आज जिस पर्सनालिटी की मैं बात करूंगी, यह फिल्म इंडस्ट्री में 50 सालों से एक्टिव है। एफटीआईआई ग्रेजुएट है और एक्टिंग पर इनकी इतनीस्ट है कि इन्होंने तरह-तरह के रोल्स किए। लेकिन अफसोस इनके वो रोल्स उतने नोटिस नहीं हुए जितने नोटिस होने चाहिए थे। हां, अगर 80ज और 90ज में भी सोशल मीडिया होता, तो डेफिनेटली ये तभी सुपरस्टार बन जाते। बट अफसोस सोशल मीडिया नहीं होने की वजह से पब्लिसिटी उतनी नहीं हो पाई। काम तो यह करते रहे लेकिन इनकी किस्मत चमकी। ईयर 2025 में जब धुरंधर फिल्म आई जिसमें इन्होंने जमील जमाली का रोल निभाया।
जबरदस्त रोल था इनका धुरंधर वन में और धुरंधर 2 में तो इनके रोल ने सभी को हिला कर रख दिया। खुद अर्जुन रामपाल ने कहा कि आप तो सभी को खा गए फिल्म में। आप समझ ही गए होंगे मैं बात कर रही हूं फिल्म इंडस्ट्री के बेहतरीन एक्टर राकेश बेदी जी की। आज कब की और कैसे में राकेश बेदी जी की लाइफ से जुड़ी वो बातें मैं आपको बताने वाली हूं जो आपने शायद ही सुनी होंगी।
कब राकेश बेदी को पुलिस टेररिस्ट समझकर ऑलमोस्ट अरेस्ट कर चुकी थी। क्यों राकेश बेदी जिन्होंने एफटीआईआई से फिल्म की पढ़ाई की वो लीड हीरो नहीं बने बल्कि एक कॉमिक एक्टर बने और कैसे राकेश बेदी जासूसी की तैयारी तो ईयर 1991 से ही कर रहे थे। फाइनली 2026 में आकर उनका मिशन कंप्लीट हुआ। राकेश बेदी का बचपन दिल्ली में बीता। केंद्रीय विद्यालय से उन्होंने अपनी स्कूलिंग की। घर में पढ़ाई का माहौल था।
पिता एरोनॉटिकल इंजीनियर थे और चाहते थे कि राकेश बेदी भी आगे चलकर इंजीनियर ही बने। लेकिन राकेश बेदी का इंक्लिनेशन तो एक्टिंग की तरफ था। एक्चुअली राकेश बेदी के मामा और उनके नाना दोनों प्लेस किया करते थे और उन्हें देखकर राकेश बेदी एक्टिंग के लिए बहुत ज्यादा फैसनेट हुआ करते थे। स्कूल में उन्होंने एक्टिंग करनी शुरू कर दी और जब भी वो स्टेज पर परफॉर्म करते स्कूल में तो उन्हें तारीफ मिलती। एक टाइम ऐसा भी आया जब वो अपने स्कूल को नेशनल लेवल पर मोनो एक्टिंग में रिप्रेजेंट करते और अवार्ड्स भी लेकर आते।
इनफैक्ट एक बार उनके स्कूल में जब प्रैक्टिकल एग्जाम था और स्कूल के टीचर ने एग्जामिनर को कहा था कि यह हमारे स्कूल के होनहार स्टूडेंट है और बहुत अच्छी एक्टिंग करते हैं। मोनोलॉग बहुत अच्छे से करते हैं। तब उस टीचर ने एग्जाम लेने के साथ-साथ राकेश बेदी से एक्टिंग भी करवाई और वो राकेश बेदी की उस एक्टिंग से बहुत इंप्रेस भी हुई। राकेश बेदी के माइंड में तो क्लियर था कि वो आगे चलकर एक्टर ही बनेंगे।
