Cli
videsh sarvar harish

हरीश राणा की मौत को लेकर लोगों ने विदेश सारवार करने का क्यों पूछा?

Hindi Post

हरीश राणा केस। कई सारे कमेंट्स आ रहे हैं। पहले मैं वो कमेंट्स पढ़ना चाहूंगा जो लोग मांग कर रहे हैं और काफी जो लोग मांग कर रहे हैं उसमें मुझे ऐसा लग रहा है पर्सनली कि शायद मांग जायज भी है। उसकी वजह वो आपको बताता हूं। कई लोग ये कह रहे हैं कि ट्रीटमेंट तो फॉरेन में भी होता है। कई अमीर लोग अपना ट्रीटमेंट कराने के लिए विदेश चले जाते हैं। कई बार हमने देखा है सरकार आर्थिक सहायता भी देती है। गरीबों का भी ट्रीटमेंट विदेशों में हो जाता है। आपको याद होगा निर्भया केस दिल्ली का उस केस में भी सिंगापुर में निर्भया का ट्रीटमेंट हुआ था। वो अलग बात है।

वो बच नहीं पाई। लेकिन ये कहा जाता है कि जो बेस्ट ट्रीटमेंट है वो कई अलग-अलग देशों में कई बार होता है पर्टिकुलर अलग-अलग ऑर्गन्स का। हालांकि इसके विपरीत एक बात और भी है। भारत में भी ट्रीटमेंट कोई दुयम दर्जे का नहीं होता। यहां भी अच्छा ट्रीटमेंट होता है। लेकिन अब जो लोग इस तरह के विचार व्यक्त कर रहे हैं उनका कहना है कि हरीश को सरकार ने ट्रीटमेंट के लिए विदेश में क्यों नहीं भेजा? वहां पर ट्रीटमेंट दिलवा सकते थे। ठीक है? यहां के डॉक्टर्स भी एक्सपर्ट हैं। यहां के डॉक्टर्स ने भी यह लिखा है कि वो ठीक नहीं हो सकता।

एक सेकंड ओपिनियन, थर्ड ओपिनियन या फोर्थ ओपिनियन लेने में गुरेज क्या है? क्योंकि अगर पेशेंट को बचाने की नियत है या ठीक करने की नियत है तो ये कदम उठाना चाहिए। ऐसा नहीं है कि उनके परिवार की नियत ऐसी नहीं है। लेकिन उनका परिवार थक गया, हार गया। इस वजह से उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में एप्लीकेशन लगाई और इसके बाद जब यहां के तमाम बड़े-बड़े अस्पतालों के डॉक्टर्स ने लिख कर दिया कि वो ठीक नहीं हो सकता यानी हरीश तब जाकर ये फैसला लिया। वाकई फैसला बहुत कठिन था लेकिन लिया गया।

अब दूसरा विचार भी आ रहा है। मैं पढ़ रहा था कई कमेंट्स। उसमें कई लोग यह कह रहे थे कि चलिए ट्रीटमेंट तो बाहर चाहे तो सरकार दिलवा सकती थी। इस केस में क्यों नहीं दिलवाया? या इस केस में परिवार की तरफ से अर्जी सरकार को यानी प्राइम मिनिस्टर को प्रेसिडेंट को क्यों नहीं दायर की गई?


क्या पता कुछ फ्रूटफुल रिजल्ट आ जाते। अब कुछ लोग ऐसे भी हैं जो कह रहे हैं कि जिस तरीके से मौत की जा रही है वो ठीक नहीं। लेकिन ऐसे लोगों को मैं कहना चाहूंगा यह विचार आपका और मेरा नहीं है। देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट का है। सुप्रीम कोर्ट ने बाकायदा कई डॉक्टर्स की जो स्टडी थी, जो मेडिकल रिपोर्ट्स थी, उसको स्टडी किया। उन्होंने ये लिखा था कि वो ठीक नहीं हो सकता।

उसी के बिना पर ये फैसला लिया और एक बार ओपिनियन नहीं ली गई। कई बार ओपिनियन लिया। जिसके बाद एम्स जैसे प्रतिष्ठित संस्थान के प्रतिष्ठित डॉक्टरों से सलाह ली गई। जब उन्होंने इस तरह की ओपिनियन दी तब जाकर कोर्ट ने यह फैसला लिया। हालांकि कोर्ट के लिए भी फैसला आसान नहीं था। कोर्ट ने इस सिलसिले में हरीश के पिता और माता दोनों से बात की। लेकिन सवाल यही उठता है कि कई लोग ये कह रहे हैं कि अगर मौत देनी ही थी तो एक झटके में दे देते ताकि इतना लंबा समय इंतजार नहीं करना पड़ता।

