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ताजमहल के नीचे बंद 22 कमरों का वो रहस्य… जिसे जानकर आपके होश उड़ जाएंगे!

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क्या सचमुच ताजमहल बनाने वाले कारीगरों के हाथ काट दिए गए थे जिससे वो कोई दूसरा ताजमहल ना बना सके? या फिर क्या सच में ताजमहल के नीचे तेजो महालय नाम का मंदिर छिपा है। जिस ताजमहल को प्यार की सबसे बड़ी निशानी हम लोग मानते हैं क्या सच में उसे एक ऐसे शहंशाह ने बनवाया जो कि अपनी बीवी के प्रेम में पागल था और उसकी याद में दुखी था। क्योंकि अगर आप सोच कर देखो तो ये वही शहंशाह शाहजहां था जो कि गद्दी हासिल करने के लिए अपने ही परिवार के लोगों को मौत के घाट उतार रहा था और उससे भी बड़ी बात यह है कि ताजमहल को बनवाया किसने? क्योंकि हमारी तो छोड़िए मुगलों के इस दावे को अंग्रेज भी नहीं मानते थे। मुगल काल के टाइम पर जब अंग्रेज भारत में आए तो सालों तक वो भी यह नहीं मानते थे कि ताजमहल को शाहजहां ने बनवाया। तो सवाल यह है कि ताजमहल के बारे में हमने जो कुछ सुना, जो कुछ जाना उसमें सच क्या है और झूठ क्या है? आज के इस वीडियो में हम पांच ऐसे सबसे बड़े दावों और मिथिकों की पड़ताल करेंगे जो ताजमहल से जुड़े हैं। इनमें हम इमोशंस पे नहीं जाएंगे। हम डॉक्यूमेंट्स हिस्ट्री और सबूतों के आधार पर बात करेंगे। तो [संगीत] वीडियो को पूरा देखिएगा क्योंकि अपना इतिहास नहीं जानोगे तो खुद को कैसे पहचानोगे। दोस्तों हिस्ट्री कनेक्ट अब स्पॉटफाई पर भी है। आपको डिस्क्रिप्शन में लिंक मिल जाएगा। वहां पर जाके आप हमारे चैनल को सब्सक्राइब कर सकते हैं, फॉलो कर सकते हैं और हमें आपके सपोर्ट की भी जरूरत है। तो सब्सक्राइब जरूर कीजिएगा स्पॉटिफाई पर हिस्ट्री कनेक्ट को। ताजमहल के सच और झूठ की गहराइयों में जाने से पहले हमें उस दौर के माहौल को समझना होगा। 1632 का साल था जब इस इमारत की नींव रखी जा रही थी। इस दौर में मुगल दौलत अपने पीक पर थी। इस दौलत को हासिल करने का एक तरीका जब्ती सिस्टम था। यह वो टैक्स था जिसमें आम किसानों को अपनी फसल का 1/3 हिस्सा सीधे शाही खजाने में जमा करना होता था। लेकिन शाहजहां ने इस टैक्स को बढ़ाकर 1/3 से आधा यानी 50% कर दिया। इस बढ़े हुए टैक्स से मिले खजाने के दम पर शाहजहां ने इस प्रोजेक्ट में लगभग 3 से $ करोड़ झोंक दिए। अगर आज के हिसाब से देखें तो यह रकम $1 अरब डॉलर के आसपास बैठेगी। अब जाहिर है कि इतनी बड़ी रकम सिर्फ एक याद के लिए तो लुटाई नहीं जाती। ऑस्ट्रियन हिस्टोरियन एबा कोच अपनी किताब द कंप्लीट ताजमहल में बताती हैं कि शाहजहां ने करीना का इस्तेमाल किया। यह बटरल सिमिट्री या एक जैसी दो [संगीत] तरफ़ा बनावट होती है। यह दुनिया पर बादशाह के कंप्लीट कंट्रोल और एक डिवाइन ऑर्डर को दिखाने का तरीका था। सब कुछ परफेक्ट होना यह दिखाता था कि बादशाह का रूल भी एकदम परफेक्ट और बैलेंस्ड है। ताजमहल का लेआउट, इसके बगीचे और इसकी भव्यता ये सब दुनिया को यह दिखाने के लिए था कि मुगल सल्तनत असल में अजय है। इसको कोई हरा नहीं सकता। लेकिन दोस्तों एक इमारत जितनी बड़ी होती है

