मंडरा रहे हैं ड्रोन। लेकिन सबसे बड़ा सवाल अब भी वही है। क्या दुनिया जल्द ही भारत की सीमा के पास एक नए देश का जन्म देखने वाली है? या फिर म्यांमार इस बगावत को खून से कुचल देगा। इस वीडियो में फिलहाल इतना ही। आपके लिए तमाम जानकारी जुटाई थी मेरे साथी आदर्श ने। मेरा नाम मनीषा है और देखते रहिए कड़क। शुक्रिया। [संगीत]

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