आज मैंने मेरी जॉब से रिजाइन कर दिया। एक बहुत ही एनवायरमेंट से खुद को निकाल लिया। यहां पर आप इसको दिहाड़ी बोल सकते हो। जी हां, कि आप सुबह अपने घर वालों को बोलो कि मैं दिहाड़ी पे जा रही हूं क्योंकि उन्होंने टीचर को टीचर नहीं मजदूर बना लिया। हां, अगर आपने स्कूल में गलती से भी हिंदी शब्द का प्रयोग किया तो आपको फाइन पे करना पड़ेगा क्योंकि यहां पे उन्हें टीचर नहीं, मजदूर चाहिए। वो मजदूर जो गधा हो जिस देश में जिस शिक्षक का दर्जा भगवान से ऊपर रखा गया आज उसी शिक्षक की बदहाली की एक ऐसी तस्वीर सामने आई जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है।
सरकारें भले ही रोजगार के बड़े-बड़े दावे करें, लेकिन प्राइवेट संस्थानों के बंद दरवाजों के पीछे कर्मचारियों का जो शोषण हो रहा है वो अब सड़कों पर और सोशल मीडिया पर कड़वी सच्चाई बनकर तैर रहा है। आज मैंने मेरी जॉब से रिजाइन कर दिया। एक बहुत ही टॉक्सिक एनवायरमेंट से खुद को निकाल लिया। रीजन बहुत सारा है। बट इस बार डिसीजन लेने का रीज़न गोरखपुर की रहने वाली एक प्राइवेट स्कूल की शिक्षिका अंकिता ने नौकरी से इस्तीफा दे दिया। इस्तीफा क्यों दिया? क्योंकि उनका कहना है कि वह अब टीचर नहीं बल्कि एक दिहाड़ी मजदूर बनकर रह गई थी। एक ऐसा मजदूर जिसे स्कूल में झाड़ू पोछा से लेकर वीडियो एडिटिंग तक कराई जाती है और हिंदी बोलने पर जुर्माना ठोक दिया जाता है।
इस वीडियो ने देश में एक नई बहस छेड़ दी है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर आंसुओं और गुस्से से भरा यह वीडियो इस समय देश का सबसे बड़ा मुद्दा बन चुका है। वीडियो बनाने वाली महिला का नाम अंकिता बताया जा रहा है जो उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के एक नामी प्राइवेट स्कूल में पढ़ाती थी। लेकिन अंकिता की यह आपबीती सिर्फ उनकी अकेली की कहानी नहीं बल्कि देश के लाखों प्राइवेट शिक्षकों और कर्मचारियों का वो दर्द है जिसे वह हर दिन घुटघुट कर सहते हैं।
अंकिता ने कैमरे के सामने आकर वह सच बयां किया जिसे अमूमन स्कूल मैनेजमेंट फीस की चकाचौंध के पीछे छिपा देता है। अंकिता का आरोप है कि प्राइवेट स्कूलों में अब पढ़ाना सबसे मुश्किल और मानसिक रूप से प्रताड़ित करने वाला पेशा बन चुका है। यहां सम्मान नहीं सिर्फ और सिर्फ शोषण का साम्राज्य चल रहा है। बताती हूं। हुआ यह कि आजकल ना यह जो टीचिंग प्रोफेशन है, जो बहुत ही रिस्पेक्टफुल जॉब है, ये वो रह नहीं गया। यहां पे आप इसको दिहाड़ी बोल सकते हो। जी हां। कि आप सुबह अपने घर वालों को बोलो कि मैं दिहाड़ी पर जा रही हूं क्योंकि उन्होंने टीचर को टीचर नहीं मजदूर बना लिया। मैं मेरी बात करूं तो मैं एक एक टीचर की सैलरी में मैंने मल्टीपल टीचर की जॉब की है। आई एम अ इंग्लिश टीचर, आई एम अ ग्रामर टीचर, आई एम अ कन्वर्सेशन टीचर, आई एम अ कंप्यूटर टीचर और आल्सो आई एम अ डांस टीचर।
आखिर एक शिक्षक को यह क्यों कहना पड़ा कि वह गधा मजदूर बन चुकी है। अंकिता ने अपने वीडियो में प्राइवेट स्कूलों की मनमानी की जो परतें खोली हैं, वह हैरान करने वाली है। अंकिता को स्कूल में इंग्लिश टीचर के तौर पर रखा गया था। लेकिन उनके मुताबिक स्कूल में उनसे अलग-अलग तरह का काम लिया जाता था। बात यहीं खत्म नहीं होती।
अंकिता का आरोप है कि स्कूल के फंक्शन में उनसे डांस टीचर का काम लिया जाता था। कैमरामैन बनकर वीडियो शूट करना और फिर रात-रात भर जागकर वीडियो एडिट करके स्कूल मैनेजमेंट को देना भी उन्हीं की जिम्मेदारी थी और हद तो तब हो गई जब स्कूल के कार्यक्रम में अलग-अलग तरह के काम करवाए गए। सोचिए जिस शिक्षक के हाथों में देश का भविष्य सवारने की जिम्मेदारी है उसके किसी काम में जरा सी भी चूक हो जाए तो भारी महफिल में अपमानित किया जाता है। यह सारे रोल्स मैं करती हूं और इसके बाद भी अगर हमारे स्कूल में कोई भी फंक्शन होता था और मैंने वीडियो शूट करके, एडिट करके टाइम से नहीं दी तो उसके लिए भी मुझे सुनाया जाता था। क्यों? क्योंकि मैं तो टीचर हूं। मेरा ये काम नहीं है। नहीं करना था क्योंकि आप टीचर हैं। इनफैक्ट मैंने टेबल्स तक पहुंची है फंक्शनंस के दिन अगर हमारे प्यून ने लेट किया है स्कूल आने में। क्यों? क्योंकि मैं तो टीचर हूं। यार टीचर टीचर नहीं रह गया। दिहाड़ी बन गई है।
जिस टीचर की हम पूजा किया करते थे अपने टाइम में वो अब रह नहीं गया। शोषण का यह खेल यहीं खत्म नहीं होता। नियमों के नाम पर इन प्राइवेट संस्थानों में जो तानाशाही चलती है उसकी बानगी भी अंकिता ने देश के सामने रखी है। अंकिता के मुताबिक स्कूल का समय सुबह 7:30 का है। अगर कोई शिक्षिका मात्र 10 मिनट की देरी से यानी 7:40 पर पहुंचती है तो सीधे उसकी पूरे दिन की सैलरी काट ली जाती है। अंकिता का दावा है कि उनकी खुद की 12 से 15 दिन की सैलरी सिर्फ इसलिए काट ली गई क्योंकि वह कुछ मिनट लेट थी।
लेकिन इस तानाशाही का सबसे क्रूर चेहरा तब सामने आता है जब देश की मातृभाषा हिंदी बोलने पर पाबंदी लगा दी जाती है। अंकिता ने बताया कि अगर किसी टीचर ने गलती से भी स्कूल परिसर में हिंदी शब्द का इस्तेमाल कर लिया तो उस पर सीधे जुर्माना यानी फाइन थोक दिया जाता है। अपनी ही भाषा बोलने पर आर्थिक दंड यह कैसी शिक्षा है और यह कैसा कल्चर है जहां इंसान रोबोट बनकर रह गया है। हां अगर आपने स्कूल में गलती से भी हिंदी शब्द का प्रयोग किया जो जो कि हमारी मातृभाषा है।
अगर आपने यूज किया तो आपको फाइन पे करना पड़ेगा। क्या हुआ आप टीचर्स हैं? अच्छा लेट हो गए। कितना लेट? 7:30 के स्कूल है। 7:40 पे हो गए। सैलरी कट मेरी 12 से 15 दिन की सैलरी कट गई क्योंकि मैं 7:30 पे ना आ गया। 745 पे पोर्शन। जजी टीचिंग जॉब ना अब हमारे लिए नहीं रहती है क्योंकि यहां पे उन्हें टीचर नहीं मजदूर चाहिए वो मजदूर जो गधा हो जैसा उस पे थोपता जाए लाता जाए वो लदे और बस चलता रहे।
अंकिता का यह वीडियो जैसे ही सोशल मीडिया पर आया मानो में लग गई देश भर के नेटिजंस पूर्व शिक्षक और नौकरी पेशा लोग अंकिता के समर्थन में उतर आए। लोग लगातार सरकार से मांग कर रहे हैं कि प्राइवेट स्कूलों और संस्थानों की इन मनमानी पर लगाम कसने के लिए कड़े और प्रभावी गाइडलाइंस बनाए जाए।
आज देश के हर शहर के किसी ना किसी प्राइवेट स्कूल में कोई ना कोई अंकिता घुट रही है। सवाल यह है कि शिक्षा के इन मंदिरों को कॉर्पोरेट टॉर्चर रूम बनाने से रोकने के लिए हमारी सरकारें कब जागेंगी?