नमस्कार फिल्म शिकार वाला एक बार फिर पेश है एक ऐसा सच्चा किस्सा लेकर जिसे सुनकर किसी का भी दिमाग सुन पड़ जाएगा। कोई भी हैरान रह जाएगा। होशकता हो जाएंगे। ये किस्सा है बिग बी यानी अमिताभ बच्चन की किडनैपिंग का। सुनकर हैरान हो गए ना आप? लेकिन ये सच है। अमिताभ बच्चन के खिलाफ अंडरवर्ड की किडनैपिंग किंग ने एक बड़ी कास्परेसी [संगीत] की थी। अगर यह प्लान कामयाब हो जाता तो अमिताभ बच्चन की जिंदगी पड़ जाती खतरे में। और अपराध की दुनिया में जुड़ जाता सबसे खौफनाक बंदा। [हंसी] क्या था पूरा किस्सा इसे सुनाऊं? उससे पहले आपसे [संगीत] वही पुरानी गुजारिश करूंगा कि अगर आपको इस तरह के अनसुने अनफिटर्ड सच्चे किस्से सुनने हैं तो फिल्मची कार वाला चैनल को जरूर सब्सक्राइब करिए और बॉलीवुड के हर किस्सों से वाकिफ है। [अचानक ज़ोर से सांस लेने की आवाज़] चलिए शुरू करते हैं महानायक के किडनैप की दिल दहलाने वाली कहानी 80 का दशक। [संगीत] हिंदुस्तान के सिनेमाघरों में एक ही नाम का तूफान था। पर्दे पे जब वो आता था तो सीटियां बजती थी। पर्दों पर सिक्के फेंके जाते थे। तालियां गूंजती थी और हर गली हर चौराहे पर बस एक ही नाम की चर्चा होती थी कि अमिताभ बच्चन जैसा कोई नहीं। वो सितारा जिसे देखने के लिए लोग रात भर लाइन में खड़े रहते थे।
जिसके एक डायलॉग को करोड़ों जुबाने दोहराती थी। जिसकी एक झलक पाने के लिए भीड़ हो जाती थी दीवानी। लेकिन उसी दौर में उन्हीं चमकती रोशनियों के पीछे एक और दुनिया थी। अंधेरे की दुनिया जहां नाम फुसफुसा कर लिए जाते थे। जहां रात के अंधेरे में बड़े-बड़े सौदे होते थे और उस दुनिया में एक नाम था जो दहशत का पर्याय बन चुका था। राजू भटनागर द किडनैपिंग किंग। राजू भटनागर वो शख्स था जिसने अपहरण को एक साइंस बना दिया था। और एक दिन उस दिन जिसकी कल्पना भी कोई नहीं कर सकता। राजीव भटनागर के दिमाग में एक ऐसा ख्याल आया जिसे सुनकर उसके खुद के गुरे भी कांप गए थे। वो ख्याल था बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन को किडनैप करने का। राजू भटनागर ये नाम उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के कई बड़े व्यापारियों, उद्योगपतियों और रसूखदार लोगों की नींद उड़ा देता था। वो कोई साधारण अपराधी नहीं था। वो एक मास्टरमाइंड था। एक ठंडे दिमाग का लंबी सोच का बेरहम इरादे का। उसका तरीका दूसरे अपराधियों से बिल्कुल अलग था। कोई शोर नहीं, कोई हंगामा नहीं। बस एक परफेक्ट प्लान और उसका फ्लोलेस एजुकेशन। वो पहले अपने शिकार की पूरी जासूसी करता था कि शिकार कहां जाता है, कब निकलता है, कितनी सिक्योरिटी रहती है, और कौन-कौन करीबी है।
