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भारत और नेपाल के बीच नए बॉर्डर विवाद का असली सच क्या है?

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क्या सच में नेपाल ने भारत की जमीन पर कब्जा कर लिया है? यह सवाल दोनों देशों के राजनीतिक गलियारों में गूंज रहा है। नेपाल के सबसे युवा प्रधानमंत्री बालन शाह ने अपनी ही संसद में खड़े होकर यह हैरान करने वाला दावा किया है। उनका बयान आते ही वहां बड़ा हंगामा मच गया। हालात ऐसे बन गए कि नेपाल के विदेश मंत्रालय को तुरंत डैमेज कंट्रोल के लिए मैदान में आना पड़ा। हम अक्सर सुनते आए हैं कि किसी बड़े देश ने अपने पड़ोसी की जमीन दबा ली। नेपाल भी हमेशा से यही आरोप लगाता रहा है। लेकिन इस बार कहानी पूरी तरह से उल्टी नजर आ रही है। नेपाल के प्रधानमंत्री खुद भरे सदन में कह रहे हैं कि उन्होंने भारत के इलाके में अतिक्रमण किया है। इस बयान ने सबको चौंका दिया। हर कोई जानना चाहता है कि आखिर इसके पीछे की असल वजह क्या है और सच्चाई क्या है? तो आज अनकही में हम इसी मुद्दे की पूरी तह तक जाएंगे। हम विस्तार से समझेंगे कि बालेंद्र शाह के इस दावे में कितना दम है।

हम यह भी डिकोड करेंगे कि कैसे उनका बयान कूटनीति तौर पर खुद नेपाल के लिए ही बड़ा नुकसान साबित हो रहा है। यह मामला सिर्फ आज का नहीं है। इसके तार बहुत पीछे जाते हैं। भारत और नेपाल के बीच 210 साल पुराना सीमा विवाद है। यह विवाद क्या है और बार-बार क्यों सुलग उठता है? इसके हर पहलू को समझेंगे। तो चलिए कहानी की शुरुआत वहीं से करते हैं जहां से यह विवाद खड़ा हुआ। नेपाल की राजनीति में इस बड़े बदलाव की नींव मार्च 2026 में पड़ी। जजी आंदोलन के बाद जब चुनाव हुए तो देश का सियासी नक्शा पूरी तरह बदल गया। बरसों से राज कर रही पार्टियां और पुराने नेता बुरी तरह हार गए। 35 साल के बालन शाह की अगुवाई में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ने दो तिहाई बहुमत हासिल करके सबको हैरान कर दिया। बालन शाह नेपाल के सबसे युवा प्रधानमंत्री बन गए। जनता को उनसे बहुत उम्मीदें थी। पीएम बनने के बाद सब कुछ लगभग ठीक-ठाक चल रहा था। लेकिन सत्ता संभालने के ठीक 65वें दिन यानी 31 मई को बड़ा मोड़ आया। बाल शाह संसद में अपना पहला भाषण देने पहुंचे। इसी दौरान कुछ सांसदों ने उनसे भारत और नेपाल के बीच चल रहे पुराने सीमा विवाद पर सवाल पूछ लिया। इसके जवाब में प्रधानमंत्री ने दो ऐसी बड़ी बातें कह दी जिसने पूरे देश में खलबली मचा दी। उन्होंने दावा किया कि प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्हें पता चला है कि सिर्फ भारत ने नेपाल की जमीन पर कब्जा नहीं किया है।

