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बेटे पर 39 लाख खर्च फिर मिली इच्छामृत्यु, जानिए बीमारी के बारेमे सबकुछ..

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सबको माफ करते हुए तुम सब से माफी मांगते हुए [संगीत] जाओ। कौन माता-पिता अपना चाहता है कि अपने बेटे को ऐसे करें? क्या बताऊं मैं अब? मां-बाप को कैसे लगता होगा?
ऐसे पता नहीं हरीश जैसे कितने लोग पड़े हैं। उनका भी कल्याण हो। एक बाप जब अपने जवान बेटे के लिए मौत की भीख मांगने लगे तो समझ लेना चाहिए कि इस दुनिया में अब उम्मीद और हौसले ने पूरी तरह दम तोड़ दिया।

सोशल मीडिया पर वायरल होते उस वीडियो ने हर किसी की रूह कपा दी जिसमें बेबसमा अपने कलेजे के टुकड़े को इस दुनिया से विदा करने की इजाजत मांग रही थी। यह सिर्फ एक खबर नहीं बल्कि एक जीते जागते इंसान के खंडर बन जाने की और एक हंसते खेलते परिवार के श्मशान में तब्दील होने की सबसे दर्दनाक दास्ता है। 13 साल यानी कि 4745 दिन और उससे भी कहीं ज्यादा लंबी काली रातें।

हरीश राणा के माता-पिता ने अपने जीवन के एक-एक पल को बेटे की उस देह की सेवा में झोंक दिया जो ना हिल सकती है ना बोल सकती है और ना ही अपनी आंखों से माता-पिता के आंसुओं को देख सकती है। साल 2013 में मोहाली की उस चौथी मंजिल से हरीश नहीं गिरा बल्कि एक पूरा परिवार अपनी खुशियां समेत गहरी खाई में जा गिरा।

इन 13 वर्षों में उस घर से सिर्फ खुशियां ही रुखसत नहीं हुई बल्कि एक-एक करके सब कुछ बिक गया। बेटे के इलाज के खातिर पिता ने अपनी उम्र भर की कमाई लगा दी। मां ने अपने जेवर उतार दिए और घर की दीवारें तक कर्ज के बोझ तले दबती नजर आई। आज हालत यह है कि घर में दवाइयों की गंध तो है लेकिन दो वक्त की रोटी का सुकून नहीं बचा। उस वायरल वीडियो में दिखती मां की आंखें यह चीख-चीख कर कह रही है

कि हमने उसे पैदा किया था उसे जिंदगी देने के लिए। लेकिन आज हम उसी के लिए मौत मांग चुके हैं। क्योंकि हम हार गए। यह हार किसी बीमारी से नहीं बल्कि उस लाचारी से है जो कि बुढ़ापे की दहलीज पर खड़े इन मां-बाप को हर पल डराती है। उनका सबसे बड़ा डर यह कि उनका बेटा मर जाएगा। उनके सबसे बड़े डर में यह भी शामिल है। सबसे बड़े खौफ में यह कि अगर उन्हें कुछ हो गया तो उनके पीछे इस जिंदा लाश को एक घूंट पानी कौन पिलाएगा?

अदालत की चौखट पर जब यह गुहार पहुंची तो कानून की किताबों ने मानवीय संवेदनाओं को ठेंगा दिखाया। कोर्ट ने कहा कि हरीश वेंटिलेटर पर नहीं है। वह खुद सांसे ले रहा है। इसलिए उसे पैसिव यूथनेशिया यानी कि अच्छा मृत्यु नहीं दी जाएगी। कानून की नजर में वह जीवित है। लेकिन उन मां-बाप की नजर में देखिए तो रोज उसे बिस्तर पर सड़ते हुए देखना पड़ा। एक ऐसा शरीर जो कि सिर्फ सांसे ले रहा था

लेकिन जिसके भीतर की चेतना मर चुकी थी। उसे जीवित कहना क्या उन माता-पिता के साथ क्रूर मजाक नहीं है। बेटे के इलाज में सब कुछ गवा दिया। अशोक राणा और निर्मला देवी आज खुद एक चलती फिरती लाश बन गए। उनके पास अब ना तो इलाज के पैसे बचे हैं और ना ही शरीर में वह ताकत कि वे अपने भारी भरकम जवान बेटे को करवट भी दिला पाए। यह मामला हमारे समाज और कानून के मुंह पर एक तमाचे की तरह था

जिसे अब सुप्रीम कोर्ट ने उस तरह बदलने की कोशिश की जैसा कि उनके माता-पिता चाहते थे। सुप्रीम कोर्ट से इजाजत मिली। इजाजत मिली बेटे को मौत की तरफ मोड़ने की। अब इस दुनिया को छोड़कर आगे बढ़ चले हैं पैसिव यूथनेशिया के साथ हरीश राणा। हरीश राणा वही हरीश राणा जिसके इलाज में परिवार ने अपना सब कुछ बेच दिया। घर, जेवर इसके साथ-साथ वो पूरा तीन मंजिला मकान जो कि कभी उनका हुआ करता था।

गांव की पुरखों की जमीनें भी बेच दी गई। वीडियो सोशल मीडिया पर आपने देखा। एम्स उन्हें लाया गया था कि लाइफ सपोर्ट सिस्टम जो भी टेक्निकल मशीनें हैं, दवाइयां हैं वो सब हरीश से हटा ली जाए जिसके बाद वो इस दुनिया को अलविदा कह सके। जिस बेटे को कभी उन्होंने अपनी लाठी समझा था, आज वही उनकी बेबसी का सबसे बड़ा कारण बन गया। वायरल वीडियो सिर्फ एक दिल झंकझोर देने वाला वीडियो नहीं है

बल्कि माता-पिता के कलेजे को फाड़ देने की वो तस्वीर है जो कभी एक दंपति ने नहीं सोची थी कि उनके बेटे के साथ उनके बेटे की विदाई इस तरह से होगी। यह अंतिम विदाई का संदेश था जो कि सीधे तौर पर उनके बेटे से उन्हें हमेशा के लिए अलग करने वाला है। बहरहाल आप मामले को कैसा देख रहे हैं? मामले पर आपकी क्या राय है? कोर्ट पर आपकी क्या राय है? कमेंट बॉक्स आपके लिए है.

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