काला पत्थर गैंग्स ऑफ वासीपुर कोयलांचल गुंडे मिशन रानीगंज जिनकी कहानी कोयला खदानों और उनमें काम करने वाले कामगारों या मजदूरों की जिंदगी के इर्द-गिर्द बुनी होती है। कोयला खदानों को संभालना उनका संचालन करना कितना चुनौतीपूर्ण होता है। [संगीत] एसईसीएल यानी साउथ ईस्टर्न कोल फील्ड्स लिमिटेड के सीएमडी श्री [संगीत] हरीश दोहन जी इस समय अगर मैं आपसे पूछूं कि इस समय वर्तमान में हालात क्या है? तो आम आदमी को परेशान होने की बिल्कुल आवश्यकता नहीं है। मैं कॉन्फिडेंटली बोल सकता हूं।
हम कोयला खदानों की [संगीत] या कोयले की बात करते हैं। नेगेटिव लाइट में ही दिखाया गया है कि भाई वो मजदूरों की जिंदगी भी बहुत खराब है या एक्सप्लॉयटेशन है। ये है जो हमारे कामगार या साथी थे पहले जिन परिस्थितियों में वो रहते थे या कार्य करते थे। आज वो परिस्थितियां बिल्कुल चेंज हो गई हैं। एक कोयला खनिक की जिंदगी कैसी होती है? जनरल असिस्टेंट से लेके और सीएमडी तक सब उस सेम ट्रीटमेंट के हकदार हैं। 1000 फुट से ज्यादा गहराई में काम करता है। तो निश्चिंत होके कार्य करता है कि उसके साथ में उसका [संगीत] जो सुपरवाइजर्स हैं, उसके जो मैनेजर्स हैं, वो उसको केयर उसकी सेफ्टी का ध्यान रखते हैं। कितनी मेहनत करके वो कोयला निकाला जा रहा होगा।
बाकी लोग जब रेस्ट करते होंगे तो हमारा खनिक उस टाइम भी कहीं ना कहीं अपना मेहनत से राष्ट्र को रोशन करना और उसको आगे बढ़ाने का काम करते हैं। मुझे गर्व है [संगीत] मैं भी एक कनिक हूं। एक-एक व्यक्ति [संगीत] की चिंता भी करनी है। पूरे भारत का एक तरह से मिनी इंडिया पूरे कोल इंडस्ट्री में रहता है। कोयला खदान उसके काम में क्या है? महिलाओं का कितना प्रतिशत भागीदारी है? कोल इंडस्ट्री अगर सर्वाइव कर रही है तो महिला शक्ति नारी शक्ति की वजह से ही है। चैलेंजेस क्या-क्या [संगीत] हैं आपके काम में? लैंड। आप एनवायरमेंट फ्रेंडली नहीं है। एससीएल का सीएसआर में या कम्युनिटी डेवलपमेंट में क्या योगदान है? क्या कर रहे हैं आप लोग?
जो पेरेंट्स अकेले पड़ जाते हैं उनके लिए हम लोगों ने एक ऐसा प्लान हमारे बिलासपुर में किया है कि वो एक साथ बैठ सके एक साथ अपने खेल सकें बातचीत कर सकें हंस बोल सके अगर किसी एक कामगार की कोई एक कहानी आप हम सबके साथ शेयर करना चाहे जो कि वो फौजी की तरह अपने परिवार को और उसको ना देख के वो माइंड्स में अगर उसको रिक्वायर्ड है कि 3 दिन 6 दिन 7 दिन रहना है तो अपने काम को कंप्लीट करके ही बाहर आता है। काला पत्थर, गैंग्स ऑफ वासीपुर, कोयलांचल, गुंडे, मिशन रानीगंज। यह तमाम फिल्में और सीरीज हैं जिनकी कहानी कोयला खदानों और उनमें काम करने वाले कामगारों या मजदूरों की जिंदगी के इर्दगिर्द बुनी होती हैं।
तो ऐसा लगता है हमारे फिल्म मेकर्स के लिए कोयला खदान और वहां के मजदूरों की जिंदगी काफी एक इंटरेस्टिंग और एक्साइटिंग टॉपिक होता है। लेकिन असल जिंदगी में हकीकत में कोयला खदानों को संभालना उनका संचालन करना वहां काम कर रहे कामगारों की जिंदगी में एक सार्थक बदलाव लाना कितना चुनौतीपूर्ण होता है और इस समय जो वैश्विक हालात हैं उसमें यह चुनौती और कितनी ज्यादा बढ़ गई है इन सब बातों पर चर्चा करने के लिए आज मेरे साथ जुड़ रहे हैं एक बहुत ही खास मेहमान एसईसीएल यानी साउथ ईस्टर्न कोल फील्ड्स लिमिटेड के सीएमडी डी श्री हरीश दुहन जी और हरीश दुहन जी इन दिनों वेस्टर्न कोल फील्ड लिमिटेड के सीएमडी का भी अतिरिक्त कार्यभार संभाल रहे हैं और मैं आपको बता दूं कि एसईसीएल जो मैंने बताया साउथ ईस्टर्न कोल फील्ड लिमिटेड ये हमारे देश की दूसरी सबसे बड़ी कोल्ड प्रोडक्शन कंपनी है। बहुत-बहुत स्वागत है दुहान जी आपका। बहुत-बहुत धन्यवाद और आपका जो प्रश्न है बिल्कुल पूरा राष्ट्र उसमें आज के दिन अफेक्टेड है और हमारी गवर्नमेंट पूरी तरह सेंसिटिव है अभी क्लियर डायरेक्शंस हैं कोल कंपनीज को कि आप अपना उत्पादन भी बढ़ाएं और जो पॉलिसीज हैं उनको भी ई आउट करें हम ताकि हमारे राज्य सरकार के द्वारा थ्रू हम कोयला जहां भी जरूरत है वहां पे हम लोग प्रोवाइड कर पाएं। तो एनर्जी सिक्योरिटी के
फील्ड में हम लोगों का यह प्रयास है कि कोई भी ऐसा ऑर्गेनाइजेशन या घर तक पहुंचे तो कहीं भी अगर जरूरत है कोयले की तो वो हम कोयला प्रोवाइड कर पाएं। गवर्नमेंट की अभी यही सोच है। बट इस समय अगर मैं आपसे पूछूं कि इस समय वर्तमान में हालात क्या हैं? कितना सीरियस से क्या कई बार ऐसा लगता है ना कि हम ज्यादा गंभीर उसको सोच रहे हैं उतना गंभीर नहीं है उतने खराब हालात है या नहीं नहीं जो हमारे ऑनरेबल प्राइम मिनिस्टर साहब या गवर्नमेंट ने जो असेसमेंट्स हैं इमीडिएट ऐसे कोई हालात नहीं है हम हमारे पास लेकिन आने वाले समय में अगर ये लॉन्ग टर्म जो वॉर है वो चलता है तो उसका इंपैक्ट डेफिनेटली आएगा और वो इंपैक्ट आएगा हमारे पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स पे और जो उससे रिलेटेड गैस एंड अदर थिंग्स। तो इन पे जैसे ही इंपैक्ट आएगा तो जो एनर्जी सिक्योरिटी हमारे बहुत सारे ऊर्जा के या एनर्जी के लिए प्लांट्स हैं गैस बेस्ड हैं। तो वहां पे दिक्कतें आएंगी। जो हमारा पेट्रोलियम से जितना भी हमारी इंडस्ट्रीज या बाकी जगह चक्का चलता है हम वहां पे इंपैक्ट आएगा। लेकिन हमारा प्रयास है कि हम लोग उसको मैक्स मिनिमाइज करें इस इंपैक्ट को और कोयले के द्वारा उसकी पूर्ति करें। क्योंकि बहुत सारे लोग जैसे अगर शहरों में जो मजदूर काम करते हैं हम सुन रहे हैं कि भाई एलपीजी नहीं मिल रही है तो अब गांव जा रहे हैं कि वहां चूल्हे पर खाना बना लेंगे तो मुझे लगता है