हर छोटी सी छोटी जानकारी इकट्ठा होती थी। और फिर जब वो वार करता था तो शिकार को खबर भी नहीं होती थी कि वो जाल में फंस गया। उसकी कुछ खास वारदातें आज भी अंडरवर के लिए मिसाल है। जैसे अगस्त 1987 को सागर मध्य प्रदेश [संगीत] में इस किडनैपिंग किंग ने जिस वारदात को अंजाम दिया, वह आज भी लोकल लोगों की जुबान और ज़हन में बैठी हुई है। राजू ने एक बड़े बीड़ी व्यापारी सुखनंदन जैन को अपना निशाना बनाया। इस बीड़ी व्यापारी के किडनैप का प्लान झांसी में बैठकर बनाया गया और इसके बाद राजू ने खुद [संगीत] बिजनेसमैन बनकर फोन किया और सागर के एक होटल में डील करना तय हुआ। सुखनंदन जैन को होटल में बुलाया गया और होटल के बाहर से ही एक ही झटके में काम कर दिया कंप्लीट। यानी बिजनेसमैन सुखनंदन जैन राजू की पकड़ में आ गए। सुखनंदन जैन को उन्हीं की फिट कार में डालकर राजू भटनागर सागर से पन्ना अपने ठिकाने पर पहुंच गया। 22 दिन की कैद के बाद सुखनंदन जैन के परिवार से ₹5.5 लाख की फिरौती [संगीत] वसूली गई। उस जमाने में यह रकम आज के ₹1.5 करोड़ों के बराबर थी। फिरौती के अलावा राजू भटनागर ने बिजनेसमैन की फिएट कार भी रख ली। आगे चलकर यह फिएट का राजू भटनागर की बेंचमार्क बन गई है। और सबसे हैरानी की बात यह है कि पुलिस पूरे 22 दिन एक सुराग तक नहीं ढूंढ पाई। यह थी राजू भटनागर की काबिलियत और यही काबिलियत उसे एक ऐसे जुए की तरफ ले जाने वाली थी जिसे जीतना नामुमकिन था। लेकिन सुखनंदन जैन वाले किस्से से पहले एक और घटना है जो राजू के शातिर दिमाग को और बेपर्दा करती है। वो सुनाता हूं। मार्च 1986 नई दिल्ली हिंदुस्तान की सबसे सुरक्षित जेल तिहाड़ यहां एक साथ दो खतरनाक नाम बंद थे।
एक था राजू भटनागर और दूसरा था दुनिया का सबसे कुख्यात ठग मर्डरर चार्ल्स शोभराज। चार्ल्स शोभराज वो शख्स था जिसने पूरी दुनिया में अपनी पहचान बनाकर धोखाधड़ी का एक नया अध्याय लिखा था। जिस पर 20 से ज्यादा लोगों की निर्मम हत्या का आरोप था। वो चाहता था कि वो तिहाड़ से फुल हो जाए। लेकिन इसके लिए तिहाड़ की उन दीवारों के पीछे उसे एक ऐसे दिमाग की जरूरत थी जो जेल के भीतर का नेटवर्क जानता हो। और राजू भटनागर वही [संगीत] दिमाग था। दोनों की मुलाकात हुई और रची गई एक ऐसी साजिश जो भारत की सबसे सुरक्षित जेल तिहाड़ के लिए अब तक का सबसे बड़ा कलंक बन चुका है। 16 मार्च 1986 रविवार का दिन तिहाड़ की हाई सिक्योरिटी सेल [संगीत] में चार्ल्स चोबराज 11 दूसरे कैदियों के साथ फरार हो गया। जेल के सारे गार्ड्स को नशीली मिठाई खिलाकर बेहोश कर दिया [संगीत] गया। हर बेहोश सिपाही के हाथ में ₹50 का नोट था जैसे उनका मजाक उड़ाया गया हो। गेट की चाबियां गायब थी और बाहर राजू का नेटवर्क तैयार खड़ा था। देश की सबसे सुरक्षित जेल की दीवारें भी राजू के आगे बेबस [संगीत] हो गई। अब सोचिए कि ऐसा आदमी अगर किसी को निशाना बनाने के ठान ले तो कौन रोक सकता है उसे? और निशाना जब अमिताभ बच्चन हो तो कहानी किस मोड़ पर जाती है? इधर है अमिताभ बच्चन। महानायक अमिताभ बच्चन को किडनैप करने की कहानी बुनी गई इलाहाबाद यानी प्रयागराज में। ये षड्यंत्र तब सुना गया जब इलाहाबाद के कमरे में सिगरेट का धुआं छत को छू रहा था। रेडियो पे अमिताभ बच्चन का इंटरव्यू चल रहा था। वो आवाज जो पूरे हिंदुस्तान को दीवाना कर रही थी। वहीं राजू अपने गुरुओं के साथ किसी और बड़े शिकार की प्लानिंग में डूबा हुआ था। तभी किसी ने कहा कि आजकल तो बस एक ही नाम की चर्चा हो रही है। अमिताभ बच्चन और अमिताभ बच्चन