हमास, हिजबुल्ला और हुती जैसे समूहों पर प्रतिबंध या रोक, ईरान कार्यक्रम पर रोक और उसके बैलेस्टिक मिसाइल क्षमता को सीमित किया जाए। इजराइल की कुछ ऐसी ही चाहत रही है। इन्हीं वजहों से इजराइल और ईरान के बीच भी हुई जिसमें अमेरिका भी कूद पड़ा। लेकिन पहले जंग हुई और सीज फायर और अब अमेरिका ईरान के बीच 14 सूत्रीय समझौतों पर मुर लगी है।
अब दोनों 19 जून को स्विट्जरलैंड के जिनेवा में औपचारिक हस्ताक्षर करेंगे। इन सबके बीच इजराइल भड़का हुआ है। इजराइल की नाराजगी को लेकर [संगीत] कई दावे किए जाने लगे हैं और शायद इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू भी [संगीत] यह सोचने लगे हैं कि ईरान जंग से इजराइल को आखिर मिला क्या? युद्ध के दौरान इजराइल ने बार-बार दावा किया कि उसका टारगेट ईरान की सैन्य और परमाणु क्षमताओं को कमजोर करना है ताकि उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
लेकिन संघर्ष थमने और कूटनीतिक प्रयास शुरू होने के बाद मामला काफी पेचीदा हो गया है। इजराइल का दावा है कि उसने ईरान की सैन्य क्षमता को बड़ा नुकसान पहुंचाया है और भविष्य में इजराइल पर होने वाले संभावित खतरों को कम किया गया है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्या और उनकी सरकार इस पूरे अभियान को सुरक्षा के लिहाज से बड़ी सफलता बता रही है। हालांकि जानकारों का मानना है कि इजराइल की सबसे बड़ी चिंता ईरान का कार्यक्रम था और शांति समझौते के बाद भी इसे लेकर कोई ठोस समझौता नहीं हो पाया है। अगर ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाएं और मिसाइल कार्यक्रम जारी रहते हैं तो इजराइल के सामने सुरक्षा संबंधी चुनौतियां भविष्य में भी बनी रह सकती हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है किक्या सैन्य कारवाही से वो लक्ष्य हासिल हुआ इसके लिए इतना बड़ा संघर्ष हुआ।
वहीं हमास हिजबुल्ला और हुती को लेकर भी अमेरिका ईरान के बीच हुई डील में कोई ठोस समझौता नहीं होने का दावा किया जा रहा है। इजराइल में इसके खिलाफ खूब आवाजें उठने लगी हैं। विपक्ष प्रधानमंत्री नेतन्या पर सवाल उठा रहा है। वहीं अमेरिका और ईरान के बीच हुई डील पर इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्या का बड़ा बयान सामने आया है। नेतन्या ने कहा है कि दशकों से मैं ईरान के परमाणु हथियार हासिल करने केप्रयासों के खिलाफ लड़ता रहा हूं। मैं इसे अपने जीवन का मिशन कह सकता हूं। मैं आज तक इस पर कायम हूं और भविष्य में भी कायम रहूंगा।
समझौता हो या ना हो ईरान के पास नहीं होंगे ना आज ना कल। जब तक मैं इजराइल का प्रधानमंत्री हूं। ऐसा नहीं होने दूंगा। यह समझौता अमेरिका के राष्ट्रपति द्वारा किया गया है और उनका मानना है कि वे वास्तव में होम स्टेट को खोलने और कार्यक्रम को समाप्त करने दोनों देशों को हासिल कर सकते हैं।
मैंने कहा कि यह उनका फैसला है। मैं दोहराता हूं यह उनका फैसला है। वही इसकी अगुवाई कर रहे हैं और निश्चित रूप से मैंने विभिन्न चर्चाओं [संगीत] में अपनी राय व्यक्त की है। मैंने कहा कि हमारे अपने हित हैं। सबसे पहले परमाणु खतरे के संबंध में मैं यह सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध हूं कि हमें ऐसे किसी खतरे का सामना ना करना पड़े। वहीं लेबनान में हमने एक बफर जोन एक सुरक्षा क्षेत्र बनाया है और जब तक जरूरत होगी हम वहां बने रहेंगे।
ईरान चाहता था कि हम वहां से हट जाएं। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। क्या आप जानते हैं कि ऐसा क्यों नहीं हुआ? कई कारणों में से एक कारण यह था कि मैं अपने रुख पर पूरी दृढ़ता के साथ कायम रहा।
इस मुद्दे पर मैं बेहद अडिग और संकल्पित था। मेरा मानना है कि हमारे अमेरिकी मित्र इस दृढ़ निश्चय, इस रुख और इस निरंतरता का सम्मान करते हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ हुए शांति समझौते को अमेरिकी कांग्रेस में समीक्षा के लिए भेजने का समर्थन किया है। ट्रंप का कहना है कि यह एक अच्छा समझौता है और उन्हें नहीं लगता कि कांग्रेस इसका विरोध करेगी। हालांकि अमेरिका में भी कई रिपब्लिकन सांसद इस समझौते को लेकर कई गंभीर सवाल उठा रहे हैं। उनका संदेह है कि क्या यह समझौता वास्तव में ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने से रोक पाएगा? यही सवाल इजराइल भी उठा रहा है।
इजराइल की सबसे बड़ी चिंता ईरान का परमाणु और बैलेस्टिक मिसाइल कार्यक्रम है। इजराइली सरकार का मानना है कि यदि समझौते में ईरान की क्षमताओं पर अस्थाई और कठोर प्रतिबंध नहीं लगाए गए तो भविष्य में खतरा फिर से पैदा हो सकता है।
ट्रंप ने क़तर के अमीर शेख तमीम बिन हमद अलथानी के साथ संयुक्त प्रेस वार्ता में दावा किया कि उनके नेतृत्व के बिना इजराइल की स्थिति काफी कमजोर हो सकती थी।
उन्होंने कहा कि अमेरिका ने हमेशा इजराइल की सुरक्षा में निर्णायक भूमिका निभाई है। हालांकि ट्रंप ने इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्या को लेबनान के मुद्दे पर अधिक जिम्मेदारी से काम करने की सलाह भी दी