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क्यों इस एक्ट्रेस ने दिलीप कुमार के चहेरे पर मारी थी लात? वजह जानकर रोंगटे खड़े हो जाएंगे।

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तू मेरा चांद मैं तेरी चांदनी मैं यह मौसम और यह तनहाई ज़रा दम भर तो आ जाओ जरा दम भर वो फिल्मी सितारा जिसने अपनी छोटी उम्र से ही चमकना शुरू कर दिया था मुरली वाले मुरली बजा सुन सुन मुरली को नाच दिया फिल्म जगत की वो हस्ती जो अपनी सुरीली आवाज और खूबसूरती के लिए जानी जाती थी दिल नाचे छमम छमम छमम पम तारम पम एक ऐसी अदाकारा जो भारतीय सिनेमा की पहली सुपरस्टार बनी।

जिसने लंबे समय तक लोगों के दिलों पर राज किया लूटा है जिसने ने तुझको वो दीवाना कौन है लेकिन क्या आप जानते हैं भारत सरकार ने उन्हें उनकी फिल्मों की स्क्रीनिंग के लिए रूस भेजा था और अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया दुनिया क्या जाने मेरा फसाना क्यों गाए दिल क्या आप सोच सकते हैं कि इन्होंने अपने जमाने के सुपरस्टार दिलीप कुमार को शूटिंग के दौरान लात मार दिया था और फिर कभी उनके साथ काम नहीं किया मैं तेरी तू मेरा बालम तेरी मेरी जीत है क्या आप यकीन करेंगे कि फिल्म जगत की एक कामयाब अभिनेत्री अपने निजी जीवन में अपने प्यार को पाने में नाकामयाब रही और आजीवन शादी नहीं की हम तेरी मोहब्बत की कसम खाए हुए हैं कौन थी यह अदाकारा कैसे इनके जीवन में दखल देकर पारिवारिक लोगों ने उन्हें बर्बाद कर दिया।

कौन था वो फिल्मी सितारा जिसको यह बेइंतहा चाहती थी और क्यों नहीं की इस अदाकारा ने शादी जानेंगे और भी बहुत कुछ बस बने रहिए हमारे साथ दोस्तों नमस्कार आप देख रहे हैं ड्रामा सीरीज भारत और मैं हूं कविता आज हम अपने इस वीडियो में जिनके बारे में चर्चा करने जा रहे हैं वो हैं अपने जमाने की मशहूर अदाकारा सुरैया जो तेरा हो चुका है वो मस्ताना कौन है सुरैया का जन्म 15 जून 1929 को लाहौर पाकिस्तान में हुआ था।

इनके पिता का नाम अजीज जमाल शेख और माता का नाम मुमताज शेख था यह अपने माता-पिता की इकलौती संतान थी उनके पिता गुजरावला में एक छोटी सी फर्नीचर की दुकान चलाते थे और बाद में वह अपने परिवार के साथ लाहौर आकर रहने लगे थे यही कारण है कि उन्हें अधिकतर लोग लाहौर का ही मूल निवासी मानते थे कुछ सालों बाद सुरैया की मां उन्हें पिता की इच्छा के विरुद्ध अपने भाई के पास मुंबई ले आई थी यहां इनके मामा जहूर हिंदी फिल्मों में खलनायक की भूमिका निभाया करते थे मुंबई में रहते हुए उन्होंने अपनी शुरुआती शिक्षा न्यू हाई स्कूल से प्राप्त की थी जिसे जेबी पेटिट हाई स्कूल फॉर गर्ल्स के नाम से जानते हैं हालांकि उन्हें साथ-साथ घर पर फारसी भाषा में धार्मिक शिक्षा दी गई सुरैया ने गायन या अभिनय में कोई अलग से प्रशिक्षण प्राप्त नहीं किया था फिर भी वह भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में बड़ा नाम बनाने में कामयाब रही उनकी आवाज बचपन से ही बहुत सुरीली थी इसलिए मुंबई आने पर वह छ साल की छोटी उम्र में ही रेडियो मुंबई में बच्चों के लिए होने वाले कार्यक्रमों में गाने लगी थी।

