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जब २८ साल के दर्द को धोनी के किस फैसले ने इतिहास में बदल दिया?

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2011 का वह वर्ल्ड कप फाइनल तो आपकी यादों में गहरा अंकित होगा। लेकिन क्या आप उस जीत के पीछे छिपी असली और चौंकाने वाली हकीकत से वाकिफ हैं क्योंकि इस जीत की दास्तान इतनी रोमांचक और जज्बाती है कि इसे सुनकर आपकी रूह कांप जाएगी। इस पूरी कहानी की जड़े जुड़ती हैं साल 1983 से जब कपिल देव की कप्तानी में भारत ने लंदन के ऐतिहासिक लॉर्ड्स मैदान पर पहली बार वर्ल्ड कप की ट्रॉफी थामी। वह एक ऐसा वक्त था जब भारत को विश्व क्रिकेट में हाशिए की टीमों में गिना जाता था। 1983 से पहले तो शायद ही कोई भारतीय टीम को गंभीरता की नजर से देखता था। लेकिन जब कपिल देव के नेतृत्व में भारत ने क्रिकेट की दुनिया में पहली बार अपना परचम बुलंद किया तो वेस्ट इंडीज, इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसी ढाकड़ टीमें भी भारत का नाम सुनकर सतर्क होने लगी। लेकिन इस बादशाहत का सिलसिला ज्यादा देर कायम ना रह सका। कपिल देव के बाद अजरुद्दीन, सौरव गांगुली और राहुल द्रविड़ जैसे महान कप्तान आए। लेकिन यह खिताब एक बार फिर भारत की झोली में डालने का सपना हर बार अधूरा रह गया। यहां तक कि 1996 में भारतीय टीम के निराशाजनक प्रदर्शन से तिल मिलाए दर्शकों ने श्रीलंका के विरुद्ध वर्ल्ड कप सेमीफाइनल के दौरान स्टेडियम में ही आग लगा दी। उस मैच में भारत के सामने 252 रनों का लक्ष्य था और शुरुआत भी बढ़िया रही। मात्र दो विकेट खोकर 98 रन बन चुके थे। लेकिन फिर अचानक पूरी बल्लेबाजी लाइनअप ताश के पत्तों की तरह ढह गई और 120 रन तक पहुंचते-पहुंचते आठ विकेट गिर चुके थे। इस हार की पीड़ा ऐसी थी कि दर्शकों का गुस्सा शोलों में तब्दील हो गया और स्टेडियम में आग भड़क उठी। हालात इतने बेकाबू हो गए कि मैच बीच में रोकना पड़ा और मैच रेफरी क्लाइव लॉयड ने श्रीलंका को विजय घोषित कर दिया। यूं एक और वर्ल्ड कप भारत की मुट्ठी से रेत की तरह फिसल गया।