लेकिन पिता चाहते थे कि वह इंजीनियर बने। आगे चलकर माइनिंग के फील्ड में जाए। और इसीलिए राकेश बेदी को इंजीनियरिंग की तैयारी करने के लिए कह दिया गया। राकेश बेदी को इंजीनियरिंग में इंटरेस्ट नहीं था। लेकिन फिर भी पिता के लिए वह इंजीनियरिंग एंट्रेंस टेस्ट देने के लिए एग्जामिनेशन हॉल में पहुंचे। और जब पेपर उन्हें थमाया गया तो वो पेपर 5 मिनट में करके वहां से निकल गए। एक्चुअली इस पेपर में जितने भी क्वेश्चंस थे उसमें से राकेश बेदी को सिर्फ एक क्वेश्चन आता था। उन्होंने वो क्वेश्चन लिखा।
एग्जामिनर को पेपर पकड़ाया और यह कहा कि मैं शायद गलत पते पर आ गया। यह कहकर वो वहां से निकल गए। उस दिन राकेश बेदी को क्लियर हो गया था कि अब इंजीनियरिंग तो नहीं करनी है, एक्टिंग ही करनी है। बाद में पिता को भी समझ आ गया कि लड़का बस एक्टिंग ही करना चाहता है। तो पिता ने भी राकेश बेदी को सपोर्ट करना शुरू कर दिया। राकेश बेदी ने दिल्ली में ही कॉलेज एडमिशन लिया।
वो अपनी ग्रेजुएशन कंप्लीट करने लगे और उसी दौरान थिएटर से भी जुड़ गए। राकेश बेदी ने अपने जैसे लड़कों को ढूंढा जो उन्हीं की तरह एक्टिंग में आगे बढ़ना चाहते थे। उनके साथ एक ग्रुप बनाया और उन्हीं के साथ प्ले किया करते थे। इस प्ले के लिए वो सिर्फ एक्टिंग नहीं करते थे बल्कि प्ले के टिकट्स भेजने, प्ले के पोस्टर्स लगाने ये सारे काम राकेश बेदी और उनके फ्रेंड्स ही किया करते थे।
एक रात ऐसा हुआ कि राकेश बेदी का एक प्ले आने वाला था ज़हर नाम का और उसके प्रचार के लिए पूरे दिल्ली में पोस्टर्स चिपकाने राकेश बेदी अपने प्ले के लड़कों के साथ पोस्टर्स दिल्ली की सड़कों पर लगाने के लिए निकले और जब वह लेट नाइट पोस्टर्स चिपका रहे थे तब पुलिस वहां पर पहुंच गई और पुलिस ने जब देखा कि कुछ लड़के हैं जो ज़हर नाम के पोस्टर्स चिपका रहे हैं तो पुलिस को लगा कि यह कोई टेररिस्ट है।
कोई एंटी इंडिया एक्टिविटी कर रहे हैं और कुछ अलग प्रोपोगेंडा के तहत यह चीजें फैला रहे हैं। पुलिस ने इन सभी लड़कों को पकड़ा और इनसे पूछताछ करनी शुरू की। तब राकेश बेदी ने कहा कि हम कोई भी एंटी इंडिया एक्टिविटी नहीं कर रहे हैं। हम तो एक्टर्स हैं। हमारा प्ले है जिसका नाम ज़हर है और उसी के प्रमोशनल पोस्टर्स हम लोग चिपका रहे हैं। पुलिस ऐसे कहां मानने वाली थी?
