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जं!!ग लड़ने ईरान क्यों पहुंचे थे हजारों ब्राह्मण?..

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हवाओं में बात करते हुए रेत को चीरती तेज रफ्तार के साथ कुछ हिंदुस्तानी वीरों का एक कारवां ऐतिहासिक मिशन पर निकल पड़ा। उनकी आंखों में अजीम मकसद थे। वो इंसाफ और हक की बात करने वाले लोग थे। वो हजारों की संख्या में ईरान होते हुए तेजी से कर्बला की ओर बढ़ रहे थे। जहां इमाम हुसैन ने अन्याय के खिलाफ जंग का ऐलान किया था। यह ऐलान इंसानियत को जिंदा रखने के लिए जंग कर्बला में शामिल होने का था

और उस जंग में शरीक होने यह हकप्रस्त जांबाज हिंदुस्तान से कर्बला जा पहुंचे। कंधे पर जनेऊ डाले, माथे पर तिलक लगाए यह योद्धा हुसैनी ब्राह्मण थे। यह वही वीर सपूत थे जो मदद की शक्ल में हिंदू और मुसलमान के बीच प्रेम की एक सुनहरी इबारत लिखने कर्बला में मौजूद थे।

ऐसे में सवाल उठता है कि हिंदू धर्म को मानने वाले यह हुसैनी ब्राह्मण जंग कर्बला में क्यों शरीक हुए? आइए इसे तफसील से समझते हैं। नमस्कार, मैं हूं आदित्य। भारत फैक्ट्स के आज के एपिसोड में आपका स्वागत है। [संगीत] हुसैनी ब्राह्मण असल में मोहियाल समुदाय के ब्राह्मण होते हैं। यह वो लोग हैं जिन्होंने सदियों पहले कलम के साथ-साथ तलवार को भी अपना गहना बना लिया था।

यह कोई मामूली किस्सा नहीं है बल्कि एक मुकद्दस रिश्ते की कहानी है। इनका ताल्लुक दत्त उपनाम से है। आपने मशहूर फिल्मी अदाकार सुनील दत्त, नरगिस दत्त और संजय दत्त का नाम तो सुना ही होगा। वह भी इसी गौरवशाली परंपरा से आते हैं। हुसैनी ब्राह्मणों का मानना है कि उनके पूर्वज जंग कर्बला में शरीक हुए थे। अब सवाल यह है कि यह कर्बला क्यों पहुंचे? रिवायत कहती है कि जब कर्बला के मैदान में हक और बाततिल के बीच जंग छिड़ी थी

तब इमाम हुसैन की मदद के लिए हिंदुस्तान से एक जामाज योद्धा और राजा वहां मौजूद था। उसका नाम था राहब सिद्धत। वो वहां पर अकेले मौजूद नहीं थे। उनके साथ उनके चाहने वाले भी उस युद्ध में शामिल वहां पर जा पहुंचे। किस्सा कुछ यूं है कि राहब दत्त इमाम हुसैन के चाहने वालों में से थे। जब यजीद की फौज ने इमाम और उनके साथियों को चारों तरफ से घेर लिया तब राहब दत्त ने अपनी छोटी सी टुकड़ी के साथ इमाम की हिफाजत के लिए मैदान जंग में उतर पड़े। कहा जाता है कि राहद दत्त के साथ बेटों ने इमाम हुसैन के हक के लिए अपनी जानों का नजराना पेश कर दिया और वह इस जंग में शहीद हो गए।

सोचिए सात समंदर पार एक हुसैनी ब्राह्मण अपने बच्चों की कुर्बानी दे रहा था। सिर्फ इसलिए क्योंकि वह हक के साथ खड़ा था। [संगीत] कर्बला के मैदान जंग में हुसैनी ब्राह्मणों की शहादत के बाद राहद दत्त खामोश नहीं बैठे। उन्होंने इमाम के दुश्मनों से बदला लेने के लिए मुख्तार सखवी की फौज का साथ दिया और यजीद के लश्कर से लोहा लिया। इसके बाद वो वापस अपने वतन हिंदुस्तान लौट आए। लेकिन वो अकेले नहीं आए।

वह अपने साथ इमाम हुसैन की मोहब्बत और शहादत की कहानियां लेकर आए जो आज भी उनके वंशजों के सीने में ताज़ा है। तभी तो एक मशहूर शेर कहा गया है वाह दत्त सुल्तान हिंदू का धर्म और इस्लाम का ईमान शहीद हुए कर्बला में कुर्बान हुए सात बेटे जान। सदियां गुजर गई लेकिन हुसैनी ब्राह्मणों ने अपनी इस विरासत को आज भी महफूज़ रखा है। मुहर्रम के दिन यह लोग इमाम का मातम करते हैं।

मजलिसें सजाते हैं और कर्बला के शहीद को खिराजे-अकीदत यानी श्रद्धांजलि पेश करते हैं। इनके घरों में आज भी वो रस्में निभाई जाती हैं जो इमाम के गम से जुड़ी हुई है। दिलचस्प बात यह है कि यह लोग खुद को बड़े गौरव के साथ हुसैनी ब्राह्मण कहते हैं। ये इस बात की मिसाल है कि शहादत और कुर्बानी किसी एक की जागीर नहीं होती। जहां जुल्म होगा वहां हुसैन के चाहने वाले किसी न किसी रूप में जरूर खड़े होंगे। आज भी पूरी दुनिया में मुसलमान जंग कर्बला में इमाम हुसैन की शहादत को बड़े फक्र के साथ याद करते हैं।

खासतौर पर शियाओं में यह विश्वास है कि इस्लाम जिंदा होता है कर्बला के बाद। साथियों कर्बला की बात करें तो वो आज वर्तमान में इराक की सीमा के भीतर है। लेकिन उस दौर में मुल्कों की सीमाएं तय नहीं हुई थी। तब ईरान और इराक एक ही ख्ते में आते थे। हुसैनी ब्राह्मण जब हजारों की संख्या में कर्बला पहुंचे तो वह ईरान होते हुए वहां पहुंचे थे। जंग में शामिल होने के लिए उन्होंने कई दिन और कई रातें ईरान में गुजारी।

जानकारों के मुताबिक आज भी ईरान के लोग इन वीरों की बहादुरी को याद करते हुए नहीं थकते हैं। वहीं ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामन पूरी दुनिया में शियाओं के सबसे बड़े आध्यात्मिक गुरु माने जाते थे। इजराइल और अमेरिका के हमले में उनकी मौत हो गई। आज जब ईरान जंग में चारों तरफ से घिरा हुआ है तब वहां कर्बला की जंग और हुसैनी ब्राह्मण को याद किया जा रहा है। वसीम बरेलवी का एक शेर भी बहुत मशहूर है जो यहां पर मौजू है।

मैं यह नहीं कहता कि मेरा सर ना मिलेगा लेकिन मेरी आंखों में तुझे डर ना मिलेगा। हुसैनी ब्राह्मणों की यह दास्तान हमें सिखाती है कि इंसानियत का मजहब सबसे बड़ा है। एक भारतीय तबके का इमाम हुसैन के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर देना दुनिया के इतिहास की सबसे खूबसूरत और वीरता की कहानियों में से एक है। यह कहानी हमें जोड़ती है ना कि बांटती है।

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