अपने इलाहाबाद के ही हैं। राजू ने सिर उठाया, आंखें तिरछी हुई। दिमाग की उस मशीन ने एक नई कैलकुलेशन शुरू करी। अगर अमिताभ बच्चन को उठा लिया तो क्या होगा? पैसा तो मिलेगा। साथ ही पूरा देश भी हिल जाएगा। और इसके बाद जो नाम मिलेगा वो जरा के इतिहास में यानी काली दुनिया में इतिहास [संगीत] हो जाएगा। दर्ज हो जाएगा। उस रात इलाहाबाद की उस कोठरी में एक ऐसे प्लान की नीव पड़ी जो अगर कामयाब हो जाती तो शायद भारत का सिनेमा इतिहास और भारत की क्राइम हिस्ट्री दोनों ही कुछ और होते। प्लानिंग शुरू हुई बेहद सोच समझ के बेहद शातिराना तरीके से। यह राजू का स्टाइल था। जल्दबाजी नहीं, घबराहट नहीं। बस ठंडे दिमाग से एक-एक कदम। सबसे पहले काम था अमिताभ की पूरी जानकारी इकट्ठा करने का। हीरो के भरोसेमंद लोग मुंबई भेजे गए। उनका एक ही मिशन था अमिताभ बच्चन की दिनचर्या को समझना। वो कब घर से निकलते हैं? कहां शूटिंग करते हैं? कितने बॉडीगार्ड हैं? साथ कितने बॉडीगार्ड साथ रहते हैं? कौन-कौन उनके करीब है? और किन रास्तों से वह आते जाते हैं। हर छोटी सी छोटी जानकारी एक-एक कर इकट्ठा होती रही। लेकिन एक बड़ी दिक्कत थी अमिताभ की सिक्योरिटी इतनी टाइट थी कि दिलों का कोई भी आदमी सीधे उनके करीब नहीं पहुंच सका। और किडनैपिंग तभी हो सकती थी जब शिकार को उस जगह लाया जाए जहां आप चाहते हो। तब राजू के दिमाग में एक ऐसी तरकीब आई जो
उसकी सोच की गहराई को बताती है। उसने एक उभरती हुई एक्ट्रेस को [संगीत] इस काम में शामिल किया। पैसा दिया, लालच दिया, उसे यह जिम्मेदारी दी कि किसी भी बहाने अमिताभ तक पहुंचना है। उन्हें इलाहाबाद के एक प्रोग्राम में चीफ गेस्ट बनाने के लिए राजी करना है। यह तरकीबक काम आ गई। एक्ट्रेस ने अमिताभ को इलाहाबाद आने के लिए राजी कर लिया। जब यह खबर राजू तक पहुंची तो उसकी आंखों में एक अजीब सी चमक आ गई। वो चमक जो किसी शिकारी की आंखों में तब आती है जब शिकार जाल के करीब आ जाता है। अब प्लानिंग का दूसरा और सबसे खतरनाक चरण शुरू हुआ। यह तय किया गया किडनैपिंग के बाद अमिताभ को कहां रखा जाएगा। किस रास्ते से ले जाया जाएगा। हर मोड़, हर चौक, हर संभावित पुलिस चेक पोस्ट का हिसाब लगाया गया। अगर कोई गड़बड़ हो तो अल्टरनेट प्लान क्या होगा वो भी तैयार किया गया। यह प्लान किसी हॉलीवुड थ्रिलर की स्क्रिप्ट से कम नहीं था। हर डिटेल इतनी [संगीत] बारीकी से सोची गई थी कि एक भी चूक की गुंजाइश नहीं थी। वहीं Fिएट कार जो सागर के बीड़ी व्यापारी से छीनी थी और जो राजू का बेंचमार्क बन चुकी थी [संगीत] उसे भी इस मिशन में तैयार रखा गया। प्रोग्राम से एक शाम पहले राजू ने अपने सबसे भरोसेमंद आदमी से सब कंफर्म किया। जवाब था सब कुछ तय है। सब कुछ रेडी है। बस कल [संगीत] होने की देर है। राजू ने गहरी सांस ली। उस रात वो सो नहीं सका क्योंकि होने वाली अगली सुबह उसके पूरे करियर की सबसे बड़ी सुबह होने वाली थी। लेकिन इस कहानी में एक ऐसा मोड़ आया जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी। प्रोग्राम के दिन सुबह ही सुबह एक खबर आई। अमिताभ बच्चन ने