नमस्कार दोस्तों, स्वागत है आपका हमारे चैनल में। जिस गाने को सुनकर आज भी लोग झूम उठते हैं, उसी गाने को कभी भारतीय संस्कृति के लिए खतरा बताया गया था और हैरानी की बात यह है कि उस गाने के पीछे थे बॉलीवुड के सबसे सभ्य सितारों में गिने जाने वाले देव आनंद। क्या आप यकीन करेंगे एक समय ऐसा भी था जब एक गाना सुनने के लिए लोग दीवाने थे। लेकिन उसी गाने को सुनाने से ऑल इंडिया रेडियो ने साफ मना कर दिया था और सिर्फ इतना ही नहीं जब फिल्म टीवी पर दिखाई गई तो उस गाने को बीच से काट कर हटा दिया गया। आज वही गाना भारतीय सिनेमा के इतिहास का सबसे बड़ा सुपरहिट गानों में गिना जाता है। दोस्तों मारो दम मिट जाए खोलो सुबह शाम। और हैरानी की बात यह है कि यह गाना किसी और का नहीं बल्कि हिंदी सिनेमा के एवरग्रीन स्टार देवानंद साहब की फिल्म का था। हरे कृष्णा [संगीत] हरे राम हरे कृष्णा हरे राम लेकिन कहानी सिर्फ दम मारो दम तक सीमित नहीं है। देवानंद की एक और फिल्म का गाना भी विवादों में फंस गया था। दोस्तों आखिर इन गानों में ऐसा क्या था? क्यों लोगों ने इन्हें भारतीय संस्कृति के खिलाफ बताया? क्यों सरकार तक को दखल देना पड़ा इन गानों के पीछे और क्यों खुद देव आनंद एक गाने को फिल्म से हटाने वाले थे। जानने के लिए दोस्तों वीडियो को आखिर तक जरूर देखिएगा। 1970 का दशक था। भारतीय सिनेमा तेजी से बदल रहा था। नई सोच, नए विषय और नए प्रयोग सामने आ रहे थे।
इसी दौर में देवानंद सिर्फ अभिनेता नहीं थे। वह निर्माता भी थे, निर्देशक भी थे। उनकी फिल्में अक्सर समाज के ऐसे मुद्दों को छूती थी जिन पर बाकी लोग बात करने से भी डरते थे। साल 1971 में उन्होंने बनाई फिल्म हरे रामा हरे कृष्णा। यह सिर्फ एक फिल्म नहीं थी दोस्तों। यह उस दौर के हिप्पी कल्चर युवाओं की भटकती जिंदगी और परिवारों के टूटते रिश्तों पर एक टिप्पणी थी। लेकिन किसी ने नहीं सोचा था कि इस फिल्म का एक गाना पूरे देश में भूचाल मचा देगा। फिल्म के लिए संगीत तैयार कर रहे थे आर डी वर्मन और गीत लिख रहे थे आनंद बक्शी साहब। गाने को आवाज दी थी आशा भोसले जी ने। जब धुन तैयार हुई तो सबको महसूस हुआ कि यह कुछ अलग होने वाली है। लेकिन कोई नहीं जानता था दोस्तों कि यह कितना बड़ा धमाका करने वाला है यह गाना। फिल्म में इस गाने को हिप्पी समुदाय के बीच फिल्माया गया। स्क्रीन पर थी जीनत अमान जो उस समय बिल्कुल नया चेहरा थी दोस्तों। उनका अंदाज, कपड़े, उनके हेयर स्टाइल और पूरी प्रस्तुति भारतीय दर्शकों के लिए बेहद अलग थी। जैसे ही फिल्म रिलीज हुई, दम मारो दम हर तरफ गूंजने लगा। चाय की दुकानों से लेकर कॉलेज कैंपस तक हर जगह यही गाना बज रहा था। लेकिन जितनी तेजी से इसकी लोकप्रियता बढ़ी उतनी ही तेजी से इसका विरोध भी शुरू हो गया। दोस्तों कई सामाजिक संगठनों ने आरोप लगाया कि यह गाना युवाओं को नशे की तरफ आकर्षित कर रहा है। लोगों का कहना था कि फिल्म में नशे को ग्लैमराइज किया गया है। कुछ अखबारों में लेख भी छपे। बहस शुरू हो गई। रेडियो कार्यक्रमों में चर्चा शुरू होने लगी। देश दो हिस्सों में बट गया। एक तरफ वो लोग थे जो इसे एक शानदार गीत मानते थे और दूसरी तरफ वो लोग थे जो इसे समाज के लिए खतरनाक बता रहे थे। दिलचस्प बात यह है कि फिल्म का उद्देश्य नशे को बढ़ाना देना नहीं था। असल में देवानंद नशे के दुष्परिणाम दिखाना चाहते थे।