कि वो पुराना एक बैकअप ऑप्शन उनका तैयार है। मुझे लगता है ये थोड़ा सा ज्यादा सेंसिटिव लोग हो रहे हैं। इतनी अभी परिस्थितियां वैसी नहीं है। गवर्नमेंट ने बहुत सारे स्टेप्स लिए हैं और आज के दिन एलपीजी की भी कमी नहीं है और डोमेस्टिक पे तो बिल्कुल ही कमी नहीं है। सिर्फ कमर्शियल पे कुछ कंट्रोल अवश्य सरकार ने किया है। हम तो आम आदमी को परेशान होने की बिल्कुल आवश्यकता नहीं है। मैं कॉन्फिडेंटली बोल सकता हूं। क्या बात है। अच्छा हरीश जी क्या होता है ना जैसे मैंने कुछ फिल्मों सीरीज के नाम लिए तो जब हम कोयला खदानों की या कोयले की बात करते हैं तो या तो एक वो बहुत टेक्निकल हो जाता है कि कितना उत्पादन और सब आंकड़ों में चली जाती है बात जिससे आम आदमी को उतना लेना देना नहीं होता। या फिर जब हम ये क्रिएटिविटी की बात करते हैं तो इसमें हमेशा आप देखेंगे नेगेटिव लाइट में ही दिखाया गया है कि भाई वो मजदूरों की जिंदगी भी बहुत खराब है या एक्सप्लइटेशन है ये है वहां क्या काम हो रहा है या क्या मेहनत हो रही है या उस जिंदगी को बदलने की ओवर द इयर्स कितनी कोशिश हुई है उसकी बात कम होती है चाहूंगी थोड़ा आप उस पर बात करें बिल्कुल बहुत अच्छा प्रश्न है और मैं भी चाहता था कि हमारे जो भी दर्शक हैं या पूरा राष्ट्र इसको समझे कोयले का जैसे ही नाम आता है वो हम लोग काला काला पत्थर और उससे शुरू हो जाते हैं। ये अवश्य थी वो भी दुनिया थी जब कोयला वैसे ही निकलता था। लेकिन ओवर दी टाइम्स जो मैनुअल माइनिंग थी बिल्कुल कंप्लीटली बंद है। अभी अब पूरा या तो सेमी मैकनाइज्ड है या मैकेनाइज्ड है। अच्छा हर क्षेत्र में जो प्रगति हुई है और जो अंडरग्राउंड में पहले हमारे साथी जाते थे उनके लिए जो सेफ्टी एंड गैजेट्स वो भी पहले उतने विकसित नहीं थे अवेलेबल नहीं थे।
आज के दिन अगर कोई जाता है अंडरग्राउंड तो ही नोस कि वहां पे क्या परिस्थितियां हैं। अगर कोई भी चीजें परिवर्तन होती हैं जियोलॉजिकल चेंजेस अंडरग्राउंड में डेफिनेटली हो सकते हैं तो वो एप्रिहेंड पहले से हो जाती हैं। हमारे पास साइंटिफिक टूल्स आज के दिन अवेलेबल हैं। अच्छा तो आज की माइनिंग एक साइंटिफिक माइनिंग हो गई है। और जो हमारे कामगार या साथी थे पहले जिन परिस्थितियों में वो रहते थे या कार्य करते थे आज वो परिस्थितियां बिल्कुल चेंज हो गई हैं। हमारे कोल वर्कर्स को बहुत अच्छी सैलरी मिलती है। उनको उनकी सेफ्टी और सिक्योरिटी को कंसर्न करते हुए इंश्योरेंस एंड अदर थिंग्स बहुत ही सफिशिएंट है। साथ में जो घर और परिवार बाकी लोगों के लिए वेलफेयर जो स्कीम्स अभी भारत सरकार की तरफ से और कोयला कंपनियों की तरफ से हैं। उनको फ्री एजुकेशन मतलब स्कूल्स हैं वहां पे फ्री एजुकेशन इन द सेंस नॉट फ्री टोटली बट सब्सिडाइज्ड हम बहुत अच्छे-अच्छे स्कूल्स हैं डीपीएस डीएवी सेंट्रल स्कूल्स केंद्रीय विद्यालय सब कुछ अभी कॉलोनीज में अवेलेबल हैं। अच्छा तो रिमोट एरियाज में रहते हुए भी परिवार बच्चे पूरी तरह से एजुकेशन के लिए वहां पर अपना पार्टिसिपेट करते हैं और बहुत सारे बच्चे आज के दिन में जो हमारे बेस्ट ऑफ द बेस्ट इंस्टीटशंस हैं उनमें एंट्रेंस एग्जाम के थ्रू क्रॉस भी करते हैं पास भी करते हैं। साथ में मेडिकल फैसिलिटीज पहले जैसे था कि दूर दूरस्थ इलाका है तो कोई एक आध डॉक्टर हुआ तो हुआ वैसा नहीं। आज हमारे हर एक जोन में बड़े हॉस्पिटल्स भी बनाए हुए हैं और हर जो माइंस हैं वहां पे एक मिनी हॉस्पिटल या डिस्पेंसरी अवश्य है। हमारे जितने भी कर्मी हैं उनको पूरे भारत में सिलेक्टेड मोस्ट ऑफ दी जो बेस्ट मेडिकल हॉस्पिटल्स हैं वहां पे वो ट्रीटमेंट के हकदार हैं। हम तो आज के दिन वो पीछे नहीं है। जो कोलकर्मी है पहले जो पीछे माना जाता था या उसका परिवार उसको बिल्कुल सोचने की या टेंशन दिमाग में नहीं है
कि मेरा क्या होगा? बच्चों का क्या होगा या मेरे परिवार का क्या होगा या मुझे कोई इंसिडेंट एक्सीडेंट या ऐसा हुआ तो उसका इलाज कहां पे होगा? तो बेस्ट ऑफ द बेस्ट एजुकेशन एंड बेस्ट ऑफ द बेस्ट उसको ट्रीटमेंट अवेलेबल है। इसमें बिल्कुल जो सबसे निचले स्तर का जो मजदूर है उसको भी सारे फायदे मिल रहे हैं। बिल्कुल ये एक फर्स्ट जो कैटेगरी वन हमारा है जनरल असिस्टेंट से लेके और सीएमडी तक सब उस सेम ट्रीटमेंट के हकदार हैं। तो अगर मैं आपसे पूछूं एक कोयला खनिक की जिंदगी कैसी होती है? क्योंकि जैसे मैं बार-बार वो कह रही हूं ना कि हम लोग तो सिर्फ एक कंटेंट देखते हैं और उससे अनुमान लगाते हैं। लेकिन असल में क्या है आज के दिन उनकी जिंदगी? बिल्कुल कोयला बाकी लोगों के लिए जैसे ही कोयले का नाम होता है एक काला जो पत्थर है उस टाइप की फीलिंग आती है कि काला होता है और उसके तहत उसके बिहाइंड आपने जो प्रश्न किया है बहुत अच्छा है कि वो खनिक उसमें कितनी मेहनत करता है अंडरग्राउंड माइंस की हमारे दो तरह से कोयला भारत में निकलता है या तो अंडरग्राउंड माइंस के थ्रू या ओपन कास्ट माइंस के थ्रू अंडरग्राउंड माइंस में जब वह अंडरग्राउंड जाता है तो वह जो आदमी है उसके दिल में यह रहता है कि मैं जा रहा हूं तो मैं कहीं ना कहीं जो कोयला उत्पादन या मेहनत मैं कर रहा हूं उससे हमारा जो बिजली है हमारी इंडस्ट्रीज हैं हर घर में जो सुविधाएं हैं वो उससे बनने वाली हैं। तो उसी शिद्दत के साथ वो जाता है और नीचे जाके जब तीन 300 मीटर नीचे या उससे ज्यादा भी गहराई में वो काम करता है। 000 फुट से ज्यादा गहराई में काम करता है तो निश्चिंत होके कार्य करता है कि उसके साथ में उसका जो सुपरवाइजर्स हैं उसके जो मैनेजर्स हैं वो उसको केयर उसकी सेफ्टी का ध्यान रखते हैं और यह कमिटमेंट जो है यह हमारे हर वर्कर के साथ होता है। तो वो अपना पसीना बहाता है, मेहनत करता है। मैं तो इसको इस वे में लेता हूं कि जैसे वह फौजी हमारे पूरी बॉर्डर की हमारी सिक्योरिटी करते हैं तो एनर्जी सिक्योरिटी हमारा खनिक करता है। 24 घंटे कार्यकर्ता है। बाकी लोग जब रेस्ट करते होंगे तो हमारा कनिक उस टाइम भी कहीं ना कहीं अपना मेहनत से राष्ट्र को रोशन करना और उसको आगे बढ़ाने का काम करता है। वाकई और हम लोगों को हम लोग जब महानगरों में बैठे होते हैं तो सब कंफर्ट्स में बैठे होते हैं। शायद नहीं समझ पाते कि कितनी मेहनत करके वो कोयला निकाला जा रहा होगा। मुझे गर्व है उस इंडस्ट्री से हैं या मैं भी एक खनिक हूं। इस पे मुझे पूर्ण रीति से गर्व है। और जिस मेहनत से हमारे पूरे साथी काम करते हैं वो एग्जांपल है एक तरह से।