इलाहाबाद आने से मना कर दिया। बस इतनी सी खबर, कोई एक्सप्लेनेशन नहीं, कोई वजह नहीं। एक सिंपल [संगीत] कैंसिलेशन। लेकिन उस एक कैंसिलेशन ने राजू के पूरे ताश [संगीत] के महल को एक झटके में ढहा दिया। वो कमरा जो रात भर उस बड़े प्लान की खुशी में जागा था अब वो भारी खामोशी से भर गया। राजू का चेहरा पत्थर की तरह हो गया। गुरे एक दूसरे को देख रहे थे लेकिन कोई बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। वो सपना जो कल रात आसमान छू रहा था। आज सुबह राख हो चुका था। आज तक कोई नहीं जानता कि आखिर अमिताभ ने वो प्रोग्राम कैंसिल क्यों किया? क्या उन्हें किसी ने आगाह किया था? क्या यह महज एक रूटीन कैंसिलेशन था [संगीत] या भगवान की मेहरबानी थी? यह रहस्य आज भी रहस्य है। लेकिन एक बात तय है उस दिन अमिताभ बच्चन ने अनजाने में अपनी जिंदगी बचाई थी। अगर वो इलाहाबाद पहुंच जाते तो शायद वो सुबह भारत के सिनेमा इतिहास की सबसे काली सुबह होती। लेकिन इसके बाद किस्मत ने राजू भटनागर को ज्यादा वक्त नहीं दिया। 9 जनवरी 1988 की रात एक मुखबिर की खबर लखनऊ पुलिस तक पहुंची कि राजू इलाहाबाद आ रहा है किसी नए शिकार की तैयारी में। तत्कालीन एसपी एसए सिंह काफी वक्त से राजू को पकड़ने की कोशिश कर रहे थे। इस बार उन्होंने ठान लिया आज आरपार होगा। 10 जनवरी की सुबह घना कोहरा फैला हुआ था। लोदर रोड पर पुलिस चप्पे-चप्पर पर तैनात थी। हर सिपाही अलर्ट, उंगली ट्रिगर पर और नजर सड़क पर और फिर कोहरे से दूर एक गाड़ी की हेडलाइट्स चमकी। वही पुरानी फिएट वही गाड़ी जो कभी सुखनंदन जैन की थी और अब राजू भटनागर की पहचान बन चुकी थी। बैरिकेड्स लगे थे।
गाड़ी को रुकना पड़ा। राजू समझ गया कि दूसरों को जाल में फंसाने वाला आज खुद पुलिस के जाल में फंस चुका है। लेकिन उसके हौसले इतने बुलंद थे कि वो किसी भी हालत में सरेंडर करने के मूड में नहीं था। दोनों तरफ से गोलियां चली। 10 मिनट तक लोधर रोड गोलियों की तड़तहट से इस तरह से गूंज रहा था जैसे पूरे 80 के दशक के उस आतंक का हिसाब चुकाया जा रहा हो। और फिर उस गाड़ी के भीतर से एक कमजोर सी आवाज आई बस अब खत्म। और इसी के साथ राजू भटनागर किडनैपिंग किंग उस सड़क पर हमेशा के लिए खत्म हो गया। वो फिएट जो उसकी शान की निशानी थी वही उसकी आखिरी जगह बनी। अपराध की दुनिया का एक बड़ा और खौफनाक अध्याय उस कोहरे भरी सुबह को हमेशा हमेशा के लिए बंद हो गया। और उधर मुंबई में बॉलीवुड के शहंशाह अमिताभ बच्चन अपनी अगली फिल्म की शूटिंग में मशगूल थे। शायद आज भी उन्हें नहीं पता कि एक रात उनके नाम पर इलाहाबाद [संगीत] की किसी कोठी में एक ऐसा प्लान बना था जिसे अगर अंजाम मिल जाता तो भारतीय सिनेमा का इतिहास कुछ और होता। तो कैसा लगा [संगीत] यह किस्सा? अगर आपको पसंद आया है इसे लाइक शेयर जरूर करिए। आज बस इतना ही। अगले एपिसोड में फिल्म शिकार वाला फिर लेकर आएगा बॉलीवुड का एक और हैरान कर देने वाला किस्सा। सच्चे अनसुने अनफिल्टर्ड किस्सों के लिए फिल्म चिकार वाला को अभी सब्सक्राइब करें और अपना और अपनों का रखें बेहद ख्याल। नमस्कारनमस्कार