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गीतकार शैलेन्द्र की तड़पती ज़िन्दगी और सिने इतिहास का सबसे खौफनाक अंत

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तू लंबी रेस का घोड़ा है। प्रोड्यूसर बन जा। यह महज एक वाक्य नहीं था बल्कि वह मीठा जहर था जिसने हिंदी सिनेमा के सबसे महान और सीधे साधे गीतकार की पूरी जिंदगी को अंदर से खोखला कर दिया। राजा की आएगी बारात रंगीली [संगीत] होगी रात मगन में। एक ऐसा इंसान जो सिर्फ भावनाएं समझता था। उसे दुनियादारी और व्यापार के उस अंधे कुएं में धकेल दिया गया जहां से वापसी का कोई रास्ता नहीं था। किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार [संगीत][गाना गाने की आवाज़] किसी का दर्द मिल सके। नमस्कार आदाब सत श्री अकाल। हेलो दोस्तों आप सुन रहे हैं हिंदी रेडियो और आज हम किसी चमकते हुए सितारे की नहीं बल्कि उस आसमान की बात करेंगे जिसने उन सितारों को चमकने की जगह दी। आज की कहानी कोई भूला बिसरा किस्सा नहीं है बल्कि दर्द की वो दास्तान है जिसे सुनकर एक पल के लिए आपकी सांसे भारी हो जाएंगी। एक सवाल आपके मन को झकझोर देगा कि क्या दुनिया में ऐसे भी लोग होते हैं जो एक फरिश्ते जैसे इंसान को उसी के अच्छाई के जाल में फंसाकर लूट लेते हैं। रमैया वस्तावैया रमैया वस्तावैया। [गाना गाने की आवाज़] मैंने दिल तुझको दिया। शैलेंद्र वो इंसान थे जिनके लिखे गीतों ने लाखों टूटे हुए दिल जोड़े। कई लोगों के घर बसाए पर अफसोस उनका खुद का घर कभी बस नहीं पाया।

सवेरे वाली गाड़ी से चले जाएंगे। [संगीत] सवेरे वाली गाड़ी से सुख, शांति और सुकून यह शब्द उनके जीवन के शब्दकोश से हमेशा के लिए मिट गए थे। कानों [संगीत] से खींच के ये आंचल ओढ़ के बंधन वाली शैलेंद्र का जन्म वैसे तो रावलपिंडी में हुआ था लेकिन उनके बचपन का एक बड़ा हिस्सा मथुरा की गलियों में बीता उनका असली नाम शंकरदास केसरी लाल था। बचपन से ही गरीबी और संघर्ष उनके सबसे करीबी साथी थे। जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही रोजगार की तलाश उन्हें माया नगरी बॉम्बे ले आए। गलत मुसाफिर मोह रे पिंजरे वाले [संगीत] मुसाफिर यहां उन्हें सेंट्रल रेलवे के माटूंगा वर्कशॉप में वेल्डिंग और बॉईलर का काम मिल गया। जरा उस मंजर की कल्पना कीजिए। चारों तरफ भारी मशीनों का कान फोड़ देने वाला शोर। बोईलर की चिलचिलाती गर्मी, पसीने से लथपथ मजदूर और उन सबके बीच एक ऐसा सीधा-साधा इंसान जिसके दिल में शब्दों की एक बेहद शांत और ठंडी नदी बह रही थी। दिनभर रेलवे की उस थका देने वाली नौकरी के बाद जब भी उन्हें थोड़ा समय मिलता, वो कागज के छोटे-छोटे टुकड़ों या माचिस के डिब्बियों पर अपनी कविताएं लिख लिया करते थे। यही वो दौर था जब पूरे देश में आजादी की आग धक रही थी। चाहा क्या मिला बेवफा शैलेंद्र भी इंडियन पीपल्स थिएटर एसोसिएशन यानी इप्टा से जुड़ गए। इटा वो मंच था जहां देश के तमाम बुद्धिजीवी और कलाकार अपने विचार रखते थे। शैलेंद्र अक्सर इप्टा के मुशायरों में अपनी कविताएं पढ़ने लगे। उनकी आवाज में वह दर्द और सच्चाई थी जो