ना सर्दी ना गर्मी बारिश हर मौसम में कार्य करते हैं। हमारे जो ओपन कास्ट माइंस हैं उसमें बिल्कुल ओपन में रहते हैं। आप 46 48 डिग्री टेंपरेचर में भी काम करते हैं। म गॉड बारिश होती है। लोग सोचते हैं कि बारिश है तो घर के अंदर बैठ के पकोड़े चाय पिए। लेकिन हमारे साथी उसमें भी मेहनत करते हैं और सबका तात्पर्य ये होता है कि राष्ट्र को जो ऊर्जा की आवश्यकता है जो हमारे कल कारखाने इंडस्ट्री चलती हैं उनकी पूर्ति हम लोग कर पाएं। मैं आपको बताना चाहता हूं कि कोविड के समय में भी सब तरफ बंदी थी। लोग घरों में थे लेकिन हमारे जो साथी थे पूरी शिद्दत के साथ काम किया है। किसी भी दिन कोई माइंड्स बंद नहीं हुई। अपनी परवाह उन्होंने कम की और पूरे जो राष्ट्र की आवश्यकता थी उसके आधार पर काम किया है। वी आर ऑल प्राउड कि हमारे इतना राष्ट्र की जैसी आवश्यकता है हमारे साथियों ने पूर्ण रीति से [गला साफ़ करने की आवाज़] उसको पूरा किया है। और मैं सच कहूं तो हम इतने लोगों के इंटरव्यू करते हैं हरीश [गला साफ़ करने की आवाज़] जी। लेकिन आपको देख के मुझे महसूस हो रहा है कि आप सिर्फ एक कंपनी के सीएमडी नहीं हैं। आप शायद हर उस बिल्कुल हर कहते हैं ना पर्सन एट द एंड ऑफ द लाइन उसके लिए महसूस करते हैं। शायद उनके साथ आप इंटरेक्ट भी करते हो। कोई अपना कोई बहुत पर्सनल इंटरेक्शन या कोई एक्सपीरियंस किसी मजदूर कामगार के साथ जो आपको लगता है कि कहीं ना कहीं आपके ज़हन में बस गया है। ऐसे बहुत सारे एग्जांपल्स हैं। मैं ग्रास रूट से जब से ज्वाइन किया कोल इंडस्ट्री तब से हमारे इनिशियल पीरियड में तो बिल्कुल उनके साथ ही काम करते थे। क्लोजली एसोसिएट होते थे। इतनी हार्डस कंडीशंस हैं, डिफिकल्ट कंडीशंस हैं। कहीं ना कहीं डेफिनेटली अंडरग्राउंड माइंड्स में अनसर्टेनिटी भी रहती है, रिस्क भी रहता है। लेकिन आप जाएं वहां पे जब पहुंच जाते हैं तो जो माहौल होता है उसमें कहीं टेंशन नहीं होती। वो लोग एक दूसरे का हंसी मजाक करते हुए और उस रीति से ही काम करते हैं। मैं स्टार्टिंग का बताता हूं।
आज से 35 साल पहले के आसपास की बात रही होगी। अंडरग्राउंड माइंस थी। इतनी टेक्नोलॉजी नहीं थी। तो चीजों को अह जो प्री पहले से हम लोग अह पता कर लेते हैं कि क्योंकि कोल माइंस हैं अंडरग्राउंड हैं। हम कोल में हीटिंग हो जाती है। तो उसकी वजह से कहीं पे किस ज़ोन में फायर भी हो जाती है। आज के दिन में बहुत इजी है उसको जानना पहचानना। तब वो टेक्नोलॉजी नहीं थी। तो माइन में एक पोर्शन में कहीं पे ये पता चला कि धुआ अंडरग्राउंड माइन थी। ये कर रहे हैं। तो उसको क्लोज करना था। आइसोलेट करना था हमें। हम और वो काम डिफरेंट गैलरीज होती हैं जैसे टनल्स होती हैं हम तो उनको मल्टीपल को आपको क्लोज करना पड़ता है। तो इतना इंपॉर्टेंट और आपको फास्ट करना है। अदरवाइज वो स्प्रेड हो जाएगी फायर। बहुत हवा उसमें माइंड में चलती है। तो जैसे ऐसी आवश्यकता में जब प्लान किया गया जो भी लीडर्स थे वहां पे और हम भी उसका पार्ट थे। तो लगातार तीन दिन तक जो टीम्स बनी थी वह ऊपर कोई नहीं आया। वहीं पे लगातार वो 72 घंटे काम किए। जब कंप्लीट उसको क्लोज कर पाए तब वो ऊपर चढ़े। तो ऐसे बहुत सारे एग्जांपल्स हैं जब आवश्यकता पड़ने पे लोगों ने बहुत मेहनत की है और यह नहीं देखा कि परिवार वेट कर रहा है कि बच्चे हैं। बहुत शानदार अनुभव रहे हैं। मैं कोविड का जैसे बताया उस टाइम पे सब लोग तरफ एक मैसेज था, डर था, भय था। लेकिन हम लोगों ने अपने टीम से बात किया, परिवारों से, महिलाओं से स्पेशली उनको कॉन्फिडेंस दिलाया कि हम पूरी प्रिकॉशंस लेके काम करेंगे। उनको मास्क देना, उनको बाकी जो मेडिसिंस के प्रिपेयरनेस करना, कोई किसी को इंपैक्ट हो जाता है तो उसके साथ मतलब देना, खड़े रहना उसी विश्वास की बदौलत हमारे साथी उस टाइम पे काम कर पाए और सिर्फ साथी नहीं हमने उस पीरियड में हमारे जो आसपास की कम्युनिटीज थी क्योंकि बाकी रोजगार नहीं रहते हैं जो हमारे काम करते हैं। लोग जो अटैच रहते हैं जो नॉट डायरेक्टली कनेक्टेड विद माइनिंग। तो उन लोगों के लिए भी हमारे सब लोगों ने मिलके इंडस्ट्री एज अ होल तो डेफिनेटली किया ही उनको खाना पीना देना उनको दवाइयां देना मास्क देना या बाकी केयर लेना वो रेगुलर बेसिस पे हुआ ताकि आसपास के लोग भी जुड़े और वो भी उसके बाद जैसी आवश्यकता थी जो कोयले का लक्ष्य था
