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अहमदाबाद प्लेन हादसे के बाद इस परिवार को रोज आता है पाकिस्तान से कॉल,वजह जान रूह कांप जाएगी।

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कैसे हो आप? ठीक हो? लंदन से आने वाली यह आवाज पिछले एक साल से गुजरात के गांव में हर दिन सुनाई देती है। यह आवाज है मूल रूप से पाकिस्तान की उमर अली की। वो कमलेश के साथ काम करते थे।

कमलेश सावधान भाई चौधरी और रतनी बहन के बेटे थे। थे इसलिए क्योंकि 12 जून 2025 को यानीठीक 1 साल पहले एयर इंडिया का अहमदाबाद गैट्विक बोइंग 787 ड्रीम लाइनर उड़ान भरने के कुछ ही मिनट बाद हो गया था। विमान में 242 यात्री सवार थे। 241 की मौत हो गई थी। कमलेश और उनकी पत्नी थापू बेन भी में थे। सावधान भाई 48 साल के किसान हैं। गुजरात के बनास कांठा जिले के थावर गांव में पत्नी रतनी बैन के साथ रहते हैं।

हादसे के बाद दुख में डूबे पति-पत्नी को दिन रात मानो काटने को दौड़ते थे। उसी दौरान फोन आया उमर अली का। 40 साल की उम्र कमलेश के साथ लंदन में एक फैंसी गुड्स की दुकान में काम करते थे।

अब हर दिन काम पर जाते हुए उमर सावधान भाई को फोन करते। कभी मौसम की बातें करते। कभी सावधान भाई के नाखून में हुए इनफेक्शन की और कभी दोपहर के खाने में खाए गवार की फली की। उमर पूछते गवार यह क्या होता है? कैसा दिखता है?

कभी बात उमर के क्लीन शेफ लुक तक पहुंच जाती। एक दिन भी ऐसा नहीं जाता जब कॉल या मैसेज पर बात ना हो। सावधान भाई बताते हैं मेरे नाखून में जरा सा भी दर्द हो तो मर पूछ लेता है। उसके घर में कोई बीमार हो जाए, बुखार भी हो तो हमें खबर हो जाती है। हां जी भाई कैसे हो आप? ठीक हो? अब आपकी कैसी तबीयत है? दर्द का आराम आया है नाखून के दर्द का, पैर के दर्द का तो पता नहीं अब सो ना गए हो आप इसलिए मैंने आपको फोन नहीं किया।

तो और बाकी सब खैरियत है। अपना ख्याल रखना। अगर आप अकेले हुए हो तो मैसेज सुनेंगे तो मुझे जवाब दे दीजिएगा। ठीक है। ओके जी बाय। वहीं उमर कहते हैं मैं सावधान भाई से हमेशा कहता हूं कि हमारा रिश्ता खुदा ने बनाया है। कमलेश इस रिश्ते का जरिया बना। मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं इस परिवार के इतना करीब आ जाऊंगा। इनसे बात करके इन्हें तसल्ली देकर मेरे दिल को सुकून मिलता है। 6 महीने पहले तीन दिन एक्सप्रेस के रिपोर्टर ऋतू शर्मा ने थावर गांव में सावधान भाई से मुलाकात की थी।

उन्हें एक 30 सेकंड का वीडियो देखने को मिला था। यह वीडियो 12 जून को अहमदाबाद के सरदार वल्लभ भाई पटेल इंटरनेशनल एयरपोर्ट के बाहर शूट किया गया था। इस पर कमलेश और धापू बहन एंट्री गेट पर दिख रहे थे। कभी वीडियो ना बनाने वाले सावधान भाई ने उस दिन सिर्फ इसलिए रिकॉर्डिंग कर ली थी क्योंकि बहू पहली फ्लाइट में बैठी थी। उसकी पहली फ्लाइट थी। अहमदाबाद से लौटते हुए माता-पिता 100 कि.मी. से भी आगे निकल गए थे ।

