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इस्लाम क्यों बटा दो हिस्सो में? रोंगटे खड़े कर देने वाला सच!

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साल 680 में इस्लाम की वह लड़ाई हुई जिसने इस्लाम को दो धरों में बांट दिया यह ऐसी लड़ाई थी जिसमें बराबरी कोई नहीं थी एक तरफ सिर्फ 72 लोग थे और दूसरी तरफ थी 1 लाख लोगों की हथियार बंद सेना इस जंग में जाहिर तौर पर 1 लाख की सेना ने उन 72 लोगों को मार दिया लेकिन इस जंग ने इस्लाम के इतिहास को बदल कर रख दिया इस जंग ने दुनिया को दो चीजें दी इस्लाम में शिया और सुन्नी नाम के धड़े और मुहर्रम वही जिसकी 10वीं तारीख को लोग हुसैन की याद में मातम मनाते हैं खुद को टॉर्चर करते हैं और हुसैन की शहादत का जुलूस निकालते हैं यह लड़ाई थी कर्बला की लड़ाई इतिहास में ऐसी बहुत ही कम लड़ाइयां हुई है कर्बला की लड़ाई अपने आप में बहुत इंपॉर्टेंट है आज मैं आपको कर्बला के जंग की दास्तान सुनाऊंगा क्या हुआ था कर्बला की जंग में कौन थे इमाम हुसैन जिनकी इबादत आज भी की जाती है और आखिर ऐसा क्या हुआ था साल 600 0 में कि 72 लोगों के खिलाफ खलीफा ने 1 लाख की फौज उतार दी थी इसके साथ यह भी जानेंगे कि आखिर शिया और सुन्नी आपस में लड़ते क्यों हैं यह सब जानेंगे इस वीडियो में तो एंड तक बने रहिएगा क्योंकि अपना इतिहास नहीं जानोगे तो खुद को कैसे पहचानोगे दोस्तों गर्मियां शुरू हो चुकी है और आप इन ट्रेंडिंग टीशर्ट्स को ट्राई करके ट्रेंडी लुक ले सकते हैं और अच्छे दिख सकते हैं तो शॉप नाउ पर लिंक है क्लिक जरूर कीजिएगा 8 जून साल 600 32 के दिन इस्लाम के आखिरी पैगंबर मोहम्मद साहब की मृत्यु हो गई उनकी मृत्यु के बाद इस्लाम फैलाने की जिम्मेदारी आई खलीफा के पास खलीफा यानी मुस्लिमों का धर्म गुरु अब धर्म गुरु के मामले में पैगंबर मोहम्मद साहिब के फॉलोअर्स दो धड़े हो गए एक वह जो कहने लगा कि पैगंबर की ब्लड लाइन यानी कि उनके ही किसी घर वाले को खलीफा बनाया जाए इसके लिए पैगंबर के चचेरे भाई और दामाद अली इब्न अबी तालिब का नाम सजेस्ट किया गया दूस दूसरा धड़ा कहने लगा कि