फिल्म शिकार वाला एक बार फिर पेश है एक ऐसा सच्चा किस्सा लेकर जिसे सुनकर किसी का भी दिमाग सुन पड़ जाएगा। कोई भी हैरान रह जाएगा। होशकता हो जाएंगे। ये किस्सा है बिग बी यानी अमिताभ बच्चन की किडनैपिंग का। सुनकर हैरान हो गए ना आप? लेकिन ये सच है। अमिताभ बच्चन के खिलाफ अंडरवर्ड की किडनैपिंग किंग ने एक बड़ी कास्परेसी [संगीत] की थी। अगर यह प्लान कामयाब हो जाता तो अमिताभ बच्चन की जिंदगी पड़ जाती खतरे में। और अपराध की दुनिया में जुड़ जाता सबसे खौफनाक बंदा। [हंसी] क्या था पूरा किस्सा इसे सुनाऊं? उससे पहले आपसे [संगीत] वही पुरानी गुजारिश करूंगा कि अगर आपको इस तरह के अनसुने अनफिटर्ड सच्चे किस्से सुनने हैं तो फिल्मची कार वाला चैनल को जरूर सब्सक्राइब करिए और बॉलीवुड के हर किस्सों से वाकिफ है।
[अचानक ज़ोर से सांस लेने की आवाज़] चलिए शुरू करते हैं महानायक के किडनैप की दिल दहलाने वाली कहानी 80 का दशक। [संगीत] हिंदुस्तान के सिनेमाघरों में एक ही नाम का तूफान था। पर्दे पे जब वो आता था तो सीटियां बजती थी। पर्दों पर सिक्के फेंके जाते थे। तालियां गूंजती थी और हर गली हर चौराहे पर बस एक ही नाम की चर्चा होती थी कि अमिताभ बच्चन जैसा कोई नहीं। वो सितारा जिसे देखने के लिए लोग रात भर लाइन में खड़े रहते थे। जिसके एक डायलॉग को करोड़ों जुबाने दोहराती थी। जिसकी एक झलक पाने के लिए भीड़ हो जाती थी दीवानी। लेकिन उसी दौर में उन्हीं चमकती रोशनियों के पीछे एक और दुनिया थी। अंधेरे की दुनिया जहां नाम फुसफुसा कर लिए जाते थे। जहां रात के अंधेरे में बड़े-बड़े सौदे होते थे और उस दुनिया में एक नाम था जो दहशत का पर्याय बन चुका था। राजू भटनागर द किडनैपिंग किंग। राजू भटनागर वो शख्स था जिसने अपहरण को एक साइंस बना दिया था। और एक दिन उस दिन जिसकी कल्पना भी कोई नहीं कर सकता। राजीव भटनागर के दिमाग में एक ऐसा ख्याल आया जिसे सुनकर उसके खुद के गुरे भी कांप गए थे। वो ख्याल था बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन को किडनैप करने का। राजू भटनागर ये नाम उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के कई बड़े व्यापारियों, उद्योगपतियों और रसूखदार लोगों की नींद उड़ा देता था। वो कोई साधारण अपराधी नहीं था। वो एक मास्टरमाइंड था। एक ठंडे दिमाग का लंबी सोच का बेरहम इरादे का। उसका तरीका दूसरे अपराधियों से बिल्कुल अलग था। कोई शोर नहीं, कोई हंगामा नहीं। बस एक परफेक्ट प्लान और उसका फ्लोलेस एजुकेशन। वो पहले अपने शिकार की पूरी जासूसी करता था कि शिकार कहां जाता है, कब निकलता है, कितनी सिक्योरिटी रहती है, और कौन-कौन करीबी है। हर छोटी सी छोटी जानकारी इकट्ठा होती थी। और फिर जब वो वार करता था तो शिकार को खबर भी नहीं होती थी कि वो जाल में फंस गया। उसकी कुछ खास वारदातें आज भी अंडरवर के लिए मिसाल है। जैसे अगस्त 1987 को सागर मध्य प्रदेश [संगीत] में इस किडनैपिंग किंग ने जिस वारदात को अंजाम दिया, वह आज भी लोकल लोगों की जुबान और ज़हन में बैठी हुई है। राजू ने एक बड़े बीड़ी व्यापारी सुखनंदन जैन