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‘अटल जी आपकी जरुरत है, जल्दी आइए’ जब इंदिरा गांधी ने अटलजी को लगाया फोन

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देश 1971 के मुहाने पर खड़ा [संगीत] था। इंदिरा गांधी पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब देने की तैयारियों में जुटी थी। अचानक रात के 12:00 बजे अटल जी के फोन की घंटी बजी। एक लंबे चौड़े कद का व्यक्ति लंबी चौड़ी मूछों वाला व्यक्ति फोन उठाता है। बोलता है कौन बोल रहा है? जवाब आता है प्रधानमंत्री जी अटल जी से बात करना चाहती हैं। अटल जी के सचिव शिव कुमार कहते हैं पर अटल जी तो सो रहे हैं। उधर से जवाब आता है अटल जी को जगाइए। देश को उनकी जरूरत है। शिव भागे-भागे जाते हैं और उन्हें जगाते हैं और अटल जी फोन पर आते हैं। उधर से प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को बोलती हैं, नमस्कार अटल जी, असुविधा के लिए खेद है। लेकिन देश को आपकी आवश्यकता है।

अटल जी, हमें आपकी जरूरत है। आप जल्दी दिल्ली पहुंचिए। सुबह तक दिल्ली में आइए। अटल जी कहते हैं मगर इंदिरा जी काफी रात हो चुकी है। अभी ना तो ट्रेन है ना कोई बस। आप सुबह तक का वक्त दीजिए। सूरज की पहली किरण के साथ मैं ग्वालियर से आगरा पहुंचूंगा और फिर वहां से दिल्ली आ जाऊंगा। इंदिरा जी कहती हैं, अटल जी 2 मिनट दीजिए। अटल जी 2 मिनट तक फोन के पास खड़े रहते हैं। उधर इंदिरा जी एक नई प्लानिंग को अंजाम देती हैं। 2 मिनट के बाद फिर प्रधानमंत्री का कॉल आता है और इंदिरा जी कहती हैं, अटल जी 20 मिनट में आपके घर के आगे सेना का वाहन आएगा। उसमें बैठिए और दिल्ली में मुझसे मुलाकात कीजिए। रात बीतती गई। सेना का वाहन आया। अटल जी उसमें सवार हुए। दिल्ली पहुंच गए। जब तक किसी को इस बात की खबर होती तब तक अटल बिहारी वाजपेयी इंदिरा जी के आवास पर पहुंच चुके थे। इंदिरा और अटल जी कमरे में गए और एक लंबी बैठक हुई। इस बैठक में इंदिरा जी कहती हैं, देश युद्ध के मुहाने पर खड़ा है।

मुझसे इस युद्ध में जीत के लिए सेना के अधिकारियों ने एक प्लान समझाया है। हो सकता है कि भविष्य में मुझे इसके लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की जरूरत पड़े। लेकिन मेरा संघ से सीधा ताल्लुक नहीं है। आप गोलवलकर से बात कीजिए और मेरी एक बैठक कराइए। अटल जी कहते हैं मैडम आप मुझे इस बैठक का उद्देश्य बताइए जिससे मैं गोलव्गर को बता पाऊं कि आखिर आप चाहती क्या हैं। इसके बाद इंदिरा जी ने बताया कि दरअसल रॉ और बीएसएफ ने मिलकर एक मास्टर प्लान तैयार किया है। तबके पूर्वी पाकिस्तान की सीमा से लगने वाले इलाकों में पश्चिमी पाकिस्तान की जातियों के खिलाफ बगावत का परचम बुलंद कर रहे युवाओं को भारत की सीमा के भीतर दाखिल कराया जाएगा। जहां उन्हें शरणार्थी कैंपों में रखा जाएगा और सैन्य ट्रेनिंग उपलब्ध कराई जाएगी और उसको वापस भेजकर मुक्ति वाहिनी के सदस्य के रूप में सीमा के पार भेजा जाएगा जिससे वह वहां रहते हुए अपना संघर्ष जारी रख पाएंगे और भारतीय फौज की मदद से पूर्वी पाकिस्तान की सीमा के भीतर अपना परचम बुलंद कर पाएंगे और वहां पर भारतीय फौज की एक सहायक टुकड़ी के तौर पर भी काम करेंगे।

लेकिन इसमें सबसे अहम है इन लोगों को संभालना, इन्हें बेहतर तरीके से अलग-अलग हिस्सों में बांटना कि यह किस काम आएंगे। किसकी कौन सी ट्रेनिंग करानी है और किसकी नहीं करानी है। पूरी व्यवस्था कैसे बनानी है। क्योंकि सेना तो युद्ध में व्यस्त होगी। ऐसे में इन सभी समस्याओं को सुलझाने के लिए एक लंबी चौड़ी फौज की जरूरत होगी। वैसे भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को इस सब का शानदार अनुभव था और आज भी संघ के अनुशासन को दुनिया देखती है। इसके बाद इंदिरा गांधी के गोलवलकर से बैठक का अटल जी ने मंतव्य को समझा और इसके बाद अटल जी तुरंत दिल्ली से नागपुर के लिए निकले। नागपुर पहुंचते ही अटल बिहारी वाजपेयी ने गुरु गोलवलकर से मुलाकात की। गुरु गोलवलकर को अटल जी ने देश में चल रही सियासत से वाकिफ कराया और इंदिरा की बेचैनी के बारे में बताया। अटल जी ने बताया कि देश में कैसे इंदिरा गांधी युद्ध के दौरान संघ की मदद चाहती हैं। तब जाकर इंदिरा जी और गोलवलकर के बीच फोन कॉल पर लंबी चौड़ी बातचीत हुई।

10-15 मिनट तक पूरा प्लान समझाया गया। इसके बाद गोलवलकर ने कहा, आप चिंता ना करें। आप दुर्गा हैं। दुर्गा दैत्यों का संहार करती है। दैत्यों का संघार करने के लिए आगे बढ़ें। समूचा राष्ट्र आपके पीछे आपकी शक्ति बनकर खड़ा है। यह पूरा किस्सा एक दौर में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे बाबूलाल गौर ने मीडिया के सामने सुनाया। हालांकि एक वीडियो इंटरव्यू में अटल बिहारी वाजपेयी ने इसका खंडन किया कि उन्होंने कभी भी इंदिरा गांधी को दुर्गा नहीं कहा। एक टीवी इंटरव्यू में अटल बिहारी वाजपेई से इंदिरा दुर्गा वाला सवाल पूछा गया तो उन्होंने क्या कहा सुनिए। उन्होंने कहा, मैंने दुर्गा नहीं कहा। यह भी अखबार वालों ने छाप दिया। मैं खंडन करता रह गया कि मैंने उन्हें दुर्गा नहीं कहा। नहीं कहा। फिर इस पर बड़ी खोज हुई। श्रीमती पुपुल जयकर ने इंदिरा जी के बारे में एक पुस्तक लिखी और उस पुस्तक में वह इस बात का उल्लेख करना चाहती थी कि वाजपेयी ने इंदिरा को दुर्गा नहीं कहा। तो वह मेरे पास आई। मैंने कहा कि मैंने यह नहीं कहा। मेरे नाम पर यह छप जरूर गया था। तो फिर उन्होंने लाइब्रेरी में जाकर सारी पुस्तकें खगा ली। सारी कार्यवाही देखी पर उसमें कहीं भी दुर्गा नहीं मिला। पर अभी भी दुर्गा मेरे पीछे है। जैसा आपके सवाल से दिखाई देता है।

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