मुस्लिम कम्युनिटी खुद अपना लीडर चुने ना कि किसी डायनेस्टी को फॉलो करें इस तरह से रिश्तेदार को खलीफा बनाने की मांग करने वाले शिया कहलाए और दूसरा धड़ा सुन्नी कहलाया फिर सुन्नियों की बात मानी गई और पहले खलीफा बने अबू बकर अबू बकर के बाद दो और खलीफा बने उमर और उस्मान यह दोनों भी सुन्नी थे यानी कि मुस्लिम कम्युनिटी से निकलकर बने हुए खलीफा इस तरह से अबू बकर से लेकर उस्मान तक तीनों 632 से लेकर साल 656 तक खलीफा बने रहे फिर फाइनली 656 में अली को खलीफा बनाया गया अली तब तक बूढ़े हो चुके थे लेकिन अली को भी कई मुस्लिम गुट पसंद नहीं करते थे खास तौर पर सीरिया के गवर्नर और उस्मान के रिश्तेदार मुआविया अली को बिल्कुल भी पसंद नहीं करते थे अब यहां आपको बताऊं तो मुआविया ने अली से खलीफा उस्मान के लिए न्याय की मांग की थी इससे दोनों के बीच झगड़ा बढ़ा था अली के खिलाफ कई मुस्लिम गुट खड़े हो गए विरोध करने वाले इन लोगों में पैगंबर मोहम्मद की विधवा आयशा भी शामिल थी उन्होंने कैमल नाम की जगह की लड़ाई में अली को चैलेंज किया था इन लड़ाइयां को फित कहा जाता है फिना का मतलब है गृह युद्ध यानी सिविल वॉर हालांकि इस युद्ध को अली जीत गए लेकिन ये ऐसा गृह युद्ध था कि अली की पोजीशन बहुत कमजोर हो गई इसी बीच साल 661 में जब वो एक जगह नमाज पढ़ने जा रहे थे तो उनकी हत्या कर दी गई इन सारी घटनाओं से जमीन तैयार होती है कर्बला की जंग की दरअसल अली की हत्या के बाद इस्लाम में एक बहुत बड़ी दरार पड़ी मुआविया जो सीरिया का गवर्नर था उसने राशिद खलीफा को उखाड़ फेंका जिसमें यह चारों पवित्र खलीफा यानी अबू बकर उस्मान उमर और अली आते थे इसके बाद उसने स्थापना की एक नए खलीफा की उम्मयद खलीफा की दरअसल हुआ यह कि अली की मृत्यु के बाद उनके बेटे हसन ने गद्दी संभाली लेकिन बढ़ते खून खराबे को रोकने के लिए उन्होंने उदों के साथ कंप्रोमाइज किया एक संधि की गई जिसके तहत खून खराबे को रोकने के लिए हसन ने मुआविया को खलीफा की गद्दी सौंप दी यह संधि साल 661 में हुई थी संधि में हसन को इस शर्त पर मुआविया को अपनी सत्ता सौंपने थी कि मुआविया एक न्यायप्रिय शासक होगा और वह एक राजवंश स्थापित नहीं करेगा जाहिर है कि संधि का उद्देश्य ही था फित को खत्म करना फिर इस ट्रीटी से इस्लामिक फित यानी गृह युद्ध कुछ सालों के लिए रुक गया

आगे जाकर होता है यह कि साल 670 में हसन की मृत्यु हो गई उनकी मृत्यु के बाद हसन के भाई हुसैन बनते हैं कुफा की बानू हाशिम ट्राइब के चीफ कुफा असल में इराक का एक शहर है अब आपको बताऊं तो ये जो बानू हाशिम ट्राइब है यहीं से पैगंबर मोहम्मद भी आते थे अब कफा के लोगों ने हुसैन को अपना समर्थन तो दिया लेकिन फिर आता है एक बहुत बड़ा टर्न देखिए हुआ ये कि साल 676 में मुआविया ने अपने बेटे यजीद को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया अब यह पूरी तरह से उस ट्रीटी का उल्लंघन था जो कि हसन और मुआविया के बीच 661 में हुई थी इतिहासकार विल्फ्रेड फर्डिनेंड कहते हैं कि इस्लामिक इतिहास में इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था इस वजह से कई विरोधी गुट मुआविया के इस फैसले के खिलाफ खड़े हो गए फिर मुआविया ने कई गुटों को अपनी ओर मिला लिया हालांकि हुसैन और कुछ दूसरे गुटों को वह अपने साथ नहीं मिला पाया साल 680 में मुआविया की मृत्यु हो गई और इस्लामिक दुनिया में उमत खलीफा की स्थापना होती है फाइनली इतिहासकार लेमंस लिखते हैं कि अप्रैल 680 में अपनी मृत्यु से पहले मुआविया ने यजीद को आगाह किया था कि हुसैन और इब्न अल जुबैर उसके शासन को चुनौती दे सकते हैं और अगर वह ऐसा करते हैं तो उन्हें हरा दिया जाए यजीद को उन्होंने आगे यह भी सलाह दी कि वह हुसैन के साथ सावधानी से पेश आए और उसका खून ना बाहे क्योंकि वह मोहम्मद के पोते हैं यजीद के बारे में पॉपुलर बिलीफ था कि वह एक भ्रष्ट रिश्वत खोर और हिंसक शासक था उसने अपने शासन को बनाए रखने के लिए हुसैन से वफादारी की मांग की लेकिन हुसैन ने इस बात से इंकार कर दिया क्योंकि यजद खुलेआम भ्रष्ट था और बहुत ज्यादा क्रूर माना जाता था हुसैन ने यजीद के ऑफर को मना करके मक्का की ओर रुख किया और फिर वह वहीं पर रुक गए इधर यजीद के कारनामों से परेशान कुफा की जनता ने हुसैन को हजारों खत लिखे और अपनी परेशानी बताई इन खतों को पढ़कर हुसैन पिघल गए कुफा के लोगों ने कहा कि वो हुसैन को सत्ता देना चाहते हैं क्योंकि यजीद के शासन से वह तंग आ चुके हैं इसलिए फिर हुसैन ने तय किया कि वह कुफा जाएंगे और वहां के लोगों की मदद करेंगे फिर हुसैन ने हज से एक दिन पहले 9 सितंबर 680 को अपने परिवार के साथ 50 लोगों के साथ मक्का छोड़