को अपना निशाना बनाया। इस बीड़ी व्यापारी के किडनैप का प्लान झांसी में बैठकर बनाया गया और इसके बाद राजू ने खुद [संगीत] बिजनेसमैन बनकर फोन किया और सागर के एक होटल में डील करना तय हुआ। सुखनंदन जैन को होटल में बुलाया गया और होटल के बाहर से ही एक ही झटके में काम कर दिया कंप्लीट। यानी बिजनेसमैन सुखनंदन जैन राजू की पकड़ में आ गए। सुखनंदन जैन को उन्हीं की फिट कार में डालकर राजू भटनागर सागर से पन्ना अपने ठिकाने पर पहुंच गया। 22 दिन की कैद के बाद सुखनंदन जैन के परिवार से ₹5.5 लाख की फिरौती [संगीत] वसूली गई। उस जमाने में यह रकम आज के ₹1.5 करोड़ों के बराबर थी। फिरौती के अलावा राजू भटनागर ने बिजनेसमैन की फिएट कार भी रख ली। आगे चलकर यह फिएट का राजू भटनागर की बेंचमार्क बन गई है। और सबसे हैरानी की बात यह है कि पुलिस पूरे 22 दिन एक सुराग तक नहीं ढूंढ पाई। यह थी राजू भटनागर की काबिलियत और यही काबिलियत उसे एक ऐसे जुए की तरफ ले जाने वाली थी जिसे जीतना नामुमकिन था। लेकिन सुखनंदन जैन वाले किस्से से पहले एक और घटना है जो राजू के शातिर दिमाग को और बेपर्दा करती है। वो सुनाता हूं। मार्च 1986 नई दिल्ली हिंदुस्तान की सबसे सुरक्षित जेल तिहाड़ यहां एक साथ दो खतरनाक नाम बंद थे। एक था राजू भटनागर और दूसरा था दुनिया का सबसे कुख्यात ठग मर्डरर चार्ल्स शोभराज। चार्ल्स शोभराज वो शख्स था जिसने पूरी दुनिया में अपनी पहचान बनाकर धोखाधड़ी का एक नया अध्याय लिखा था। जिस पर 20 से ज्यादा लोगों की निर्मम हत्या का आरोप था। वो चाहता था कि वो तिहाड़ से फुल हो जाए। लेकिन इसके लिए तिहाड़ की उन दीवारों के पीछे उसे एक ऐसे दिमाग की जरूरत थी
जो जेल के भीतर का नेटवर्क जानता हो। और राजू भटनागर वही [संगीत] दिमाग था। दोनों की मुलाकात हुई और रची गई एक ऐसी साजिश जो भारत की सबसे सुरक्षित जेल तिहाड़ के लिए अब तक का सबसे बड़ा कलंक बन चुका है। 16 मार्च 1986 रविवार का दिन तिहाड़ की हाई सिक्योरिटी सेल [संगीत] में चार्ल्स चोबराज 11 दूसरे कैदियों के साथ फरार हो गया। जेल के सारे गार्ड्स को नशीली मिठाई खिलाकर बेहोश कर दिया [संगीत] गया। हर बेहोश सिपाही के हाथ में ₹50 का नोट था जैसे उनका मजाक उड़ाया गया हो। गेट की चाबियां गायब थी और बाहर राजू का नेटवर्क तैयार खड़ा था। देश की सबसे सुरक्षित जेल की दीवारें भी राजू के आगे बेबस [संगीत] हो गई। अब सोचिए कि ऐसा आदमी अगर किसी को निशाना बनाने के ठान ले तो कौन रोक सकता है उसे? और निशाना जब अमिताभ बच्चन हो तो कहानी किस मोड़ पर जाती है? इधर है अमिताभ बच्चन। महानायक अमिताभ बच्चन को किडनैप करने की कहानी बुनी गई इलाहाबाद यानी प्रयागराज में। ये षड्यंत्र तब सुना गया जब इलाहाबाद के कमरे में सिगरेट का धुआं छत को छू रहा था। रेडियो पे अमिताभ बच्चन का इंटरव्यू चल रहा था। वो आवाज जो पूरे हिंदुस्तान को दीवाना कर रही थी। वहीं राजू अपने गुरुओं के साथ किसी और बड़े शिकार की प्लानिंग में डूबा हुआ था। तभी किसी ने कहा कि आजकल तो बस एक ही नाम की चर्चा हो रही है। अमिताभ बच्चन और अमिताभ बच्चन