सीधा सुनने वाले के दिल को चीर जाती थी। दोस्त [गाना गाने की आवाज़] दोस्त ना रहा प्यार प्यार ना साल 1947 के आसपास का वो एक ऐसा ही मुशायरा था मंच पर एक दुबला पतला सा लड़का खड़ा था और अपनी पूरी जान लगाकर एक कविता पढ़ रहा था [नाक से की जाने वाली आवाज़] जलता है पंजाब इस कविता में बंटवारे का दर्द था इंसानी खून की बू थी और एक कवि की तड़प थी उसे मुशायरे में सामने बैठे दर्शकों के बीच एक नौजवान अभिनेता भी मौजूद था जिसकी आंखें इस कवि को देखकर चमक उठी थी। वह अभिनेता कोई और नहीं बल्कि राज कपूर थे। छोटा सा घर होगा बादलों की छांव में आशा दीवानी मन भी। राज कपूर उस वक्त अपनी पहली फिल्म आग बना रहे थे। उन्हें शैलेंद्र के शब्द इतने ताकतवर लगे कि मुशायरा खत्म होते ही वह सीधे शैलेंद्र के पास गए। उन्होंने शैलेंद्र से कहा कि तुम्हारी कविता ने मुझे अंदर तक हिला दिया है। क्या तुम मेरी फिल्म के लिए गीत लिखोगे? राज कपूर को लगा था

कि रेलवे का यह आम सा कर्मचारी इस ऑफर को सुनकर खुशी से उछल पड़ेगा। लेकिन शैलेंद्र का जवाब सुनकर राज कपूर सन्य रह गए। शैलेंद्र ने बड़ी ही शालीनता लेकिन दृढ़ता से कहा। माफ कीजिएगा लेकिन मैं अपनी कविताएं बेचता नहीं हूं। सिनेमा मेरी दुनिया नहीं है। राज कपूर उस स्वाभिमानी कवि को देखते रह गए। उन्होंने बुरा नहीं माना बल्कि मुस्कुराकर कहा कि मेरे दरवाजे तुम्हारे लिए हमेशा खुले हैं। ये रात भीगी भीगी [संगीत] ये मां सुख जाएगी। समय का पहिया घूमा। आजादी मिल चुकी थी। शैलेंद्र की शादी शकुंतला से हो चुकी थी और अब वह पिता बनने वाले थे। पत्नी की प्रेगनेंसी के दौरान घर में पैसों की सख्त जरूरत आ पड़ी। रेलवे की मामूली पगार से घर चलाना और अस्पताल का खर्च उठाना नामुमकिन हो रहा था। तब उस स्वाभिमानी कवि को अपनी कला और परिवार की जरूरत के बीच एक कठिन चुनाव करना पड़ा। शैलेंद्र को राज कपूर का वह ऑफर याद आया। वो भारी कदमों से राज कपूर के पास पहुंचे और कहा, “मुझे पैसों की जरूरत है। क्या वह काम अभी भी मिल सकता है?” राज कपूर ने बिना कोई सवाल किए शैलेंद्र को गले लगा लिया और एडवांस के तौर पर ₹500 उनके हाथ में थमा दिए। यही वह पल था जब एक साधारण सा रेलवे कर्मचारी हिंदी सिनेमा का महान गीतकार शैलेंद्र बन गया। अजीब दास्ता है कहां शुरू कहां?

