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क्या है वों 5 वजहें, जिस वजह से हार जाएंगी ममता बनर्जी..

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बंगाल विधानसभा चुनाव इस बार कुछ नया होने वाला है क्योंकि पिछले 15 सालों से ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में एकतरफा राज कर रही हैं। यह वही ममता हैं जिन्होंने 34 साल लंबे चले वामपंथी शासन को सत्ता से बेदखल किया था। लेकिन इस बार चुनाव ममता के लिए उतना आसान नहीं होने वाला जितना वह समझ रही हैं। बीजेपी से तो उनकी सीधी टक्कर है ही। हम उस पांच चुनौतियों के बारे में भी बताएंगे जिसकी वजह से ममता इस चुनाव में हार सकती हैं।

यह वीडियो आप पूरा देखिएगा [संगीत] क्योंकि ममता की चुनौतियों के साथ-साथ राजनीतिक उथल-पुथल पर भी बात जारी रहेगी। साल 2011 में जब उन्होंने पहली बार मुख्यमंत्री पद संभाला था तो ना केवल उनके विरोधियों ने बल्कि कुछ राजनीतिज्ञों और जानकारों ने उनके शासन को लेकर शंका जाहिर की थी। जाहिर है महिलाओं की क्षमता पर सवाल उठते रहते हैं। उनकी राजनीतिक परिपक्वता को लेकर भी शंका थी लोगों के मन में।

लेकिन पिछले 15 सालों से ममता बनर्जी ने सारी शंकाओं और सवालों का जवाब खुद बंगाल को और देश को दे दिया है। ममता बनर्जी एक कड़ी चुनौती है। ममता बनर्जी एक नहीं लगा था। तीन बार राज्य की मुख्यमंत्री चुनी गई और अब जब पश्चिम बंगाल का चुनाव दो चरणों में होने वाला है तब ममता चौथी बार तृणमूल कांग्रेस के साथ मैदान में उतर रही हैं। इस बार कांटे की टक्कर है।

वैसे कई राजनीतिक पार्टियां मैदान में है लेकिन सीधी और करारी टक्कर भाजपा से है और टीएमसी के बीच ही [संगीत] होने वाली है। इस पूरे चुनावी गणित में ममता को हराने के लिए उनकी ही पार्टी से निकले शुभेंदु अधिकारी और उनके खिलाफ ताल ठोक दी है। जबकि हुमायूं कबीर जिन्होंने टीएमसी को बाय-बाय कर अभी-अभी अपनी नई पार्टी आम जनता उन्नयन पार्टी के साथ ताल ठोकी है। ममता बनर्जी भवानीपुर से चुनाव लड़ती हैं

तो बीजेपी के शुभेंदु अधिकारी और हुमायूं कबीर की पार्टी की हाई प्रोफाइल [संगीत] मुस्लिम उम्मीदवार भी मैदान में हैं। ममता को इस बार कड़ी चुनौती मिल [संगीत] रही है। चाहे ईडी से आई पैक। आईपैक मामले में झटका मिला हो या फिर प्रशासनिक अधिकारियों का एकदम चुनाव के समय बदला जाना। या फिर बात करें उम्मीदवारों की। अब देखना यह है कि ममता कैसे गणित बैठाती हैं।

भवानीपुर में 20% वोटर मुसलमान हैं। वहीं एसआईआर के दौरान इस विधानसभा सीट से 4ज़ वोटरों के नाम काटे गए हैं। ऐसे में अगर हुमायूं कबीर किसी हाई प्रोफाइल मुस्लिम कैंडिडेट को मैदान में उतारते हैं और भवानीपुर की जनता से मन के मन में जरा भी उतरती है ममता तो उनकी जीत की राह इस बार आसान नहीं रहने [संगीत] वाली है। भवानीपुर में मिलीजुली आबादी है। यहां बंगाली, गुजराती, सिख, मुसलमान सब रहते हैं।

2021 विधानसभा चुनाव में टीएमसी ने यहां करीब 59,000 वोटों की बड़ी बढ़त बनाई थी। लेकिन 2024 के लोकसभा [संगीत] चुनाव में यह घटकर सिर्फ 8,200 वोट रह गई जैसे इस तरह से पश्चिम बंगाल में समीकरण बन रहे हैं। ऐसे में यह तो दिख रहा है कि ममता का इस बार इतिहास रचना इतना आसान नहीं रहने वाला है। लेकिन ममता अगर अपनी ही पार्टी को फिर से जीत दिलाती हैं

तो वह पश्चिम बंगाल की पहली ऐसी मुख्यमंत्री बन सकती हैं जिन्होंने लगातार चार बार विधानसभा चुनाव [संगीत] जीतकर इतिहास रच दिया है। ममता की सबसे बड़ी चुनौती क्या होने वाली है? वो है एंटी इनकंबेंसी यानी सत्ता विरोधी रह। दूसरी चुनौती एसआईआर है। यह ममता पर पॉजिटिव और नेगेटिव दोनों असर डाल सकता है।

और एसआईआर को लेकर ममता ने इसके खिलाफ सड़क से लेकर संसद और सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़ी है। जिससे उनकी मजबूत नेता की छवि बनती है और उनके समर्थकों को एकजुट होने का संदेश भी जाता है। तीसरी बड़ी चुनौती वो भ्रष्टाचार है जिससे ममता को इस चुनाव में निपटना होगा।

पीडीएस स्कैम, कैटर स्मगलिंग [संगीत] स्कैम, टीचर रिक्रूटमेंट स्कैम, मंत्रियों और नौकरशाहों की गिरफ्तारी यह स्कैम की आवाज लोकसभा [संगीत] चुनाव में भी सुनाई दी थी। चौथी चुनौती महिलाओं की सुरक्षा और पांचवी सांप्रदायिक मुद्दे हैं और यह सभी मुद्दे मिलकर ममता बनर्जी के विजय रथ को रोक सकते हैं.

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