सबने मिलके पाया और आसपास के लोगों ने भी उसमें सहयोग पूर्ण रीति से दिया। मैं चाहूंगी एक बार थोड़ा सा क्योंकि मैं हमने ये तो बता दिया कि भ देश की दूसरी सबसे बड़ी कोल्ड प्रोडक्शन कंपनी है एसईसीएल लेकिन जितनी सब आप बात कर रहे हैं कितने चैलेंजेस हैं एसईसीएल के बारे में हम थोड़ा और जानना चाहेंगे और आपकी जो आपके साथ-साथ जो पूरी लीडरशिप है आप लोग कैसे ये इंश्योर करते हैं कि भाई कोल का प्रोडक्शन भी ऊपर रखना है लेकिन जब एक-एक व्यक्ति की चिंता भी करनी है अपनी टीम को संभालकर साथ लेकर चलना है तो थोड़ा कंपनी के बारे में और वो आपकी पूरी लीडरशिप की विचारधारा के बारे में बताएं। एससीएल बिल्कुल भारत के मध्य में स्थित कंपनी है। बिलासपुर हेड क्वार्टर है और दूसरी सबसे बड़ी कोयला उत्पादन कंपनी है भारत की ये। हम लोग लास्ट ईयर 167 मिलियन टन प्रोडक्शन किया था इसने और इस बार उससे अधिक ऑलरेडी कर चुके हैं और आगे भी जो भी लक्ष्य है उसको पाने के लिए हमारे साथी कार्यरत हैं। जहां तक ये एससीएल है टोटल दो स्टेट में इसके कार्य क्षेत्र हैं। छत्तीसगढ़ एवं मध्य प्रदेश 10 से अधिक जिले हैं। टोटल 60 60 माइंस में यह माइनिंग ऑपरेशंस आज चल रहे हैं। इतना बड़ा जो एरिया है या वर्किंग है स्पैन है उसमें काम करने वाले लोग भी डिफरेंट रीजन से हैं। डिफरेंट पूरे भारत का एक तरह से मिनी इंडिया पूरे कोल इंडस्ट्री में रहता है। साउथ नॉर्थ ईस्ट सब जगह से लोग कार्य करते हैं। एक साथ मिलके कार्य करते हैं। तो जब यह कार्य होता है तो इसका जो टॉप हम लोग प्लान करते हैं एक क्लेरिटी ऑफ़ थॉट हमारे टीम्स को रहता है और मैं अपनी कार्य पद्धति बताना चाहता हूं। हमारे ऑनरेबल मिनिस्टर सर ने भी हमें उसके लिए मोटिवेट किया था कि चिंतन शिविर करें। मंथन करें आप लोग। तो हम लोगों ने अपने ग्रास रूट लेवल तक इनवॉल्व करके अपना चिंतन शिविर किया और जो सुझाव आए कि कैसे हम लोग और आगे बेहतर कर सकते हैं। कोयला उत्पादन में अपनी एफिशिएंसी बढ़ा सकते हैं या जो भी कार्य हमारा है उसमें हर क्षेत्र में चाहे वो वेलफेयर अम्युनिटी से रिलेटेड हो चाहे कोयला उत्पादन से सब मिलके हम लोगों ने मंथन उस पे किया और उस स्ट्रेटजी को लेके हम लोग आगे बढ़ रहे हैं। एक बार क्लेरिटी ऑफ थॉट हो जाए लोगों पे और रिस्पांसिबिलिटी फिक्स हो जाए कि कौन-कौन किस क्षेत्र में कैसे कार्य करेगा और किस प्रोजेक्ट को क्या-क्या करना है। उस डिजाइन से जब काम करते हैं तो एक क्लेरिटी भी होती है और ट्रस्ट भी होता है, विश्वास होता है अपने टीम के ऊपर कि हां जो टॉप मैनेजमेंट है और बाकी जितना टीम मेंबर्स हैं सब लोग इक्वली कंट्रीब्यूट कर रहे हैं। सबकी अहमियत उतनी ही है। जिस क्लेरिटी ऑफ़ थॉट के साथ काम होता है, तो लोग मिलके आगे बढ़ते हैं और बहुत अच्छे-अच्छे रिजल्ट आते हैं। आप लगातार माइनिंग इंडस्ट्री से ही जुड़े रहे। आपने करियर पूरा इसी में जी। आपके लिए अगर मैं कहूं कि हर इंडस्ट्री हमें कुछ सिखाती है। लाइफ लेसन होता है वो। सिर्फ एक एकेडमिक या प्रोफेशनल नहीं। आपके लाइफ लेसंस क्या रहे इतने सालों में? सबसे इंपॉर्टेंट जो शिक्षा मिलती है कि हम लोग कैसे एक साथ मिलके जो मिरेकल कैसे कर सकते हैं वो इस इंडस्ट्री से सिखाया कि डिफरेंट बिलीफ वाले लोग डिफरेंट रीजन से आए हुए लोग जब एक साथ मिलते हैं तो उनके साथ कैसे हम लोग सामंजस्य बिठाएं और कैसे उनको एक टीम का एक इंपॉर्टेंट मेंबर बना के काम करें तो वह फीलिंग यहां से सीखा है कि एक एकजुट होकर कार्य करना और उससे जो रिजल्ट आते हैं वह जब लोगों को मिलते हैं तो डेफिनेटली दे आर मोटिवेटेड। तो सबसे इंपॉर्टेंट पार्ट मुझे तो यही लगी कि हम लोग एकजुट होके एक एक मत होके और एक क्लेरिटी ऑफ थॉट के साथ जब काम करते हैं एक दूसरे पर विश्वास करते हैं तो डेफ बहुत अच्छे-अच्छे रिजल्ट्स आते हैं। बट आपके खदान के जो कामगार होते होंगे वह तो ज्यादातर स्थानीय ही सब लोकल होते हैं लोग या मजदूर जो क्योंकि यह भारत सरकार का उपक्रम है और इसमें सभी जगह से लोग आते हैं लेकिन हम जो
आसपास के लोग हैं जिनकी जमीनें जाती हैं उनके लिए एंप्लॉयमेंट के लिए सेपरेट प्रोविजंस है। तो अभी उनकी संख्या डेफिनेटली ज्यादा है। ठीक है। एक महिला होने के नाते मुझे हमेशा एक सबसे बड़ी एक सवाल मेरे मन में रहता है। हम वुमेन वर्क फोर्स की बात करें अगर एसईसीएल में खासतौर पर और वैसे भी थोड़ा मुझे आप एक ओवरव्यू दीजिएगा कोयला खदान उसके काम में क्या है महिलाओं का कितना प्रतिशत भागीदारी है मैं क्योंकि सॉरी क्योंकि क्योंकि थोड़ा खतरनाक काम भी है। रिस्क इनवॉल्वड है इसमें। बिल्कुल आप जो वर्ड बोल रहे हैं इसी के हिसाब से मैं बोलना चाहता हूं कि कोल इंडस्ट्री अगर सर्वाइव कर रही है हम तो महिला शक्ति नारी शक्ति की वजह से ही है क्योंकि पहले जब परिस्थितियां हमारी टेक्नोलॉजी या बाकी चीजें उतनी नहीं थी तब महिलाएं डायरेक्टली इन्वॉल्व नहीं थी प्रोडक्शन में बट वो पीछे से जो शक्ति देती थी कि जो मेरी पूजा है मेरी मेरी प्रार्थना है उसमें उसके भरोसे आप जाइए एंड आप सुरक्षित आएंगे कोयला निकाल के तो नारी शक्ति वहां पे भी थी साथ में लेकिन समय के साथ हम लोगों ने काफी अपने माइंडसेट भी चेंज किया है कि मेल डोमिनेटेड के साथ हमारी फीमेल्स भी इक्वली इंपॉर्टेंट है कोल इंडस्ट्री के लिए और स्ट्रक्चरल चेंजज़ भी लाए हैं। आज के दिन मैं एससीएल का या कोल इंडस्ट्री का बता सकता हूं। हर क्षेत्र में हमारी महिलाओं की भागीदारी है। अच्छा चाहे वो अंडरग्राउंड में माइनिंग इंजीनियर हैं। अच्छा चाहे हमारी एचआर डेफिनेटली हैं। हमारी एनवायरमेंटल मैनेजमेंट में टीम में महिलाएं हैं। लीड रोल्स में बता रहा हूं। फाइनेंस में तो पहले भी थी और दे आर स्टिल कंटिन्यूइंग। संख्या जरूर बढ़ रही है। हेल्थ सेक्टर में हमारे जो डॉक्टर्स या पैरामेडिकल स्टाफ है डेफिनेटली बहुत महिलाएं हैं। हम लोगों ने एससीएल में एक इनिशिएटिव लिया 2000 इसी फाइनेंसियल ईयर में ही एक पहली हमने एक हमारी जो मिनी हॉस्पिटल बोलिए एक डिस्पेंसरी को फुल्ली वुमेन हेडेड बनाया है। हम उसमें डॉक्टर्स, पैरामेडिकल स्टाफ, फार्मासिस्ट एंड सभी जो महिलाएं हैं और वह बहुत सक्सेसफुली रन कर रहा है। दे आर गिविंग