उन्होंने राज कपूर की फिल्म बरसात के लिए दो गीत लिखे। बरसात में तुमसे मिले हम सजन और पतली कमर है। यह दोनों गीत रातों-रात पूरे देश की धड़कन बन गए। मुकेश की आवाज और शैलेंद्र के शब्दों ने ऐसा जादू किया कि आर के स्टूडियो का परचम आसमान में लहराने लगा। बरसात [संगीत] में हमसे मिले तुम सजन तुमसे मिले हम बरसात में। यहीं से शुरू हुई राज कपूर और शैलेंद्र की वह अमर और रूहानी दोस्ती। जिसकी मिसाल आज भी दी जाती है। राज कपूर ने उन्हें आर के स्टूडियो का स्थाई हिस्सा बना लिया। उनकी सैलरी ₹500 महीना तय कर दी गई। जो उस जमाने में एक बहुत बड़ी रकम थी। शर्त बस इतनी थी कि चाहे वो एक गीत लिखें या पांच उन्हें यही तय रकम मिलेगी। [संगीत] जीवन के दो पहलू हैं हरियाली और रास्ता। आज जावेद अख्तर और गुलजार साहब जैसे दिग्गज भी सिर झुकाकर यह बात मानते हैं कि शैलेंद्र हिंदी सिनेमा के सबसे महान गीतकार थे। उनकी सबसे बड़ी खूबी यह थी कि वो कोई भारी भरकम उर्दू के शायर नहीं थे। वो जिंदगी के सबसे गहरे, सबसे जटिल और सबसे दर्दनाक फलसफों को इतने सरल और आम शब्दों में लिख देते थे कि एक रिक्शा चलाने वाला भी उसे गाता था और एक पढ़ा लिखा बुद्धिजीव भी। प्यार हुआ इकरार हुआ है प्यार से फिर क्यों डरता है दिल आवारा हूं मेरा जूता है जापानी प्यार हुआ इकरार हुआ और सजंडरे झूठ मत बोलो यह सिर्फ गीत नहीं थे यह आम हिंदुस्तानी आदमी की आत्मा की आवाज थे मैं आशिक [संगीत] हूं बहारों का नजारों का फिजाओं का इशारों का राज कपूर उन्हें इतना मानते थे कि वो वो अक्सर जमीन पर शैलेंद्र के पैरों के पास बैठ जाया करते थे और आंखें बंद करके उनके गीत सुनते थे। राज कपूर उन्हें प्यार के कविराज और महान रूसी कवि के नाम पर पुष्किन कहकर पुकारते थे। लेकिन इतनी शोहरत और पैसा मिलने के बावजूद शैलेंद्र का स्वभाव बिल्कुल नहीं बदला। वह हमेशा जमीन से जुड़े रहे। वह अक्सर अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा उन संगीतकारों और टेक्नशियनों के साथ बांट लिया करते थे जो आर्थिक रूप से कमजोर होते थे। पतली कमर है तिरकी नजर है खिले फूल सी तेरी जवानी हुई। जिंदगी एक खूबसूरत सपने की तरह चल रही थी। लेकिन फिर साल 1960 आया। यह वो साल था जब इस सीधे-साधे इंसान ने अपनी कला को एक नया मुकाम देने का फैसला किया। मशहूर स्क्रीनप्ले राइटर नेंदु घोष ने फणेश्वर नाथ रेणू की एक दिल छू लेने वाली कहानी पढ़ी थी जिसका नाम था मारे गए गुल्फाम। नवंदु दा को यह कहानी इतनी पसंद आई कि उन्होंने इसका जिक्र बसु भट्टाचार्य से किया। वसुदा उस वक्त महान निर्देशक विमल रॉय के असिस्टेंट हुआ करते थे। वसुधा ने यह कहानी शैलेंद्र को सुनाई। कहानी में एक सीधे साधे बैलगाड़ी वाले हीरामन और एक नौटंकी में नाचने वाली हीराबाई के बीच के उस पवित्र और खामोश प्यार का जिक्र था जिसे समाज कभी मंजूरी नहीं देता। शैलेंद्र जब यह कहानी सुन रहे थे तो उनके आंसू नहीं रुक रहे थे। हीराराम के सीधेपन में उन्हें कहीं ना कहीं अपना भी अक नजर आ रहा था। उन्होंने तय कर लिया कि वह इस कहानी को पर्दे पर उतारेंगे। साहित्य और सिनेमा के इस महान संगम का नाम रखा गया तीसरी कसम। दुनिया