1999 में भी वर्ल्ड कप जीतने का एक सुनहरा मौका था। लेकिन अफ्रीका और जिंबाब्वे जैसी टीमों से हार के बाद जब ऑस्ट्रेलिया ने भी भारत को परास्त किया तो यह वर्ल्ड कप भी भारत की दहलीज से दूर चला गया। फिर आया 2003 का वर्ल्ड कप जहां एक बार फिर भारत को विश्व विजेता बनाने की जिम्मेदारी सौंपी गई सौरव गांगुली को जो उस दौर के सबसे धाकड़ और जुझारू कप्तानों में से एक थे। 2003 तक गांगुली की रहनुमाई में भारतीय टीम एक मजबूत और खतरनाक इकाई बन चुकी थी। ओपनिंग में सचिन तेंदुलकर और वीरेंद्र सहवाग की दमदार जोड़ी थी। मिडिल ऑन ऑर्डर में गांगुली, द्रविड़, कैफ और युवराज जैसे कुशल बल्लेबाज थे और गेंदबाजी में ज़हीर खान व आशीष नेहरा जैसे घातक हथियार। इसी वजह से भारत उस टूर्नामेंट में ऑस्ट्रेलिया के बाद दूसरी सबसे ताकतवर टीम मानी जा रही थी और इसका असर मैदान पर भी दिखा। भारत वर्ल्ड कप के फाइनल तक जा पहुंचा। इस मुकाम तक आते-आते हर किसी को लगा कि शायद इस बार इतिहास लिखा जाएगा। लेकिन फाइनल में सामना था उस ऑस्ट्रेलिया से जो नॉकआउ मैचों में अपराजय मानी जाती थी। फाइनल में रिकी पोंटिंग ने अकेले दम पर 140 रनों की तूफानी पारी खेलकर भारतीय गेंदबाजों की कमर तोड़ दी और भारत के सामने 360 रनों का अजय लक्ष्य रख दिया। जब भारत इस लक्ष्य का पीछा करने उतरा तो टीम 234 रनों पर ढेर हो गई और एक बार फिर ट्रॉफी हाथ से निकल गई। अब भारत पर चोकर्स का दाग लग चुका था। ड्रेसिंग रूम से लेकर स्टेडियम तक और घर-घर में निराशा और मायूसी का गहरा अंधेरा छा गया। इसी उदासी के बीच समय का चक्र घूमते-घूमते 2007 के डे वर्ल्ड कप तक पहुंचा। टीम की कमान इस बार राहुल द्रविड़ को सौंपी गई और टूर्नामेंट की मेजबानी थी वेस्ट इंडीज में। टीम लगभग वही थी जो 2003 में खेली थी। बस एक नया और तूफानी नाम जुड़ा था। एम एस धोनी। भारत का पहला मुकाबला बांग्लादेश से हुआ और वहां जो हुआ वो भारतीय क्रिकेट इतिहास की सबसे शर्मनाक हारों में गिना जाता है। बांग्लादेश जैसी टीम से हारना हर भारतीय प्रशंसक के लिए किसी सदमे से कम नहीं था। इसके बाद भारत ने बरमूडा को तो हराया मगर श्रीलंका ने भी भारत को बुरी तरह धूल चटाई। नतीजा यह निकला कि भारत ग्रुप स्टेज में ही तीसरे पायदान पर रहा और टूर्नामेंट से बाहर हो गया। इस पराजय ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया। बांग्लादेश के हाथों मिली। वो चोट आज भी भारतीय क्रिकेट प्रशंसकों के ज़हन में ताजा है। जैसे ही भारत बाहर हुआ, बहिष्कार शुरू हो गया। खिलाड़ियों पर तीखे हमले होने लगे और कोच ग्रेग चैपल के विवाद भी सार्वजनिक हो गए। ऐसा लगा जैसे भारतीय क्रिकेट की पूरी इमारत दरक गई हो। उस दौर में भारत को वैसे ही ट्रोल किया जा रहा था जैसे आज भारत में पाकिस्तान को किया जाता है और इसी अंधेरे दौर को भारतीय क्रिकेट का काला अध्याय कहा जाता है।

इसी अंधकार में टीम इंडिया को जरूरत थी एक नए सूरज की एक ऐसे नेतृत्व की जो टीम को फिर से विश्व मंच पर सम्मान दिला सके और तभी 2007 के T20 वर्ल्ड कप के लिए एम डिस धोनी को कप्तान बनाया गया। सबसे मुश्किल वक्त में कमान संभाली धोनी ने और उन्होंने इस मौके को हाथ से जाने नहीं दिया। पहली ही बार में भारत को T20 विश्व चैंपियन बनाकर उन्होंने सारे आलोचकों को एक झटके में चुप करा दिया। लेकिन करोड़ों भारतीय प्रशंसकों की आंखों में अभी भी एक डे वर्ल्ड कप का सपना बाकी था और वह सपना अब 2011 में पूरा होने की आस लिए था। तब तक धोनी सिर्फ एक बेहतरीन फिनिशर नहीं बल्कि टीम इंडिया के सबसे चतुर और ठंडे दिमाग वाले कप्तान के रूप में भी अपनी पहचान बना चुके थे। पूरा देश उनसे सिर्फ एक चीज मांग रहा था। एक वन डे वर्ल्ड कप 28 साल का इंतजार अब प्रतीक्षा नहीं बल्कि दर्द बन चुका था। ऑस्ट्रेलिया की वर्षों से चली आ रही विश्व विजेता की कुर्सी भारतीय प्रशंसकों को खलने लगी थी और उस पर तुर्राइया कि क्रिकेट के भगवान सचिन तेंदुलकर अपने करियर के आखिरी पड़ाव पर थे और पूरी दुनिया की तमन्ना थी कि इन महान बल्लेबाज को विदाई से पहले कम से कम एक वर्ल्ड कप की ट्रॉफी मिले। यह जिम्मेदारी अब धोनी के कंधों पर आ चुकी थी। इस वर्ल्ड कप की मेजबानी भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका और बांग्लादेश को दी गई थी। लेकिन 2009 में श्रीलंकाई टीम पर हुए आतंकवादी हमले के बाद पाकिस्तान से मेजबानी का अधिकार वापस ले लिया गया। इस तरह भारत, श्रीलंका और बांग्लादेश ही आयोजक बने। भारत के लिए सबसे अहम बात यह थी कि वर्ल्ड कप के सभी नॉकआउ मुकाबले भारतीय जमीन पर खेले जाने थे और यह एक अभूतपूर्व लाभ था। इसी दौरान मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर ने ऐलान कर दिया कि यही उनका आखिरी वन डे वर्ल्ड कप होगा। अब टीम पर एक भावनात्मक दायित्व और आ गया था कि क्रिकेट के इस महान खिलाड़ी को विदाई वर्ल्ड कप ट्रॉफी के साथ हो। हालांकि इस सफर में रोड़े भी कम नहीं थे। ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका, श्रीलंका और पाकिस्तान सभी टीमें अपने चरम पर थी। लेकिन भारत के पास भी एक से बढ़कर एक खिलाड़ी थे और सबसे बड़ी बात कप्तान था महेंद्र सिंह धोनी। शांत दिमाग पेनी रणनीति और सटीक फैसलों का उस्ताद। 2011 का वर्ल्ड का पर्दा उठाता है और भारत का पहला सामना होता है उसी बांग्लादेश से जिसने 2007 में ऐसा घाव दिया था जो भरा नहीं था। स्वाभाविक था कि प्रशंसकों के मन में 2007 की आशंका फिर से घर कर गई। लेकिन इस बार तस्वीर बिल्कुल अलग थी। 19 फरवरी 2011 को भारत टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करने उतरा और वीरेंद्र सहवाग ने तूफानी अंदाज में 175 रन ठोककर माहौल को एकदम बदल दिया। साथ में विराट कोहली ने अपने वर्ल्ड कप करियर का पहला शतक ठोककर सबको हैरत में डाल दिया। भारत ने बांग्लादेश के सामने 371 रनों का पहाड़ जैसा लक्ष्य रखा जिसके जवाब में बांग्लादेश 283 रनों पर समेट दिया गया। वर्ल्ड कप अभियान की शुरुआत हुई