वन ऑफ द बेस्ट ट्रीटमेंट्स। दूसरा हमने एक इनिशिएटिव लिया है कि हमारे जो सेंट्रल स्टोर है जहां पे हमारे हैवी मशीनंस चलते हैं। उनके स्पेयर पार्ट्स का मैनेजमेंट का रहता है। हम इन्वेंटरी मैनेजमेंट वो पार्ट में भी हमने जो सबसे बड़ा हमारा सेंट्रल स्टोर था। महिलाओं को उसमें एक रिस्पांसिबिलिटी दिया लीड रोल से लेके एव्री पार्ट तो वो मैनेजमेंट भी दे आर डूइंग सक्सेसफुली हमारे साथ में जो महिलाओं के लिए हम लोगों ने एक और प्रयास हम लोग कर रहे हैं। इसी जो वुमस डे है एथ को ही हमने एक अनाउंस किया है। धरा शक्ति एक प्रोजेक्ट हमने अनाउंस किया और उसका जो प्रयोजन है वह यही है कि जो हमारी महिलाएं चाहे वो लैंड हाउस के तौर पे या डिपेंडेंट एंप्लॉयमेंट के तौर पे हमारी इंडस्ट्रीज में अभी उतने मेजर रोल में नहीं है। हम हमने एक टीम कॉन्स्टिट्यूट किया है। हम वह उनको जाके मोटिवेट करेंगे और उनको मेन स्ट्रीम के रोल्स जो हैं हम एक्चुअल जो हमारे मशीनंस जो चलाने वाले रोल में वर्क में या फिर हमारी जो मशीनंस का मेंटेनेंस रखरखाव जो करती हैं वहां पे हम चाहते हैं कि हमारी महिलाएं आए तो ये एक प्रोजेक्ट का अनाउंस ऑलरेडी हम लोग इस वर्ष से स्टार्ट किए हैं धरा शक्ति और पूरी तरह हम मोटिवेटेड हैं कि अभी जैसे हमने ये प्रोजेक्ट लिया है सेंट्रल स्टोर डिस्पेंसरी हमारा एक और मिशन हम लोगों ने लिया था। तो आने वाले समय में जो हमारा माइनिंग का की रोल है जो कोर सेक्टर है वहां पे भी हमारी महिलाएं एक्टिव रहेंगी और जो 240 टन के डंपर हैं जो आज के दिन सिर्फ पुरुष ही चलाते हैं वो भी हमारी महिलाएं चलाएं। ये विज़न के साथ हम लोग कार्य कर रहे हैं। वाह क्या बात है। और मुझे पूर्ण विश्वास है कि हमारी महिलाएं जब से जब आसमान अंतरिक्ष तक चली गई हैं और एरोप्लेन भी उड़ा रही हैं तो ये माइनिंग में भी वो 240 टन के डंपर और 42 क्यूब मीटर के शावल वो भी जलाएंगी और उसी मिशन के साथ हम लोग आगे बढ़ रहे हैं। वी आर जस्ट गिविंग देम अपॉर्चुनिटी क्या? दे आर ऑलरेडी एमावर्ड शक्ति है उनमें। एससीएल परिवार कितना बड़ा है? हमारे पास टोटल आज के दिन अराउंड 6ाउज वर्क फोर्स है और उसमें से अराउंड 35 36 जो हैं एससीएल के मेन एंप्लाइजज़ हैं जो डायरेक्ट रोल पे हैं। साथ में जो हमारे एजेंसीज आउटसोर्सिंग एजेंसीज काम करते हैं। बैलेंस उनके साथ अटैच है। बट दे आर इक्वली पार्ट ऑफ दे ऑल फैसिलिटीज आर बीइंग सिंडिकेट। सो इम नॉट रोंग आज देश लगभग कितना 1 बिलियन टन कोल प्रोडक्शन कर रहा है। 1 बिलियन टन ऑलरेडी हम क्रॉस कर चुके हैं। पिछले वर्ष भी किया था और इस वर्ष भी किए हैं। यह बहुत बड़ा अचीवमेंट है राष्ट्र के लिए। हम और मैं बताना चाहता हूं हम पूरे विश्व में दूसरे नंबर पर हैं जो ये अचीवमेंट कर पा रहे हैं। इतना जो कोयला
उत्पादन कर पा रहे हैं। हम हमारे यह संभव हुआ है। हमारी गवर्नमेंट ने जो पॉलिसीज लाए हैं ई ऑफ डूइंग बिजनेस के पॉइंट ऑफ व्यू से भी साथ में जो क्लीयरेंस होते हैं स्टचुरी क्लीयरेंस पहले बहुत रेड टैपिज्म था लेकिन धीरे-धीरे ग्रेजुअली काफी इज आउट किया गया है विद मेंटेनिंग ऑल स्टैंडर्ड्स तो ये बहुत हेल्प किया है इसमें और मुझे पूर्ण विश्वास है आने वाले समय में हम लोग 1 बिलियन 1.5 मिलियन 2 मिलियन 2 बिलियन टन तक जाएंगे यानी 1 बिलियन मींस 100 करोड़ टन उत्पादन भारत आज कर रहा है और इसको को और आगे बढ़ाए। और इसमें एससीएल की क्या भूमिका रहेगी? इसमें एससीएल की भूमिका आज भी जो हमारे रिजर्व्स हैं 16% के आसपास रिजर्व्स हैं और पूरे भारत में एससीएल आज भी 16 से 17% अपना कंट्रीब्यूशन दे रहा है और आने वाले समय में यह कंट्रीब्यूशन मोर देन 20% रहेगा। इसी डायरेक्शन में टीम एससीएल वर्क कर रही है। चैलेंजेस क्या-क्या हैं आपके काम में? सबसे ज्यादा जैसे अभी वर्किंग्स हैं कोल माइंस में। ओपन कास्ट माइं ज्यादा अभी प्रोडक्शन हो रहा है और वहां की सबसे इंपॉर्टेंट रिसोर्सेज होती है जमीन लैंड लैंड लेने के लिए हमारे पास कानून तो हैं कोल बेयरिंग एक्ट के तहत भारत सरकार उस जमीन को अधिकृत कर लेती है लेकिन जो फिजिकल पजेशन लेना होता है हम वो सबसे चैलेंजिंग जॉब होता है क्योंकि वहां पे बहुत सारे लोग काम कर रहे होते हैं गांव होते हैं हम खेती हो रही होती है तो उन लोगों को एक विनविन सिचुएशन क्रिएट करना उनको खुशीखुशी वो शिफ्ट हो उस जगह से। यह काम जो है यह हमारी माइनिंग इंडस्ट्री करती है और इसमें राज्य सरकार पूर्ण रीति से सहयोग करती है। जैसे एससीएल में मैं बताऊं कि हम लोगों ने पिछले वर्ष सिर्फ 29 हेक्टेयर जमीन लिया था और इस वर्ष 300 हेक्टेयर जमीन फिजिकल पजेशन में हम लोग ले चुके हैं और इसमें बहुत बड़ा सहयोग राज्य सरकार का भी रहा। इसका मतलब है कि उस जगह पर जो हमारे मेगा प्रोजेक्ट्स हैं एक हेक्टेयर जमीन में वन मिलियन टन कोल ऑलरेडी अवेलेबल है। इतने अच्छे वो रिजर्व्स हैं। लेकिन साथ में हमने गांव शिफ्ट किए हैं। लेकिन उनको साथ लेके किए हैं। उनके साथ संवाद करके किए हैं। उनकी जो भी नीड्स थी उनके बच्चों के हिसाब से वो एनवायरमेंट क्रिएट करके किए हैं। स्कूल्स बनाना हुआ चाहे हेल्थ पॉइंट ऑफ व्यू से भी है। पूरा केयर करते हुए हमने किया है और इसमें राज्य सरकार साथ मिलके रहती है। अच्छा तो हर एक को उस माहौल क्रिएट करना उनसे एक विश्वास अर्जित करना ये बहुत अहम बात होती है और यही हमारे साथी हमारे जो ग्राउंड लेवल पे काम कर रहे हैं वो उस रीति से काम करते हैं और तभी खुशी-खुशी लोग अपना जमीन कोयला देते हैं। तो आज की तारीख में अगर मैं आपसे पूछूं कि देश का कुल बिजली जो लागत है हमारी वो कितना कोयले से पूरी होती है। आज के दिन में 70 