उसके साथ जुड़ने वाली अफवाहें भी उतनी बड़ी हो जाती हैं। आइए जानते हैं उन पांच बड़े [संगीत] मिथकों को जो इस मशहूर से भी ऊपर की इमारत के साथ जुड़े हुए हैं। मिथ नंबर एक, आपने पक्का यह सुना होगा, यह कहानी सुनी होगी कि ताजमहल बनाने वाले लोगों के हाथ काट दिए गए थे। आपको कई टूरिस्ट गाइड ताजमहल के पास यह कहानी सुनाते हुए मिल जाएंगे। कहा जाता है कि ताजमहल पूरा होने के बाद शाहजहां ने उन 20,000 मजदूरों के हाथ कटवा दिए जिन्होंने इसे बनाया था। यहां तक कि जो चीफ आर्किटेक्ट था उसकी आंखें भी निकाल ली गई थी ताकि दुनिया में फिर कभी ऐसी कोई इमारत ना बन सके। अब ये सब सुनने में कितना लॉजिकल लगता है। एक बादशाह जो चाहता है कि उसके जैसा काम कोई और करा ही ना पाए। लेकिन जब हम इस पर्टिकुलर दावे के लिए हिस्टोरिकल डाटा देखते हैं तो हमें एक अलग ही कहानी नजर आती है। मुगल दरबार का एक-एक हिसाब रखा जाता था अलग-अलग किताबों में। बादशाहनामा जो शाहजहां के दौर का ऑफिशियल रिकॉर्ड है उसमें सुई से लेकर हाथी तक का जिक्र है। लेकिन 20,000 लोगों के हाथ काटे जाने का कोई जिक्र पूरे मुगल आर्काइव में कहीं नहीं मिलता। किसी भी समकालीन यूरोपियन यात्री जो उस वक्त भारत में थे वो ऐसे किसी भी खौफनाक घटना के बारे में नहीं लिखते। अब जरा इसे एक और लॉजिक से सोचिए। 17वीं सदी में आज की तरह मॉडर्न मशीनें या एआई तो होते नहीं थे। इसलिए ये बहुत ही स्किल्ड कारीगर बहुत कीमती भी होते थे। ताजमहल को बनाने के लिए कन्नौज से पत्थर तराशने वाले, बुखारा से फूल पत्ती उकेरने वाले और तुर्की से गुंबद बनाने वाले एक्सपर्ट बुलाए गए थे। अगर शाहजहां अपने ही कारीगरों के हाथ काट देता तो उसके बाद के प्रोजेक्ट्स कौन बनाता? इसी सवाल के जवाब में आपको एक इंटरेस्टिंग बात बताता हूं। ताजमहल के चीफ आर्किटेक्ट उस्ताद अहमद लाहौरी थे। शाहजहां ने उनके आर्किटेक्ट डिज़ाइन की स्किल से खुश होकर उन्हें नादिरुल असर यानी युग का अजूबा की उपाधि दी थी। जब ताजमहल का काम पूरा हुआ तो शाहजहां ने उनके हाथ नहीं कटवाए बल्कि दिल्ली का लाल किला, दिल्ली का जामा मस्जिद और शाहजहानाबाद की प्लानिंग में उनको इनवॉल्व किया। दरअसल हाथ काटने की यह कहानी एक ग्लोबल फोकलोर का हिस्सा है। लोकथाओं की स्टडी करने वाले स्कॉलर इसे स्टिथ थॉमसन मोटिव इंडेक्स के तहत रखते हैं। दुनिया भर में ऐसी कई कहानियां हैं जहां राजा किसी अनोखी चीज के बनने के बाद उसे बनाने वाले को अंधा कर देता है या अपाहिज कर देता है। यह कहानी सिर्फ उस बिल्डिंग की महानता को बढ़ा चढ़ाकर बताने का एक तरीका थी। लेकिन हाथ कटने की इस अफवाह के बीच एक और झूठ धीरे-धीरे पनप रहा था जो सीधे तौर पर भारतीयों की काबिलियत पर ही सवाल उठा रहा था। और यह हमारा मिथ नंबर दो होगा। लेकिन उससे पहले मैं आपको एक और बात बताता हूं। ताजमहल के सदन गेट के ठीक बाहर एक पूरी बस्ती बसाई गई थी। उस दौर में इस बस्ती को मुमताजाबाद कहा जाता था। आज यही इलाका ताजगंज के नाम से मशहूर है। यहां जो लोग आज रहते हैं वो ताजमहल बनाने वाले कारीगरों की आज की पीढ़ी है। इन्हीं के पूर्वजों ने ताजमहल बनाया था और आज के दौर में ताजमहल में जो भी मरम्मत का काम होता है उसमें बहुत बड़ा इनवॉल्वमेंट इन्हीं लोगों का होता है। अब आते हैं झूठ नंबर दो पर। एक टाइम पर एक बहुत बड़ा झूठ फैलाया गया कि ताजमहल का डिजाइन किसी यूरोपियन ने बनवाया था। 