अटलांटिक महासागर के दक्षिण में एक छोटा सा हिस्सा जिसने दुनिया को ऐसे ऐसे जख्म दिए जिसे भूल पाना आसान नहीं था। जिसने न जाने कितने जहाज और विमान को अपने आगोश मिले जिसने दुनिया को एक ऐसा रहस्य दिया जो सालों तक विज्ञान और वैज्ञानिकों के लिए चुनौती बना रहा जिसके किलर मैकेनिज्म से पूरी दुनिया डरती रही। लेकिन आज उसी रहस्यमई दुनिया के रहस्य से पर्दा उठ गया है। जहाजों और विमानों को निगलने वाले दानव का सच अब दुनिया के सामने आ गया है और वो दानव कोई और नहीं बल्कि बरमूडा ट्रायंगल। [संगीत] दुनिया के सबसे रहस्यमई इलाकों में गिने जाने वाले बरमूडा ट्रायंगल को लेकर वैज्ञानिकों ने एक बड़ा दावा किया। या यूं कहें कि वैज्ञानिकों ने बरमूडा ट्रायंगल के रहस्य को सुलझाने का दावा कर दिया है। बताएंगे आपको क्या था उसका अन्न सुलझा रहस्य जिससे पर्दा उठा है।
लेकिन बरमूडा ट्रायंगल के रहस्य और इसे लेकर सदियों पुरानी पहेलियों को समझने से पहले इसकी भौगोलिक स्थिति जान लीजिए। करीब 39 लाख वर्ग किलोमीटर के समुद्री इलाके में फैले इस आभासी ट्रायंगल के तीन कोनों पर तीन अमेरिकी द्वीप है फ्लोरिडा, बरमूडा और प्योटोिको। हालांकि इसकी सीमा को लेकर वैज्ञानिकों में एक राय नहीं है, लेकिन इस ट्रायंगल के भीतर जो होता है वो सबको एक जैसा ही चौंकाता है। इसकी शुरुआत होती है 15वीं शताब्दी से। जब दुनिया ने इसके रहस्य और खौफ के बारे में सुना और जाना था। जिसके बाद यह सवाल बन गया कि आखिर बरमूडा द्वीप लाखों वर्षों से समुद्र तल से इतना ऊपर कैसे टिका हुआ है? जबकि वहां का ज्वालामुखी सिस्टम करोड़ों साल पहले शांत हो चुका है। 13 सितंबर 1492 यह वो साल था जब दुनिया ने पहली बार इसके बारे में सुना था। क्रिस्टोफर कोलंबस जो कि स्पेन के राजा का विशेष दूत था।
उन्होंने ही अमेरिका की खोज की थी। इस खोज यात्रा के दौरान क्रिस्टोफर कोलंबस जब अटलांटिक महासागर के दक्षिणी हिस्से में पहुंचे तो उसे कुछ अजीब सी चीजें महसूस हुई जो कि अब तक की समुद्री यात्रा में कभी भी दिखाई नहीं दी थी जिस पर रिसर्च करके उन्होंने इसके बारे में बताया। क्रिस्टोफर कोलंबस जब अटलांटिक महासागर के दक्षिणी हिस्से में पहुंचे तो उनके जहाज में लगा चुंबकीय कंपास अचानक दिशा बदलने लगा। समुद्र की लहरों के साथ रहस्यमई रोशनी दिखाई पड़ने लगी। अचानक सतह से उठती 50 फीट तक ऊंची समुद्री लहरें देखी जाने लगी। ऐसे ही अनुभवों के बाद इस समुद्री इलाके को पहले अटलांटिक महासागर का कब्रिस्तान और फिर बरमूडा ट्रायंगल जैसा नाम दे दिया गया और साल 1964 में एक किताब में बरमूडा ट्रायंगल का पहला जिक्र होता है। यह किताब उन रहस्यमई हादसों के दस्तावेज थी जिन्होंने अटलांटिक महासागर के इस हिस्से को बेहद खतरनाक साबित किया था। इसमें एक हादसा तो अमेरिका के फ्लाइट 19 बेड़े का था।
