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करीम लाला कैसे बना बॉम्बे का पहला डॉन? दावूद इब्राहिम का था दुश्मन?

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विजय ने पिछले हफ्ते ही तय कर लिया था कि आज मवालियों को पैसा नहीं देगा। मुंह से बीड़ी को हटाते हुए उसने रहीम चाचा को ही पहले ही बता दिया था। लेकिन यह कहानी यह कहानी दीवार पिक्चर के विजय की नहीं है। यह घटना कई साल पहले मुंबई के एक रेलवे स्टेशन पर घट चुकी थी। उस रोज बीटी स्टेशन पर आम दिनों की तुलना में भीड़ थोड़ी ज्यादा थी। सुबह से ही भारी-भरकम सूटकेस उठाकर थक चुके कुली कुछ देर के लिए सुस्ता रहे थे। इनमें कुछ लोग बंबई के ही थे और कुछ लड़के बाहर से भी आए थे। तभी सामने से मवालियों का एक गैंग जो है वह आता हुआ दिखाई दिया। हर हफ्ते की तरह उस रोज भी वो मवाली कुलियों से पैसा वसूलने वाले थे। आदतन सभी कुली बारी-बारी उठते और डिब्बे में पैसा डाल देते। लेकिन बाहर से आया एक लड़का वो टस से मस नहीं हुआ। गैंग का लीडर उसके पास गया और कहने लगा इधर काम करना है तो पैसा दे। नौजवान पठान खड़ा हुआ और बोला हम मेहनत करता है पैसा कमाता है।

हम यह पैसा तुमको नहीं देगा। उसका यह कहना था कि मवालियों का गैंग पूरा उस पर टूट पड़ा। लेकिन लंबे चौड़े हट्टे-कट्टे पठान ने उन्हें दौड़ा दौड़ा के मारा। झगड़े की खबर फैली तो स्टेशन पर काम करने वाले बाकी पठान भी वहां आ गए और मवाली जो है उल्टे पांव [संगीत] भागे। यह कहानी उसी पठान लड़के की है जो कुछ साल पहले अपने भाई को ढूंढने अफगानिस्तान से बंबई आया था। लेकिन ना कभी उसका भाई मिला ना वो कभी वापस गया। उसने बंबई को ही अपनी माशुका बना लिया। इसी शहर पर राज किया और यहीं की मिट्टी में दफन हो गया। नाम था अब्दुल करीम शेर खान। डोंगरी की जमीन को अगर खोदा जाए तो नीचे खून के ढेर सारे धब्बे मिलेंगे और मिलेंगी करीम शेर खान की कहानियां। जुए के अड्डों की कहानियां, किराएदार और मकान मालिकों की कहानियां, उन छतों की कहानियां जिन पर बैठकर ना जाने कितने ही सुलहनामे हुए। कहानी एक डॉन की और उसकी छड़ी के खौफ की। यह कहानियां हैं बंबई के पहले डॉन करीम लाला की। नमस्ते और स्वागत। मैं हूं अभिषेक और आप देख रहे हैं किस्सों का टाइम ट्रैवल और इतिहास की लल्लन टॉप कहानियों वाला शो तारीख। 1940 के दशक में करीम अफगानिस्तान से बंबई आया। 7 फीट लंबा गोरा चिट्टा पठान खान अब्दुल गफ्फार खान का फॉलोअ था। उसे अपने भाई की तलाश थी। वो अम्मी से वादा करके आया था

कि सलीम को लेकर ही लौटेगा। लेकिन उसकी यह तलाश अधूरी रह गई। बंबई की रंगत देखकर करीम को [संगीत] इस शहर से मोहब्बत हो गई। वो इसे अपना शहर कहता था। करीम ने दक्षिण बंबई में ग्रांट रोड स्टेशन के पास गली में एक जगह किराए पर ले रखी थी। वो पढ़ा लिखा था नहीं और कोई खास हुनर भी नहीं था। करीम ने वीटी स्टेशन पर लिहाजा कुली का काम शुरू कर दिया जिसे आज सीएसटी कहा जाता है इस स्टेशन को। मवालियों के जिस गैंग को उसने पीटा था जिसका जिक्र हमने अभी शुरू में किया वो मालाबारियों का गैंग था। जिसका उस वक्त उस इलाके पर काफी दबदबा था। प्रभुत्व था। इस झगड़े ने करीम शेर खान को करीम लाला बना दिया। उस वक्त मुंबई में पठानों की तादाद अच्छी खासी थी और वह सब एकजुट थे। करीम लाला को इसका फायदा हुआ और धीरे-धीरे पठान गैंग आकार लेने लगा। कहीं भी किसी का कोई विवाद होता, झगड़ा होता तो [संगीत] बाकी उसके साथ खड़े हो जाते। शुरुआत में करीम लाला और उसकी गैंग के लोग जुए के अड्डों से प्रोटेक्शन मनी वसूलते थे। [संगीत] लेकिन आगे चलकर उन्होंने अपने ही जुए के अड्डे खोलने शुरू कर दिए। इन अड्डों को सोशल क्लब कहा जाता था। यहां अमीर, गरीब, हिंदू, मुस्लिम सब आते थे। सब लोग पैसा हारते थे। जो पैसा हार जाते वो लाला से पैसे उधार लेते। धीरे-धीरे यह बन गया एक रिवायत। लाला लोगों को उधार देता था और हर महीने की 10 तारीख को ब्याज वसूलता था। यानी हर महीने की 10 तारीख को करीम लाला की तिजोरी भर जाती थी। जैसे नौकरी पेशे वालों के लिए 31 तारीख होती है। अब इन अड्डों पर कोई भले लोग तो आते नहीं थे।