18वीं और 19वीं सदी में जब ब्रिटिश हुकूमत भारत में मजबूत होने लगी तो एक नई तरह की थ्योरी सामने आई। आज WhatsApp पर तेजो महाले के मैसेज खूब फैलते हैं। मूवी तक बन चुकी है

और इसका भी आधार यही है कि मुगल इतनी बेहतरीन इमारत बना नहीं सकते थे। ये थ्योरी दी थी पीएन ओक नाम के एक राइटर ने। हालांकि पीएन ओक की थ्योरी से बहुत पहले यूरोप के लोगों ने भी एक ऐसी ही साजिश रची थी। इस मिथ की कहानी यानी कि यूरोप के लोगों ने ताजमहल को बनाया। इस मिथ की कहानी 1640 से शुरू होती है। पुर्तगाली पादरी फादर सेवेबेस्टियन मैनरिक बर्मा से होते हुए आगरा पहुंचे। 1649 में उन्होंने अपनी यात्रा पर एक किताब छापी। इस किताब में उन्होंने दावा किया कि ताजमहल को इटली के वेनिस शहर के गेरोनिमो विरोनियो ने डिजाइन किया। वेरोनियो की मौत मैनरिक के पहुंचने से ठीक पहले लाहौर में हुई थी। ये किताब लगभग 200 सालों तक अनदेखी रही। इसको किसी ने देखा नहीं। फिर 1880 के दशक में यह कहानी अचानक वायरल हो गई। 1888 में गाइड टू आगरा नाम की एक टूरिस्ट बुकलेट ने इसे सच मानकर छाप दिया। फिर आगरा के पाद सटोस कब्रिस्तान में विरोनियो की कब्र भी मिल गई। इसके बाद तो यूरोपियंस को मजा ही आ गया। ये जुट गए दिखाने के लिए कि दुनिया का सातवां अजूबा इटालियन रेननेसा यानी इटली के पुनर्जागरण की देन है। उनका अहंकार ये मानने को तैयार ही नहीं था कि ईस्ट के लोग इतना शानदार आर्किटेक्चर खड़ा कर सकते हैं। इसी बीच एक और नई थ्योरी आ गई। यूरोप के एक दूसरे ग्रुप ने दावा किया कि ताजमहल इटली के विरोनियों ने नहीं बल्कि फ्रांस के मशहूर जहरी ऑस्टिन डी बोर्डो ने बनाया है। अब फ्रांस और इटली के विचारकों में ताजमहल का क्रेडिट लेने की होड़ मच गई। 1927 में मैनरिक की किताब के नए ट्रांसलेशन में फ्रांसीसी दावे को झुझलाने के लिए बड़े-बड़े नोट लिखे गए। आर्ट हिस्टोरियन जाइल स्टिलटसन ने अपनी 2008 की किताब ताजमहल में इस पूरे ड्रामे और झूठी कहानियों का गहराई से जिक्र किया है। आज हिस्टोरियंस इन दोनों थ्योरीज को कूड़ेदान में डाल चुके हैं। यानी कि तेजो महालय की थ्योरी और इसके साथ-साथ में जो यूरोपियन थ्योरी है उसको भी। मॉडर्न डिस्कवरी और डॉक्यूमेंट से ये पूरी तरह से बात साबित हो चुकी है कि ताजमहल के चीफ आर्किटेक्ट कोई इटालियन या फिर कोई फ्रेंच नहीं बल्कि उस्ताद अहमद लाहौरी थे। शाहजहां ने लाहौरी के हुनर से खुश होकर उसे नादिर उल असर यानी युग का आश्चर्य की उपाधि दी थी। इस बात का सबसे बड़ा ठोस सबूत दीवान मुहंदिस नाम का एक ग्रंथ है। इसे किसी और ने नहीं बल्कि उस्ताद अहमद