अपने इलाहाबाद के ही हैं। राजू ने सिर उठाया, आंखें तिरछी हुई। दिमाग की उस मशीन ने एक नई कैलकुलेशन शुरू करी। अगर अमिताभ बच्चन को उठा लिया तो क्या होगा? पैसा तो मिलेगा। साथ ही पूरा देश भी हिल जाएगा। और इसके बाद जो नाम मिलेगा वो जरा के इतिहास में यानी काली दुनिया में इतिहास [संगीत] हो जाएगा। दर्ज हो जाएगा। उस रात इलाहाबाद की उस कोठरी में एक ऐसे प्लान की नीव पड़ी जो अगर कामयाब हो जाती तो शायद भारत का सिनेमा इतिहास और भारत की क्राइम हिस्ट्री दोनों ही कुछ और होते। प्लानिंग शुरू हुई बेहद सोच समझ के बेहद शातिराना तरीके से। यह राजू का स्टाइल था। जल्दबाजी नहीं, घबराहट नहीं। बस ठंडे दिमाग से एक-एक कदम। सबसे पहले काम था अमिताभ की पूरी जानकारी इकट्ठा करने का। हीरो के भरोसेमंद लोग मुंबई भेजे गए। उनका एक ही मिशन था अमिताभ बच्चन की दिनचर्या को समझना। वो कब घर से निकलते हैं? कहां शूटिंग करते हैं? कितने बॉडीगार्ड हैं? साथ कितने बॉडीगार्ड साथ रहते हैं? कौन-कौन उनके करीब है? और किन रास्तों से वह आते जाते हैं। हर छोटी सी छोटी जानकारी एक-एक कर इकट्ठा होती रही। लेकिन एक बड़ी दिक्कत थी अमिताभ की सिक्योरिटी इतनी टाइट थी कि दिलों का कोई भी आदमी सीधे उनके करीब नहीं पहुंच सका। और किडनैपिंग तभी हो सकती थी जब शिकार को उस जगह लाया जाए जहां आप चाहते हो। तब राजू के दिमाग में एक ऐसी तरकीब आई जो उसकी सोच की गहराई को बताती है। उसने एक उभरती हुई एक्ट्रेस को [संगीत] इस काम में शामिल किया। पैसा दिया, लालच दिया, उसे यह जिम्मेदारी दी कि किसी भी बहाने अमिताभ तक पहुंचना है। उन्हें इलाहाबाद के एक प्रोग्राम में चीफ गेस्ट बनाने के लिए राजी करना है। यह तरकीबक काम आ गई। एक्ट्रेस ने अमिताभ को इलाहाबाद आने के लिए राजी कर लिया। जब यह खबर राजू तक पहुंची तो उसकी आंखों में एक अजीब सी चमक आ गई। वो चमक जो किसी शिकारी की आंखों में तब आती है जब शिकार जाल के करीब आ जाता है। अब प्लानिंग का दूसरा और सबसे खतरनाक चरण शुरू हुआ। यह तय किया गया किडनैपिंग के बाद अमिताभ को कहां रखा जाएगा। किस रास्ते से ले जाया जाएगा। हर मोड़, हर चौक, हर संभावित पुलिस चेक पोस्ट का हिसाब लगाया गया। अगर कोई गड़बड़ हो तो अल्टरनेट प्लान क्या होगा वो भी तैयार किया गया। यह प्लान किसी हॉलीवुड थ्रिलर की स्क्रिप्ट से कम नहीं था। हर डिटेल इतनी [संगीत] बारीकी से सोची गई थी कि एक भी चूक की गुंजाइश नहीं थी। वहीं Fिएट कार जो सागर के बीड़ी व्यापारी से छीनी थी और जो राजू का बेंचमार्क बन चुकी थी [संगीत] उसे भी इस मिशन में तैयार रखा गया।
प्रोग्राम से एक शाम पहले राजू ने अपने सबसे भरोसेमंद आदमी से सब कंफर्म किया। जवाब था सब कुछ तय है। सब कुछ रेडी है। बस कल [संगीत] होने की देर है। राजू ने गहरी सांस ली। उस रात वो सो नहीं सका क्योंकि होने वाली अगली सुबह उसके पूरे करियर की सबसे बड़ी सुबह होने वाली थी। लेकिन इस कहानी में एक ऐसा मोड़ आया जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी। प्रोग्राम के दिन सुबह ही सुबह एक खबर आई। अमिताभ बच्चन ने