जब हादसे की खबर आई। उन्होंने चमत्कार की उम्मीद करते हुए तुरंत कार अहमदाबाद की तरफ मोड़ ली। लेकिन उड़ान भरने के कुछ ही मिनट बाद विमान बीजे मेडिकल कॉलेज की मेस बिल्डिंग से टकराकर हो चुका था। कमलेश सितंबर 2022 से लंदन में रह रहे थे। 22 नवंबर 2024 को वह अपनी शादी के लिए बनासका आए थे। शादी के बाद वह वापस लंदन चले गए। कुछ महीने बाद वह फिर लौटे।

इस बार धापू को अपने साथ ले जाने के लिए। परिवार ने बताया कि कमलेश को 2 साल पहले वर्क वीजा मिला था। वो अगले 5 साल में छोटा सा बिजनेस शुरू करना चाहते थे। उनका मन था कि छोटे भाई हितेश को भी अपने साथ ले जाएं। 23 साल के हितेश बनासकांठा से एग्रीकल्चर बिजनेस मैनेजमेंट में मास्टर्स कर रहे हैं। इस साल 6 जनवरी को सावधान भाई ने अहमदाबाद का एक और सफर किया। वह अहमदाबाद के उस होटल पहुंचे जिसमें एयर इंडिया ने फैमिली रिटर्न्स सेंटर बनाया था। जहां उन 241 यात्रियों के परिवारों को उनके अपनों का बचा हुआ सामान लौटाना जाना था।

उस बड़े से कमरे में सावधान भाई छोटे से बच्चे की तरह रो पड़े थे। [संगीत] उनकी हथेलियों में कुछ पारदर्शी जिप लॉक बैग थे। एक बैग में उनके बेटे कमलेश का जला हुआ वेडिंग एल्बम था। एक दूसरे बैग में डेस्कटॉप कैलेंडर था। उस पर कमलेश और धापू बेन की तस्वीर थी। कैलेंडर पर लिखा था टू सोल्स विद अ सिंगल थॉट टू हार्ट्स दैट बीट एस वन। उसके 12 पन्नों पर दोनों की तस्वीरें थी। कुछ और बैग्स में उनके अधले पहचान पत्र थे। सावधान भाई कहते हैं कि बड़े बेटे और बहू की मौत के दिन उनकी जिंदगी खत्म हो गई थी। लेकिन इस कहानी का अगला हिस्सा भी बाकी था।

पिछले एक साल से सावधान भाई और रत्नी बहन की जिंदगी में एक इंतजार जुड़ गया है। दोपहर 3:00 बजे उमर का फोन आता है। उमर पहले रोज काम पर निकलते हुए लाहौर में अपने माता-पिता को फोन करते थे। फिर यह आदत बदल गई। अब उन्होंने उसी वक्त कमलेश के माता-पिता को फोन करना शुरू कर दिया। हेलो तुम कैसे हो? बस मैं एकदम ठीक हूं। आप कैसे हो? मैं भी ठीक हूं। शुक्र है। तो आज तो मैंने आपको ज्यादा पहले से भी उठा दिया ना। नहीं नहीं नहीं मैं वैसे भी उठा हुआ था। मैं उसे ज़ैनब को स्कूल छोड़ने की आवाज है। स्कूल छोड़ा उसे वापस घर जाने लगा था। हां। अच्छा अच्छा। शुरुआत में कॉल छोटी होती थी।

सावधान भाई हिंदी में बात करने की कोशिश करते। फिर बार-बार गुजराती में बोलने लगते मरधैर्य से सुनते रहते। एक पिता के दुख को समझने के लिए भाषा की जरूरत नहीं होती। हेलो [नाक से की जाने वाली आवाज़] जी मैं जो आपका कॉल आया था तो मैं उठा नहीं सका जो बिजी था मैं थोड़ा बाहर था तो फोन नहीं उठा सका। तो सॉरी यार ये सब फिर अब काफी देर हो गई है जो रात हो गई है तो फिर अभी मैं आपको यह मैसेज कर देता हूं अच्छा आप भी अभी बिजी होगे तो फिर यह मैसेज मैं कर लेता हूं कि सॉरी यार यह फोन आज मैं नहीं उठा सका बस ओके ओके मैं एकदम ठीक हूं सब ठीक है आप भी ठीक होंगे ओके बाय उमर बताते हैं कि वह और कमलेश बहुत गहरे दोस्त नहीं थे ।