बनाने [संगीत] वाले क्या तेरे मन में समाई शैलेंद्र ने तुरंत फणीश्वर नाथ रेणू को खत लिखा और उनसे फिल्म बनाने की इजाजत मांगी। रेणू जी भी खुशी-खुशी तैयार हो गई। इसी बीच बासु भट्टाचार्य ने शैलेंद्र के भोलेपन का फायदा उठाते हुए एक मीठा जाल बुना। वसुधा ने शैलेंद्र को यकीन दिलाया कि अगर वह उन्हें निर्देशक बनाते हैं तो यह पूरी फिल्म महज 6 से 8 महीने के भीतर और सिर्फ ₹ लाख के मामूली बजट में बनकर तैयार हो जाएगी। शैलेंद्र इस मीठे धोखे में आ गए। 14 जनवरी 1961 को बिहार के पूर्णिया जिले में जो कि फणीश्वर नाथ रेणु का गृह नगर था। इस फिल्म का मुहूर्त बड़े ही धूमधाम से किया गया। शैलेंद्र को लग रहा था कि वह एक इतिहास रचने जा रहे हैं। उन्हें लग रहा था कि उनके अपने लोग उनके साथी उनका साथ देंगे। लेकिन उस भोले इंसान को यह नहीं पता था कि सिनेमा की यह दुनिया कितनी बेरहम है और यह कदम उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा सबसे दर्दनाक और आखिरी फैसला साबित होने वाला है। मेरा जूता है जापानी ये पतलू [संगीत] इंग्लिश सर पे लाल टोपी रूसी फिर भी बिहार के पूर्णिया में फिल्म का मुहूर्त तो बड़े धूमधाम से हो गया था। लेकिन शैलेंद्र के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती थी इस कहानी के किरदारों में जान फूंकने की। शैलेंद्र अपनी इस सबसे प्यारी कविता को पर्दे पर उतारने के लिए ऐसे चेहरे तलाश रहे थे जो बिल्कुल आम सच्चे [संगीत] और जमीन से जुड़े हुए लगे। आपको यह जानकर शायद बेहद हैरानी होगी कि तीसरी कसम के लिए राज कपूर और वहीदा रहमान शैलेंद्र की पहली पसंद बिल्कुल नहीं थे। शैलेंद्र चाहते थे कि बैलगाड़ी हांकने वाले सीधे-साधे हीरामन का किरदार मशहूर अभिनेता महमूद निभाएं और नौटंकी में नाचने वाली हीराबाई के किरदार में नूतन जी की गहरी और दर्द भरी आंखें हो। वसु भट्टाचार्य और शैलेंद्र ने नूतन जी से संपर्क भी किया था। लेकिन कुछ अपरिहार्य कारणों से नूतन जी ने इस प्रस्ताव को बेहद विनम्रता से ठुकरा दिया। इसके बाद जब एक दिन शैलेंद्र ने अपने परम मित्र राज कपूर को बातोंबातों में बताया कि वह मारे गए गुलफाम पर फिल्म बना रहे हैं और महमूद को हीरो लेने की सोच रहे हैं तो राज कपूर को यह बात कुछ जजी नहीं। राज कपूर ने जब फणेश्वर नाथ रेणू की वह कहानी सुनी तो हीरामन के भोलेपन और सादगी ने उनके दिल को गहराई से छू लिया।

राज कपूर ने तुरंत शैलेंद्र से कहा कि यह रोल मैं करूंगा। शैलेंद्र खुशी से फूले नहीं समाए लेकिन अगले ही पल राज कपूर का चेहरा एकदम गंभीर हो गया। उन्होंने शैलेंद्र की आंखों में आंखें डालकर बड़े ही कड़क अंदाज में कहा, “मेरा पारिश्रमिक यानी मेरी फीस तुम्हें एडवांस देनी होगी। मैं बिना पैसे के काम नहीं करूंगा।” जरा सोचिए उस सीधे साधे कवि के दिल पर उस वक्त क्या गुजरी होगी। शैलेंद्र का चेहरा एकदम से उतर गया। उनके दिल को एक गहरा धक्का लगा। उन्हें बिल्कुल उम्मीद नहीं थी कि जीवन भर की इतनी गहरी और रूहानी दोस्ती का राज कपूर इस तरह व्यापारिक बदला देंगे। शैलेंद्र का उतरा हुआ और मासूम चेहरा देखकर राज कपूर अपनी हंसी नहीं रोक पाए। वो जोर से मुस्कुराए और