फाइनली राकेश बेदी और उनकी टीम को पुलिस के सामने एक्ट करके दिखाना पड़ा और तब जाकर लेट नाइट वो पुलिस से छूटे। वरना उस दिन वो जेल जाने ही वाले थे। राकेश बेदी प्लेस तो कर रहे थे लेकिन उन्हें सिर्फ थिएटर स्टेज पर काम नहीं करना था। उन्हें बड़े पर्दे पर काम करना था। यानी कि फिल्मों में काम करना था और फिल्मों में बिना कांटेक्ट्स के काम तो मिलता नहीं है।
फिल्मों में काम करने के लिए या तो कोई बड़ा कांटेक्ट हो या फिर आपके पास डिग्री हो। उस दौरान फिल्मों की पढ़ाई दो जगह करवाई जाती थी। एक तो एनएसडी में और दूसरी एफटीआईआई में। राकेश बेदी दिल्ली में थे। उनके लिए एनएसडी से पढ़ाई करना आसान था। लेकिन फिर भी वो दिल्ली छोड़कर एफटीआईआई पुणे गए। इसके पीछे रीजन यह है कि राकेश बेदी जिस टाइम एक्टिंग फील्ड में आना चाहते थे
उस टाइम एनएसडी के एक्टर्स को फिल्म इंडस्ट्री में इतना जल्दी काम नहीं मिल रहा था। जबकि एफटीआईआई से जो एक्टर्स आ रहे थे उन्हें बहुत काम मिल रहा था। यही वजह है कि एनएसडी को छोड़कर राकेश बेदी एफटीआईआई पुणे गए 1974 में और वहां पर उन्होंने अपनी फिल्म की पढ़ाई शुरू की। इस दौरान उनके बैचमेट्स थे लेट सतीश शाह जी, डेविड धवन, सुरेश ओबरॉय, ओमपुरी।
फिल्मों के बारे में एफटीआईआई में उन्होंने बहुत कुछ सीखा। एक्टिंग के बारे में सीखा और कई सारी फिल्म इंडस्ट्री की पर्सनालिटीज वहां पर उनके लेक्चर्स लेने आया करते थे। इस दौरान राकेश बेदी ने एफटीआईआई में ही एक प्ले परफॉर्म किया और उस प्ले को देखने आए थे शोले के मेकर जीपी सिप्पी। जीपी सिप्पी ने राकेश को जब स्टेज पर परफॉर्म करते हुए देखा तो वह बहुत ज्यादा इंप्रेस हुए और उन्होंने राकेश बेदी को कहा कि जब भी मुंबई आओ मुझसे मिलना जरूर।
मैं तुम्हें अपनी फिल्म में काम दूंगा। और इस तरह से राकेश बेदी का एफडीआईआई के जरिए फिल्म इंडस्ट्री का रास्ता खुल चुका था। अपना कोर्स खत्म किया 1976 में और फिर राकेश बेदी आ गए मुंबई। मुंबई जाकर वो जीपी सिटी से मिले जिन्होंने उन्हें काम दिया फिल्म एहसास में। हालांकि राकेश बेदी ने एक और फिल्म की थी हमारे तुम्हारे जो कि एहसास से पहले ही रिलीज़ हो गई।
राकेश बेदी फिल्मों में तो काम कर रहे थे लेकिन उनका रोल नोटिस हुआ फिल्म चश्मे बद्दूर में। फारूक शेख दीप्ति नवल स्टारिंग फिल्म में राकेश बेदी का जबरदस्त रोल था और ओमी के रोल में उन्हें बहुत पसंद किया गया। इस रोल ने उन्हें फिल्म इंडस्ट्री में एक पॉपुलर चेहरा बना दिया। लेकिन इस फिल्म का भी एक किस्सा है। राकेश बेदी इस फिल्म की शूटिंग दिल्ली में कर रहे थे। तभी उन्हें मुंबई से एक दूसरी शूटिंग का कॉल आया। जब वो यह शूट करने गए तो डायरेक्टर ने कहा कि आपको मूछे हटानी होगी।