फिल्म की कहानी भटके हुए युवाओं की थी। लेकिन अक्सर होता क्या है? दर्शक संदेश से ज्यादा मनोरंजन को याद रखना चाहते हैं। और यही हुआ इस गाने के साथ। फिल्म का संदेश पीछे रह गया जबकि दम मारो दम लोगों की जुबान पर चढ़ गया। बहुत कम लोग जानते थे कि एक समय ऐसा भी आया जब देवनंद इस गाने को फिल्म से हटाने के बारे में सोच रहे थे। उन्हें लग रहा था कि कहीं यह गाना फिल्म के मूल संदेश को कमजोर ना कर दे। लेकिन टीम के कुछ लोगों ने उन्हें समझाया। कहा कि यह गाना फिल्म का सबसे बड़ा मोड़ बन सकता है। आखिरकार गाना फिल्म में रखा गया और बाद में यही निर्णय फिल्म की सबसे बड़ी ताकत साबित हुआ। दोस्तों विवाद बढ़ता चला गया। कहा जाता है कि ऑल इंडिया रेडियो ने इस गाने को नियमित प्रसारण से दूर रखा। वहीं जब फिल्म का टेलीविजन प्रसारण हुआ, तो दूरदर्शन ने कई बार इस गाने को लेकर सावधानी भी बरती। उस दौर में सरकारी मीडिया की जिम्मेदारी अलग तरीके से देखी जाती थी। जो चीजें समाज पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती थी, उन्हें सीमित करने की कोशिश की जाती थी। यही वजह थी कि दम मारो दम वर्षों तक चर्चा और विवाद दोनों का विषय बना रहा। सरकारी संस्थाएं चाहे जितनी सख्ती कर लें। जनता ने अपना फैसला सुना दिया। गाना सुपरहिट हुआ। रिकॉर्ड्स भी बिके, कैसेट्स बिके। लोगों ने इसे बहुत याद रखा। आज भी जब 70 के दशक के सबसे बड़े गानों की बात होती है दोस्तों तो दम मारो दम का गाना सबसे पहले लिया जाता है। दूसरा विवादित गाना की बात करते हैं दोस्तों। साल था 1978। देववानंद लेकर आते हैं फिल्म देश परदेश। फिल्म में उनके साथ थी टीना मुनीम। इस फिल्म का एक गाना था तू पी और जी।
नाम सुनकर ही अंदाजा लगाया जा सकता है दोस्तों कि गाना किस तरह का होगा। फिर शुरू हुआ विरोध। गाने में शराब पीने को लेकर कई दृश्य और बोल थे। कुछ संगठनों ने आरोप लगाया कि यहां शराबखोरी को बढ़ावा दे रहा है। विरोध फिर से शुरू हुआ। बहस छिड़ गई। लोगों ने सवाल उठाया कि इसकी फिल्म की सामाजिक जिम्मेदारी क्या होनी चाहिए? क्या मनोरंजन के नाम पर कुछ भी दिखाया जाना चाहिए या फिर फिल्मों को समाज के प्रति जवाबदेह होना चाहिए। देव आनंद हमेशा नई सोच के पक्षदर्द रहे। वे मानते थे कि सिनेमा समाज का आईना है। जो समाज में मौजूद है उसे फिल्मों में दिखाया जा सकता है। लेकिन हर दौर की अपनी संवेदनशीलताएं होती हैं। दोस्तों जो बात आज सामान्य लगती है वो 1970 के दशक में विवाद का कारण बन सकती थी। और यही इन दोनों गानों के साथ भी हुआ। दिलचस्प बात यह है कि जिन गानों पर कभी विवाद हुआ करता था।
आज वही गाने भारतीय सिनेमा की विरासत माने जा रहे हैं। नई पीढ़ी उन्हें क्लासिक कहती है। संगीत प्रेमी उन्हें बार-बार सुनते हैं और फिल्म इतिहासकार उन्हें भारतीय पॉप कल्चर का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं। समय बदल गया लेकिन इन गानों की लोकप्रियता नहीं बदली। तो दोस्तों देवानंद के करियर में ऐसे दो गाने आए जिन्होंने जितनी लोकप्रियता हासिल की उतना ही विवाद भी झेला। एक था दम मारो दम जिसने पूरे देश में बहस छोड़ दी और दूसरा था तूप्पी और जी जिसने फिर से लोगों को दो हिस्सों में बांट दिया लेकिन इतिहास गवाह है दोस्तों विवाद आए और चले गए मगर यह गाने आज भी जिंदा हैं और शायद यही किसी भी कलाकार की सबसे बड़ी जीत होती है। अगर आपको भी यह कहानी पसंद आई हो दोस्तों, तो वीडियो को लाइक करें, चैनल को सब्सक्राइब करें और कमेंट में बताइए क्या दम मारो दम पर हुआ विवाद सही था या नहीं। क्या सच में दम मारो दम युवाओं को गलत रास्ते पर ले जा रहा था? दोस्तों, अगर यह गाना आज रिलीज होता, तो क्या फिर विवाद होता? क्या बैन लगाने से किसी गाने की लोकप्रियता कम हो जाती है? थैंक यू