शैलेंद्र के कंधे पर हाथ रखते हुए बोले, निकालो ₹1 यही मेरी पूरी फीस है और मुझे मेरा यह पूरा एडवांस अभी चाहिए। इस ₹1 वाली बात का जिक्र खुद राज कपूर के बेटे ऋषि कपूर ने भी अपनी किताब खुलम खुल्ला में बड़ी ही भावुकता के साथ लिखा है। दिल तड़प तड़प के कह रहा है आ भी जा तू हमसे आंख [संगीत] ना चुरा तुझे हीरामन मिल चुका था लेकिन हीराबाई की तलाश अब भी जारी थी। जब वहीदा रहमान के पास यह ऑफर गया तो शुरुआत में उन्होंने भी इस रोल के लिए मना कर दिया था। तब शैलेंद्र ने वहीदा जी के मेंटर और उस दौर के सबसे दिग्गज फिल्मकार गुरुदत्त साहब से गुजारिश की। गुरुदत्त साहब के समझाने पर वहीदा रहमान आखिरकार इस फिल्म के लिए तैयार हो गई। लेकिन यहां पर वहीदा जी का वह बड़प्पन सामने आया जो आज के दौर में देखने को भी नहीं मिलता। शैलेंद्र एक नए और बहुत ही छोटे बजट के प्रोड्यूसर थे। जब उन्होंने वहीदा रहमान को साइन किया तो उनकी आंखें नम थी। उन्होंने रंधे हुए गले से वहिदा जी से कहा कि मेरे पास आपको देने के लिए उतने पैसे नहीं है जितनी आपकी फीस है। शैलेंद्र के उन सच्चे आंसुओं को देखकर वहिदा रहमान का दिल पिघल गया। उन्होंने शैलेंद्र से वादा किया कि आज के बाद हम इस फिल्म के लिए पैसों का जिक्र कभी नहीं करेंगे। किसी ने अपना बना के मुझको [संगीत] मुस्कुराना सिखा दिया।

यह फिल्म महज एक कहानी नहीं थी। यह एक बैलगाड़ी वाले हीरामन और नौटंकी में नाचने वाले हीराबाई के बीच 30 घंटे के एक लंबे और बेहद खूबसूरत सफर की दास्तान थी। हीरामन जिसने अपनी पूरी जिंदगी में कभी किसी गैर औरत को इतने करीब से नहीं देखा था। वह हीराबाई के रूप और उसके सलीके को देखकर मंत्रमुग्ध हो जाता है। वो उसे एक परी एक देवी मान बैठता है। वहीं हीराबाई जो समाज के तमाम तानों और वासना भरी नजरों के बीच एक नौटंकी कंपनी में नाचकर अपनी ईमानदार रोजीरोटी कमा रही थी। वो हीरामन के इस पवित्र नजरिए को देखकर अंदर तक हिल जाती हैं। वो आजाद ख्यालों वाली एक ऐसी महिला थी जो अपने पैरों पर खड़ी थी जिसे अपना काम पसंद था। लेकिन समाज उसे सिर्फ एक बिकाऊ चीज समझता था। जब उसे हीरामन के रूप में एक ऐसा इंसान मिलता है जो उसकी पूजा करता है तो उसके भीतर एक अजीब सी कशमकश शुरू हो जाती है। इन दोनों किरदारों को राज कपूर और वही रहमान से बेहतर कोई और जी ही नहीं सकता था। चक्के में चक्का चक्के पे गाड़ी गाड़ी में निकली अपनी सवारी। सब कुछ तय हो चुका था। गानों की रिकॉर्डिंग शुरू हो गई। लेकिन पनौती ने पहले ही दिन से शैलेंद्र का दामन पकड़ लिया। जिस दिन खुदा के पास जाना है गाने की रिकॉर्डिंग थी, उसी दिन स्टूडियो का एसी खराब हो गया। राज कपूर और वाहदा रहमान जैसे बड़े सितारों का समय बर्बाद ना हो और स्टूडियो का भाड़ा व्यर्थ ना जाए इसलिए स्टूडियो को ठंडा करने के लिए बाहर से बर्फ के बड़े-बड़े बॉक्स मंगवाए गए। तब जाकर कहीं वो अमर गाना रिकॉर्ड हो सका। सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है सहारा निर्देशक बसु भट्टाचार्य ने शैलेंद्र को भरोसा दिलाया था कि फिल्म 6 से 8 महीने में पूरी हो जाएगी लेकिन वसुधा का रवैया बहुत ही गैर जिम्मेदाराना था। बतौर