लाहौरी के अपने बेटे लुत्फुल्लाह मोहदिस ने लिखा था। इसमें साफ तौर पर लाहौरी के मैच की नॉलेज और ताजमहल और लाल किले के डिज़ाइन में उनके रोल का जिक्र है। लेकिन विदेशी यात्रियों को सिर्फ इस इमारत का डिज़ाइन हजम नहीं हो रहा था। उन्हें नदी के उस पार यानी ताजमहल के उस पार कुछ ऐसा नजर आ रहा था जिसने हमारे इतिहास में एक और झूठ को जन्म दिया। सबसे बड़ा सवाल है कि यूरोप के लोग ऐसा कर क्यों रहे थे? 1903 में कोलकाता के गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ आर्ट के पूर्व प्रिंसिपल ईबी हेवेल ने इसका जवाब दिया। अपने ऐसे ताज और उसके डिजाइनर में उन्होंने साफ लिखा है कि यह गोरे लोगों के अहंकार और अज्ञानता का नतीजा है। हर यूरोपियन यह सोचकर प्राउड फील करना चाहता था कि भारत की सबसे शानदार इमारतों में से एक ताजमहल वेस्टर्न दिमाग की ही उपज है। हैवेल ने इसके सुपीरिटी कॉम्प्लेक्स को खूब क्रिटिसाइज किया है। आज चाहे इटली के आर्किटेक्ट की कहानी हो या WhatsApp का तेजोहाल मैसेज दोनों का मकसद एक ही है। लोग ताजमहल की महानता को हजम नहीं कर पाते और इसका हिस्टोरिकल क्रेडिट चुराना चाहते हैं। अब आते हैं झूठ नंबर तीन पर यानी कि ब्लैक ताजमहल की थ्योरी पर। अगर आप कभी आगरा गए हैं और यमुना नदी के पार मेहताब बाग से ताजमहल को आपने देखा है तो शायद आपने भी यह कहानी सुनी हो। कहा जाता है कि शाहजहां नदी के दूसरी तरफ अपने लिए बिल्कुल ताजमहल जैसा ही एक और मकबरा बनवाना चाहते थे। यह ताजमहल पूरी तरह से काले संगमरमर का बनना था। इन दोनों इमारतों को यमुना के ऊपर एक चांदी के पुल से जोड़ा जाना था। कहानी कहती है कि इससे पहले कि शाहजहां इस काले ताजमहल को बनवा पाते उनके बेटे औरंगजेब ने उन्हें गद्दी से हटा दिया और कैद कर लिया। अब कहानी में सुनने से एक ट्रैजिक हॉलीवुड फिल्म जैसी कहानी लगती है। एक अधूरा सपना, एक लाचार पिता और एक क्रूर बेटा। लेकिन इस कहानी की जड़े भी एक फ्रेंच यात्री बैप्टिस्ट ट्रेवनियर की किताब में मिलती है। ट्रेवनियर को सनसनीखेज बातें लिखने का शौक था। जब 1990 के दशक में एएसआई ने मेहताब बाग की खुदाई की तो लोगों को लगा कि अब काले ताजमहल के राज खुल जाएंगे। लेकिन सवाल है कि खुदाई में निकला क्या? वहां कोई भी ऐसा बड़ा फाउंडेशन या नींव नहीं मिली जो एक बहुत बड़े मकबरे का वजन उठा सके। वहां कुछ काले पत्थर जरूर मिले जिन्हें देखकर शुरुआती लोगों ने काले ताजमहल की थ्योरी गढ़ ली। लेकिन जब साइंटिस्ट ने उन पत्थरों की जांच की तो पता चला कि वो काले पत्थर दरअसल सफेद संगमरमर ही थे। सदियों तक काई, नमी और मौसम की मार सहने की वजह से उनका रंग काला पड़ गया था। इतिहासकारों के मुताबिक मेहताब बाग कोई दूसरी इमारत की जगह नहीं थी। वो ताजमहल के ही कॉम्प्लेक्स का एक अहम हिस्सा था। इतिहासकार एवा कोच ने अपने सर्वे में पाया कि मेहताब बाग में मिला ऑक्टागोनल कुंड ताजमहल के मेन गुंबद के एकदम परफेक्ट अलाइनमेंट में है। यह साबित करता है कि यह कोई अलग इमारत की जगह नहीं बल्कि ताजमहल कॉम्प्लेक्स का मून लाइट गार्डन था। इसे सिर्फ इसलिए बनाया गया था ताकि राजा वहां बैठकर पानी में ताजमहल का रिफ्लेक्शन देख सकें। लेकिन रिफ्लेक्शन की शांति के नीचे कुछ ऐसे विवाद पनप रहे थे जो आज की पॉलिटिक्स को भी हिला कर रख देते हैं।

