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सऊदी में मिला 1400 साल पुराना पत्थर जिसने पूरी दुनिया में तहलका मचा दिया है

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दोस्तों पिछले कुछ दिनों से लगातार आप लोग हर जगह पर एक पत्थर के बारे में काफी सुन रहे होंगे कि जो पत्थर लगभग 1350 से 1400 साल पुराना है और सऊदी अरबिया में एक बहुत ही अहम रिसर्च के दौरान मिला है। मीडिया हो या फिर सोशल मीडिया हो हर जगह पर पिछले कुछ दिनों से इसी पत्थर की चर्चाएं नजर आ रही हैं।

सऊदी अरेबिया फाउंड अ रॉक इं्रिप्शन बेरिंग ह नेम इन मदीना। और इतनी ज्यादा चर्चाओं को देखने के बाद आप लोगों के दिमाग में भी यह सवाल जरूर आया होगा कि आखिर इस पत्थर का मतलब क्या है? इसका मुसलमानों के दूसरे खलीफा हजरत उमर फारूकी आजम से क्या कनेक्शन है? इसमें ऐसी भी क्या खास बात है कि जिसकी वजह से इसकी इतनी ज्यादा चर्चाएं हो रही हैं? और साथ ही साथ सवाल यह भी कि जब से यह पत्थर मिला है तब से बहुत सारे लोग सोशल मीडिया पर इस तरह की चीजें क्यों लिख रहे हैं कि इस पत्थर के मिल जाने के बाद से इस्लाम ने एक बार फिर से अपने सच्चे होने का इस दुनिया को प्रूफ दे दिया है।

तो दोस्तों इन सारी ही चीजों को बारी-बारी से आसान जबान में समझने की कोशिश करते हैं। आरएच नेटवर्क के नॉलेजेबल फ्रेंड्स, पिछले कुछ सालों में यह देखा गया है कि जब से सऊदी अरबिया ने यह विज़न 2030 का ऐलान किया है, तब से जहां एक तरफ बड़ी तेजी के साथ वहां पर टेक्निकल एडवांसमेंट हो रही है। बाकी प्रोजेक्ट्स के ऊपर काम चल रहा है, तो वहीं इतिहास से जुड़ी हुई चीजों पर भी बड़े लेवल पर काम किया जा रहा है। उनकी पुरानी से जो पुरानी जगह हैं उनको रिस्टोर किया जा रहा है।

इसके अलावा सऊदी अरबिया के इतिहास से जुड़ी हुई नई-नई चीजों की खोजें करने की कोशिश की जा रही है। क्योंकि जाहिर है कोई भी ऐसा इलाका कि जिसकी हिस्ट्री बहुत ज्यादा रिच होती है। मतलब जिसका इतिहास बहुत ज्यादा पुराना और गहरा होता है। वो लोगों को अपनी तरफ ज्यादा अट्रैक्ट करता है। इसीलिए सऊदी अरबिया पिछले कुछ सालों से बड़ी ही शिद्दत के साथ यह कोशिशें कर रहा है कि वो अपने इतिहास से जुड़ी हुई ज्यादा से ज्यादा चीजों को खोज निकाले और फिर लोगों को उनको देखने के लिए सऊदी अरबिया तक खींच कर लेकर आए।

तो इसी तरह की ही बहुत सारी कोशिशों में से एक कोशिश हाल ही के दिनों में भी की गई थी कि जब सऊदी हेरिटेज कमीशन ने जो मुकद्दस सरजमी है मतलब कि मदीना उसके आसपास के इलाके में मौजूद अल महद के इलाके में बड़े लेवल पर सर्वे किया था। ये सर्वे दो अलग-अलग चरणों में मतलब दो अलग-अलग सीजन में किया गया था। और इस पूरे सर्वे के जरिए से फिर इन लोगों ने लगभग 1774 के करीब डिस्कवरीज की मतलब कि खोजें की। अब वैसे तो डिस्कवरीज का यह नंबर काफी बड़ा है और यह जितनी भी 1774 के करीब डिस्कवरीज हैं, इनमें से हर हर चीज अपने आप में एक अलग अहमियत भी रखती है।