दूसरे विश्व युद्ध के समय में अमेरिकी नौसेना के पांच हाईटेक बम वर्षक विमान जिस तरह इस समुद्री क्षेत्र में गायब हुए उससे पूरी [संगीत] दुनिया हैरान रही। सवाल था कि वो हादसा जहाजों के नेविगेशन सिस्टम खराब होने से हुआ या अचानक हरा मौसम के कारण या फिर यह एक मानवीय भूल है। सालों तक बने रहस्य को जानने के लिए वैज्ञानिकों ने अलग-अलग तरीके से रिसर्च की। समंदर की हलचल से लेकर ग्रेविटी के बारे में सारे के सारे फार्मूले को फिर से चेक किया। लेकिन उस राज तक नहीं पहुंच पाए जिसकी तलाश वह कर रहे थे। साल बीतता गया। रिसर्च का तरीका भी बदल गया। इसी के साथ-साथ वह बीत भी गया।
फिर वैज्ञानिक को एक ऐसा रहस्य मिला जिससे इसकी गु्थी पूरे तौर पर सुलझ गई। वैज्ञानिकों को समुद्र के नीचे एक ऐसी भूवैज्ञानिक संरचना मिली है। यानी समुद्र के अंदर जमीन की ऐसी बनावट पता चली है जिसे इस रहस्य की सबसे बड़ी कड़ी माना जा रहा है। अमेरिका के कारनेगी इंस्टट्यूट फॉर साइंस और गेल यूनिवर्सिटी से जुड़े वैज्ञानिकों की टीम ने आधुनिक सिस्मिक तकनीक और गहरे भूवर्गीय नमूनों की मदद से यह अध्ययन किया। शोधकर्ताओं को बरमूडा के नीचे समुद्री क्रस्ट के ठीक नीचे लगभग 12 मील से अधिक मोटी एक हल्की और कम घनत्व वाली चट्टानी परत मिली है। वैज्ञानिकों के मुताबिक यह संरचना किसी विशाल राफ्ट या तैरते प्लेटफार्म की तरह काम कर रही है जो पूरे द्वीप को ऊपर टिकाए हुए आमतौर पर हवाई जैसे ज्वालामुखी द्वीप मैंटल प्लम के ऊपर बनते हैं। यानी कि धरती के मेंटल से उठने वाला बेहद गर्म चट्टानों का गुबार जो समुद्र तल को ऊपर की ओर धकेलता है। लेकिन समय के साथ जब टेक्टॉनिक प्लेटें खिसकती हैं तो ज्वालामुखी ठंडे होते हैं तो ये द्वीप वापस नीचे धंसने लगते हैं।
लेकिन बरमूडा के साथ ऐसा नहीं है। इस गु्थी को सुलझाने के लिए वैज्ञानिकों ने दुनिया भर में आने वाले बड़े भूकंपों से पैदा होने वाली सिस्मिक वेव की गहनता से जांच की और पाया कि जब यह तरंगे धरती के भीतर से गुजरती हैं तो चट्टानों के घनत्व के हिसाब से उनकी गति कम या ज्यादा होती जाती है। फिर बरमूडा पर लगे एक भूकंपीय स्टेशन के डाटा का इस्तेमाल करके शोधकर्ताओं ने द्वीप के नीचे करीब 20 मील गहराई तक धरती के अंदरूनी हिस्से की तस्वीर तैयार की और अपनी रिसर्च का दायरा बढ़ाया। रिसर्च के दौरान वैज्ञानिकों के होश उस वक्त उड़ गए जब उन्हें समुद्री क्रस्ट के ठीक नीचे 12 मील से भी ज्यादा मोटी एक अजीबोगरीब चट्टान की परत मिली। यह चट्टान अपने आसपास मौजूद मेंटल प्लम की तुलना में बहुत हल्की और कम घनत्व वाली है। यानी नीचे से ऊपर धकेलने वाले सामान्य मेंटल प्लम की बजाय यह हल्की चट्टान एक बड़ी राफ्ट यानी प्लेटफार्म की तरह काम कर रही है। यह समुद्री तल को ऊपर उठाए रखती है।