लिहाजा आए दिन यहां वारदातें होती थी। मारपीट, लड़ाई झगड़े वगैरह-वगैरह। बात जो है [संगीत] पुलिस के कानों तक पहुंचती तो लाला उसे पैसे देकर किसी तरह रफादफा करवा लेता। इससे उसके पुलिस से भी रिश्ते पुख्ता होने लगे। पैसा तो बढ़ ही रहा था। हिम्मत भी बढ़ने लगी, दबदबा भी बढ़ने लगा। लोग करीम लाला को करीम दादा कहते थे। वो पठानों के कबीले के सरदार जैसा व्यवहार करता था। लोग भी उसे वैसी ही इज्जत देते थे। वो लोगों के आपसी झगड़े सुलझाता था और सब उसकी बात मानते थे। मकान मालिकों को जब किराएदारों से घर खाली करवाना होता था तो वह करीम लाला के पास ही जाते थे। लोगों को यह रास्ता पुलिस या अदालत की तवील कारवाई से आसान लगता था। एस हुसैन ज़दी इनकी एक किताब है डोंगरी टू दुबई। इस किताब में वो लिखते हैं कि हर रविवार को करीम लाला की छत पर लोगों की दिक्कतों को सुनने और सुलझाने के लिए एक पंचायत लगती थी। पैसे उधार देने की बजाय घर खाली करवाने का काम ज्यादा अच्छा था। इसमें पेमेंट तुरंत मिल जाती थी। रसूख भी बढ़ता था। आलम ऐसा था कि लोग करीम लाला का नाम सुनकर ही घर खाली कर देते थे। जैसे ही मकान मालिक कहता अब तो लाला को बुलाना ही पड़ेगा। किराएदार तुरंत घर छोड़कर चल देते। आजादी के बाद पठान बंबई में आराम से रह रहे थे। करीम जैसा मजबूत आदमी उनका सरदार था। अपने 50वें जन्मदिन पर लाला ने एक भव्य पार्टी दी। दावत आलीशान दावत। यहां तक आते-आते अब वह परंपरागत पठानी की बजाय सफेद सफारी सूट बिल्कुल झक्क सफेद सफारी सूट पहनने लगा था। काला चश्मा, महंगी सिगार या पाइप। जन्मदिन की पार्टी में एक चेले ने उसे एक महंगी छड़ी गिफ्ट की जिसका हैंडल जो है वो सोने का था। इसे देखकर लाला भड़क गया। उसने कहा अरे मुझे इस छड़ी की क्या जरूरत? मैं बिल्कुल फिट हूं। लेकिन लोगों ने कहा कि इससे आपका ओरा बढ़ेगा। तो कुछ मानवल के बाद उसने वो छड़ी रख ली। वो जहां भी जाता अपने साथ यह छड़ी लेकर जाता। धीरे-धीरे वो छड़ी उसकी पहचान बन गई। कैदी अपनी किताब में लिखते हैं कि एक वक्त पर करीम लाला का खौफ ऐसा था कि अगर वो मस्जिद में है और अपनी छड़ी टिका कर गुलखाने चला गया तो किसी की हिम्मत नहीं थी कि उसे एक जगह से उठाकर दूसरी जगह रख दे। किसी बैठक में अगर वो अपनी छड़ी को सोफे से टिका कर कहीं चला गया तो कोई उस सोफे पर बैठने की जरूरत नहीं करता था।