राकेश बेदी डर रहे थे कि मूछे हटा दूंगा तो चश्मे बद्दूर की कंटिन्यूटी टूट जाएगी। बट मुंबई वाला डायरेक्टर अड़ा हुआ था कि बिना मूछों के ही यह रोल आपको मिल पाएगा। राकेश बेदी ने अपनी मूछों की कुर्बानी दी और फाइनली मुंबई वाला काम किया। मुंबई का काम खत्म करके वो फिर से दिल्ली लौटे चश्मे बद्दूर की शूटिंग के लिए। लेकिन सेट पर जाने से पहले वो डर रहे थे। क्योंकि साईं परांज पे जो कि इस फिल्म की डायरेक्टर थी
वो काफी स्ट्रिक्ट थी और राकेश बेदी को बिना मूछों के देखती तो भड़क जाती। ऐसे में राकेश बेदी अब एक दिन में मूछे उगाए तो कैसे उगाए? उन्हें आईडिया आया कि क्यों ना मूछे पेंसिल से बना दी जाए। फिर क्या था? राकेश बेदी ने पेंसिल से मूछे बनाई और वह सेट पर चले गए। इसी तरह वह हर रोज सेट पर जाने लगे। तीन-चार दिन बीत गए। किसी को पता नहीं चला कि मूछों का क्या हुआ है।
लेकिन एक दिन ऐसा हुआ कि सेट पर राकेश बेदी को बहुत पसीना हुआ और उन्होंने अपना मुंह जब पहुंचा तो उनकी आधी मूछे मिट गई। जिसके बाद सभी को सेट पर पता चल गया कि राकेश बेदी की यह असली मूछे नहीं है। यह मूछे पेंट करके जा रहे हैं। साईं परांजपे जो डायरेक्टर थी उन्हें जब यह बात पता चली तो वो राकेश बेदी पर बुरी तरह भड़की। हालांकि राकेश बेदी ने उन्हें समझाया कि जब पिछले चार-प दिनों में यहां पर किसी को नहीं पता चला
तो आगे भी कैसे पता चलेगा। इस तरह से उन्होंने इस सिचुएशन को संभाला और आगे बढ़े। यानी कि एक अच्छे एक्टर के साथ-साथ उनमें यह भी टैलेंट था कि अगर डायरेक्टर गुस्सा हो जाए तो उसके टेंपरामेंट को कैसे संभाला जाए। यह भी एक रीजन है कि राकेश बेदी ने फिल्म इंडस्ट्री में एक लंबा समय निकाला।
इसके बाद एक दूजे के लिए फिल्म आई। यह फिल्म भी सुपरहिट थी। इसमें भी राकेश बेदी का शानदार रोल था। राकेश बेदी एफटीआईआई से पढ़कर आए थे और जब कोई इतना पढ़ लिखकर फिल्म इंडस्ट्री में आता है तो सोचता है कि मैं तो लीड हीरो ही बनूंगा। लेकिन राकेश बेदी ने फिल्म इंस्टट्यूट में ही डिसाइड कर लिया था कि वो लीड हीरो नहीं बनेंगे। वो तो कॉमिक एक्टर बनेंगे। उन्हें पता था
कि फिल्म इंडस्ट्री में हीरो के लिए लुक्स कैसे चाहिए। फिल्म इंडस्ट्री में विलेन बनने के लिए लुक्स कैसे चाहिए। फिल्म इंडस्ट्री में अगर आप विलेन के हचमैन बनते हो तो उसके लिए भी एक शानदार पर्सनालिटी चाहिए। इधर राकेश बेदी का गोल चब्बी चेहरा फिजिक भी कोई इतनी इंप्रेसिव नहीं। उन्हें पता था कि वो लीड हीरो वाली बात तो क्रैक कर ही नहीं पाएंगे। यही वजह है कि उन्होंने मन बना लिया था