इलाहाबाद आने से मना कर दिया। बस इतनी सी खबर, कोई एक्सप्लेनेशन नहीं, कोई वजह नहीं। एक सिंपल [संगीत] कैंसिलेशन। लेकिन उस एक कैंसिलेशन ने राजू के पूरे ताश [संगीत] के महल को एक झटके में ढहा दिया। वो कमरा जो रात भर उस बड़े प्लान की खुशी में जागा था अब वो भारी खामोशी से भर गया। राजू का चेहरा पत्थर की तरह हो गया। गुरे एक दूसरे को देख रहे थे लेकिन कोई बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। वो सपना जो कल रात आसमान छू रहा था। आज सुबह राख हो चुका था। आज तक कोई नहीं जानता कि आखिर अमिताभ ने वो प्रोग्राम कैंसिल क्यों किया? क्या उन्हें किसी ने आगाह किया था? क्या यह महज एक रूटीन कैंसिलेशन था [संगीत] या भगवान की मेहरबानी थी? यह रहस्य आज भी रहस्य है। लेकिन एक बात तय है उस दिन अमिताभ बच्चन ने अनजाने में अपनी जिंदगी बचाई थी। अगर वो इलाहाबाद पहुंच जाते तो शायद वो सुबह भारत के सिनेमा इतिहास की सबसे काली सुबह होती। लेकिन इसके बाद किस्मत ने राजू भटनागर को ज्यादा वक्त नहीं दिया। 9 जनवरी 1988 की रात एक मुखबिर की खबर लखनऊ पुलिस तक पहुंची कि राजू इलाहाबाद आ रहा है किसी नए शिकार की तैयारी में। तत्कालीन एसपी एसए सिंह काफी वक्त से राजू को पकड़ने की कोशिश कर रहे थे। इस बार उन्होंने ठान लिया आज आरपार होगा। 10 जनवरी की सुबह घना कोहरा फैला हुआ था। लोदर रोड पर पुलिस चप्पे-चप्पर पर तैनात थी। हर सिपाही अलर्ट, उंगली ट्रिगर पर और नजर सड़क पर और फिर कोहरे से दूर एक गाड़ी की हेडलाइट्स चमकी। वही पुरानी फिएट वही गाड़ी जो कभी सुखनंदन जैन की थी और अब राजू भटनागर की पहचान बन चुकी थी। बैरिकेड्स लगे थे। गाड़ी को रुकना पड़ा। राजू समझ गया कि दूसरों को जाल में फंसाने वाला आज खुद पुलिस के जाल में फंस चुका है। लेकिन उसके हौसले इतने बुलंद थे कि वो किसी भी हालत में सरेंडर करने के मूड में नहीं था। दोनों तरफ से गोलियां चली। 10 मिनट तक लोधर रोड गोलियों की तड़तहट से इस तरह से गूंज रहा था जैसे पूरे 80 के दशक के उस आतंक का हिसाब चुकाया जा रहा हो। और फिर उस गाड़ी के भीतर से एक कमजोर सी आवाज आई बस अब खत्म। और इसी के साथ राजू भटनागर किडनैपिंग किंग उस सड़क पर हमेशा के लिए खत्म हो गया। वो फिएट जो उसकी शान की निशानी थी वही उसकी आखिरी जगह बनी। अपराध की दुनिया का एक बड़ा और खौफनाक अध्याय उस कोहरे भरी सुबह को हमेशा हमेशा के लिए बंद हो गया। और उधर मुंबई में बॉलीवुड के शहंशाह अमिताभ बच्चन अपनी अगली फिल्म की शूटिंग में मशगूल थे। शायद आज भी उन्हें नहीं पता कि एक रात उनके नाम पर इलाहाबाद [संगीत] की किसी कोठी में एक ऐसा प्लान बना था जिसे अगर अंजाम मिल जाता तो भारतीय सिनेमा का इतिहास कुछ और होता। तो कैसा लगा [संगीत] यह किस्सा? अगर आपको पसंद आया है इसे लाइक शेयर जरूर करिए। आज बस इतना ही। अगले एपिसोड में फिल्म शिकार वाला फिर लेकर आएगा बॉलीवुड का एक और हैरान कर देने वाला किस्सा। सच्चे अनसुने अनफिल्टर्ड किस्सों के लिए फिल्म चिकार वाला को अभी सब्सक्राइब करें और अपना और अपनों का रखें बेहद ख्याल। नमस्कार