स्वतंत्र निर्देशक यह उनकी पहली फिल्म थी। जिस पर विमल रॉय के सिनेमा की गहरी छाप थी। लेकिन उनका स्वभाव सेट पर मौजूद अन्य लोगों को बिल्कुल पसंद नहीं आता था। इतना ही नहीं वह बिन बताए कई-कई दिनों तक शूटिंग से गायब भी हो जाया करते थे। शैलेंद्र को लगा कि अगर प्रोडक्शन की जिम्मेदारी घर के ही किसी व्यक्ति को दे दी जाए तो चीजें समय पर होंगी और उनका बहुत सारा पैसा बच जाएगा। यही सोचकर उन्होंने अपनी पत्नी शकुंतला के भाई यानी अपने साले को फिल्म का प्रोडक्शन कोऑर्डिनेटर बना दिया। शैलेंद्र की जिंदगी की यह सबसे बड़ी, सबसे भयानक और सबसे जानलेवा भूल साबित हुई। शकुंतला का भाई शैलेंद्र के उन खूबसूरत सपनों का सबसे बड़ा दुश्मन और एक आस्तीन का सांप निकला। तीसरी कसम फिल्म की कहानी के हिसाब से शूटिंग मुंबई के आसपास बसे किसी भी एक छोटे से गांव में बड़े आराम से की जा सकती थी। लेकिन शकुंतला के भाई ने शैलेंद्र के भरोसे का खून करते हुए पूरी यूनिट को मध्य प्रदेश के सागर और जबलपुर के बीच बसे एक छोटे से गांव खिमलासा में ले जाने का फैसला किया। राज कपूर, वहिदा रहमान, मुकेश और पूरी यूनिट को 15 दिन का बोलकर बीना के पास उस खिमलासा गांव में ले जाया गया। शकुंतला के भाई ने सबको यह यकीन दिलाया था कि इतनी दूर जाकर शूटिंग करने का फैसला उसने शैलेंद्र बाबू से पूछकर ही लिया है। वहिदा जी, राज कपूर और मुकेश ने भी यह सोचकर कोई सवाल नहीं किया कि वह शैलेंद्र के घर का आदमी है तो शैलेंद्र को पता ही होगा। लेकिन असलियत तो कुछ और ही थी। शैलेंद्र को तो इस बात की भनक भी नहीं थी कि पूरी यूनिट को खिमलासा क्यों ले जाया गया है। बाद में जब इस भ्रष्टाचार की परतें खुली तो पता चला कि शकुंतला के भाई की प्रेमिका उस खिमलासा गांव में रहती थी। सिर्फ अपनी माशुका के करीब रहने और शैलेंद्र के पैसों पर ऐश करने के लिए वो पूरी यूनिट को वहां ले गया था। उसने शैलेंद्र को इतनी बेरहमी से लूटा जिसकी कोई मिसाल नहीं मिलती। आप खुद सोचिए इस पूरी फिल्म में किसी भी कलाकार ने सूट बूट नहीं पहना है। हर कोई धोती कुर्ते और साड़ी में है। फिर भी उस शख्स ने प्रोडक्शन के खाते में 20 महंगे अंग्रेजी कपड़ों का भारी भरकम बिल जोड़कर पैसा अपनी जेब में डाल लिया। हद तो तब पार हो गई जब उसने बैलों के मरने की झूठी कहानी रची। उसने खाते में लिखा कि शूटिंग के लिए खरीदे गए बैल अचानक मर गए और फिर नए बैलों की खरीदारी का फर्जी बिल बनाकर शैलेंद्र को अंदर तक चूस लिया। शैलेंद्र मुंबई में बैठकर अपने उन कर्जों की आग में धीरे-धीरे जल रहे थे जो उन्होंने अपने ही लोगों पर आंख मूंदकर भरोसा करने की वजह से लिए थे। उन्हें यह नहीं पता था कि जिस फिल्म को वह एक साहित्य की इबादत समझकर बना रहे हैं, उनके अपने ही लोग उन्हें एक चारागाह समझकर चल रहे हैं। खिमलासा गांव के उस मनहूस और धोखेबाज शूटिंग के बाद शैलेंद्र मुंबई तो लौट आए, लेकिन उनका सुकून हमेशा के लिए उसी गांव की धूल में कहीं खो गया। एक सीधा-साधा कवि जिसने कभी पैसों का हिसाब नहीं रखा था। वो अब कर्ज के एक ऐसे भयानक चक्रव्यूह में फंस चुका था जहां से बाहर निकलने का हर रास्ता बंद हो रहा था। बसु भट्टाचार्य ने शैलेंद्र को बड़े ही मीठे शब्दों में भरोसा दिलाया था कि यह फिल्म महज 6 महीनों में और ₹ लाख के मामूली बजट में बनकर तैयार हो जाएगी। लेकिन हकीकत में वक्त रेत की तरह हाथों से फिसलता जा रहा था। 