नेपाल ने भी कई जगहों पर भारत की जमीन दबा रखी है। बालशाह यहीं नहीं रुके। उन्होंने एक और बड़ा दावा कर दिया। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे को सुलझाने के लिए उनकी सरकार ने सिर्फ भारत और चीन से ही नहीं बल्कि ब्रिटेन की सरकार से भी बात की है। उनका तर्क था कि ब्रिटेन को इस मामले में दिलचस्पी लेनी चाहिए क्योंकि यह पूरा विवाद उसी दौर का है जब अंग्रेज इस क्षेत्र को छोड़कर गए थे। बाले का बयान आते ही संसद के अंदर जोरदार हंगामा शुरू हो गया। विपक्षी दल अपनी सीटों से उठकर विरोध करने लगे और उन्होंने तुरंत प्रधानमंत्री से इन दावों के सबूत मांग लिए। संसद के रिकॉर्ड से इस बयान को हटाने और प्रधानमंत्री से माफी मांगने की मांग तेज हो गई। नेपाल के पूर्व उप प्रधानमंत्री कमल थापा ने एक्स पर लिखा कि प्रधानमंत्री को जनता को साफ बताना चाहिए कि वह कौन सी जगह है और उसके क्या सबूत हैं। उन्हें तुरंत अपनी यह गलती सुधारनी चाहिए और सम्मान के साथ वह जमीन भारत को वापस लौटा देनी चाहिए। दूसरी तरफ विपक्षी पार्टी नेपाली कांग्रेस की नेता वासना थापा ने कहा कि किस जमीन पर अतिक्रमण हुआ है इसकी जानकारी हमें बहुत पहले मिल जानी चाहिए थी। यह एक गंभीर और आपत्तिजनक मुद्दा है। इसलिए इसे संसद के रिकॉर्ड से तुरंत हटाया जाए। हालांकि नेपाल में पत्रकारों और राजनयिकों के एक धड़े ने सीमा विवाद को इतनी मजबूती से उठाने के लिए प्रधानमंत्री की तारीफ भी की।

बालेंद्र शाह के दावे के बाद लोग सोचने लगे कि क्या वाकई नेपाल की तरफ से ऐसा कोई अतिक्रमण हुआ है? सच्चाई क्या है? इस बारे में आगे आपको बताऊंगी। लेकिन पहले यह सुनिए। संसद के हंगामे के बाद नेपाल सरकार के पसीने छूट गए। बालेन के बयान से जो रायता फैला उसे समेटने के लिए विदेश मंत्रालय को तुरंत सफाई देनी पड़ी। मंत्रालय ने कहा कि प्रधानमंत्री किसी विदेशी जमीन पर फौजी कब्जे की बात नहीं कर रहे थे। उनके कहने का मतलब केवल क्रॉस बॉर्डर ऑक्यूपेशन था। यानी सीमा पार रहने वाले आम नागरिकों का खेतीबाड़ी या रहने के लिए दूसरे देश की जमीन का इस्तेमाल करना। यह कोई सैन्य अतिक्रमण नहीं है जिसके लिए इतना बवाल काटा जाए। इस क्रॉस बॉर्डर ऑक्यूपेशन की असल वजह समझने के लिए हमें दोनों देशों की भौगोलिक स्थिति देखनी होगी। भारत और नेपाल के बीच करीब 10,751 कि.मी. लंबी सीमा लगती है। इसमें ऊंचे पहाड़ है, काली नदी है और बड़े समतल मैदान भी आते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि पूरी सीमा खुली हुई है। दोनों देशों के बीच कहीं भी फेंसिंग या तार की बाढ़ नहीं लगी है। जहां भी जमीन समतल है, वहां सीमा तय करने के लिए बॉर्डर पिलर लगाए गए हैं। नियम के मुताबिक पिलर के दोनों तरफ 10-10 गज की पट्टी खाली छोड़ी जाती है। इसे नो मैनस लैंड कहा जाता है और आम बोलचाल में इसे 10 गजा भी कहा जाता है। नियम यह है कि इस 10 गजा जमीन पर दोनों तरफ के नागरिकों को पक्के मकान बनाने, दुकान खोलने या खेती करने की इजाजत नहीं होती है। लेकिन बिहार से लगे सीमावर्ती इलाकों में जमीनी हकीकत कुछ और है। N 18 की रिपोर्ट के मुताबिक इंडोनेपाल बॉर्डर पर कई इलाकों में 500 मीटर की दूरी तक कोई पिलर मौजूद ही नहीं है। पिलर गायब है या लगाए ही नहीं गए। ऐसे में लोग धीरे-धीरे अपना कब्जा आगे बढ़ा लेते हैं। दोनों तरफ के किसान अपने खेत के साथ-साथ नो मैनस लैंड पर भी हलचला देते हैं