सुरैया के बचपन के दोस्तों में राज कपूर और मदन मोहन शामिल हुआ करते थे मैं तेरा राग तू मेरी रागनी सुरैया का फिल्मों में आने से पहले रेडियो स्टेशन पर काम करते हुए गीत और संगीत से वास्ता पड़ने लगा था जैसे ही संगीत निर्देशक नौशाद अली ने सुरैया की आवाज सुनी उन्होंने 13 साल की उम्र में अब्दुल रशीद करदार की फिल्म शारदा में गाने के लिए चुना वह सुरैया के मेंटर बन गए बाल गायक के रूप में सुरैया का पहला गीत नौशाद द्वारा रचित साल 1942 की फिल्म नई दुनिया में बूट करूं मैं पॉलिश बाबू था वोट करो ना पाए बाबू वोट करो ना पाए।

सुरैया ने साल 1936 में जदन बाई द्वारा निर्देशित फिल्म मैडम फैशन और साल 1937 में बनी फिल्म उसने क्या सोचा से एक बाल कलाकार के रूप में फिल्मी करियर की शुरुआत की थी 1941 में एक दिन शूटिंग देखने के लिए अपने मामा के साथ मोहन स्टूडियो गई वहां नानू भाई वकील द्वारा निर्देशित फिल्म ताजमहल की शूटिंग चल रही थी नानू भाई वकील ने जब उन्हें देखा तो उनको अपनी फिल्म में अभिनय करने का ऑफर दिया जिसके बाद उन्होंने मुमताज महल की बचपन की भूमिका निभाई 1942 में इनकी तीन फिल्में रिलीज हुई जिनमें फिल्म नई दुनिया स्टेशन मास्टर और शारदा थी स्टेशन मास्टर फिल्म में सुरैया ने गानों के साथ-साथ अभिनय भी किया था गाना सिखाया था।

उसकी पहली लाइन क्या है माधव घराएं हां मोहन घराए इसके बाद के वर्षों में उन्होंने कुछ धमाकेदार हिट फिल्में दी लेकिन परवाना फिल्म के चार गाए गीतों ने उन्हें रातोंरात स्टार बना दिया आजा बाल मारे ना तेरी डर लागे आजा बाल मारे ना तेरी डर लागे इन गीतों के संगीतकार ख्वाजा खुर्शीद अनवर उनके पसंदीदा संगीत निर्देशक थे लेकिन उन्होंने 1943 से 1949 तक उनके लिए केवल 13 गाने गाए थे एक कलाकार के रूप में उन्होंने साल 1942 की फिल्म तमन्ना और 1943 की फिल्म हमारी बात में अभिनय किया और गाया भी बॉम्बे टॉकीज प्रोडक्शन कंपनी की प्रमुख देविका रानी ने उनकी प्रतिभा को देख उन्हें एक गायिका और अभिनेत्री के रूप में 5 साल के अनुबंध पर साइन किया।

साल 1943 में बनी देविका रानी की फिल्म हमारी बात में उन्होंने एक युगल नृत्य किया और अरुण कुमार के साथ उनका गाना बिस्तर बिछा दिया है तेरे घर के सामने बहुत लोकप्रिय हुआ घर के सामने घर हमने ले लिया है तेरे घर के सामने साल 1945 में सुरैया की पांच फिल्में आई जो थी यतीम तब्दीलर सम्राट चंद्रगुप्त फूल और मैं क्या करूं के आसिफ के फिल्म फुल में सुरैया ने शमा के किरदार में पृथ्वीराज कपूर की बहन की भूमिका निभाई फिल्म में पृथ्वीराज कपूर नायक के रूप में थे उन्होंने के एल सहगल की सिफारिश पर फिल्म तब्दीलर में एक नायिका की भूमिका निभाई जिसे जयंत देसाई की साल 1945 की फिल्म सम्राट चंद्रगुप्त के एक गाने के रिहर्सल के दौरान उनकी आवाज पसंद आई थी जिसमें वह अभिनय कर रही थी वह साल 1946 की फिल्म उमर खयाम और परवाना में के एल सहगल के साथ सह कलाकार बनी हालांकि तब तक उनकी कुछ फिल्मों के गाने हिट हो चुके थे।

पीछे क्यों हट रहे हैं आप मेरी तरफ देखिए देख तो रहा हूं आपने तुम्हारा चेहरा उन्होंने साल 1946 में महबूब खान की फिल्म अनमोल घड़ी में नूरजहां के साथ मुख्य अभिनेत्री और साल 1947 की फिल्म दर्द में मुनववर सुल्तान के साथ अभिनय किया चले दिल की दुनिया जो बर्बाद करके बहुत रोएंगे साल 1948 में आई फिल्म प्यार की जीत रिलीज हुई तेरे नैनों ने चोरी किया मेरा छोटा सा जिया परदेिया इस फिल्म की सफलता के बाद उस दौर में सुरैया के प्रति लोगों की दीवानगी का आलम कुछ ऐसा था कि सुरैया के घर के बाहर उनकी झलक देखने के लिए बहुत भीड़ जमा हो जाती थी उस भीड़ को कंट्रोल करने के लिए पुलिस इंस्पेक्टर और चार कांस्टेबल को तैनात करना पड़ता था नैनों में प्रीत है होठों पे गीत है सुरैया ने इसी साल की फिल्म गजरे में भी काम किया था साल 1949 में आई फिल्म बड़ी बहन के प्रीमियम के दौरान सिनेमा हॉल के बाहर बहुत बड़ी भीड़ थी और जब सुरैया हॉल में चल रही थी तो पुलिस को लाठी चार्ज करना पड़ा था।