6 महीने का वो झूठा वादा 5 साल के लंबे और घुटन भरे इंतजार में बदल गया और जो बजट 2 से ₹ लाख तय हुआ था वो सारी हदें पार करते हुए 22 से ₹23 लाख तक पहुंच गया। जरा सोचिए उस इंसान की मानसिक हालत क्या होगी जिसकी अपनी पगार कुछ ₹100 हो और उस पर लाखों का कर्ज चढ़ जाए। सब कुछ सीखा हमने ना सीखी होशियारी। [संगीत] सच है दुनिया वालों शैलेंद्र अब ब्याजखोरों और साहूकारों के उस गहरे दलदल में गले तक डूब चुके थे जहां हर दिन उन्हें अपनी कला की कीमत अपने आंसुओं से चुकानी पड़ रही थी। मुसीबतों का पहाड़ यहीं खत्म नहीं हुआ। फिल्म के निर्देशक बसु भट्टाचार्य जिनके ऊपर इस फिल्म को पूरा करने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी थी उनका बर्ताव दिन-बदिन गैर जिम्मेदाराना होता गया। वो सेट पर मनमानी करते और यूनिट के लोगों के साथ उनका व्यवहार भी बहुत रूखा था। हद तो तब हो गई जब वसुदा आधी फिल्म बीच भवर में छोड़कर ही गायब हो गए। एक ऐसा जहाज जिसने साहित्य के समंदर में एक खूबसूरत सफर की शुरुआत की थी। अब वह बिना कप्तान के डूबने की कगार पर आ खड़ा हुआ था। शैलेंद्र पूरी तरह से टूट चुके थे।

उन्हें लगा कि अब सब कुछ खत्म हो गया है। [नाक से की जाने वाली आवाज़] लेकिन ऐसे अंधेरे वक्त में एक बार फिर वो इंसान उनके साथ चट्टान की तरह खड़ा हुआ जिसने जीवन भर की दोस्ती का फर्ज सिर्फ ₹1 में निभाया था। महान अभिनेता राज कपूर और उनके साथ दिग्गज गायक मुकेश साहब ने शैलेंद्र के इस डूबती नया को अपने कंधों पर उठा लिया। जब राज कपूर की अपनी होम प्रोडक्शन फिल्म संगम और वहीदा रहमान की फिल्म गाइड की शूटिंग हो गई तो राज कपूर ने फैसला किया कि वो अपने दोस्त के इस अधूरी फिल्म को खुद डायरेक्ट करेंगे। राज कपूर और मुकेश की जोड़ी ने दिन-रा एक कर दिया। राज कपूर ने कैमरे के पीछे और आगे दोनों जगह पूरी जान लगा दी। उन्होंने फिल्म की बची हुई शूटिंग पूरी की। उसकी एडिटिंग करवाई और बहुत ही बारीकी के साथ तीसरी कसम की शानदार पैकेजिंग तैयार की। राज कपूर चाहते थे कि उनके दोस्त की यह फिल्म किसी भी तरह बॉक्स ऑफिस पर अपना कमाल दिखाए ताकि शैलेंद्र इस भारी कर्ज से आजाद हो सके। इसी उम्मीद के साथ राज कपूर ने अपने आर के स्टूडियो में इस फिल्म की एक बेहद खास और स्पेशल स्क्रीनिंग आयोजित की। इस स्क्रीनिंग में मुंबई और देश भर के सबसे बड़े डिस्ट्रीब्यूटर्स को बुलाया गया था। फिल्म शुरू हुई। शैलेंद्र के रचे हुए अमर गीत, फणीश्वर नाथ रेणू की शानदार कहानी, शंकर जयकिशन का जादुई संगीत और वहिदा राज कपूर का बेमिसाल अभिनय सब कुछ बहुत ही बेहतरीन चल रहा था। लेकिन जैसे ही फिल्म अपने आखिरी पड़ाव पर पहुंची, जैसे ही वह दृश्य आया जहां हीराबाई हमेशा के लिए हीरामन को छोड़कर ट्रेन से चली जाती हैं और उन दोनों का कभी मिलन नहीं होता। वैसे ही डिस्ट्रीब्यूटर के बीच एक अजीब सी बेचैनी फैल गई। स्क्रीनिंग खत्म होते ही हॉल में सन्नाटा छा गया। सब आपस में फुसफुसाने लगे।