दो हफ्ता, तीन हफ्ता, चार हफ्ता उसको मरते नहीं देखना पड़ता। और यह खबर वाकई जो भी सुन रहा है उसका दिल दहल रहा है। वो नहीं चाहता कि बार-बार सुने खबर और बार-बार उसकी मौत का इंतजार किया जाए। कुछ लोग इस विचारधारा में उनका कहना है कि देना है तो एक झटके में मौत दीजिए। आपको बता दूं कानून इसको लेकर बहुत स्पष्ट है। भारत में इस तरह से तड़पाकर मौत नहीं दी जा सकती। यहां डिग्निफाइड तरीके से मौत दी जाती है

और इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने ये फैसला लिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि डिग्निफाइड मैनर में धीरे-धीरे खुराक कम की जाए, दवा कम की जाए और उसके बाद बॉडी में जितनी इम्युनिटी है वो अपना उसको झेले और उसके बाद शरीर त्याग करें। ये इंटेंशन थी कि कम से कम दर्द हो और जो पेशेंट की मौत हो वो भयानक तरीके से। ये बात सच है। इसमें वक्त लगता है। ये बात सच है कि इसमें इंतजार करना पड़ता है। ये बात सच है। इसमें धैर्य रखना पड़ता है। और ये बात सच है कि इसमें एक दिन में कुछ नहीं होता। यही वजह है कि सिलसिला अभी भी चल रहा है।

खैर इसको लेकर डॉक्टर्स का क्या कहना है? डॉक्टर्स ने इसको लेकर बहुत ही डीपली इस चीज को समझाया है और यह बताया है कि किस तरीके से यह प्रोसेस अडॉप्ट किया जा रहा है। एम्स के डॉक्टर का क्या कहना है? इसके अलावा हमने प्राइवेट डॉक्टर से भी बात की थी। उनका क्या कहना है? सुनिए। हरीश राणा मामले को लेकर लगातार अपडेट सामने आ रहे हैं। दरअसल एम्स में जो डॉक्टर्स की टीम उनकी हेल्थ को मॉनिटर कर रही है

और इच्छाशक्ति को लेकर इच्छा मृत्यु को लेकर सॉरी उनके परिवार वालों ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल की थी जिसे सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार कर लिया था। ऐसे में अब किसी भी वक्त हरीश राणा की सासे थम सकती हैं क्योंकि बाकायदा डॉक्टर्स की टीम उनको जो इच्छा मृत्यु की जो याचिका थी उसको अमल में ला रही है। किस तरह का ये प्रोसेस होता है? हमारे साथ डॉक्टर पुनीत धवन जुड़ गए हैं। वो बताएंगे सर किस तरह से यह प्रोसेस होता है? पेशेंट की मेडिकल कंडीशन सबसे पहले देखी जाती है। उसके बाद क्या किस तरह के प्रोसेस अडॉप किया जाता है?


देखो चिराग जी यह केस है पैसिव यूथनेजिया का। बेसिकली यह एक क्लॉज़ है जो इंडिया में लीगली परमिसबल है। एंड जो डिसीजन कोर्ट ने ली है इट इज अ वेरी वेल थॉट ऑफ डिसीजन। बिकॉज़ ये केस जो इन्होंने फाइल किया उसके पेरेंट्स ने वो आज नहीं किया। कई साल से कर रहे थे। यह केस इवन दिल्ली हाई कोर्ट ने उनका रिजेक्ट भी किया था।

एट दैट टाइम दे सेड दैट द चाइल्ड इज नॉट ऑन एनी मैकेनिकल वेंटिलेशन और सपोर्ट सिर्फ ट्रेकसमी और गैस्ट्रोस्टमी हुई हुई है तो पैसिव यूस्थनेजिया के लिए भी परमिशन नहीं दी थी जो हम रिव्यू अब विज़न में जाएंगे तो वी वुड रिव्यू दैट इफ दिस वाज़ अ लीगली परमिसबल क्लॉज़ इट शुड हैव बीन परमिटेड एट दैट टाइम आल्सो बिकॉज़ इवन विद दिस आर्टिकल 21 में जो आपका कॉमन कॉज में जो प्रोविजन दी हुई है हमें लॉ ने उसमें इवन अ विलिंग रिटन लाइफ विल आल्सो वुड एंटाइटल समबडी टू गो फॉर अ पैसिव यूथनेसिया अगर वो लिख के चले जाता है