और वहां बुवाई कर लेते हैं। कई जगहों पर तो लोगों ने टिन के शेड डाल रखे हैं और वहां भैंस और बकरियां बांधी जाती हैं। सीमा पर अतिक्रमण की ऐसी खबरें अक्सर आती रहती हैं। 2018 में दैनिक भास्कर ने अपनी ग्राउंड रिपोर्ट में बताया था कि नेपाल के लोगों ने पश्चिमी चंपारण के करीब 7100 एकड़ इलाके में अवैध रूप से कब्जा जमा लिया है। इसी तरह 2022 में उत्तराखंड के चंपावत में भी 5 हेक्टेयर जमीन पर कब्जा करने की रिपोर्ट सामने आई। एसएसबी यानी सशस्त्र सीमा बल लगातार इसकी जानकारी गृह मंत्रालय को देती रही है। इसके अलावा अतिक्रमण को हटाने के लिए भारत की एसएसबी और नेपाल की सशस्त्र पुलिस समय-समय पर साझा अभियान भी चलाती हैं। दोनों देशों के सुरक्षा बल मिलकर लोगों को नो मैनस लैंड से पीछे हटाते हैं। यह पूरी तरह से स्थानीय नागरिकों से जुड़ा मामला है जिसे हमेशा आपसी बातचीत से सुलझा लिया जाता है। किसानों और आम लोगों के छोटे स्तर वाले इस अतिक्रमण को नेपाल के प्रधानमंत्री ने बिना सोचे समझे अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बना दिया। क्रॉस बॉर्डर ऑक्यूपेशन को सैन्य कब्ज़े की तरह पेश करके उन्होंने खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली। कूटनीतिक जानकारों की मानें तो यह नेपाल का बड़ा सेल्फ गोल है। प्रधानमंत्री के अति उत्साह नेपाल के सामने तीन बड़ी मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। सबसे बड़ी मुश्किल नेपाल की अपनी कूटनीतिक स्थिति का कमजोर होना। नेपाल हमेशा से लिपुलेख, लिंपिया धुरा और काला पानी को अपना हिस्सा बताता रहा है। इस विवाद में नेपाल दुनिया के सामने खुद को हमेशा पीड़ित बताता आया है। नेपाल का दावा रहा है कि भारत ने उसकी जमीन पर कब्जा किया है। अब जब प्रधानमंत्री खुद कह रहे हैं कि नेपाल ने भी भारत की जमीन दबाई है तो पूरी कहानी पलट जाती है। कूटनीतिक मंचों पर नेपाल का अपना केस बेहद कमजोर हो गया है। पूर्व उप प्रधानमंत्री कमल थापा ने भी यही कहा है कि प्रधानमंत्री का ऐसा बयान पूरी तरह गैर जिम्मेदाराना है। जब आप खुद अतिक्रमण की बात मान रहे हैं तो फिर आप पीड़ित कैसे हुए? दूसरी बड़ी मुश्किल ब्रिटेन को बीच में लाने का फ्लॉप आईडिया। बालन शाह के मुख्य सलाहकार कुमार बयांजंकर ने बाकायदा ब्रिटिश राजदूत रफ फैन से मुलाकात की थी। वो चाहते थे कि ब्रिटेन इस सीमा विवाद को सुलझाने में दखल दे। काठमांडू पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक ब्रिटेन ने इस मांग को ठुकरा दिया है। ब्रिटिश राजदूत ने साफ कर दिया कि यह दोनों देशों का आपसी मामला है और वह इसमें कोई दखल नहीं देना चाहते। भारत भी कभी नहीं चाहता कि उसके किसी भी सीमा विवाद में कोई तीसरा देश दखलंदाजी करे। भारत के पूर्व राजनायक कमल सिब्बल ने भी इस कदम पर हैरानी जताई है।