डिस्ट्रीब्यूटर्स ने राज कपूर को किनारे ले जाकर साफ शब्दों में कह दिया कि अगर आखिर में हीरो और हीरोइन का मिलन नहीं होगा तो यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुंह गिर जाएगी। भारत की जनता सिनेमाघर में अपने दुखों को भुलाने आती है। वो ऐसा दुखद और रुला देने वाला अंत देखकर कभी खुश नहीं होगी। राज कपूर एक बहुत बड़े शो मैन थे। वो सिनेमा के व्यापार को रग-रग से वाकिफ थे। उन्हें डिस्ट्रीब्यूटर्स की यह बात बिल्कुल सही लगी। राज कपूर ने शैलेंद्र को अपने पास बिठाया और उन्हें बहुत प्यार से समझाते हुए अपनी खुद की फिल्म आहा का उदाहरण दिया। राज कपूर ने कहा कि कविराज मेरी फिल्म आहा का क्लाइमेक्स भी तीसरी कसम की तरह बेहद दुखद और नकारात्मक था और जब वो नहीं चली तो मुझे भी अपनी फिल्म का अंत दोबारा फिल्माना पड़ा था। राज कपूर ने शैलेंद्र से गुजारिश की कि वह हीरामन और हीराबाई का मिलन करवा दें ताकि डिस्ट्रीब्यूटर्स इसे खरीद लें और फिल्म पैसे कमा सके। लेकिन यहां पर उस सीधे-साधे इंसान के भीतर का वो स्वाभिमानी कवि एक बार फिर जाग उठा। जिसने सालों पहले राज कपूर को अपनी कविताएं बेचने से मना कर दिया था।

शैलेंद्र ने साफ कह दिया कि अगर मैंने इस फिल्म का क्लाइमेक्स बदल दिया तो इस फिल्म के नाम का मतलब ही क्या रह जाएगा। हीराबाई उसे नहीं मिलती हैं। उसका दिल टूटता है। इसलिए तो हीरामन अपनी वह तीसरी कसम खाता है कि वह अब कभी अपनी बैलगाड़ी में नौटंकी वाली को नहीं बिठाएगा। शैलेंद्र ने कहा कि मैं पैसे कमाने के लिए साहित्य की आत्मा की हत्या नहीं कर सकता। शैलेंद्र की इस जिद में फणेश्वर नाथ रेणू ने भी उनका पूरा साथ दिया। रेणू जी ने शैलेंद्र को खत लिखकर कहा कि वह अपनी बात पर अड़े रहें और कहानी के साथ कोई भी समझौता ना करें। शैलेंद्र नहीं झुके। उन्होंने कला को व्यापार के आगे बिकने नहीं दिया। लेकिन इस फैसले की कीमत उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। जैसे ही फाइनेंसरों और साहूकारों को यह भनक लगी कि फिल्म बनकर तैयार है लेकिन डिस्ट्रीब्यूटर उसे खरीद नहीं रहे हैं तो उन्होंने शैलेंद्र को नोचना शुरू कर दिया।

उनके घर के चक्कर कटने लगे। शैलेंद्र के खिलाफ एक के बाद एक कई [संगीत] एफआईआर दर्ज हो गए और मामला कोर्ट कचहरी तक पहुंच गया। जो इंसान कल तक महफिलों की जान हुआ करता था। अब उसे धमकियां मिलने लगी थी। उन फाइनेंसरों में से एक इतना बेरहम था। उसने तो यह तक कह दिया कि अगर शैलेंद्र ने मेरे पैसे नहीं लौटाए तो मैं उनकी कब्र खोदकर भी अपना पैसा वसूल करूंगा। अंधे जान के [संगीत] अंधे रास्ते जाए तो जाएं कहां? इन तीखे तानों, अपनों के धोखे और कर्ज के इस पहाड़ ने शैलेंद्र के दिलो दिमाग को बुरी तरह से झकझोड़ दिया। उन्हें हर तरफ बस अंधेरा ही अंधेरा नजर आ रहा था। उस महान गीतकार ने लोगों से मिलनाजुलना बिल्कुल बंद कर दिया और खुद को एक कमरे में कैद कर लिया। सिगरेट के धुएं और शराब के प्यालों में वह अपना दर्द डुबोने की नाकाम कोशिश करने लगे। कर्ज के उस खौफनाक

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