दिया उन्होंने अरब के रेगिस्तान से उत्तर की ओर मार्ग लिया हुसैन के चचेरे भाई अब्द अल्लाह इब्न जाफर के रिक्वेस्ट पर मक्का के गवर्नर अबन इब्न सईद ने अपने भाई और इब्न जाफर को हुसैन के पीछे भेजा ताकि उन्हें मक्का में वापस लाया जा सके और उनकी सेफ्टी की जा सके लेकिन हुसैन ने लौटने से साफ इंकार कर दिया यह बताते हुए कि मोहम्मद ने उन्हें एक सपने में अपने रिजल्ट की परवाह किए बिना आगे बढ़ने का आदेश दिया था हुसैन के फॉलोअर्स ने उन्हें खूब समझाया लेकिन वह माने नहीं और कुफा की ओर निकल गए हालांकि जब तक वो कुफा पहुंच पाते तब तक यजीद के गवर्नर उब द उल्ला इब्न जियाद ने कुफा पहुंचकर विद्रोह को दबा दिया कुफा के लोगों ने यजीद के अत्याचारों से बचने के लिए लिए हुसैन का साथ छोड़ दिया इससे हुआ यह कि हुसैन अकेले पड़ गए उन्हें पहले 1000 लोगों की सेना द्वारा रोक लिया गया हुसैन से कहा गया या तो यजीद को खलीफा मान लो या फिर उनसे युद्ध करो लेकिन हुसैन ने कहा कि वह सरेंडर नहीं करेंगे क्योंकि वह इस्लाम में न्याय और सुधार लाना चाहते हैं अब हुसैन जो उम डायनेस्टी के 1000 लोगों से लड़ने चल दिए थे उनके पास सिर्फ 72 लोग थे लेकिन फिर भी उनको भरोसा था कि उनकी स चाई की जीत होगी इस तरह हुसैन 72 लोगों की बेहद छोटी सी टुकड़ी को या यूं कहे कि उनके कारवा को उनके फैमिली मेंबर्स के साथ कर्बला की ओर धकेल दिया गया यह जो मैप में आप यूफ्रेट्स में मुहर्रम का दूसरा दिन चल रहा था आने वाले आठ दिन हुसैन और उनके 72 साथियों के लिए बहुत ज्यादा तकलीफ देह होने वाले थे क्योंकि यजीद ने तय कर लिया था कि वह किसी भी हाल में हुसैन की वफादारी हासिल करके रहेगा अगले पांच दिनों तक हुसैन अपने कैंप में रहे और किसी भी तरह की शर्त को मानने से मना कर दिया लेकिन मुहर्रम के सातवें दिन यजीद की सेना के कमांडर उमर इब्न साद ने 300 लोगों की सेना का इस्तेमाल करके हुसैन के पानी की सप्लाई को रोक दिया इन सैनिकों ने यूफ्रेट्स को बंद कर दिया तपते रेगिस्तान में पानी की कमी से हुसैन और उनके साथियों की हालत बद से बदतर होती चली गई लेकिन यजीद को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा इधर हुसैन भी हार मानने को तैयार नहीं थे फिर दो दिन बाद मुहर्रम की नौवीं रात को यजीद की सेना ने जंग की तैयारी