मुंबई लाला की छड़ी से कांपती थी। मकान मालिकों को जब घर खाली करवाना होता तो लाला की गैंग के लोग सिर्फ उसकी छड़ी लेकर वहां चले जाते मकान मालिक के सामने और किराएदार मकान खाली कर देते। वरिष्ठ पत्रकार और लेखक विवेक अग्रवाल एक किस्सा सुनाते हैं। आप भी सुनिए। एक बार की बात है मशहूर अदाकारा हेलन के ₹00 एक प्रोड्यूसर पर बकाया थे। उस जमाने में ₹00 बहुत बड़ी रकम हुआ करते थे। किसी ने हेलन को बताया कि आप करीम भाई से मिलिए। वो आपका काम करवा देंगे। हेलन सीधा करीम लाला के घर जा पहुंची। उन्हें देखकर पहले तो वह चौंक गए। फिर बोले बताइए मोहतरमा मैं आपकी क्या खिदमत कर सकता हूं। हिलन ने पूरी बात उन्हें बताई। पूरा किस्सा सुनाया। करीम राणा ने कहा कि ठीक है आप बेफिक्र होकर घर जाइए। आपका काम हो जाएगा। जब हेलन [संगीत] घर पहुंची तो वो प्रोड्यूसर उन्हें दहलीज पर बैठा मिला। हेलन को देखते ही खड़ा हो गया। थरथर कांपने लगा। उसने कहा कि अरे आप वहां क्यों चली गई? मैं आपके पैसे देने ही आ रहा था। उसने जेब से नोटों का पैकेट निकाला। हेलन को [संगीत] देकर वहां से ऐसा भागा मानो खुद करीम लाला वहां पर खड़ा हो। अब हेलन करीम लाला को उस मदद के लिए खुद धन्यवाद देना चाहती थी। उनकी एक फिल्म का प्रीमियर था। शहर के जानेमाने लोग उस इवेंट में पहुंचे थे। करीम लाला भी पहुंचा था। हेलन ने उसे देखा। उसके पास गई। उसका गाल चूम लिया। कहा थैंक्स। करीम लाला को तो जैसे काटो तो खून नहीं। इतना शर्मा गया कि वहां एक सेकंड नहीं रुका गया। तुरंत वहां से चल दिए। हर तरफ लाला की चर्चा थी। हर कोई उसके बारे में बात कर रहा था। तो यह बातें जा पहुंची हाजी मस्तान के कानों तक। हाजी मस्तान को तलाश थी एक भरोसेमंद आदमी की जो उसके स्मगलिंग के माल को एक सेफ पैसेज मुहैया करवा सके। ग्रांट रोड मस्जिद में लाला और मस्तान की मुलाकात हुई। इसके बाद मस्तान लाला के घर गया। दोनों ने खाना खाया। बातचीत शुरू हुई। इस बारे में ज़दी लिखते हैं कि मस्तान ने कहा खान साहब आपके साथ एक दोस्त की तरह बात करने में बड़ा मजा आया। लेकिन अब मेरे पास आपके लिए एक कारोबारी पेशकश है। लाराला बोला बिल्कुल मस्तान भाई बताइए आपके मन में क्या है बताइए? मस्तान ने पानी के हल्के-हल्के घूंट लिए और अपनी बात शुरू की। कहा पोर्ट पर मेरा काफी सामान उतरता है। इसे उतारने, गोदाम तक ले जाने और ट्रकों में लाद कर बाहर भिजवाना होता है। जब तक यह माल बिक नहीं जाता, आपके आदमियों को मेरे सामान की हिफाजत करनी होगी। लाला जो है थोड़ी देर खामोश रहा। हाथ बांधे और पीछे पीठ टिका कर बोला,

क्या इस काम में खूनखराबा भी हो सकता है? मस्तान ने कहा अगर आपके आदमी आसपास होंगे तो कोई दखलअंदाजी करने की हिम्मत भी नहीं करेगा। इसलिए बहुत खून खराबा करने की नौबत आएगी ही नहीं। लाला ने पूछा इसके बदले मुझे क्या मिलेगा? मस्तान का जवाब हमारे हिस्से उस सामान पर निर्भर होंगे जो हम उतारेंगे। लाला कुछ देर चुप रहा। एक गहरी सांस छोड़ी। सिर उठाया और मुस्कुराहट के साथ हाथ आगे बढ़ा दिया। दरअसल ये मस्तान का दिमाग और करीम लाला का बाहुबल साथ मिला रहे थे। हाथ मिला रहे थे। अंडरवर्ड की यह जोड़ी पुलिस के लिए सिरदर्द बन गई। वो मस्तान को छू नहीं सकते थे क्योंकि उसके पॉलिटिकल कनेक्शंस बहुत अच्छे थे। लेकिन [संगीत] लाला पर एक्शन लेने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं थी। उसके जुए के अड्डे पर रेड मारी गई। बार-बार लाला को सीआईडी के दफ्तर तलब किया गया। सीआईडी ने बुलाया। हालांकि अक्सर वो पैसेवैसे देकर छूट जाता। नोटों की गड्डी देखते ही पुलिस वाले उसकी जी हुजूरी करने लगते। लेकिन इन सबके बीच एक हवलदार था जिसकी लाला दिल से इज्जत करता था। नाम था इब्राहिम कास्कर। वो ना तो लाला से पैसे लेता था ना ही किसी तरह का सम्मान जाहिर करता था बल्कि कभी-कभी तो हेड कांस्टेबल होने के नाते डाट डपट भी कर देता था। दोनों एक दूसरे को कई साल हो गए जानते आ रहे थे। इब्राहिम तंगी से जूझता एक हवलदार था। घर में दाल रोटी का भी संकट था। इसके बाद भी वो लाला के पैसे को ठुकरा देता था और सिर्फ ₹75 की सैलरी में अपना घर चलाता था। उसकी ईमानदारी लाला को प्रभावित करती थी। वो उसे बहुत मानता था। लाला 10 साल बड़ा था। फिर भी वह इब्राहिम भाई कहकर उन्हें बुलाता था। 26 दिसंबर 1955 को जब कास्कर के घर दूसरा बेटा पैदा हुआ तो करीम लाला कुबे का पहला शख्स था जिसे इसकी खबर मिली। एक पीर ने भविष्यवाणी की थी कि कास्कर का दूसरा बेटा बहुत ताकतवर। नाम चीन और रईस होगा और उसकी किस्मत पलट कर रख देगा। लेकिन कास्कर के पास इतने पैसे नहीं थे कि वह बेटे [संगीत] के पैदा होने की दावत दे।