कि वो कॉमेडी ही करेंगे। फिर क्या था? धीरे-धीरे फिल्मों में राकेश बेदी के लिए शानदार रोल्स लिखे जाने लगे। वो जब भी स्क्रीन्स पर आते लोगों को एंटरटेन करते। फिल्मों में तो वो काम कर ही रहे थे और उसके बाद जब टीवी शुरू हुआ तो राकेश बेदी ने टीवी पर भी कमाल का एंटरटेन किया। उनके शोज़ यह जो जिंदगी है श्रीमान श्रीमती यस बॉस इन्हें आज भी याद किया जाता है। इनफैक्ट उनके Yes बॉस शो के फैन थे लेजेंड्री फिल्म मेकर ऋषिकेश मुखर्जी जो अक्सर राकेश बेदी को बुलाया करते थे। अपने पास बिठाया करते थे
और इस शो के बारे में पूछा करते थे। राकेश बेदी ने अपने एक इंटरव्यू में बताया था ऋषिकेश मुखर्जी ने तो यहां तक कह दिया था कि जब भी मेरी मौत आएगी तो मैं यमराज से कहूंगा कि मुझे यस बॉस का एक और एपिसोड देखना है और उसके बाद ही मुझे लेकर जाओ। कुछ इस कदर के फैन थे ऋषिकेश मुखर्जी भी राकेश बेदी के। हां, फिल्मों ने और टीवी वालों ने राकेश बेदी को टैड कास्ट कर दिया।
उन्हें कॉमेडी रोल्स ही ऑफर किए। लेकिन राकेश बेदी को इस बात से जरा भी प्रॉब्लम नहीं है क्योंकि उनका कहना है कि इन रोल्स की वजह से ही वह इतने समय तक फिल्म इंडस्ट्री में सर्वाइव कर पाए और जो रोल्स उन्हें फिल्म वाले या टीवी वाले नहीं दे पाए वो रोल्स तो वो अपने थिएटर में करते ही थे। राकेश बेदी जिस वक्त फिल्में कर रहे थे, जिस वक्त वो टीवी कर रहे थे तब वो थिएटर भी साथ के साथ कर रहे थे। उन्होंने अपने लेटेस्ट इंटरव्यू में बताया है कि जब से उन्होंने अपने करियर की शुरुआत की है तब से लेकर आज तक एक महीना ऐसा नहीं निकला है
जिसमें उन्होंने प्ले नहीं किया हो। हां, कोरोना में जरूर उनके प्लेज़ रुक गए थे, लेकिन वह प्ले से जुड़े हुए हैं। वह थिएटर करते हैं और 2004 से तो उन्होंने थिएटर पर और ज्यादा फोकस करना शुरू कर दिया। उन्होंने खुद के प्ले लिखने शुरू कर दिए। उनका एक प्ले मेरा वो मतलब नहीं था बहुत पॉपुलर हुआ जिसे अनुपम खेर और नीना गुप्ता ने किया। इसके अलावा उनके शो जब वी सेपरेटेड बीवीओ बीवी शिमला कॉफी हाउस बहुत ही पॉपुलर है। राकेश बेदी ऑन एंड ऑफ टीवी और फिल्म दोनों में काम कर रहे थे।
इधर कभी वो भाभी जी घर पर है और तारक मेहता का उल्टा चश्मा में कुछ एपिसोड्स में नजर आते तो कभी वो फिल्मों में भी छोटे-मोटे किरदार करते नजर आते। उरी फिल्म में भी उनका बहुत अच्छा किरदार था और वहीं से उनकी दोस्ती हुई फिल्म मेकर आदित्य धर। राकेश बेदी को आदित्य धर ने जब उरी ऑफर की थी तब आदित्य धर ने बताया था कि सिर्फ एक दिन की शूटिंग है और शूटिंग सर्बिया में है।
राकेश बेदी ये छोटा सा रोल करना ही नहीं चाहते थे। लेकिन आदित्य धर ने कहा कि सर जबजब मैं आपके कैरेक्टर की स्क्रिप्ट पढ़ता हूं मुझे आप ही नजर आते हैं। मैं चाहता हूं कि आप यह रोल करें और इस छोटे रोल की भरपाई मैं फ्यूचर में जरूर करूंगा और अपनी बात रखते हुए आदित्य धर ने जब धुरंधर फिल्म बनाई तो उन्होंने राकेश बेदी के लिए जमील जमाल का रोल लिखा। यह रोल एकदम डिस्टिंक्ट था।