पहले अब वो क्योंकि वेजिटेटिव स्टेट में था उसके पेरेंट्स ही गार्डियन थे उसके तो पेरेंट्स की भी विल मान लेनी चाहिए थी बट स्टिल अब जो हुआ कंडीशन उस टाइम उन्होंने सुप्रीम कोर्ट ने मना किया उन्होंने कहा कि चलो आप नहीं कर सकते तो गवर्नमेंट सपोर्ट देगी और यूपी गवर्नमेंट भी सपोर्ट कर रही थी उनको। अब जो कंडीशन उन्होंने दो रिपोर्ट्स में बिकॉज़ इस डिसीजन को लेने के लिए पहले तो मजिस्ट्रेट वगैरह कर सकते थे। अब मेडिकल बोर्ड बनता है। पहले प्राइमरी रिपोर्टिंग होती है। उसके बाद सेकेंडरी रिपोर्टिंग होती है। उसमें अब बता रहे हैं कि भ बेड सोर्स वगैरह भी हो गए। कंडीशन तो उसकी ऐसी थी कि रिकवर होने वाली बात ही नहीं थी।

वेजिटेटिव स्टेट में जा चुका था। ब्रेन डेथ टाइप थी। ही वुड हैव नॉट रिकवर्ड। वो थोड़ा इमोशनल फैक्टर्स थे जो हम आजकल भी मीडिया में देख रहे हैं कि उन्होंने इस डिसीजन से लेने से पहले आपने आध्यात्मिक आध्यात्मिक लोगों से भी राय ली। ब्रह्मकुमारी का भी बीच में नाम आ रहा है कि दे वर काउंसलिंग देम एंड मेंटली प्रिपेयरिंग देम और क्रिएटिंग अ सीन अराउंड दैट व्हाटएवर द पेरेंट्स आर डूइंग इट्स अ जस्टिफाइड डिसीजन। अब इसमें एक बड़ा क्लियर कट दिया हुआ है कि यह जो है इसमें पैसिव यूथनेजिया में कोई हम मौत को जल्दी लाने की कोशिश भी नहीं कर सकते और उसको डिले भी नहीं करना

तो हम जो सपोर्ट दे रहे हैं उस सपोर्ट को धीरे-धीरे विड्र करना है। अब उसकी जो मेन सपोर्ट चल रही थी ट्रक हुई है वो तो सांस को वेंटिलेटर पर तो है नहीं। ऑक्सीजन कभी कभी जरूरत होती थी। ऑक्सीजन नहीं देंगे। अब जो सस्टेन कर रहा है शरीर को वो तो हमारी खुराक है। अब जो उसको मुंह से खाना दे रहे थे उसको प्लस ये भी इस क्लॉज में होता है कि हमने मरीज को तकलीफ नहीं देनी।

उसकी डिग्निटी पे भी असर नहीं आना। अब तकलीफ नहीं देनी तो भूखा रख के ही हमने उसको एक तरह का स्टार भी करना है। खाना नहीं देंगे। अब खाना एकदम नहीं देंगे तो वो भी परेशानी देता ही है। तो दे हैव सेट अ टारगेट ऑफ से टू टू थ्री वीक्स कि हम दो-तीन हफ्ते में इसको धीरे-धीरे मॉनिटर करेंगे। ये बच्चे की उस बच्चे की डिपेंड करता है कि बॉडी में इनहेरेंट कैपेबिलिटी टू फाइट एंड सस्टेन हिमसेल्फ कितनी है।

कितना ये पिछले 13 साल में वो अपने आप को खत्म कर चुका है। कितना रोज के रोज खाने वाले से गुजारा चल रहा था। तो दिस प्रोसेस मे टेक लेस टाइम और अगर उसके स्टोर अच्छी तरह थे स्टोर ठीक हुए थे हो सकता है ज्यादा भी ले बट मकसद बेसिक आईडिया पीछे ये है कि हमने उसको तकलीफ में नहीं मारना उसको परेशानी में नहीं मारना और उसकी मौत को जल्दी भी नहीं लाना उसकी मौत को दूर भी नहीं करना तो हम जो सपोर्ट दे रहे हैं सपोर्ट मेन मेरे हिसाब से तो सिर्फ खाने की रह गई जो गैस्ट्रिक वो धीरे-धीरे कैसे टेपर ऑफ करते हैं व्हाट पैराटर्स दे मॉनिटर दे मॉनिटर द ग्लूकोस सिस्टम उसका शुगर कितना चल रहा है किस लेवल पर वो जाके धीरेधी क्योंकि अगर हमें मालूम है कि अगर शुगर ही एकदम कम शुगर ही तो हमारे को चलाता है शरीर को अगर खाने में शुगर खत्म हो जाती तो लोगों को दौरे भी आ जाते हैं कम भी हो जाते तो वो किस तरह मॉनिटर करते हैं