कर ली 9 अक्टूबर की शाम को सेना हुसैन के शिविर की ओर बढ़ी हुसैन ने उमत कमांडर इब्न साद से अगली सुबह तक वेट करने के लिए कहा ताकि वह मामले पर और ज्यादा सोच सके इधर हुसैन ने ने अपने आदमियों से कहा कि वह सभी अपने परिवार के साथ रात के अंधेरे में जाने के लिए स्वतंत्र हैं क्योंकि उनके विरोधी केवल उन्हें चाहते हैं कहा जाता है कि कोई भी हुसैन को छोड़कर नहीं गया सब जंग लड़ने को तैयार थे फिर जंग की तैयारी की गई रात में ही एक टेंट लाया गया और एक साथ बांध दिया गया और टेंट के पीछे खाई खो दी गई फिर इसमें खूब सारी लकड़ियां भर दी गई ताकि हमले के दौरान आग लगाई जा सके जाहिर है कि हुसैन अपनी छोटी सी टुकड़ी से जंग को जीत नहीं सकते थे लेकिन उन्होंने लड़ने की पूरी त तैयारी कर ली थी इसके बाद आता है दोस्तों मुहर्रम का 10वां दिन जब फाइनली कर्बला की जंग शुरू होती है हुसैन की 72 लोगों की सेना 1 लाख की सेना से भिड़ गई इस लड़ाई में एक-एक करके हुसैन के सभी सिपाही जंग लड़ने गए वो बहुत बहादुरी से लड़े हुसैन के बेटे अली अकबर और हुसैन के भाई अब्बास इब्न अली ये दोनों इस जंग में शहीद हो गए अब्बास की मौत का विवरण प्राथमिक स्रोतों जैसे कि अल तबार या अलबाला धुरी में नहीं दिया गया है लेकिन एक बहुत फेमस अ शिया धर्म शस्त्री शेख अल मुफीद ने किताब अल इरशाद में अपने जिक्र में लिखा है कि अब्बास हुसैन के साथ नदी पर गए थे लेकिन अलग हो गए फिर घेर लिए गए और मारे गए किसी समय हुसैन का एक छोटा बच्चा जो उसकी गोद में बैठा हुआ था वो भी एक तीर से मारा गया और मर गया इस तरह एक-एक करके जब सभी मारे गए तब हुसैन ने भी जंग लड़ी और इमाम हुसैन बुरी तरह से घायल हो गए उनके ऊपर कई तीरों और तलवारों का एक साथ हमला हुआ जिसमें उनकी जा चली गई सिफत सनान जो यजीद की सेना का दूसरा कमांडर था उसने हुसैन का सिर धड़ से अलग कर दिया इस तरह कर्बला की जंग खत्म हो गई हुसैन की तरफ से जंग में 70 या 72 लोग मारे गए जिनमें से लगभग 20 अली के पिता अबू तालिब के वंशज थे इसमें हुसैन के दो बेटे उनके पत्रिक भाइयों में से छह हसन इब्न अली के

तीन बेटे जफर इबन अली तालिब के तीन बेटे और अकील इब्न अली तालिब के तीन बेटे और तीन पोते शामिल थे लड़ाई के बाद हुसैन के कपड़े उतार दिए गए और उनकी तलवार जूते और सामान ले लिया गया हुसैन के शरीर को घोड़े में बांधकर घसीटा गया और उनके सिर को यजीद के सामने पेश किया गया जो कि उस समय डम स्कस में था महिलाओं के गहने और लबादे भी जब्त कर लिए गए कुछ दिनों बाद इन महिलाओं को मदीना रवाना कर दिया गया दोस्तों कर्बला की लड़ाई भले ही खत्म हो गई हो लेकिन इसने एक कभी ना खत्म होने वाली लड़ाई या यूं कहे दरार को जन्म दे दिया था ये लड़ाई थी शिया और सुन्नी की लड़ाई कर्बला की जंग अत्याचार के विरुद्ध जंग का सिंबल बन गई यही वजह है कि हुसैन की मृत्यु के बाद उदों के खिलाफ कई विद्रोह उठ खड़े हुए जिसने आखिर में उमत खलीफा के पतन की नीव रखी आज भी मुहर्रम के दसवें दिन हुसैन की शहादत की याद में मातम मनाया जाता है उनकी हत्या को लेकर दुख जताया जाता है तो दोस्तों यह थी कहानी शिया और सुन्नी के बीच लड़ाई की और उस अहम जंग की जिसे कर्बला के नाम से जाना जाता है आपको यह कहानी कैसी लगी कमेंट करके जरूर बताइएगा वीडियो को लाइक और शेयर करना ना भूल और ऐसी इंट्रस्टिंग कहानियों के लिए इतिहास से जुड़े रहने के लिए हिस्ट्री कनेक्ट को सब्सक्राइब जरूर करें धन्यवाद [संगीत]

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