उन्होंने लिखा है कि ब्रिटेन को इस मामले में घसीटकर बालन शाह खुद अपने सर नई मुसीबत मोल ले रहे हैं। ब्रिटेन और भारत के रुख के बाद बालेन के इस तीसरे देश वाले सुझाव का कोई मतलब नहीं रह गया है। तीसरी मुश्किल बालन शाह की अपनी विश्वसनीयता को लेकर खड़ी हुई है। जेएनयू में प्रोफेसर और फॉरेन एक्सपर्ट डॉ. राजन कुमार का विश्लेषण बहुत अहम है। उनका कहना है कि बाल शाह का बयान अंतरराष्ट्रीय मामलों में उनकी नासमझी को दर्शाता है। वह आंदोलन से निकले युवा नेता हैं इसलिए उन्हें कूटनीति के अनुभव नहीं है। उन्हें बयान देने के पहले यह सोचना चाहिए कि इससे दोनों देशों के पारंपरिक रिश्तों पर क्या असर पड़ेगा। फिलहाल बालिन शाह के इस बयान पर भारत सरकार की तरफ से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। नई दिल्ली ने मामले पर चुप्पी साध रखी है। हालांकि कूटनीतिक गलियारों में चर्चा जरूर है कि भारत सरकार सही समय पर अपना रुख साफ करेगी। वैसे कुछ समय पहले जब सीमा विवाद को लेकर सवाल उठा था तब भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने एक अहम बात कही थी। उन्होंने कहा था कि नेपाल के यह क्षेत्रीय दावे ना तो सही है और ना ही किसी ऐतिहासिक तथ्य या सबूत पर आधारित है। भारत का यह स्टैंड आज भी उतना ही मजबूत है। लेकिन बात सिर्फ इस एक बयान की नहीं है। नेपाल में सत्ता संभालने के बाद पिछले 65 दिन के अंदर प्रधानमंत्री बालन शाह ने कई ऐसे फैसले लिए हैं जिन्होंने दोनों देशों के बीच पारंपरिक रिश्तों में तनाव बढ़ा दिया है। उन्होंने एक-एक करके ऐसे कदम उठाए हैं जिन्हें कूटनीतिक हलकों में भारत विरोधी माना जा रहा है। पहला कदम उन्होंने भारतीय राजदूत को लेकर उठाया। नेपाल में यह स्थापित परंपरा रही है कि नया प्रधानमंत्री बनने के बाद भारतीय राजदूत से अलग से शिष्टाचार मुलाकात की जाती है। लेकिन बालन शाह ने इस परंपरा को तोड़ दिया। उन्होंने भारतीय राजदूत को कोई विशेष तरजीह नहीं दी और सभी देशों के राजदूतों के साथ सामूहिक मुलाकात की। इससे यह संदेश गया कि उनकी सरकार भारत के साथ किसी भी तरह के विशेष संबंध को तवज्जो नहीं देना चाहती। चलिए ठीक है। दूसरा बदलाव उनके विदेश दौरे को लेकर है। नेपाल का इतिहास रहा है कि वहां का कोई भी नया प्रधानमंत्री अपने पहले विदेशी दौरे के लिए भारत को ही चुनता है। बाल शाह ने कार्यभार संभालते ही अजीब घोषणा कर दी कि वो एक साल तक दुनिया के किसी भी देश के आधिकारिक दौरे पर नहीं जाएंगे। उन्होंने इस पुरानी कूटनीतिक परंपरा को पूरी तरह दरकिनार कर दिया। अब एक साल बाद वो कहां जाएंगे यह तो देखना होगा।

तीसरा फैसला आर्थिक मोर्चे पर सीधा असर डालने वाला है। बालन सरकार ने भारत से नेपाल ले जाए जाने वाले 100 से ज्यादा के हर सामान पर भंसार यानी कस्टम ड्यूटी लगा दी है। इससे सीमावर्ती इलाकों में व्यापार करने वाले लोगों और आम जनता की जेब पर असर पड़ रहा है। जिस वजह से उन्होंने अपनी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। कई जगह फैसले के विरोध में प्रदर्शन हुए लेकिन बाल शाह पीछे हटने को तैयार नहीं है। चौथा झटका उन्होंने तब दिया जब मई 2026 में भारत के विदेश सचिव विक्रम मिश्री नेपाल के दौरे पर जाने वाले थे। वो बालन शाह को भारत आने का आधिकारिक न्योता देने का मन बना चुके थे। लेकिन नेपाल की तरफ से विदेश सचिव को मुलाकात का समय ही नहीं दिया गया। जिसकी वजह से भारतीय विदेश सचिव का यह अहम दौरा आखिरी वक्त पर रद्द करना पड़ा। पांचवा मामला आगामी 4 जुलाई से शुरू होने वाली मानसरोवर यात्रा से जुड़ा है। इस यात्रा के लिए भारतीय श्रद्धालु उत्तराखंड के लिपुलेख पास से होते हुए तिब्बत जाते हैं। नेपाली विदेश मंत्रालय ने इस साल की यात्रा पर आपत्ति जता दी है। उनका दावा है कि लिपुलेख उनका इलाका है। इसके लिए उन्होंने भारत और चीन दोनों को चिट्ठी लिखकर अपना रुख साफ कर दिया। यह सभी फैसले बताते हैं कि बालन शाह का भारत को लेकर क्या स्टैंड है। पर जानकारों का मानना है कि नेपाल के विदेश मंत्रालय ने प्रधानमंत्री के बयान पर जो सफाई दी है, उसी वजह से भारत अभी इस मामले को ज्यादा तूल नहीं देना चाहता। भारत और नेपाल के बीच का सीमा विवाद असल में उतना जटिल नहीं है क्योंकि दोनों देशों के बीच खुली सीमा है। वैसे इसी बीच एक नई हलचल भी देखने को मिली है। बाल शाह की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के अध्यक्ष रवि लामछा ने पांच जिलों के भारत दौरे पर आए हुए हैं। 2 जून को वह बीजेपी मुख्यालय पहुंचे जहां उनका भव्य स्वागत किया गया। इसके बाद बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन से उनकी मुलाकात हुई। बीजेपी अध्यक्ष ने ही आरएसपी अध्यक्ष को भारत आने का न्योता दिया था। इस मुलाकात का मकसद दोनों दलों के बीच औपचारिक राजनीतिक बातचीत शुरू करना, संगठनात्मक अनुभवों को साझा करना और नेपाल भारत के संबंधों को और बेहतर करना है। नेपाल की राजनीति में अचानक आई यह तल्खी और कूटनीतिक बदलाव रातोंरात पैदा नहीं हुए हैं। नए नेताओं के तीखे तेवरों को समझने के लिए हमें इतिहास के पन्नों को पलटना होगा। भारत और नेपाल के बीच ये जमीनी विवाद करीब 210 साल पुराना है। जैसा मैंने शुरू में आपको बताया। इस विवाद के केंद्र में आते हैं उत्तराखंड से लगे तीन अहम इलाके। लिंपियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी। यह पूरा क्षेत्र लगभग 338 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। क्षेत्रफल के हिसाब से देखें तो यह छत्तीसगढ़ के रायपुर शहर जितना बड़ा इलाका है। नेपाल इस हिस्से को अपना बताता है। वहीं भारत शुरू से ही नेपाल के इस दावे को खारिज करता आया है। इस विवाद की जड़ 1816 में हुई सुगोली संधि में छिपी है। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के राजा के बीच ये ऐतिहासिक समझौता हुआ था। इस संधि में काली नदी को दोनों देशों की सीमा मान लिया गया और तय यह हुआ कि काली नदी के पश्चिम का हिस्सा भारत का होगा। नदी के पूर्व वाला इलाका नेपाल के हिस्से में आएगा। तो वैसे तो यह बंटवारा बेहद आसान लगता है पर असली पेच काली नदी के उद्गम को लेकर फंसा हुआ है। यह नदी पहाड़ों से निकलती है और इसकी दो अलग-अलग धाराएं हैं। आगे जाकर ये दोनों धाराएं आपस में मिल जाती हैं।

तो दोनों देशों के बीच असल झगड़ा इसी बात पर है कि नदी की असली शुरुआत कहां से होती है। पहाड़ी नदी होने के कारण इसके रास्ते में हमेशा प्राकृतिक बदलाव होता रहता है जिससे सीमा तय करने में दिक्कत आती है। भारत का मानना है कि काली नदी की पूर्वी धारा से ही असली नदी शुरू होती है जो काला पानी से निकलती है। इसलिए भारत काला पानी को सीमा का शुरुआती बिंदु मानता है। लेकिन नेपाल का दावा बिल्कुल अलग है। वो कहता है कि नदी पश्चिमी धारा से शुरू होती है जो लिंपिया धुरा से निकलती है। इसी आधार पर नेपाल लिंपिया धुरा, लिपुलेख और कालापानी को अपना इलाका मानता है। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में मौजूद काला पानी भारत के लिए रणनीतिक रूप से बहुत अहम है। मानसरोवर जाने वाले तीर्थ यात्री भी इसी इलाके के लिपुलेख दर्रे से होकर गुजरते हैं। सबसे अहम बात यह कि ऊंचाई पर होने के कारण यहां से चीनी सेना पर नजर रखना बेहद आसान हो जाता है। इसलिए चीन भी इस इलाके को लेकर नेपाल को भड़काता रहता है। 1962 में जब भारत और चीन का युद्ध हुआ तब सुरक्षा कारणों से लिपुलेख दर्रे को बंद कर दिया गया था। कई दशकों तक यह रास्ता बंद ही रहा। 2015 में भारत और चीन के बीच सहमति बनी तब इस दर्रे को व्यापार और तीर्थ यात्रा के लिए दोबारा खोल दिया गया। नेपाल ने उस वक्त भी इस फैसले पर अपनी नाराजगी जताई थी। इस विवाद ने बड़ा रूप मई 2020 में लिया।

भारत ने कैलाश मानसरोवर यात्रा को आसान बनाने के लिए बड़ा कदम उठाया। भारत सरकार ने पिथौरागढ़ से लेकर लिपुलेख दर्रे तक 80 कि.मी. लंबी सड़क का निर्माण कर दिया। इसके बनने से नेपाल सरकार भड़क गई और उसने कड़ा विरोध दर्ज कराया। नेपाल के विरोध पर उस समय के भारतीय थल सेना अध्यक्ष एमएम नरवण ने बयान दिया था। उनका दावा था कि नेपाल ही सब किसी और के बहकावे में आकर कर रहा है। उनका इशारा पूरी तरह से चीन की तरफ था। ठीक इस बयान के बाद जून 2020 में नेपाल की संसद ने देश का नया नक्शा पास कर दिया जिसमें लिंपियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी को नेपाल का हिस्सा दिखा दिया। नेपाल के इस कदम पर भारतीय विदेश मंत्रालय ने तुरंत आपत्ति जताई। भारत ने साफ कर दिया कि नेपाल का दावा ऐतिहासिक तथ्यों और सबूतों पर आधारित नहीं है। दोनों देशों के बीच तल्खी आज भी उसी तरह बरकरार है। हालांकि भारत और नेपाल का रिश्ता सदियों पुराना है। दोनों देशों के बीच रोटी बेटी का अटूट नाता माना जाता रहा है। दोनों देशों के बीच पूरी सीमा खुली हुई है। इसलिए किसानों और स्थानीय लोगों के बीच छोटे-मोटे जमीनी विवाद होना बहुत आम बात है। इस तरह के मामलों को हमेशा आपसी बातचीत से सुलझा लिया जाता है। नेपाल के प्रधानमंत्री बालिन शाह का हालिया बयान इस छोटे से विवाद को बड़ा बनाने की कोशिश रखता है। या उनके जैसे युवा और अनुभवहीन नेता की जल्दबाजी भी हो सकती है। फिर भी भारत को कूटनीतिक मोर्चे पर बहुत सर्क रहने की जरूरत है। चीन हमेशा इसी ताक में रहता है कि वह इस तरह के आपसी विवाद का पूरा फायदा उठाएं। आपको क्या लगता है नेपाल के प्रधानमंत्री का बयान उनकी नासमझी है या किसी बड़ी चाल का हिस्सा? आप अपनी राय कमेंट सेक्शन में लिखकर हमें जरूर भेजें।

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