हां, अकॉर्डिंग टू राकेश बेदी इनिशियली यह रोल कॉमेडी नहीं करने वाला था। सीरियस रोल ही था। लेकिन राकेश बेदी ने आदित्य धर को इंसिस्ट किया कि कभी-कभी यह कैरेक्टर मजाक भी करेगा और सरकास्टिक वे में भी सिचुएशन को हैंडल करेगा। एकद सीन्स जब शूट किए तो वो सीन्स इंटरेस्टिंग लगने लगे। तब आदित्य धन ने इस पैटर्न को अप्रूव कर दिया और इस तरह से जमील जमाल का यह कैरेक्टर डिजाइन किया गया।
जो आज चाहे धुरंधर फिल्म हो या धुरंधर 2 फिल्म हो सबसे ज्यादा वायरल कैरेक्टर है और लोग इसी कैरेक्टर के जो शेड्स बदले हैं पूरी फिल्म में उसे देखकर हैरान है। लेकिन इस सक्सेस के लिए राकेश बेदी को लंबा इंतजार करना पड़ा है। काफी स्ट्रगल भी करना पड़ा। एक वक्त ऐसा भी आया था जब राकेश बेदी इंडस्ट्री में नए थे। काम का अता पता नहीं था। जेब में पैसे नहीं थे और पेट में भूख थी। एक इंटरव्यू में वह बताते हैं कि उस दिन भूख बहुत लग रही थी और जेब में थी अठन्नी। अठन्नी में कुछ नहीं आता है।
बस छह केले आते थे। मैंने उस रात छह केले खरीदे। वही खाए और सोचा अगले दिन का अगले दिन देखा जाएगा। कुछ इस तरह की मुफ्लिसी के दिन भी उन्होंने बिताए हैं। यही वजह है कि धुरंधर 2 और धुरंधर की जो सक्सेस है वो राकेश बेदी के करियर का सबसे पीक मोमेंट है। क्योंकि इस इंडस्ट्री में सबसे ज्यादा टफ एक कैरेक्टर एक्टर होना होता है। वो ना तो लीड एक्टर में होते हैं और ना पूरी तरह से वो स्ट्रगलर्स कहलाते हैं। और अपने आप को फिल्म इंडस्ट्री में जिंदा रखने के लिए उन्हें हर दिन उतनी ही मेहनत करनी पड़ती है।
ऐसा नहीं कि एक प्रोजेक्ट में बड़ा काम कर दिया, तो आगे से काम धड़ल्ले से मिल जाएगा। एक में अच्छा काम किया, दूसरे के लिए फिर अच्छा करना है। कुछ नया सोचना है क्योंकि कम टाइम के लिए स्क्रीन पर आओगे और उसी कम टाइम में आपको अपना मैजिक दिखा कर जाना है। जिससे आपका नेक्स्ट प्रोजेक्ट फिक्स हो जाए। राकेश बेदी की पर्सनल लाइफ की अगर बात करें तो जिस वक्त वह पुणे में थे,
एफटीआईआई में थे, तभी उन्हें प्यार हो गया था। आराधना बेदी से 1985 में उन्होंने शादी की। इस शादी से उन्हें दो बेटियां हुई। रतिका बेदी और रिद्धिमा बेदी। रतिका जहां टीवीएफ के साथ टैलेंट मैनेजर है। वहीं रिद्धिमा खुद एक एक्टर है। और चलिए अब बात करते हैं कि कैसे ईयर 1991 से राकेश बेदी जासूसी की तैयारी कर रहे थे। ईयर 1991 में फिल्म आई थी दिल है कि मानता नहीं। इस फिल्म में राकेश बेदी एक प्राइवेट डिटेक्टिव थे। पूजा भट्ट और आमिर खान की जासूसी करते हैं। इसके बाद फिल्म आई थी तिरंगा। उसमें भी वह पुलिस के जासूस थे, खबरी थे। इसके बाद आई फिल्म उरी।