से 72% जो है बिजली वो हमारे कोयले से ही आती है। हमारे पास अभी भी नॉन रिलबिल एनर्जी, सोलर एनर्जी ये बढ़ रही है। हम लेकिन ग्रिड की जो स्टेबिलिटी है या 24 आवर्स जो बिजली की उपलब्धता है वो कोयले से ही संभव है। हम हमारे जितने भी अक्षेत्र राज कार्य कर रहे हैं उनका भारत सरकार का भी यही डायरेक्टिव है कि हम लोग कोयले को क्योंकि हमारे पास सफिशिएंट रिजर्व्स अवेलेबल हैं कोल के। उसको हम लोग निकालें और ये सस्ता भी स्रोत है। हम हम तो इस आधार पे आने वाले समय में और भी कोयला उत्पादन बढ़ेगा। टेकिंग केयर ऑफ दी एनवायरमेंट मिटिगेशन मेजर्स एंड अदर थिंग्स। एक खदान के बारे में जरूर मैं आपसे जानना चाहूंगी। हम लोग नाम बहुत सुनते हैं क्योंकि एशिया की सबसे बड़ी खदान है गेवरा खदान। और वो आपके पास है। उसकी थोड़ी कहानी बताएं। उसके बारे में बताएं और खासकर मैं चाहूंगी जो हमारी युवा पीढ़ी है यंगस्टर्स है जिनको शायद नहीं पता होगा गेवरा मं के बारे में। नहीं ये हमारे लिए पूरी गर्व की बात है कि गेवरा खदान एससीएल के क्षेत्र में का है। हम ये खदान आज के दिन पिछले वर्ष भी 56 मिलियन टन इसने उत्पादन किया है। 56 मिलियन टन जी ऑलमोस्ट आधा ही हो गया है। बिल्कुल सब इसीलिए तो एशिया की सबसे बड़ी माइन तो इस माइन के जो है वहां पे सभी
आज के दिन अगर जाएंगे एक हमारे मन में जो मैं पुनः बताना चाहता हूं कि जैसे ही कोयले की बात आती है तो लोग मन में आता है कि मैनुअली काम होता है या छोटी मशीनों से काम होता है। बट घेवरा खदान भारत के लिए भी गर्व की बात है जो हमारे प्रधानमंत्री जी बोलते हैं थिंक बिग हम और उसी लाइन पे यह माइन अपने आप को आगे बढ़ा रही है। हम यहां पर वर्ल्ड की जो लार्जेस्ट ऑफ द इक्विपमेंट्स हैं वह हमारे पास अवेलेबल हैं। 42 क्यूबिक मीटर के मशीनंस हैं जो कोयला निकालते हैं और साथ में जो जिस डंपर में वो लोड करते हैं वो 240 टन का कैपेसिटी का है। बड़े-बड़े डोजर्स हैं जो उसको मूव करते हैं मटेरियल को। एक-एक चीज वहां पर स्टेट ऑफ द आर्ट टेक्नोलॉजी हमारे पास है। जो मॉनिटरिंग मैकेनिज्म है वह फुल्ली तरह से एआई बेस्ड है। एक इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सेंटर बना हुआ है। जहां पे पूरी चीजें आपको दिखाई देती हैं। कहां पे क्या कार्य हो रहा है, कैसे हो रहा है। अगर कहीं पे कोई चीजें मिस हो रही हैं तो वहीं से हम लोग देख सकते हैं। साथ में फुल्ली जितने भी प्लानिंग से लेकर एग्जीक्यूशन तक सभी क्षेत्र में डिजिटाइजेशन वहां पे किया गया है। तो ये भारत का वही भारत है जो हमारे प्रधानमंत्री जी विकसित भारत जिसकी बात करते हैं। उसी स्टेज पे ये माइन वर्क कर रही है। उसी लार्ज स्केल पे ये काम करती है। 9 कि.मी. स्ट्राइक लेंथ में हम लोग अपने कार्य कर रहे हैं। इतना बड़ा क्षेत्र है कार्य। ऐसी जगह में कोऑर्डिनेशन काफी चैलेंजिंग होता होगा जब इतने बड़े-बड़े मेगा प्रोजेक्ट्स में बहुत सारे लोग बहुत बड़ी टीम डेफिनेटली ये जब तक आप एक क्लियर प्लानिंग आपके पास ना हो जो हर आदमी जो काम करने वाला टीम का मेंबर है उसको पता होना चाहिए और जब काम करते हैं तो डिजिटल इनिशिएटिव्स ने ये लाइफ को थोड़ा इजी किया है कि हम जान सकते हैं समझ सकते हैं डेली मॉनिटरिंग हम लोग उस उस लेवल पे करते हैं तो टेक्नोलॉजी के इंटरवेंशन से आज के दिन जो कोऑर्डिनेशन है वह थोड़ा इजी हुआ है। हालांकि बहुत डिफिकल्ट है क्योंकि वहां पे डिफरेंट डिसिप्लिंस के लोग हैं। माइनिंग के लोग हैं जो अपना कोल एक्सक्यूबेशन करते हैं। जो हमारे मेंटेनेंस के लोग हैं जो मैकेनिकल इंजीनियर्स होते हैं। मशीनों की रखरखाव करते हैं। हमारे इलेक्ट्रिकल के हैं जो 6.6 केB पावर यानी 6600 वोल्ट की सप्लाई से ये मशीनें चलती हैं। तो वह पावर को इंश्योर करते हैं। जब आप काम करते हैं तो 300 मीटर से ज्यादा गहराई पर आप काम कर रहे हैं तो बहुत सारा पंपिंग भी करना पड़ता है। तो उनको सबको मैनेज करने के लिए बहुत सारे लोग हैं। जो कोयला निकलता है उसको कैसे हम लोग ऐसे रेल के जो हेड तक है वहां तक भेजना है, डिस्पैच करना है और ताकि वो बड़ा काम है। हां थर्मल प्लांट में जाए और विद्युत उत्पादन करें। अच्छा एक चीज जैसे हम लोग जो छवि की लगातार बात कर रहे हैं ना एक-एक छवि सबके मन में यह भी होती है कि माइनिंग से जुड़े जो लोग हैं वो आप एनवायरमेंट फ्रेंडली नहीं है। है ना? पर्यावरण को नुकसान पहुंच रहा है। ठीक है? उस उसका जो उत्पादन हो रहा है उससे बहुत सारे काम दूसरे हो रहे हैं। लेकिन पर्यावरण को नुकसान हो रहा है। तो आप एसईसीएल को एनवायरमेंट फ्रेंडली बनाने के लिए क्या कर रहे हैं? कुछ हो रही है क्या कदम उठा? डेफनेटली डेफिनेटली। जैसे हमने बताया है कि हमारे जो प्रोजेक्ट्स हैं उनमें हम लोग जो कोयला परिवहन पहले क्या होता था फेस से जहां से कोयला निकलता है उस जगह से ले रेल हेड तक ये ट्रक्स के थ्रू आता था हम अभी हम लोगों ने फर्स्ट माइल कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट यानी कन्वेयर के थ्रू वो आता है। अच्छा हम लोग उसको फेस से लेके और रेल जहां पे वेगन में रैक में लोडिंग होता है रेलवे [गला साफ़ करने की आवाज़] बैगन में वहां से लेके कंप्लीट क्लोज कन्वेयर के थ्रू कवर्ड कन्वेयर के थ्रू आता है। तो पूरा एनवायरमेंट फ्रेंडली वे है ये। दूसरा है जो हम लोग जमीन लेते हैं डेफिनेटली कुछ खेती की जमीन होती है कुछ फॉरेस्ट की जमीन होती है तो जो पेड़ होते हैं हम लोग जितना भी है जैसे हमने 100 हेक्टेयर लिया तो 200 हेक्टेयर हम लोग प्लांटेशन प