एक धमाकेदार जीत के साथ। अगले मुकाबले में सामना था इंग्लैंड से। सचिन के शानदार शतक ने भारत को 339 रनों के पार पहुंचाया। लेकिन इंग्लैंड ने भी जमकर लड़ाई की और मैच टाई हो गया। यह नतीजा भारतीय प्रशंसकों के लिए चिंता की लकीर खींच गया क्योंकि जहीर खान को छोड़ बाकी गेंदबाजों का प्रदर्शन उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा था। इसके बाद आयरलैंड और नीदरलैंड को मात देकर भारत ने ग्रुप में पकड़ मजबूत की लेकिन दक्षिण अफ्रीका के हाथों हार भी मिली। लीग चरण का आखिरी मुकाबला था वेस्ट इंडीज से चेन्नई में। भारत ने पहले बल्लेबाजी की और जब सचिन बल्लेबाजी कर रहे थे। कैरेबियाई खिलाड़ियों ने एलबीडब्ल्यू की जोरदार अपील की। अंपायर ने नकार दिया। लेकिन सचिन ने स्वयं मैदान छोड़ने का फैसला किया। यह पल हर भारतीय के लिए गर्व का था और शायद इसीलिए उन्हें क्रिकेट का भगवान कहा जाता है। सचिन के जाने के बाद बल्लेबाजी क्रम ज्यादा देर नहीं टिका मगर एक छोर पर युवराज सिंह डटे रहे। चेन्नई की कड़ी धूप और उमस में उनका जिस्म जवाब दे रहा था। उन्हें कई बार रिटायर्ड हर्ट होने की सलाह दी गई लेकिन उन्होंने इंकार कर दिया। थकान और पीड़ा के बावजूद वह डटे रहे और 113 रनों की जाबाज पारी खेलकर भारत को 268 तक पहुंचाया और इसी मैच के बाद यह खबर पूरे देश में आंधी की तरह फैली कि युवराज के फेफड़ों में ट्यूमर है। लक्ष्य का पीछा करने उतरी वेस्ट इंडीज ने अच्छी शुरुआत की लेकिन भारतीय गेंदबाजी के सामने टिक नहीं सकी और 188 रनों पर पूरी टीम सिमट गई। चार जीत के साथ भारत ने क्वार्टर फाइनल में जगह बना ली। अब मुकाबला था उस ऑस्ट्रेलिया से जो भारत के लिए वर्षों से एक दुस्वप्न की तरह था। एक बार फिर क्रिकेट विशेषज्ञ भारत की हार की आशंका जताने लगे। लेकिन इस बार भारतीय टीम पूरी तरह अलग इरादे के साथ मैदान में उतरी। जीत की भूख और बदले की आग लेकर। ऑस्ट्रेलिया ने पहले बल्लेबाजी की और पोंटिंग के शतक के दम पर 260 रन खड़े किए। ब्रेटली और मिशेल जॉनसन जैसे आग उगलने वाले गेंदबाजों के सामने 261 रन बनाना मुश्किल काम था। भारत की शुरुआत लड़खड़ाई। सहवाग जल्दी पवेलियन लौट गए। लेकिन सचिन और गौतम गंभीर ने मिलकर टीम को संभाला और दोनों ने अर्धशतक जड़े। बाद में एक बार फिर संकट आया। लेकिन युवराज और सुरेश रैना ने मोर्चा थाम लिया और भारत को जीत की दहलीज तक पहुंचाया और आखिरकार 48वें ओवर की दूसरी गेंद पर युवराज ने ब्रेटली को चौके के लिए भेजकर मैच का फैसला कर दिया। इसके बाद युवराज घुटनों पर बैठकर दहाड़े जैसे पूरी दुनिया को ललकार रहे हो कि क्रिकेट का नया सम्राट आ गया है। भारत सेमीफाइनल में पहुंच चुका था और सेमीफाइनल में सामना था उस टीम से जो भारत की चिर प्रतिद्वंदी है पाकिस्तान। पाक ने सेमीफाइनल तक पहुंचने से पहले ऑस्ट्रेलिया और वेस्ट इंडीज जैसी मजबूत टीमों को रौंदा था। इसलिए यह मुकाबला महा मुकाबला बनने वाला था। दोनों देशों के प्रधानमंत्री भी मोहाली स्टेडियम में इस ऐतिहासिक मुकाबले के गवाह बने। धोनी ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी का फैसला किया। शुरुआत तो अच्छी रही, लेकिन बीच में बल्लेबाजी क्रम डगमगा गया। एक छोर पर सचिन डटे रहे। 85 रनों की बेहद अहम पारी खेली और इस दौरान उन्हें पांच बार जीवन दान मिला। इन्हीं जीवनदानों ने भारत को 260 के सम्मानजनक स्कोर तक पहुंचाया। 260 के जवाब में पाकिस्तानी टीम भारतीय गेंदबाजों के जाल में उलझती रही और 231 रनों पर समेट दी गई और इस तरह भारत ने अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंदी को हराकर 2011