और यहां से आता है मिथ नंबर चार। यह मिथ है ताजमहल के तहखाने में बंद 22 कमरों की मिस्ट्री। पिछले कुछ सालों में सोशल मीडिया और WhatsApp की यूनिवर्सिटी ने इसे इस इमारत के इर्द-गिर्द एक नया जाल बना है। कहा जाता है कि ताजमहल के बेसमेंट में 22 कमरे हैं जिन पर हमेशा ताला लगा रहता है। दावा किया जाता है कि इन कमरों के अंदर हिंदू देवी देवताओं की मूर्तियां हैं। टूटे हुए शिवलिंग हैं और कुछ ऐसे सबूत हैं जिन्हें सरकार दुनिया से छिपाना चाहती है। इसे एक बहुत ही बड़ी पॉलिटिकल साजिश की तरह पेश किया जाता है। इस पर एक मूवी भी आई थी। अगर आपको याद हो [संगीत] तो मैंने इस पर वीडियो भी बनाया था। पर चलिए एक बार और इस पर हम बात कर लेते हैं डिटेल में। एक लेखक थे पीएनओ जिनके बारे में मैंने अभी थोड़ी देर पहले जिक्र किया। इन्होंने ये किताब लिखी ताजमहल एक मंदिर है। इस किताब में वो सारी बातें थी जैसे कि तहखाने में छिपे हुए कमरे, हिंदू प्रतीक जो लोगों को एक बढ़िया कांस्परेसी मसाला देती हैं। ये मसाला हमारे देश में धड़ल्ले से बिकता भी है। यही वजह है कि ओक की कांस्परेसी थ्योरी पर किसी इतिहासकार ने भले ही ध्यान ना दिया हो, लेकिन धीरे-धीरे 1980 और 90 के दशक में तेजो महालेय की कहानी फिर से जिंदा हो गई। कुछ ऑर्गेनाइजेशनंस ने इसे दबी हुई सच्चाई बताना शुरू किया और दावा किया कि इतिहासकारों ने इस्लामिक आक्रमणकारियों के डर से असली इतिहास को छिपा दिया। इनफैक्ट पीएनओ साहब ने अपनी इस किताब के आधार पर साल 2000 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी डाली। तब सुप्रीम कोर्ट ने इसे पब्लिसिटी स्टंट बता दिया। और इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कमेंट किया कि जैसे किसी के दिमाग में मक्खी घुस गई है। इस तरह की ये पीआईएल है। लेकिन सवाल फिर भी बना ही रहा। तो अब आते हैं हम असली सबूतों पर कि क्या सचमुच ताजमहल के एक तहखाने में 22 मंदिर हैं। देखिए शाहजहां के दरबार में कई इतिहासकार थे। इनमें से एक अब्दुल हमीद लाहौरी ने बादशाहनामा में लिखा। 1632 में शाहजहां ने मुमताज महल की याद में यमुना किनारे मकबरे का निर्माण आरंभ किया। फ्रांसवा बर्नियर उन बेहद कम लोगों में से थे जिन्होंने ताजमहल को पूरी तरह से बनते हुए देखा। उन्हें यह जगह दारा शिकोह ने दिखाई थी। वो लिखते हैं कि मैंने उस मकबरे का निर्माण होते हुए देखा जिसकी सुंदरता अनुपम थी। अब अगर ताजमहल कोई पहले से बना मंदिर होता तो क्या ये विदेशी यात्री जो शाहजहां के शासनकाल में भारत आए थे उसका जिक्र नहीं करते। इतिहासकार आरनाथ जो मुगल आर्किटेक्ट के बहुत बड़े विशेषज्ञ माने जाते हैं वो लिखते हैं ताजमहल पूरी तरह से एक प्लंड मुगल स्मारक है। इसके डिजाइन से लेकर इसके आर्किटेक्ट तक हर एक एलिमेंट शाहजहां के काल के हिसाब से बना हुआ है।