इसलिए करीम लाला ने अपने दोस्त की तरफ से एक शानदार दावत दी। इस बेटे का नाम रखा गया दाऊद इब्राहिम कास्कर। 70 के दशक के शुरुआती सालों में करीम लाला और मस्तान की दोस्ती से लाला को बहुत फायदा हुआ। दक्षिण मुंबई में करीम लाला का अच्छा खासा दबदबा था। शहर में पठान गैंग का आतंक बढ़ता जा रहा था। पठान गैंग के लोग राह चलते किसी को भी पीट देते। कभी किसी का घर खाली करवा देते। किसी की दुकान में घुस जाते, तोड़फोड़ करते। पुलिस के लिए पठान गैंग जो है एक सिरदर्द बन चुका था। लेकिन इस गैंग का सरगना करीम लाला बना मुंबई का पहला डॉन। इंदिरा गांधी के साथ करीम लाला की एक तस्वीर अक्सर वायरल होती है। इस तस्वीर में करीम लाला और इंदिरा गांधी के साथ सरोजनी नायडू के भाई हरिंद्रनाथ चट्टोपाध्याय भी थे। इमरजेंसी के दौरान जब हाजी मस्तान और बाकी लोग अरेस्ट हुए तब करीम लाला को किसी ने हाथ भी नहीं लगाया। हालांकि बाद में दूसरे मामलों में उसकी गिरफ्तारी हुई। 1980 तक मुंबई अंडरवर्ड में दाऊद बड़ा नाम बन चुका था। करीम लाला और दाऊद के बीच अब दूरियां आ गई थी। 1980 से 1985 के बीच दाऊद और पठान गैंग के बीच खूब कत्लो गारत हुई। दाऊद ने अपने भाई शब्बीर को खोया तो वहीं करीम का भाई रहीम लाला भी मारा गया। इसके बाद 1986 के आसपास दाऊद दुबई चला गया और लाला रिटायरमेंट की ओर बढ़ चला।

करीम लाला की जिंदगी के आखिरी साल जो है लो प्रोफाइल [संगीत] ही थे। जवानी के दिनों में स्कॉच पीता था लेकिन बुढ़ापे में शराब छोड़नी छोड़नी [संगीत] पड़ी होगी। अगर नहीं छोड़ा तो वो था नोवेल्टी सिनेमा के पीछे वाला पुराना घर। 18 फरवरी 2002 को 90 साल की उम्र में करीम लाला की हार्ट अटैक से मौत हुई। एक वक्त पर जिस आदमी की छड़ी से लोग कांपते थे, वो भी वक्त की लाठी से बच नहीं पाया। जिसमें आवाज नहीं होती। शोरशराबे वाले शहर में करीम लाला का अंत नितांत सन्नाटे में हुआ। तो यह थी मुंबई के पहले अंडरवर डॉन करीम लाला [संगीत] की कहानी और कैसे एक कहानी से अंडरवर के अपराध के तमाम तार निकलते हैं। कुछ तार हमने इस कहानी में भी जोड़े कुछ अगले एपिसोड के लिए बचा कर [संगीत] रखे हैं। आज का एपिसोड लिखा है हमारे साथी योगेश ने। अपना ख्याल रखिए। तारीख में आपसे मुलाकात फिर होगी। तब तक के लिए शुक्रिया। [संगीत]

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