ऐसी संरचना पृथ्वी पर कहीं और देखने को नहीं मिलती है। यही कारण है कि इधर से गुजरने वाले जहाज कभी-कभी इसके ट्रैप में फंस जाते हैं क्योंकि वह समंदर के अंदर बने इस चट्टानी राफ्ट को समझ ही नहीं पाते। इसीलिए वो राफ्ट के बीच में फंस जाते हैं और डूब जाते हैं। क्या वैज्ञानिकों के इस दावे से बरमूडा ट्रायंगल के रहस्य से पर्दा उठ गया है? क्या वैज्ञानिकों की इस थ्यरी को ही अब सच माना जाएगा? क्योंकि इस थ्योरी को देने वाले जो वैज्ञानिक हैं उनमें से एक ने यह बात कही जिसके बाद से कई और भी सवाल उठने लगे हैं। बरमूडा ट्रायंगल की मिस्ट्री [संगीत] को सॉल्व करने वाले वैज्ञानिकों ने अपनी थ्योरी को दुनिया के सामने रख तो दिया है लेकिन उन्होंने एक ऐसा दावा भी किया है जो लोगों के मन में कई सवाल पैदा कर रहा है। दरअसल वैज्ञानिकों ने साफ किया है कि उनकी रिसर्च सीधे तौर पर बरमूडा ट्रायंगल में जहाजों और विमानों के रहस्यमई तरीके से गायब होने की व्याख्या नहीं करती। फिर भी शोधकर्ताओं का मानना है कि इस विशाल भूवैज्ञानिक ढांचे के कारण इस क्षेत्र के गुरुत्वाकर्षण और चुंबकीय क्षेत्र में कई विसंगतियां हो सकती हैं। लेकिन वैज्ञानिक अब भी खराब मौसम, मानवीय त्रुटि और समुद्र के नीचे से निकलने वाली मीथेन गैस को [संगीत] हादसों की बड़ी वजह मानते हैं।
अटलांटिक महासागर का यह समुद्री हिस्सा डरावना है। इस पर कोई संदेह नहीं है। समुद्री हलचल यहां जितनी सामने दिखाई देती है, उससे कहीं ज्यादा अदृश्य होती है। यानी हमें समुद्र के रुख का अंदाजा तक नहीं होता और पलक झपकते ही पूरा का पूरा दृश्य बदल जाता है और इसी को लेकर अलग-अलग वैज्ञानिकों ने अपनी अलग-अलग रिसर्च थ्योरी भी दी है। साल 2010 में भी एक अमेरिकी रिसर्च संस्था एनओए ने एक रिपोर्ट जारी की थी, जिसमें कहा गया था कि यहां कोई रहस्यमई घटना नहीं है। अमेरिकी रिसर्च संस्था एनओए ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि इसके पीछे की वजह गल्फ स्ट्रीम में अचानक मौसम बदल जाना है। साथ ही रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि इसके पीछे का कारण कैरीबियाई टापूओं का जटिल जाल है जो बड़ी तेजी से अपने पास आने वाली चीजों को खींचता है। जिसकी वजह से चुंबकीय गड़बड़ियां हो जाती हैं जो कंपस को गुमराह कर देती हैं। कई बार इतनी अधिक वायुमंडलीय उथल-पुथल होती है कि समुद्र में 50 फीट ऊंची लहरें उठने लगती हैं। इसके साथ एक डर भी हावी होता है ना। जब कोई इस क्षेत्र से गुजरते हैं, मौसम खराब होते ही या नेविगेशन सिस्टम में हलचल दिखते ही मनोवैज्ञानिक दबाव इतना तेज हो जाता है कि मानवीय फूल की संभावनाएं काफी ज्यादा बढ़ जाती हैं। ब्यूरो रिपोर्ट जी