इसके किसी हिस्से में मंदिर या मूर्ति पूजा का संकेत नहीं मिलता। अब जो दावा है कि ताजमहल के ऊपर कलश, कमल और त्रिशूल और हिंदू मंदिर का सबूत है। लेकिन जो लोग स्थापत्य के विशेषज्ञ हैं वो बताते हैं कि ये कलश इस्लामी वास्तुकला का भी हिस्सा रहा है। जो फारस, तुर्की और मध्य एशिया में भी देखा जा सकता है। यह प्रतीक देवी ऊर्जा का नहीं बल्कि संतुलन और एकता का प्रतीक है जो अरबी कला में गहराई से रचा बसा है। अब बात करते हैं हम आर्कियोलॉजिकल सबूतों की। एएसआई ने 1970 और 2000 के दशक में ताजमहल के स्ट्रक्चरल स्टडी किए। इन स्टडीज में कहीं भी मंदिर बेस्ड संरचना के अवशेष नहीं मिले। जो भी खुदाई हुई उसमें नींव, ईंट और पत्थरों का जो स्ट्रक्चर है वो मुगल कालीन पाया गया ना कि सीक्रेटली कोई अर्ली मिडिवल का पाया गया। एसआई की कई रिपोर्ट्स और हाल ही में जारी की गई तस्वीरों ने ये साफ किया कि नीचे के वो 22 कमरे कोई रहस्यमई जगह नहीं है। वो दरअसल मुगल आर्किटेक्चर का एक आम हिस्सा है जिन्हें तहखाना कहा जाता है। यमुना नदी की नमी और पानी से मेन बिल्डिंग को बचाने के लिए ये हवादार कमरे बनाए गए थे। इनमें लकड़ी के दरवाजे लगे थे जो टाइम के साथ खराब हो गए। इसलिए एएसआई ने वहां ईंटों की दीवारें चुनवाकर उन्हें बंद कर दिया ताकि इमारत की नींव सुरक्षित रहे। वहां ना तो कोई मूर्ति है ना कोई ही रहस्य है। एएसआई की वेबसाइट पर जाकर आप उन तहखानों के जो है फोटो भी देख सकते हैं। अब हम आते हैं झूठ नंबर पांच पर। तेजो महालय और लूटी हुई राजपूत जमीन। ये आज के दौर का सबसे ज्यादा रेलेवेंट और सबसे ज्यादा कंट्रोवर्शियल मुद्दा है। यह मिथ भी पीएनओ का ही दिया हुआ था। उनकी किताब से ये सारे मिथ निकले हैं। उन्होंने दावा किया कि ताजमहल दरअसल कोई मकबरा है ही नहीं। उनके मुताबिक ये 12वीं सदी में बना भगवान शिव का एक मंदिर था और शाहजहां ने इसे राजपूतों से छीनकर मकबरे में बदल दिया। ये थ्योरी आज के बहुत बड़े पॉलिटिकल हथियार के रूप में इस्तेमाल होती है। लेकिन जब हम आर्काइव्स और लैंग्वेज साइंस के नजरिए से देखते हैं या लिंग्विस्टिक साइंस के नजरिए से देखते हैं तो ये धावे ढहने लगते हैं।

सबसे पहली बात तो ये कि शब्द ताज और महल ये संस्कृत के शब्द है ही नहीं। ये अरबी और फारसी के आम शब्द हैं जो मुगलों के दौर में बहुत इस्तेमाल होते हैं। इंटरेस्टिंग [नाक से की जाने वाली आवाज़] बात ये है कि शाहजहां के अपने गवर्नमेंट रिकॉर्ड्स में भी इसे कभी ताजमहल नहीं कहा गया। मुगल डॉक्यूमेंट्स में इसका नाम रोजा-ए मुनव्ववरा यानी रोशन मकबरा लिखा गया। ताजमहल नाम तो बाद में जनता के बीच में मशहूर हुआ। तो जिस मकबरे का नाम कभी तेज ताजमहल ऑफिशियली था ही नहीं वो तेजो महाले वाली बात कैसे फॉलो हो जाएगी वहां पर? इसके साथ ही हम आते हैं जमीन छीनने वाली बात पर। क्या शाहजहां ने राजा जय सिंह से ये जमीन जबरदस्ती हड़पी थी? इसका जवाब जयपुर के राजघराने के एक बहुत ही सुरक्षित आर्काइव