लोग उनके कपड़े तक खींचने लगे थे जिसके बाद सुरैया ने अपने फिल्मों के प्रीमियर में जाना बंद कर दिया वो पास रहे या दूर रहे नजरों में समाए रहते हैं वो इसी साल देव आनंद की फिल्म विद्या में उनके साथ रोमांटिक भूमिका में दिखाई दी और अगले कई सालों तक उन्होंने देव आनंद के साथ काम किया था इसके बाद उन दोनों को एक साथ सात फिल्मों में देखा गया था और वह फिल्में हैं 1948 की फिल्म विद्या 1949 की फिल्म जीत और शायर 1950 की फिल्म अफसर और फिल्म नीली 1951 की फिल्म दो सितारे और सनम मैं कह दूं तुमको चोर तो बोलो तो बोलो क्या करोगे तो बोलो क्या करोगे 40 के दशक के अंत से लेकर 1950 के दशक के प्रारंभ तक सुरैया भारतीय सिनेमा की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली और सबसे लोकप्रिय सुपरस्टार थ

लाई खुशी की दुनिया हंसती हुई जवानी साल 1954 में रिलीज फिल्म मिर्जा गालिब में उन्होंने ऐसा दमदार अभिनय किया कि उन्हें अभिनय की दुनिया में सर्वश्रेष्ठ कहा जाने लगा तुझे हुआ क्या है इस फिल्म को सरकार से साल 1954 का सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला फिल्म में सुरैया ने गालिब के प्रेमी अभिनेत्री और एक गायिका के रूप में चमक बिखेरी थी तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने फिल्म देखने के बाद सुरैया के लिए कहा तुमने मिर्जा गालिब के रूह को जिंदा कर दिया संगीतकार गुलाम मोहम्मद ने राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्म मिर्जा गालिब के लिए संगीत दिया था जिसमें उन्होंने मिर्जा गालिब के यादगार गाने गाए नुक्ता जी है गम दिल उसको सुनाए ना बने मिर्जा गालिब के बाद उन्होंने साल 1954 की फिल्म बिल्व मंगल वारिस और शमा परवाना साल 1955 की फिल्म कंचन साल 1956 की फिल्म मिस्टर लंबू साल 1958 की फिल्म ट्रॉली ड्राइवर मालिक और मिस 1958 साल 1961 61 की फिल्म शमा जैसी बहुत सी फिल्मों में अभिनय किया मस्त आंखों में शरारत कभी ऐसी तो ना थी उन्होंने फिल्म शमा परवाना में उस वक्त के नए हीरो शमी कपूर के साथ भी काम किया था बेकरार है कोई 50 के दशक के मध्य में सुरया ने एक बार लता मंगेशकर से कहा था कि वह जल्द ही फिल्मों में काम करना बंद कर रही हैं लता ने उन्हें ऐसा करने के लिए मना करा उन्होंने अपने फिल्मी करियर में लगभग 150 से ज्यादा फिल्मों में काम किया था।