मगर फिर भी यह देखा गया कि मीडिया और सोशल मीडिया पर इन 1774 में से जिस एक चीज की सबसे ज्यादा चर्चा हुई वो दरअसल एक पत्थर है कि जिसके ऊपर अरबी में लिखा हुआ है। जी हां, आप इसको एक रॉक इं्रिप्शन कह सकते हैं। मतलब पत्थर की एक ऐसी तख्ती कि जिसके ऊपर लिखा हुआ है और ये जो रॉक इं्रिप्शन होते हैं ये आए दिन वैसे दुनिया के ऐसे बहुत सारे इलाकों से निकलते रहते हैं कि जिन खास इलाकों का इतिहास थोड़ा बहुत नहीं बल्कि हजारों साल पुराना है। अब अगर खासतौर से बात करें सऊदी अरबिया में मिलने वाले रॉक इंस्क्रिप्शन की कि जिसके बारे में एक्सपर्ट्स ने यह दावा किया है कि यह लगभग 1300 से 1400 साल पुरानी है। तो इसके ऊपर जो चीज अरबिक जबान में लिखी हुई है वह यह है कि अल्लाह मुहाफिज़ है उमर इब्न खत्ताब का इस दुनिया में और आखिरत में। इसके अलावा इसमें नीचे ला इलाहा इल्लल्लाह भी लिखा हुआ है। जिसका मतलब है नहीं है कोई माबूद सिवाय अल्लाह के। अब मदीना के आसपास का वो इलाका कि जिसको लेकर हमेशा से यह माना जाता रहा है कि यह शुरुआती मुस्लिम दौर में बहुत अहम इलाका हुआ करता था।

वहां से इस तरह की एक तख्ती का निकलना और उसके ऊपर यह लिखा होना हम लोगों को काफी कुछ बताता है। खासतौर से यह बताता है कि उस दौर में इस इलाके में रहने वाले लोगों की हजरत उमर को लेकर क्या थिंकिंग थी। वही हजरत उमर कि जो किसी दौर में तो इस्लाम के सबसे बड़े दुश्मन हुआ करते थे। मगर उन्होंने फिर ना सिर्फ खुद इस्लाम को अपनाया बल्कि इस्लाम के सबसे बड़े मुहाफिज भी बन गए।

दूसरे खलीफा बने ना सिर्फ दूसरे खलीफा बल्कि इतिहास के सबसे कामयाब हुक्मरानों में से एक कि जिन्होंने दुनिया की सबसे ताकतवर गद्दी पर बैठने के बावजूद भी ना सिर्फ हद से ज्यादा सादा जिंदगी गुजारी बल्कि इंसाफ भी इस तरह से कायम किया [संगीत] कि जिसकी मिसाल दूर-दूर तक नजर नहीं आती। और मिलिट्री के मामलात में तो बात ही ना कीजिए क्योंकि वो रोमन और पर्शियन एंपायर कि जिनको हजारों सालों तक कोई भी थर्ड पार्टी चैलेंज नहीं किया करती थी उन दोनों को चंद सालों के अंदर मिट्टी में मिलाकर रख दिया। अब जैसा कि दोस्तों, हमने आपको पहले ही बताया कि यह सिर्फ इकलौती पत्थर की तख्ती ही नहीं मिली है बल्कि इन सर्वेज़ में लगभग 1774 के करीब डिस्कवरीज हुई हैं। और जाहिर है इस तरह के जो रॉक इं्रिप्शंस हैं, जो पत्थर की तख्तियां हैं वो भी कई हैं और उन पर अलग-अलग तरह की चीजें लिखी हुई हैं।

किसी के ऊपर ला इलाहा इल्लल्लाह मोहम्मद रसूल्लाह मतलब नहीं है। कोई माबूद सिवाय अल्लाह के मोहम्मद सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम उसके रसूल हैं। लिखा हुआ है। तो किसी के ऊपर पुराने दौर की कोई शायरी लिखी है तो किसी के ऊपर कुछ और चीज लिखी है और यह सारी ही चीजें एक्सपर्ट्स को उस दौर के बारे में गहराई से ना सिर्फ बहुत सारी चीजें समझने में मदद दे रही हैं बल्कि मुमकिन है कि जब इनके ऊपर और छानबीन की जाएगी तो ये और भी ज्यादा इंफॉर्मेशन लेकर आएंगी। अब यह जो 1750 से भी ज्यादा डिस्कवरीज हैं, इनमें अलग-अलग तरह की चीजें हैं। मतलब कुछ कुएं भी मिले हैं। इसके अलावा कुछ पत्थर के स्ट्रक्चर मिले हैं। तीन के करीब महल या फिर इस तरह की बिल्डिंग्स मिली हैं। कुछ कारवा रूट्स मिले हैं। मतलब रास्ते मिले हैं। 173 के करीब नई आर्कियोलॉजिकल साइट्स मिली हैं। मतलब ऐसी साइट्स कि जो अभी तक अननोन थी। तो जाहिर है अब इनके ऊपर रिसर्च की जाएगी तो यहां से न जाने क्या-क्या हाथ लगेगा।

इसके अलावा 1200 से ज्यादा रॉक आर्ट ड्राइंग्स हैं। 461 के करीब इस्लामिक इं्रिप्शंस बताए जा रहे हैं। वैसे यहां पर गौर करने वाली बात यह भी है कि यह कोई पहला मौका नहीं है कि जब सऊदी अरबिया के अंदर इस्लामिक इतिहास से जुड़ी हुई इस तरह की कोई अहम चीज मिली हो। बल्कि जब भी रॉक इं्रिप्शन का जिक्र होता है तो सबसे पहले तो जुहेर इं्रिप्शन को याद किया जाता है। यह मुस्लिम इतिहास से जुड़ी हुई अभी तक की खोजी गई सबसे अहम रॉक इं्रिप्शन के तौर पर देखी जाती है। इसको 1999 में खोजा गया था और यह सऊदी अरबिया के मदाइन साले नाम का जो इलाका है उसके आसपास में मिली थी।

इंटरेस्टिंग बात यह है कि अभी तक खोजी जाने वाली तमाम रॉक इं्रिप्शंस में सबसे अहम समझी जाने वाली यह जो रॉक इं्रिप्शन है यह भी हजरत उमर के दौर के ही आसपास की है क्योंकि इसके ऊपर लिखा हुआ है बिस्मिल्लाह और फिर लिखा हुआ है कि मैं ज़हैर इसको तब लिख रहा हूं कि जब उमर की हुई थी साल 24। अब यहां पर उमर का मतलब दूसरे खलीफा हजरत उमर फारूक आजम है। जबकि जो साल 24 लिखा हुआ है उसका मतलब है 24 हिजरी। जिसको अगर हम ईवी में ट्रांसफर करें तो लगभग 644 ईसवी बनती है। अब आखिर में बारी आती है उस पैट्रा थ्योरी की कि जिसका जिक्र आप लोग इस टॉपिक पर लिखी गई किसी भी पोस्ट या वीडियो के अंदर नहीं देख रहे होंगे।

यह जो पैट्रा शहर से जुड़ी हुई एक कंट्रोवर्शियल थ्योरी है इसके बारे में आप में से शायद बहुत सारे लोगों ने पहले सुना भी होगा। जिन्होंने नहीं सुना है तो उनको बता दें कि कई साल पहले कनाडा के एक इंसान डेन गिबसन ने एक नई थ्योरी दी की जिस थ्योरी के मुताबिक उसका यह दावा था कि जब इस्लाम शुरू हुआ था जब बिल्कुल शुरुआती दिन थे तो मुसलमानों का जो असली क़बला था वो दरअसल मक्का शहर के अंदर नहीं बल्कि पेट्रा के अंदर था। वही पेट्रा कि जो आज जॉर्डन देश के अंदर मौजूद है और जिसको देखने या फिर वहां पर घूमने के लिए हजारों लाखों की तादाद में लोग पहुंचते रहते हैं।

इस इंसान ने यह भी दावा किया था कि सिर्फ क़िबला ही नहीं बल्कि नबी अल सलाम का जन्म भी मक्का शहर की बजाय पैट्रा के अंदर हुआ था और इस्लाम की शुरुआत भी इसी शहर से हुई थी। मगर फिर कुछ दहाइयों के बाद जब मुस्लिम दुनिया में सिविल वॉर का आगाज हुआ। सल्तनत बनू उमैया और अब्दुल्ला इब्न जुबैर के बीच जंग का आगाज हुआ तो अब्दुल्ला इब्न जुबैर ने यह जो क़िबला था इसको पैट्रा से खत्म करके मक्का के इलाके में बना दिया। यहीं पर हजरे असद को लाकर लगा दिया और बाद में जब सल्तनत बनो उमैया खत्म भी हो गई। अब्बासी सल्तनत कायम हो गई तो उन्होंने अब्दुल्ला इब्न जुबैर वाले इसी क़िबले को मतलब मक्का वाले इलाके को मशहूर कर दिया।

धीरे-धीरे पैट्रा वाले क़बले से जुड़ी हुई जो निशानियां थी उनको भी मिटा दिया गया ताकि फ्यूचर में किसी को पता ना चल सके। इवन इस इंसान के दावे के मुताबिक कुरान में तक बदलाव कर दिया गया। तो अब साथियों वैसे तो डेन गिबसन की ये एक ऐसी थ्योरी थी कि जिसको मुसलमान तो छोड़िए बल्कि वेस्टर्न वर्ल्ड के जो सेकुलर या फिर एथिस्ट लोग थे उन्होंने भी सीरियसली नहीं लिया था। लेकिन फिर भी यह एक थ्योरी तो थी एक ऐसी थ्योरी कि जो आज भी वजूद रखती है बल्कि आए दिन बहुत सारी वीडियोस बहुत सारे पॉडकास्ट या फिर बहुत सारी डिबेट्स के अंदर जो इस्लाम मुखालिफ ग्रुप होते हैं उनकी तरफ से इस थ्योरी को पेश भी किया जाता है।

तो अब आखिर में कहने का मतलब यह है कि अगर वाकई सल्तनत बनू उमैया और अब्दुल्ला इब्न जुबैर के दौर में क़बले को पेट्रा से मक्का की तरफ ट्रांसफर कर दिया गया था तो फिर इन तमाम तख्तियों का इन तमाम सबूतों का क्या मतलब है कि जो उस दौर के हैं और मदीना के इलाके से निकल रहे हैं। जबकि हम सभी जानते हैं कि मदीना ही उस दौर में मुस्लिम खिलाफत की राजधानी हुआ करती थी।

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