में मिलता है। वहां आज भी 28 दिसंबर 1633 का एक शाही फरमान सुरक्षित रखा हुआ है। इस फरमान को कई इतिहासकारों ने स्टडी किया। इसमें साफ लिखा है कि राजा जय सिंह आगरा में यमुना नदी के किनारे अपनी एक हवेली देने को तैयार थे। लेकिन शाहजहां को अपनी बेगम के लिए एक पाक जमीन चाहिए थी। इस्लामी कानून के मुताबिक अगर दफन करने की जगह खरीदी ना गई हो तो उसे शुद्ध नहीं माना जाता। इसीलिए जमीन के बदले शाहजहां ने राजा जय सिंह को आगरा के बीचों-बीच चार कीमती हवेलियां दी थी। यह एक तरह से पूरी तरह से कानूनी लेनदेन था। इसके अलावा एएसआई ने कई बार कोर्ट में हलफनामा दिया है कि इस इमारत की बनावट में हिंदू मंदिर का कोई बड़ा लक्षण हमें देखने को नहीं मिलता। ना तो इसमें कोई गर्भगृह है और ना ही परिक्रमा करने की कोई जगह है। कुछ लोग ताजमहल के मुख्य गुंबद पर लगे कलश को देखकर कहते हैं कि यह त्रिशूल है इसलिए यह मंदिर है। लेकिन वो दरअसल मुगल पॉलिटिक्स की एक चालाकी थी। मुगलों ने भारत पर रूल करने के लिए यहां के लोकल सिंबल्स को अपने आर्किटेक्चर में शामिल किया। कमल का फूल और कलश भारतीय प्रतीक थे जिनके ऊपर उन्होंने इस्लामी चांद लगा दिया। ये डिज़ाइन ये बताने के लिए था कि अब मुगलों का राज पूरी तरह से भारतीय हो चुका था। यह कोई मंदिर का सबूत नहीं बल्कि सत्ता को मजबूत करने की एक सोची समझी स्ट्रेटजी थी। दोस्तों इतिहास जो है वो बहुत ही कॉम्प्लेक्स होता है।

ताजमहल का निर्माण एक तरफ जहां इंसान की कला का सबसे बेहतरीन नमूना है वहीं दूसरी तरफ इसने मुगल खजाने को इस कदर खाली किया कि एंपायर की नींव हिल गई। इसी आर्थिक तंगी और सत्ता के लालच ने उस खूनी जंग को जन्म दिया जिसमें औरंगजेब ने अपने ही भाइयों का कत्ल किया और जिस जिस शाहजहां ने यह इमारत बनाई उसे जिंदगी के आखिरी आठ साल आगरा के किले में रहकर बिताने पड़े एक कैद की तरह। आज ताजमहल एक तरफ भारत की पहचान बनकर खड़ा है जो दुनिया भर को अपनी ओर खींचता है। वहीं दूसरी तरफ यह इस बात का भी सबूत है कि ऐतिहासिक इमारतों को कैसे अपने-अपने फायदे के लिए तोड़ा मरोड़ा जा सकता है। कभी अंग्रेज इसे अपना बताना चाहते थे। कभी आशिक इसे सिर्फ प्यार की निशानी मानते हैं और आज की पॉलिटिक्स इसे हिंदू मुस्लिम के चश्मे से देखती है। सच्चाई इन सबके कहीं बीच में दबी हुई है। उन डॉक्यूमेंट्स में जिन्हें बहुत कम लोग पढ़ते हैं। इतिहास को सिर्फ भावनाओं से नहीं बल्कि फैक्ट्स की कसौटी पर परखना भी जरूरी है। तो दोस्तों ये थी कहानी इस चीज की कि कौन से पांच बड़े झूठ चलते हैं। वैसे पांच और बड़े झूठ हैं। अगर आप चाहते हैं तो कमेंट में बताइएगा। मैं उस पर भी दूसरा वीडियो लेकर आऊंगा और ताजमहल के बाकी के पांच झूठ के बारे में आपके सामने सारे फैक्ट्स के साथ बातें रखूंगा। अगर आपको ये वीडियो पसंद आया है तो इसे लाइक कीजिए, शेयर कीजिए और ऐसी इंटरेस्टिंग कहानियों के लिए हिस्ट्री करंट को सब्सक्राइब जरूर कीजिए। बहुत-बहुत धन्यवाद।

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