जबकि 48 फिल्मों में अपनी मखमली आवाज का जादू बिखेरा था सोचा तेरे प्यार की दुनिया कभी आबाद ना हो दिल तो रोता हो मगर होठों पे फरियाद ना हो साल 1963 की फिल्म रुस्तन सोहरा उनकी आखिरी फिल्म थी कैसी अजब दास्ता हो गई है छुपाते छुपाते उन्होंने अपने जीवन में फिल्म निर्माता नजीर के साथ मिलकर फिल्म भी प्रोड्यूस की थी जो साल 1964 की रिलीज फिल्म शगुन नाम से थी पर्वतों के पेड़ों पर शाम का बसेरा सुरैया ने एक इंटरव्यू में बताया था कि वह लो ब्लड प्रेशर के कारण फिल्म की शूटिंग ठीक से नहीं कर पा रही हैं जो उनके फिल्मों को छोड़ने का कारण भी कहा जाता है सुरैया जी के बारे में एक किस्सा यह भी मशहूर है कि 50 के दशक की शुरुआत में दिलीप कुमार के साथ बन रही के आसिफ की फिल्म जानवर को उन्होंने अधूरा छोड़ दिया था बताया जाता है कि फिल्म के एक सीन में उन्हें पैर में सांप के काटने पर दिलीप कुमार को मुंह से चूसकर जहर निकालना था इस सीन की जब लगातार चार दिन तक शूटिंग होती रही और के आसिफ और दिलीप कुमार के खराब बर्ताव के कारण उन्होंने फिल्म में काम करने से मना कर दिया था बेशर्म दूसरों की इज्जत लूटते हैं दूसरों की शर्मो हया से खेलते हैं एक दिन उनके हाथों में अपनी बहन का घूंघट भी आ सकता है।

उनकी दो अन्य फिल्में भी अधूरी रह गई थी जिनमें से एक फिल्म पागलखाना थी यह भी 50 के दशक के शुरुआती समय की थी जिसमें मुख्य अभिनेता के रूप में भारत भूषण थे जिसे निर्माता निर्देशक पीएल संतोषी ने आठ रीलों को शूट करने के बाद बंद कर दिया था दूसरी फिल्म वाजिद अली शाह का अंग्रेजी संस्करण था जिसमें 1953 में सुरैया और अशोक कुमार ने अभिनय किया था जिसे ब्रिटिश फिल्म निर्देशक हरबर्ट मार्शल द्वारा फिल्माया गया था कुछ समय के बाद इस फिल्म को भी ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था।

अगर सुरैया के पर्सनल जीवन की बात की जाए तो देव आनंद के लिए उनका प्यार इतना अधिक था कि वह अपने फिल्मी करियर को छोड़ने के लिए तैयार थी सुरैया और देव आनंद के साथ काम करने वाली अभिनेत्री कामिनी कौशल ने जनवरी 2014 में फिल्म फेयर को दिए एक साक्षात्कार में कहा कि जब उनकी नानी ने उन पर नजर रखनी शुरू की तब सुरैया अपने पत्रों को देव आनंद तक पहुंचाने के लिए उनके पास भेजा करती थी साल 1950 में आई फिल्म नीली की शूटिंग के दौरान सुरैया से देव आनंद ने शादी के बारे में अंतिम निर्णय पूछा त सुरैया ने देव आनंद से कहा वह नहीं चाहती वह उनकी मौत का कारण बने क्योंकि उनकी नानी और मामा दोनों शादी के खिलाफ थे उन्होंने देव आनंद को मारने की धमकी दे रखी थी।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक देव आनंद ने उन्हें एक बार ₹000 की हीरे जड़ी अंगूठी दी थी परंतु जब उनकी नानी को इसके बारे में पता चला तो बहुत क्रोधित हुई और अंगूठी को समुद्र में फेंक दिया एक इंटरव्यू में देव आनंद ने इस बात का खुलासा किया था देव साहब के मुताबिक सुरैया ने खुशी-खुशी उनकी अंगूठी स्वीकार भी कर ली थी ऐसा कहा जाता है कि सुरैया के माता-पिता चाहते थे कि उनकी शादी देव आनंद से हो मगर उनकी नानी ने सुरैया और देव आनंद को एक साथ फिल्मों में काम करने पर रोक लगा दी थी इसके बाद सुरैया ने अपने प्यार के खातिर शादी नहीं की तमन्नाएं हमारी यूं तड़प के छोड़ जाएगा जून 1972 में एक साक्षात्कार में सुरैया ने बताया था कि उनमें अपने परिवार का विरोध करने का असाहस नहीं था और देव आनंद वास्तव में उनसे प्यार करते थे वह चाहते थे कि वह सिविल कोर्ट में उनसे शादी करें सुरैया ने अपने संप्रदाय के कुछ फिल्म निर्देशकों और व्यवसायियों से शादी करने के लिए अपने परिवार के प्रयासों के बावजूद किसी से भी शादी करने से इंकार कर दिया था फिल्म निर्देशक एम सादिक जो एक विवाहित व्यक्ति थे और अभिनेता रहमान कुछ फिल्मी व्यक्ति थे जो सुरैया से शादी करने के इच्छुक थे मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस शादी को रोकने में अभिनेता दिलीप कुमार और संगीतकार नौशाद आदि ने भी अहम भूमिका निभाई थी देव आनंद ने अपनी आत्मकथा में बताया है सुरैया उनका पहला सच्चा प्यार थी।