किस तरह उनकी टीम है बिकॉज़ इट इज इन द बेस्ट हैंड्स अब एम से बेटर इंस्टट्यूट हमारे कौन हो गए और सेकेंडरी बोर्ड बैठ रहा है वहां पे उनका मकसद ये है कि बच्चा तकलीफ में भी ना जाए और धीरे-धीरे हम इस प्रोसेस को अपने इमकान तक ले आए। तो वी वुड सी दैट हाउ पैराटर्स आर असिस्ट। लेकिन सर इसमें कई बार ये भी बात बोलते हैं कई डॉक्टर से हमारी बात हुई। उनका कहना है कि जो ऑक्सीजन पाइप है अगर वो हटा दिया जाए तो तो एक ही मिनट में मौत हो सकती है। नहीं ऑक्सीजन पाइप तो देखो इसमें जो मैंने देख रहा हूं कि उसको ट्रकस्टमी हुई हुई है।

उसकी सांस की नली यहां से डाली हुई है जिससे वो हवा जा रही है फेफड़ों में उसको मैकेनिकल वेंटिलेशन या ऑक्सीजन की सप्लाई कभी-कभी इंटरमिटेंटली चाहिए होती थी। ठीक है? अगर वो भी हम देख रहे हैं कि जब उसकी ऑक्सीजन कोई स्ट्रेस में जाता है बच्चा पेट में खाना गया है उस टाइम हमारी ऑक्सीजन की जरूरत बढ़ती है कुछ और कहीं से जुकाम खांसी या पोलशन या कुछ और चीजें जहां ऑक्सीजन की जरूरत बढ़ती है

उस टाइम सपोर्ट चल रहा था कि बिना उसके ही अभी चल रहा था अगर ऑक्सीजन चल रही थी उसके साथसाथ अभी कंटीन्यूस ऑक्सीजन सपोर्ट पे है तो ऑक्सीजन हटाने से तो और जल्दी फर्क पड़ेगा अगर ऑक्सीजन की सपोर्ट के बगैर चल रहा है खाली ट्रकयोस्टमी के सिर पर चल रहा है तो वो उसके इनहेरेंट बाकी फैक्टर जो होंगे अगर खाना कम होगा बॉडी स्ट्रेस में जाती है ऑक्सीजन की जरूरत उस टाइम बढ़ती है

हम उसको ना सपोर्ट करें तो यह भी हसन अप करेंगे टवर्ड्स अल्टीमेट एंड बात ध्यान में रखनी है कि मेडिकेशन भी दिया जाएगा इस तरह की बात भी सामने आ रही थी अगर अगर पेन होता है तो इस हां यही तो जो क्लॉज़ है इसमें पैसिव यूथनेसिया में कि वी हमने उसको तकलीफ नहीं देनी अगर कोई ये हमारी विड्र सिम्टम्स में ऑक्सीजन पे और उसकी कैलोरी इंटेक्स पे खाने की चीजें कम करते हुए अगर उसको कोई तरह तरह की तकलीफ आनी तभी एनस्थीसिया वाले हेड उसमें इनवॉल्व है किसी तरह की कोई ऐसी चीजों की कमी आने लगती है

उसको कन्वर्जन ही आने लग पड़े उसको दौरा ही आने लग पड़ा वो तो हमने तकलीफ देके मार दिए ना फिर तो उस चीजों को वो कम करेंगे अगर कोई ऐसा कन्वर्जन आने लग पड़ी या कुछ और आपका मेटा जो बायोकेमिस्ट्री पैराटर्स अगर कुछ डिस्टर्ब हो रहे हैं जो परेशान करने लगे हैं तो वो तो उनको धीरे-धीरे सॉर्ट आउट करना ही है। दैट इज व्हाट दे आर मॉनिटरिंग। तो सर इसमें कितना वक्त लगेगा?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *