नहीं यूज़ कर सकता यहां का स्टाफ लेकिन हिजाब यूज़ कर सकता है तो क्या मतलब शरिया लागू करवाना है क्या भारत देश में लेंस कार्ड की एक कंट्रोवर्सी ने पूरे देश में बहस छेड़ दी है मामला सिर्फ एक ड्रेस कोड का नहीं रहा बल्कि रिलीजन आइडेंटिटी और वर्क प्लेस फ्रीडम तक पहुंच गया है क्या सच में कर्मचारियों को तिलक और कलावा पहनने से रोका गया या मामला [संगीत] सोशल मीडिया पर बढ़ा चढ़ाकर पेश किया गया आज हम इस पूरे मुद्दे को फैक्ट्स कानून और लॉजिक के साथ समझेंगे। दरअसल इस पूरी कंट्रोवर्सी में अब खुद को सनातनी बताने वाली नाजिया इलाही खान भी कूद चुकी हैं। दरअसल वह मुंबई के अंधेरी में एक लेंस कार्ड स्टोर पर पहुंची। वहां उनकी मुलाकात एक कर्मचारी मोहसिन से हुई। जहां दोनों के बीच बहस हो गई। इसके बाद नाजिया ने सोशल मीडिया पर कुछ वीडियो शेयर किए और गंभीर आरोप लगाए।
उन्होंने लिखा लेंस कार्ड में हिंदू कर्मचारियों [संगीत] को तिलक और कलावा पहनने से रोका जाता है। कंपनी में मुस्लिम मैनेजर जानबूझकर नियुक्त किए गए हैं। इसे गजवा-ए- हिंद स्ट्रेटजी से जोड़ा गया। इन ट्वीट्स के बाद मामला तेजी से वायरल हो गया और कई हिंदू संगठन भी एक्टिव हो गए। कुछ लोगों ने इसे धार्मिक भेदभाव बताया तो कुछ ने इसे फेक नैरेटिव और उकसाने वाली बात कहा। यानी देश दो हिस्सों में बंट गया। नहीं यूज़ कर सकता यहां का स्टाफ लेकिन हिजाब यूज़ कर सकता है। तो क्या मतलब है शरिया लागू करवाना है क्या? भारत देश में शरिया लागू करवाना है क्या? मुसलमानों ने तो पाकिस्तान ले लिया। अब यहां क्या क्या पीटना है भाई? छाती क्यों पीटा जा रहा है? ये कहां दिखाओ दिखाओ सारे साहब को बुलाओ देखिए किसका किसका हाथ में तिलक है किसका किसका माथा में तिलक है बुलाओ बुलाओ तुम मोहन खान हो तुम सबको मोहन खान बनाओगे और तुमको हेड बना करके रखा गया है मोहन खान एक पक्ष कहता है यह हिंदुओं के खिलाफ साजिश है। दूसरा पक्ष कहता है यह सिर्फ वर्क प्लेस पॉलिसी है।
इसे कम्युनल एंगल दिया जा रहा है। दरअसल पिछले दिनों लेंस कार्ड से जुड़ी एक ड्रेस कोड पॉलिसी का डॉक्यूमेंट लीक हो गया था। लोगों ने इस बात पर ध्यान दिलाया कि इसमें वर्क प्लेस पर बिंदी और तिलक लगाने की अनुमति नहीं है। जबकि हिजाब की परमिशन थी। इस पर लेंस कार्ड के संस्थापक और सीईओ पीयूष बंसल ने साफ किया कि कंपनी की पॉलिसीज में बदलाव आया है और यह डॉक्यूमेंट उनके मौजूदा गाइडलाइन को नहीं दिखाती है। विवाद बढ़ने पर लेंस कार्ड के संस्थापक और सीईओ पीयूष बंसल ने साफ किया कि नीतिगत दस्तावेज गलत था। ऑनलाइन शेयर किए गए ड्रेस कोड दस्तावेज में लिखा था कि हिजाब पगड़ी पहनने पर उसका रंग काला होना चाहिए।
हिजाब से [संगीत] शरीर का ऊपरी हिस्सा ढका होना चाहिए और लोगों को नहीं ढकना चाहिए। वहीं दुकान में [संगीत] बुर्का पहनने को मना किया गया है। इसमें लिखा है बिंदी कल्चर की अनुमति नहीं है। कलावा के संदर्भ में धार्मिक धागे या कलाई बंद उतारकर ऑफिस आना होगा। इन गाइडलाइंस के बाद लेंस कार्ड की कंट्रोवर्सी सोशल मीडिया पर काफी आग की तरह फैल गई थी। हालांकि कंपनी के सीईओ पीयूष बंसल ने अब सामने आकर माफी भी मांगी है और सफाई भी दी है। उन्होंने कहा कि कोई भी धार्मिक भेदभाव नहीं किया जाता। कंपनी में यूनिफार्म पॉलिसी सभी पर लागू होती है। किसी भी धर्म के खिलाफ कोई नियम नहीं है। बाद में बैकलैश बढ़ने पर कंपनी ने क्लेरिफिकेशन के साथ माफी भी मांगी और कहा कि उनकी पॉलिसी को गलत तरीके से समझा गया। सभी [संगीत] धर्मों का सम्मान किया जाता है।
जिसके बाद अब नाजिया इलाही ने मुंबई के इस स्टोर में पहुंचकर हिंदू कर्मचारियों को बिंदी और कलावा [संगीत] पहनाया। तो सोशल मीडिया पर रिएक्शन भी शुरू हो गए। एक यूजर ने लिखा आई एम नॉट श्योर। एक यूजर ने लिखा मुझे नहीं पता कि इनके खिलाफ एक्शन क्यों लिया जा रहा है। आपको शोरूम में घुसने की इजाजत किसने दी। वही ने लिखा काफी नीच। गो फाइट विद द ओनर्स। ओनर्स से लड़िए। पुअर वर्कर्स को हैरेस मत कीजिए। वार्ड ने लिखा बहुत-बहुत धन्यवाद बहन। आज जो काम हिंदुओं को करना [संगीत] चाहिए वह आप कर रही हैं और करवा रही हैं। सनातन समाज में जिसमें आप भी हैं सदा-सदा आपका ऋणी रहूंगा। मकर ने लिखा इनसे पूछो कब लिया और कैसे लिया। यह बस इतना ही होमवर्क करके आई हैं और इससे ज्यादा इन्हें कुछ नहीं पता होगा। इनसे पूछो कब और कहां किसने दिया फिर इनकी वीडियो बनाऊंगा। मगर ने लिखा ये महिला लेंस कार्ड के स्टोर में जाकर हंगामा कर रही हैं और माहौल खराब कर रही हैं। इनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही होनी चाहिए और पुलिस का एक्शन भी होना चाहिए। लेंस कार्ड मैनेजमेंट को इसके खिलाफ एफआईआर करनी चाहिए। मकर ने कहा हिंदू मुस्लिम करना बंद करो वरना एक दिन कैंसर हो जाएगा और और कोई नहीं पूछेगा।
अब सबसे जरूरी सवाल क्या किसी कंपनी को ऐसा रूल बनाने का अधिकार है? हर व्यक्ति को अपने धर्म को मानने और दिखाने की स्वतंत्रता है। आर्टिकल 24 के मुताबिक। लेकिन प्राइवेट कंपनी अपने वर्क प्लेस के लिए रूल्स बना सकती हैं। जैसे यूनिफार्म ग्रूमिंग पॉलिसी। सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में यह साफ हुआ है कि अगर रूल न्यूट्रल है यानी सब पर बराबर लागू होता है तो वो वैध माना जा सकता है। लेकिन अगर रूल किसी एक धर्म को टारगेट करे तो वो डिस्क्रिमिनेशन यानी भेदभाव माना जाएगा। तो लेंस कार्ड सही था या गलत? अगर कंपनी ने सच में सभी धर्मों के सिंबल्स [संगीत] पर एक जैसा रूल लगाया तो यह कानूनी रूप से सही हो सकता है।
लेकिन अगर किसी एक धर्म को अलव और दूसरे को रिस्ट्रिक्ट किया गया तो यह गलत और गैरकानूनी होगा। असली समस्या क्या हुई? कम्युनिकेशन फेलियर। कंपनी अपनी पॉलिसी को साफ तरीके से एक्सप्लेन नहीं कर पाई और सोशल मीडिया पर नैरेटिव कंट्रोल से बाहर हो गया। क्या कंपनियों को ऐसे सेंसिटिव रूल्स बनाते समय सोच समझ कर फैसला लेना चाहिए? जवाब है हां क्योंकि भारत जैसे देश में रिलीजन आइडेंटिटी और आइडेंटिटी इमोशन है। अगर पॉलिसी गलत तरीके से बाहर आ जाए तो माहौल बिगड़ सकता है। फिलहाल आपकी क्या राय है? कमेंट सेक्शन में हमें लिखकर जरूर बताएं। वीडियो को लाइक करें, शेयर करें और चैनल को सब्सक्राइब करना बिल्कुल ना भूलें।