वर्ल्ड कप के फाइनल में धमाकेदार दस्तक दी। उस वक्त देश में क्रिकेट का जो जुनून था वो शब्दों में बयान करना मुश्किल है। हर गली, हर नुक्कड़, हर चौराहे पर बस एक ही बात वर्ल्ड कप और अब फाइनल में भारत का सामना था श्रीलंका से। श्रीलंकाई टीम उस वक्त अपने सबसे मजबूत दौर में थी। संघकारा, दिलशान और जयवर्धन जैसे दिग्गज बल्लेबाजों के साथ मुरलीधरना और मलिंगा जैसे विध्वंसक गेंदबाज भी टीम में थे। उन्हें हराना आसान कतई नहीं था। 2 अप्रैल 2011 मुंबई का वाणखेड़े स्टेडियम स्टेडियम इस कदर खचाखच भरा था कि सुई टाकने की जगह नहीं बची। बॉलीवुड सितारे उद्योगपति अंबानी हो या अडानी हर कोई वहां था। ऐसा लग रहा था मानो पूरा हिंदुस्तान उस एक मैदान में सिमट आया हो। हर किसी की दुआ बस यही थी। इस बार ट्रॉफी घर आए। उस महा मुकाबले की शुरुआत के साथ ही भारत की सड़कें सुनी हो गई। श्रीलंका ने चार बदलावों के साथ फाइनल में कदम रखा जिससे रोमांच और परतें और गहरी हो गई। टॉस श्रीलंका ने जीता और पहले बल्लेबाजी का फैसला किया। दिलशान और उपुल थरंगा सलामी जोड़ी के रूप में उतरे और भारत की तरफ से जहीर खान ने पहला ओवर किया। वही ज़हीर जो इस पूरे टूर्नामेंट में अपनी स्विंग और अनुभव से कहर बरपाते रहे थे। उन्होंने थरंगा को महज दो रन पर स्लिप में कैच करवा दिया। जहीर खान ने अपने शुरुआती तीन ओवरों में एक भी रन नहीं दिया। उनके मन में 2003 के फाइनल की यादें थी और इस बार वह कोई चूक नहीं करना चाहते थे।