जब 2004 में सुरैया की मृत्यु हुई तो देव आनंद मीडिया से दूर रहे और अपनी छत पर चले गए देव आनंद के लिए सुरैया का प्यार 1996 में भी उतना ही गहरा था जब इस अदाकारा को लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड लेने के लिए बुलाया गया था खबरों की माने तो उन्हें यह कहकर बुलाया गया था कि देव आनंद भी अवार्ड फंक्शन में भाग लेंगे और उनके ना आने पर सुरया बहुत निराश हुई वो उस महिला रिपोर्टर पर गुस्सा भी हुई जिसने उनसे झूठ बोला था इस समारोह में सुरैया को स्क्रीन लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया गया था सुरैया की नानी बादशाह बेगम जिन्होंने उनके करियर और यहां तक कि उनके निजी जीवन में हमेशा दखल दिया था बाद में अपने भाई और उनके बेटे के साथ रहने के लिए पाकिस्तान चली गई और सुरैया अपनी मां मुमताज बेगम के साथ अकेली रह गई अपनी मां के साथ बिताया समय उनके लिए खुशी का साल था।

जब उनकी मां उनकी दैनिक जरूरतों का ध्यान रखती थी और वह कभी-कभी उनके कुछ बचपन के दोस्त जैसे निम्मी निरूपा रॉय और तबसस्सुम थे जिनसे वह कभी-कभी मिला करती थी 1987 में अपनी मां की मृत्यु के बाद सुरैया मुंबई में कृष्णा महल मरीन ड्राइव में अश्विन शाह से किराए पर लिए गए अपार्टमेंट में अकेली हो गई जहां वह 1940 के दशक की शुरुआत से रह रही थी उनके पास वरली मुंबई में कई अपार्टमेंट्स और पुणे के पास लोनावला में भी संपत्ति थी वह अपने जीवन में ज्यादातर समय अकेले ही रहती थी 31 जनवरी 2004 को मुंबई के हरकिशन दास अस्पताल में 75 वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु हो गई एक सप्ताह पहले उन्हें विभिन्न बीमारियों से पीड़ित होने के बाद वहां भर्ती कराया गया था उनसे मिलने अस्पताल में सुनील दत्त नौशाद और प्रताप एराना आते थे अभिनेता धर्मेंद्र जो उनके जबरदस्त फैन थे वह भी उनके अंतिम संस्कार में शामिल हुए उन्हें मरीन लाइंस मुंबई में बड़ा कब्रिस्तान में दफनाया गया था।

उनके वकील हेमांत ठक्कर एक पारिवारिक मित्र और मार्गदर्शक थे जिनके साथ उनके बहुत करीबी पारिवारिक संबंध थे अपने जीवन के अंतिम छ महीनों के दौरान सुरैया ठक्कर परिवार के साथ रही जिन्होंने बीमार होने पर उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया सुरैया की मृत्यु के बाद उनकी संपत्ति को लेकर कानूनी विवाद छिड़ गया क्योंकि उन्होंने कोई स्पष्ट वसीयत नहीं छोड़ी थी जबकि मरीन ड्राइव के घर पर उनके वकील ठक्कर और दुबई में उनके पाकिस्तानी चचेरे भाई महफूज अहमद जो उनके मामा एम ज़हूर के बेटे थे उनके द्वारा दावा किया गया था 30 अप्रैल 2003 को दादासाब फाल्के अकादमी और स्क्रीन वर्ल्ड पब्लिकेशन द्वारा दादासाब फाल्के की 134वीं जयंती पर विशेष समारोह में सुरैया को सम्मानित और स्मृति चिन्ह प्रदान किया गया 3 मई 2013 को भारतीय सिनेमा के 100 वर्ष पूरे होने पर उन्हें सम्मानित करने के लिए भारत सरकार ने उनकी छवि वाला एक डाक टिकट जारी किया था और इस समारोह के दौरान सुरैया को बेस्ट ऑन स्क्रीन ब्यूटी विद द मोस्ट एथनिक लुक के रूप में वोट दिया गया था।

सुरैया की कमी हमेशा बहुत खलेगी भले ही वह दर्शकों तक अकेली रही थी श्रेया की गीत उन्हें श्रद्धांजलि के रूप में हर साल उनकी जयंती 15 जून और पुण्यतिथि 31 जनवरी को रेडियो सिलोन द्वारा बजाए जाते हैं तो दोस्तों कैसी लगी।

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