वो बस साथ में काम करते थे। उमर तन्नी भाई की दुकान में बतौर सेल्स मैनेजर काम करते थे। कमलेश उसी दुकान के एक दूसरे हिस्से को संभालते थे। फिर एयर इंडिया हादसे की खबर आई। उमर को पता चला कि कमलेश और धापू बेन की विमान हादसे में मौत हो गई। उस पल कुछ टूट गया। उमर कहते हैं मुझे बहुत दुख हुआ और मैं दहाड़े मार कर रोने लगा। पूरा स्टाफ मेरी तरफ दौड़ कर आया। सब मुझे तसल्ली देने लगे।

तन्नी भाई ने उमर से कहा कि वह सावधान भाई को फोन करें। उमर ने कमलेश के रूममेट दीक्षित पटेल से उनका नंबर लिया। कई कोशिशों के बाद बात हो पाई। उमर कहते हैं मुझे उनके शब्द आज भी याद हैं। उन्होंने कहा मेरा बेटा चला गया। मुझे पता था कि वह फोन के उस पार रो रहे हैं। मुझे समझ नहीं आया कि क्या बोलूं। मैंने बस कहा कि आपका बेटा और हमारा भाई चला गया। मैंने उनसे कहा कि हिम्मत रखिए और मैं फिर फोन करूंगा। फिर एक नया रिश्ता शुरू हुआ। बहुत सरल। एक आदमी दूसरे आदमी को फोन करता था और पूछता था ठीक हो? हेलो जी हम डॉक्टर के पास जाके आए। वो थोड़ा सा आंखों में पानी आ रहा था और जलन हो रही थी तो इसलिए गए थे तो वो डॉक्टर ने दवाइयां दी है वो दवाई बस एक ही दिन [नाक से की जाने वाली आवाज़] थोड़े से जो आंख में बूंद डालना है वो दी है एक ही दवा दी है और फिर थोड़ा उसको नंबर का प्रॉब्लम था जो चश्मे का था तो नजदीक और दूर दोनों का तो उसके लिए सर दर्द हो रहा था तो वो नंबर के चश्मे भी बनवा दे और सब कुछ ठीक है। एकदम खैरियत तो हम अब घर आ गए और खाना भी खा लिया। अब बस सो रहे। ओके थैंक यू। कमलेश के जाने के बाद सावधान भाई का फोन उनकी यादों का घर बन गया है।

इस फोन में वह सारे मैसेजेस को संभाल कर रखते हैं जो उन्होंने लंदन में कमलेश के बॉस तन्नी भाई को किए थे। पिछले 12 महीनों से तन्नी भाई हर महीने सावधान भाई के खाते में ₹500 भेज रहे हैं। यह मदद किसी शोर के साथ नहीं आती। यह खामोश सहारा है। उस मेहनती और ईमानदार लड़के के परिवार के लिए जो उनके स्टोर में काम करता था। पिछले महीने सावधान भाई ने उमर के लंदन वाले पते पर 10 किलो का एक पार्सल भेजा। उसमें घर का बना घी था। पाचन वाला चूर्ण था और उमर की पत्नी समीना के लिए सूखी कचौरी के दो पैकेट थे। यह सब कुछ उन्होंने उसी अपनेपन से भेजा जैसे कभी कमलेश को भेजा करते थे।

यह रिश्ता अब सिर्फ फोन और यादों तक सीमित नहीं है। कुछ महीने पहले उमर ने कमलेश के छोटे भाई हितेश के लिए एक ब्लजर और शर्ट भेजी थी। उन्होंने रत्नी बहन के लिए एक स्वेटर भी भेजा था। जैसे दूर बैठे दो परिवार अब एक दूसरे के सुख-दुख और अपनेपन को संभाल रहे हो। 12 जून को उस हादसे की बरसी है। सावधान भाई रत्नी बहन और उनका पूरा परिवार उस दिन अहमदाबाद जा रहा है।

उनके लिए यह महज कुछ किलोमीटर का सफर नहीं है। कमलेश अब नहीं है लेकिन उनके गुजरने के बाद भी कुछ रिश्ते खत्म नहीं हुए। वह फोन के मैसेजेस हर महीने भेजी गई रकम और अनकही जिम्मेदारी में बदल चुके हैं।

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