इसके बाद संघकारा और जयवर्धने ने पारी को संभाला। संघकारा आउट हुए लेकिन जयवर्ध ने एक छोर पर डटे रहे और 103 रनों की शानदार पारी से श्रीलंका को मजबूत जमीन पर खड़ा कर दिया। श्रीलंका की पारी 274 रन पर समाप्त हुई। यानी भारत को जीत के लिए 275 रनों का विशाल लक्ष्य मिला। पिच क्यूरेटर सुधीर नायक पहले ही कह चुके थे कि इस पिच पर 270 रन विजय स्कोर होगा और पिछले नौ में से दो वर्ल्ड कप पहले बल्लेबाजी करने वाली टीम ने ही जीते थे। यानी दबाव भारत पर था लेकिन भारतीय टीम को अपने बल्लेबाजों पर पूरा यकीन था और अब क्रीज पर उतरे सचिन तेंदुलकर और वीरेंद्र सहवाग करोड़ों उम्मीदों के साथ लेकिन दूसरी ही गेंद पर मलिंगा ने सहवाग को आउट कर दिया। करोड़ों दिल एक पल में डूब गए। टीम अभी संभलने की कोशिश में थी कि सातवें ओवर की दूसरी गेंद पर सचिन भी मलिंगा के हाथों आउट हो गए। एक बार फिर देश में खामोशी छा गई।

लेकिन इस मुश्किल घड़ी में गौतम गंभीर के साथ मैदान पर उतरे विराट कोहली। दोनों ने 83 रनों की कीमती साझेदारी निभाई जिसकी खासियत यह थी कि विकेट बचाने के साथ-साथ रणगति भी थमने नहीं दी। इसके बाद विराट 35 रन बनाकर पवेलियन लौटे। अब भारत को एक नई जोड़ी की दरकार थी और इसी नाजुक मोड़ पर कप्तान एम एस धोनी ने सबको चौंकाते हुए युवराज से पहले खुद क्रीज पर कदम रखा। पूरे टूर्नामेंट में धोनी का बल्ला खामोश रहा था। इसलिए यह फैसला सबके लिए अप्रत्याशित था। लेकिन यही वह दाम था जिसने इतिहास की दिशा बदल दी। धोनी और गंभीर ने मिलकर चौथे विकेट के लिए 109 रन जोड़े। गंभीर ने 97 रनों की जांबाज पारी खेली। शतक से ठीक तीन रन दूर रह गए। लेकिन उनकी वो 97 रन की पारी कई शतकों से ज्यादा कीम थी। इसके बाद युवराज सिंह उतरे और धोनी के साथ मिलकर भारत को जीत की दहलीज तक ले गए और फिर आया वह ऐतिहासिक अविस्मरणीय पल। महेंद्र सिंह धोनी ने नवान कुलशेखरा की गेंद पर एक लंबा और ऊंचा लगाया और 28 साल की प्यास एक झटके में बुझ गई। भारत वर्ल्ड कप चैंपियन था।

पूरा देश जैसे झलझले में आ गया। हर गली हर मोहल्ले में ढोल, थालियां, बर्तन जो हाथ में आया वही बजाकर लोग सड़कों पर निकल पड़े। लाखों आंखों में आंसू थे। लेकिन यह आंसू थे खुशी के, गर्व के, मुक्ति के। सचिन को कंधों पर उठाकर पूरे मैदान का चक्कर लगाया गया क्योंकि यह ट्रॉफी उनके लिए उतनी ही जरूरी थी जितनी पूरे भारत के लिए वो जश्न, वो रात, वो लम्हा शायद फिर कभी ना हो। धोनी को मैन ऑफ द मैच का खिताब दिया गया और वह इसके पूरे हकदार थे। वहीं युवराज सिंह टूर्नामेंट के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी चुने गए। सच तो यह है कि इस जीत में हर खिलाड़ी का पसीना और खून शामिल था। लेकिन युवराज का किरदार सबसे असाधारण था। आज अफसोस इस बात का है कि उस योद्धा को लोग धीरे-धीरे भुलाते जा रहे हैं। जिसने कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से जूझते हुए एक फेफड़े में ट्यूमर लिए भारत को विश्व विजेता बनाया। वेस्ट इंडीज के उस मैच में तो उनकी हालत इतनी नाजुक थी कि जान का खतरा था। फिर भी वह मैदान पर डटे रहे देश के लिए। 2011 वर्ल्ड कप की यही वह सच्चाई है जो बहुत कम लोग जानते हैं या जानते हुए भी आंखें मोह लेते हैं। बहरहाल सच यही है कि वर्ल्ड कप जैसी ट्रॉफी कोई अकेला नहीं जिताता। यह पूरी टीम की मेहनत, कुर्बानी और जज्बे का नतीजा होती है।

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