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भारत ने छोड़ा ईरान का साथ! संयुक्त राष्ट्र में हुआ बड़ा खेल!..

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जहां ईरान, इजराइल, अमेरिका जंग में लग रहा था कि भारत का झुकाव ईरान की तरफ ज्यादा है। तो वहीं अब सबसे बड़ा खिलाड़ी बनकर भारत ही उभर गया है। और ऐसा हम क्यों कह रहे हैं थोड़ी देर में आप जरूर समझ जाएंगे। नमस्कार, मेरा नाम है कनिष्का और आप देख रहे हैं Zee न्यूज़ का डिजिटल प्लेटफार्म। दरअसल मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच अब भारत ने साफ और सख्त संदेश दे दिया है।

जिस ईरान के साथ भारत के सालों पुराने रिश्ते रहे हैं, जिसके साथ व्यापार और रणनीतिक साझेदारी भी रही है, उसी ईरान के खिलाफ अब भारत खुलकर खड़ा होता नजर आ रहा है। संयुक्त राष्ट्र में एक बड़ा प्रस्ताव आया जिसमें ईरान के हमलों की कड़ी निंदा की गई और भारत ने सिर्फ इसका समर्थन ही नहीं किया बल्कि इस प्रस्ताव का को स्पॉनसर भी बन गया। यानी दुनिया के सबसे बड़े कूटनीतिक मंच पर भारत ने साफ संकेत दे दिया है कि मिडिल ईस्ट में हमले और अस्थिरता अब स्वीकार नहीं की जाएगी। तो आखिर क्या प्रस्ताव था? आपको बताते हैं। भारत ने ऐसा कदम क्यों उठाया?


इसका जवाब भी हम आपको देते हैं। मिडिल ईस्ट में हमले और अस्थिरता अब स्वीकार नहीं की जाएगी। तो आखिर यह प्रस्ताव था क्या? और भारत ने यह कदम क्यों उठाया? और इससे मिडिल ईस्ट की राजनीति पर क्या असर पड़ने वाला है? सब बताते हैं। दरअसल संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में हाल ही में एक अहम प्रस्ताव पेश किया गया था। इस प्रस्ताव में ईरान द्वारा खाड़ी देशों और जॉर्डन पर किए गए हमलों की कड़ी निंदा की गई।

परिषद के 15 सदस्यों में से 13 देशों ने इसके पक्ष में वोट किया जिसके बाद यह प्रस्ताव पारित हो गया। हालांकि इनमें से दो बड़े देश यानी कि चीन और रूस इस वोटिंग से दूर रहे और उन्होंने इसमें हिस्सा ही नहीं लिया। इस प्रस्ताव की एक खास बात यह रही कि भारत सिर्फ समर्थक देश नहीं था बल्कि सह प्रायोजक यानी कि को स्पॉनसर के रूप में भी शामिल हुआ। प्रस्ताव में क्या-क्या कहा गया इसके बारे में बात कर लेते हैं।

दरअसल इस प्रस्ताव में साफ तौर पर कहा गया कि ईरान को खाड़ी सहयोग परिषद यानी जीसीसी देशों और जॉर्डन पर हमले तुरंत रोकने होंगे। इन हमलों को अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया गया। साथ ही चेतावनी भी दी गई कि क्षेत्र में तनाव बढ़ाने वाली गतिविधियां तुरंत बंद कर दी जाए। दरअसल संयुक्त राष्ट्र ने यह भी कहा कि इस तरह की सैन्य कारवाही वैश्विक शांति और सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन सकती है।

समुद्री रास्तों को लेकर भी चिंता व्यक्त की गई इस प्रस्ताव के अंदर बल्कि पूरी दुनिया की अहम समुद्री मार्गों को लेकर भी चिंता इस प्रस्ताव में जताई गई। खासतौर पर ट्रेट ऑफ हॉर्मोस का इसमें जिक्र किया गया। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक माना जाता है। अगर यहां पर कोई भी रुकावट आती है तो पूरी दुनिया की तेल सप्लाई प्रभावित हो सकती है।

इसी तरह बाब अलमंडेब स्टेट की सुरक्षा पर भी चिंता जताई गई क्योंकि ये दोनों समुद्री रास्ते वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद अहम माने जाते हैं। नागरिक इलाकों पर हमले की भी निंदा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने हालिया हमलों में रिहाायशी इलाकों को निशाना बनाए जाने पर भी गंभीर चिंता जताई।

कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक इन हमलों में कई आम नागरिकों की मौत हुई और कई इमारतें भी क्षतिग्रस्त हुई। बता दें कि परिषद ने प्रभावित देशों और वहां के नागरिकों के प्रति एकजुटता और समर्थन भी व्यक्त किया। अब सवाल उठता है कि रूस का प्रस्ताव क्यों फेल हो गया? इस बीच रूस ने भी एक अलग प्रस्ताव पेश किया गया था। बता दें लेकिन उसमें सिर्फ युद्ध रोकने की अपील की गई थी। किसी भी देश का नाम इसमें नहीं लिया गया था

और शायद यही वजह है कि उसे जरूरी समर्थन नहीं मिल पाया और वह प्रस्ताव पास ही नहीं हो पाया। अब सवाल यह उठता है कि इसमें भारत का रुख क्यों अहम है? भारत का यह रुख इसलिए भी ज्यादा इंपॉर्टेंट बन जाता है क्योंकि भारत और ईरान के रिश्ते पारंपरिक तौर पर काफी अच्छे रहे हैं। इसके बावजूद भारत ने यह स्पष्ट संकेत दे दिया है कि वो क्षेत्रीय स्थिरता, अंतरराष्ट्रीय कानून और समुद्री सुरक्षा के पक्ष में खड़ा हुआ है।

इसके पीछे एक बड़ा कारण यह भी है कि मिडिल ईस्ट में लाखों भारतीय काम करते रहते हैं। और ऐसे में वहां बढ़ता संघर्ष सीधे तौर पर भारत के हितों को और भी ज्यादा प्रभावित कर सकता है। यानी मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच भारत ने कूटनीतिक के मंच पर अपना रुख साफ कर दिया है। संदेश बिल्कुल स्पष्ट था। चाहे दोस्ती कितनी भी पुरानी क्यों ना हो। लेकिन अगर बात क्षेत्रीय शांति, समुद्री सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय नियमों की होगी तो भारत उसी के साथ खड़ा होगा जो स्थिरता और शांति की बात करेगा।

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