हले करते हैं कहीं और कहीं और हम तो वो करते हैं साथ-साथ जो जमीन पे हम लोग कोयला निकालते जाते हैं उस जमीन को भी हम लोग रिक्लेम करते हैं प्लांटेशन करते हैं। अच्छा इस वर्ष ही हमने मोर देन 13 लाख प्लांट्स किए हैं और अभी तक 3 करोड़ से ज्यादा हम लोग प्लांटेशन कर चुके हैं। तो प्लांटेशन के क्षेत्र हो या एनवायरमेंट मिटिगेशन के लिए हमारा जो भी वर्किंग होता है वहां पे डस्ट वस्ट ना हो तो उसके लिए स्प्रिंकलिंग अरेंजमेंट है। मोबाइल स्प्रिंकलर्स हैं, फिक्स स्प्लिंकलर्स हैं। ईटीपी है, इफ ट्रीटमेंट प्लांट्स हैं। यानी जो पानी हम प्रयोग करते हैं उसको ट्रीट करें। हां जी। तो यह सारी प्रयास पूरे वहां पे हो रहे हैं और चीजें यह इंप्लीमेंटेड हैं फील्ड में। तो पूरी केयर के साथ एनवायरमेंट का पूरा ध्यान रखते हुए यह हम लोग एससीएल में कार्य कर रहे हैं। अच्छा एससीएल सिर्फ एक कोल्ड प्रोडक्शन से आगे बढ़कर दूसरे क्षेत्र में भी जैसे क्रिटिकल जो मिनरल्स हैं या रेयर अर्थ है उसमें भी क्या सोलर एनर्जी कदम रख रही है। बिल्कुल अभी सिर्फ एक कोल कंपनी सीसीएल मेन फोकस्ड है और वो आगे भी रहेगा। लेकिन साथ में हम लोग चाहते हैं कि इंटीग्रेटेड एनर्जी कंपनी बने। अच्छा और उसी क्षेत्र में हमारी बहुत सारी पहल हैं। यह भारत सरकार का डायरेक्टिव है कि क्रिटिकल मिनरल्स जो आज के दिन में पूरी तरह से इंपोर्टेड ज्यादा हैं। हमारे यहां पर उसके स्रोत भी कम है और जो हैं वो भी हमने टैप नहीं किए हुए हैं। तो हम उस डायरेक्शन में भी काम कर रहे हैं। दूसरा हम लोग जो ओपन कास्ट माइंड्स हैं उसके बहुत सारे जो मटेरियल मिट्टी हटा देते हैं। उस मिट्टी में भी ऐसे एलिमेंट्स हैं जो हमारे लिए यूज़फुल हो सकते हैं। क्रिटिकल मिनरल के तौर पे यार अर्थ एलिमेंट्स के तौर पे तो हम लोगों ने आइडेंटिफाई किया है कि हमारे जो से म को अभी इनिशियल स्टेज में वहां पर हम लोग 600 सैंपल्स कलेक्ट करवाएंगे और उसमें आइडेंटिफाई करेंगे कि कितने रेयर एलिमेंट्स हैं वंस वो प्रूव होने के बाद देन डेफिनेटली इट विल बी अ गेम चेंजर और बहुत सारा हम लोग इसमें कंट्रीब्यूट कर पाएंगे आने वाले समय में। इसी तरह से हमारा प्रयास है कि जो आज राष्ट्र को आज भी फेस कर रहे हैं हम चैलेंजेस कि गैस को लेके हम तो हम लोग कोल से गैस में कैसे कन्वर्ट हो हमारे गेसिफिकेशंस प्रोजेक्ट हैं। गवर्नमेंट का भी ये प्लान है कि 100 मिलियन टन 2030 तक ये लक्ष्य कोल से गैस को करना है। उसके लिए बहुत 8500 करोड़ का पैकेज भी इंसेंटिव स्कीम भी गवर्नमेंट ने दिया है। तो उसका फायदा उठाते हुए प्लस राष्ट्र की आवश्यकता को पूर्ति के लिए हम लोग गेसिफिकेशन की तरफ भी हम लोग बढ़ रहे हैं। ऑलरेडी एक पायलट प्रोजेक्ट हमने आइडेंटिफाई किया हुआ है और फर्दर भी हमारा वर्क इस डायरेक्शन में चल रहा है। सोलर के तहत भी हमारे जितनी माइंस हमारी क्लोज होती जाती हैं जो हमारी जमीन है वहां पे हम लोग सोलर प्लांट्स लगा रहे हैं। अच्छा तो ये भी गेनफुल यूटिलाइजेशन है और रिपर्पजिंग है। आसपास की कम्युनिटीज को भी एक तरह से इन्वॉल्व उसमें करते हैं। तो मतलब आप लोग रिक्लेम भी करते हैं। उसको थोड़ा हराभरा भी करते हैं और सोलर प्लांट्स इन पर दोनों पर साइमलटेनियसली काम चल रहा है। अच्छा एससीएल का सीएसआर में या कम्युनिटी डेवलपमेंट में क्या योगदान है? क्या कर रहे हैं आप लोग? बहुत अच्छा प्रश्न है और जैसे ही हम लोग आप बोलते हैं कोल इंडस्ट्री जो काम करता है कहीं ना कहीं आसपास के क्षेत्र को डिस्टर्ब तो करता ही है लेकिन साथ में सीएसआर के थ्रू जो भी हमारे आसपास की कम्युनिटीज हैं जो पैप्स हैं जिनकी जमीनें जाती हैं या आसपास के गांव हैं उनके लिए बहुत सारी चाहे एजुकेशन के क्षेत्र में हो या उनके मेडिकल फैसिलिटीज के बारे में हो उनके स्पोर्ट्स से रिलेटेड हो या बच्चों को आगे बढ़ाना हो तो उस हर क्षेत्र में कार्य कर रहा है। मैं आपको एग्जांपल देना चाहता हूं। एक छोटे से बच्चों से लेके एक हमारे संज्ञान में आया कि जो नवजात कुछ बीमारियां हार्ट डिजीज उसके बच्चों में छेद हो जाता है या कुछ इस टाइप के इश्यूज को लेते हुए हमने सर्वे करवाया हमारे आसपास के लोगों का। हम तो उसमें पाया गया
कि बच्चों में यह समस्याएं हैं एंड दे डोंट नो कि इसको आगे कैसे बढ़े और ना उनके पास रिसोर्सेज हैं। उसका रीज़न ये माइनिंग के एरिया आसपास से कुछ नहीं इससे कोई लेना देना नहीं है। लेकिन ये सब जगह होती हैं लेकिन हमारे क्योंकि उनको पता भी नहीं रहता और दिक्कत नहीं है। अवेयरनेस भी नहीं है और ट्रीटमेंट भी नहीं करवा पाते। रिसोर्सेज भी नहीं है। तो हमने यह आइडेंटिफाई किया और एक बहुत अच्छी स्कीम हम लोगों ने लाया है। तो उसके तहत हम इन बच्चों का फ्री ऑफ कॉस्ट ट्रीटमेंट करवाते हैं। उसके डायरेक्शन में जब देखते हैं उन बच्चों से या उनके मां-बाप से मिलते हैं आफ्टर ट्रीटमेंट। अभी तक 180 बच्चों का ट्रीटमेंट हो चुका है। एंड वी हैव ऑलरेडी सेंश कि मोर देन 300 करेंगे। अगर रिक्वायरमेंट होगा तो हम लोग और भी आगे बढ़ेंगे। तो वो जो मुस्कान उन बच्चों के या उनके माता-पिता के चेहरों पर आती है। काफी सेटिस्फाइंग है। इसी तरह हम लोगों ने युवाओं के लिए भी कार्य किया। बहुत सारे जो बच्चे मेडिकल के क्षेत्र में जाना आता थे तो नीट की परीक्षा के लिए हम लोग उनको फ्री ऑफ कॉस्ट मतलब पूरी कोचिंग करवाते हैं और बहुत अच्छा रिजल्ट वो बच्चे कर रहे हैं गांव के जिनके पेरेंट्स को नहीं पता होता कि ऐसे भी कोई बच्चा आगे बढ़ सकता है। तो काफी अच्छे काम इस डायरेक्शन में कर रहे हैं। हम लोग हमारे जितने गवर्नमेंट्स मेडिकल हॉस्पिटल्स हैं उनकी उनको अपग्रेड करने में भी हम लोग हेल्प कर रहे हैं। हमारे सेंसिटिविटी जैसी रिक्वायरमेंट होती है बच्चों को चाहे स्पोर्ट्स के क्षेत्र में लाना हो या कररियर बिल्डिंग हो महिलाओं को स्किल डेवलपमेंट है। बहुत सारे हमारे इनिशिएटिव्स इस डायरेक्शन में चल रहे हैं कि उनको कैसे हम लोग अपने पैरों पे महिलाएं भी आगे खड़ी हो। साथ में बिलासपुर हमारा हेड क्वार्टर है। तो हम लोगों ने ईश्वर जी वहां पर मोर देन 60 करोड़ की स्कीम्स लाए हैं। और वो स्कीम्स बहुत ही सेंसिटिव वे में ऐसे टॉपिक्स पे हैं जो शहर को कैसे क्लीन रखना है, प्लास्टिक फ्री रखना है, उनकी मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर को कैसे अपग्रेड करना है। साथ में हमने सेंशन किया है कि आज के समय में अगर देखें हम लोग तो बच्चे पूरी फैमिलीज ऐसी हो गई हैं जो या तो पेरेंट्स हैं या एक दो बच्चा है हम तो बच्चे जैसे ही बड़े होते हैं वो अपनी जॉब के लिए बाहर चले जाते हैं। तो पहले आश्रम या वृद्धाश्रम होते थे हम तो वो उन लोगों के लिए होते थे जिनको बच्चे निकालते थे या और कुछ है। लेकिन आज एक आवश्यकता हो गई है कि जो पेरेंट्स अकेले पड़ जाते हैं उनके लिए हम लोगों ने एक ऐसा प्लान हमारे बिलासपुर में किया है कि वो एक साथ बैठ सके एक साथ अपने खेल सकें बातचीत कर सकें हंस बोल सके लिविंग जिसको हां तो वो पार्ट के लिए एक हम लोगों ने किया है और जो हमारे डेफिनेटली फिजिकली डिसेबल्ड हैं उन लोगों के लिए भी हम लोग पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर वहां पे क्रिएट कर रहे हैं। आज मुझे एक बहुत अच्छी चीज लग रही है। मैं बार-बार मतलब ये सोच रही हूं कि इतने लोगों के हम इंटरव्यू करते हैं लेकिन बहुत कम लोग हम ऐसे मिलते हैं कि लीडरशिप रोल में हैं। कई बार हमें ऐसा लगता है सख्त होते होंगे लीडर्स। लेकिन आपके अंदर एक इतना मैं सेंसिटिव साइड बार-बार महसूस कर रही हूं। जैसे जब भी आप अपने टीम के बारे में या कामगारों के बारे में बात कर रहे हैं तो मतलब मुझे पर्सनली ये बात बहुत अच्छी लग रही है। एसईसीएल का आईपीओ प्रपोज्ड है। कहां अब आप आगे जर्नी देख रहे हैं कंपनी की? बिल्कुल आईपीओ प्रपोज है। गवर्नमेंट ने निर्णय लिया है और इसका प्रय यही है जो अभी कुछ देर पहले हम बात कर रहे थे कि ये कोयला कंपनी है। इसको बहुत आगे बढ़ना है और साथ में डायवर्सिफाई भी करना है। उसके लिए पूरे इनिशिएटिव्स इसके थ्रू हम लोग लेंगे। तो डिफरेंट जेवीस जो जो जिस फील्ड में एक्सपर्ट्स हैं उनको इनवॉल्व करेंगे और जो भी कैपिटल रिक्वायर्ड है उसके लिए भी हम लोग कार्य करेंगे। यह डायरेक्शन में एससीएल को जो नया दौर आ रहा है जो वर्ल्ड के साथ मिलके जो रिक्वायरमेंट्स है सिर्फ कोयला कंपनी नहीं एक इंटीग्रेटेड एनर्जी कंपनी हम लोग बनाना चाहते हैं और इसी मिशन के तहत यह भी एक स्टेप है लिस्टिंग का और मुझे पूर्ण रीति से विश्वास है कि इसको बहुत अच्छा रिस्पांस भी मिलेगा। हमारे पास एससीएल में आज के दिन जो रिसोर्सेज हैं कोयले की डिफरेंट ग्रेड्स होती हैं। तो हमारे पास वाइड स्पेक्ट्रम है। जी3 ग्रेड से लेके G1-15 ग्रेड तक हमारे पास कोयला उपलब्ध है। यानी कंज्यूमर की जो रिक्वायरमेंट है, डिफरेंट लेवल्स के जो कंज्यूमर्स हैं, किसी को हाई ग्रेड कोयला चाहिए, किसी को लोअर ग्रेड चाहिए, वो सबकी पूर्ति एससीएल कर सकता है। तो उस पॉइंट ऑफ व्यू से भी देखें तो यह उनकी नीड्स को फुलफिल करेगा और जो फ्यूचर ग्रोथ है चाहे हमारे इंटीग्रेटेड कोल रेल कॉरिडोर प्रोजेक्ट्स आने हैं गैसिफिकेशन प्रोजेक्ट्स आने हैं उनको भी यह सप्लीमेंट करेगा। मैं ना अंत में हरीश जी ये चाहूंगी कि जो भी यह पडकास्ट देखे उसके ध्यान में ना उसके जहन में वो वो एक कामगार जरूर हो क्योंकि जैसा मैंने कहा कि हम लोग सोचते भी नहीं है उनके बारे में और एसईसीएल सिर्फ एक कोल्ड प्रोडक्शन कंपनी के की तरह हम ना देखें बल्कि देश के जो विकास की एक यात्रा चल रही है उसमें हमें उसकी भूमिका दिखाई दे अगर किसी एक कामगार की कोई एक कहानी आप हम सबके साथ शेयर करना चाहे जो हमारे साथ रहे और हमें याद दिलाते रहे कि देखिए कोई है जो इतनी मेहनत कर रहा है। हर कर्मी पूरी हम जो टीम का है वो पूरा शिद्दत और मेहनत के साथ कार्य करता है। लेकिन जब भी चैलेंजिंग सिचुएशन आती हैं
तो अगर आप इंडिविजुअल में भी बात करें तो वो कमिटमेंट वो डडीिकेशन उस कोलकर्मी में है कि वह फौजी की तरह अपने परिवार को और उसको ना देख के वो माइंस में अगर उसको रिक्वायर्ड है कि 3 दिन 6 दिन 7 दिन रहना है तो अपने काम को कंप्लीट करके ही बाहर आता है। तो यह कमिटमेंट हमारे साथियों का है। मैं अपने सभी दर्शकों से एक चीज जो आपने बोला है और मैं बिल्कुल प्राउडली गर्व होता है कि मैं भी एक खनिक हूं और वो यह है कि जब भी आप देखें खनिक के बारे में जो कोयले के बारे में विचार हो तो यह जरूर सोचें कि जो यह बिजली मेरे घर में चल रही है जो मेरा फ्रिज चल रहा है एसी चल रहा है जो फैसिलिटीज मेरे पास हैं जो इलेक्ट्रिसिटी से रिलेटेड है ये उस कनिक की पसीने की जो मेहनत है वो मेहनत जो अपना पसीना बाहर आता है। यह उसकी मेहनत की बदौलत यह फैसिलिटीज हमारे पास हैं। जो हमारा देश आगे बढ़ रहा है, उसमें कहीं ना कहीं 70 से 72% कंट्रीब्यूशन कोयले का है जो एनर्जी मिल रही है। तो हर चीज आज के दिन इलेक्ट्रिसिटी से ही जनरेटेड है और कोयला उद्योग का या खनिक का उतना ही उसमें बहुत योगदान है। थैंक यू। डेफिनेटली आपने जो ये एक अपॉर्चुनिटी दी है कि हम अपने खनिक की बात आप पूरे देश के अपने दर्शकों के सामने रख पाए। बहुत-बहुत धन्यवाद। बहुत-बहुत शुक्रिया हरीश धान जी हमसे बात करने के लिए, जुड़ने के लिए और वाकई एक बहुत एक बहुत इमोशनल साइड से हमारा परिचय कराने के लिए। थैंक यू। थैंक यू। [संगीत]