ईरान। आज दुनिया इसे एक इस्लामिक मुल्क के तौर पर जानती है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि हजारों साल पहले यही जमीन एक ऐसी तहजीब का गवाह थी जिसकी जड़े हिंदुस्तान की प्राचीन वैदिक सभ्यता से मिलती-जुलती थी। कई इतिहासकारों का मानना है कि प्राचीन दौर में भारत और ईरान एक ही बड़े सांस्कृतिक परिवार का हिस्सा थे। जिसे इंडो ईरानियन या आर्य सविता कहा जाता है।
सबसे पहले समझना जरूरी है ईरान नाम खुद क्या बताता है। दरअसल ईरान शब्द अवस्था भाषा के एआरना या आर्यनम से निकला माना जाता है। जिसका मतलब होता है आर्यों की भूमि यानी आर्य लोगों की धरती। यही वजह है कि प्राचीन ईरान की संस्कृति और धर्म में कई ऐसी बातें मिलती है जो वैदिक हिंदू परंपरा और सनातन धर्म से काफी हद तक मिलती जुलती दिखाई देती है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सच में ईरान कभी हिंदू वैदिक परंपरा को मानने वाला देश था? अगर हां, तो कब वहां पर इस धर्म का बोलबाला था? आइए इसे डिटेल में समझते हैं।
नमस्कार, मैं हूं आदित्य। भारत फैक्ट्स के आज के एपिसोड में आपका स्वागत है। इस्लाम से पहले ईरान में जरास्त्रवाद यानी पारसी धर्म प्रचलन में था। लेकिन उससे भी पहले वहां वैदिक हिंदू धर्म की मान्यताएं मौजूद थी। अगर हम प्राचीन ग्रंथों की तरफ देखें तो भारत के वेद और ईरान के अवस्था में कई समान शब्द और देवताओं के नाम मिलते हैं। जैसे मित्र, वरुण और अग्नि जैसे देवताओं की झलक दोनों परंपराओं में दिखाई देती है।
इससे यह अंदाजा लगाया जाता है कि कभी दोनों इलाकों में रहने वाले लोगों की धार्मिक मान्यताएं एक ही जड़ से निकली हुई थी। अवस्था को संस्कृत की सिस्टर लैंग्वेज और फारसी की मदद लैंग्वेज भी कहा जाता है। कुछ इतिहासकार तो यह भी कहते हैं कि बहुत पुराने समय में ईरान के इलाके में भी वैदिक आस्थाएं और देवताओं की पूजा होती थी। उदाहरण के तौर पर देवराज इंद्र का नाम भारत के ऋग्वेद में सबसे ताकतवर देवता के तौर पर मिलता है। इंद्र को बिजली, बारिश और युद्ध का देवता माना जाता है जो अपने वज्र से दैत्यों का संहार करते हैं।
दिलचस्प बात यह है कि ईरान के प्राचीन धर्म ग्रंथ अवस्था में भी इंद्र का जिक्र मिलता है। देवराज इंद्र को आर्यों का सबसे प्रमुख देवता माना गया है। हालांकि उनकी छवि ईरान में भारत से अलग अंदाज में दिखाई देती है। हखामनी साम्राज्य के दौरान वहां पर धार्मिक यज्ञ होते थे। फारस के राजाओं का प्रभाव सिंधु घाटी तक था। जानकारों के अनुसार आर्य लोग करीब 2000 ईसा पूर्व के आसपास ईरान में उत्तर और पूर्व की दिशा से आए थे। इन्होंने यहां के लोगों के साथ एक मिश्रित संस्कृति की आधारशिला रखी। जिससे ईरान को उसकी पहचान मिली।
यही वह समय था जब वहां पर वैदिक आर्य धर्म का बोलबाला था। आर्यों की कई शाखाएं ईरान में आई। इनमें से कुछ मिदी, कुछ परथियन, कुछ फारसी, कुछ सगदी तो कुछ दूसरे नामों से जाने जाने लगे। 1500 ईसा पूर्व के करीब का समय वहां जराथुस्त्र यानी पारसी धर्म के उदय का काल माना जाता है। इसके करीब 5000 सालों के बाद ईरान में कई इलाकों पर यहूदियों का भी प्रभुत्व देखने को मिला। इस दौरान ईरान की आबादी का एक बड़ा हिस्सा यहूदी धर्म को भी मानने वाला रहा। इस दौरान भी इजराइल यहूदी धर्म का केंद्र हुआ करता था। फिर करीब 200 सालों तक यहूदी राजाओं और पारसी राजाओं के बीच पूरे खित्ते में युद्ध की स्थिति बनी रही।
लेकिन समय के साथ ईरान में पारसी धर्म मजबूत होता रहा। ईसा के बाद के सालों में ईरान में पारसियों ने अपने धार्मिक एक ईश्वरवादी सिद्धांतों को और भी मजबूती के साथ फॉलो करना शुरू कर दिया। वक्त के साथ-साथ भारत और ईरान की धार्मिक सोच अलग-अलग रास्तों पर चल पड़ी। जहां भारत में वैदिक धर्म आगे चलकर मौजूदा सनातन परंपरा के रूप में विकसित हुआ, वहीं ईरान पारसी धर्म की ओर आगे बढ़ता गया। उन्होंने अहूरा मजदा को अपना सर्वोच्च ईश्वर बताया और पुरानी कई देवताओं की व्याख्याएं बदल दी। इस दौर में ईरान का धार्मिक ढांचा धीरे-धीरे बदलने लगा। कई पुराने देवताओं की जगह नई धार्मिक मान्यताओं ने ले ली।
लेकिन सातवीं सदी में अरबों के आने के बाद वहां की सियासत और समाज में बड़ा बदलाव आया। इस्लामी सल्तनत के फैलने के साथ-साथ ईरान में भी धीरे-धीरे इस्लाम का असर बढ़ने लगा। अगले कुछ सदियों में वहां की ज्यादातर आबादी मुसलमान हो गई और ईरान पूरी तरह से इस्लामिक रीजन बन गया। फिर आया साल 1501 का समय। सवी राजवंश के संस्थापक शाह इस्माइल प्रथम ने राष्ट्र को एकजुट करने के लिए शिया से को अपनाने का आदेश दे दिया।
फिर सुन्नी बहुसंख्यक ईरान 16वीं और 17वीं शताब्दियों में शिया बहुल्य ईरान में तब्दील हो गया। आज का ईरान मुख्य तौर पर शिया इस्लाम को मानने वाला देश है। लेकिन उसकी मिट्टी में आज भी हजारों साल पुरानी सभ्यता की निशानियां मौजूद है। तो जब लोग यह सवाल करते हैं कि क्या ईरान कभी हिंदू या वैदिक संस्कृति से जुड़ा हुआ था? तो इतिहासकार यही कहते हैं दोनों इलाकों की जड़े एक साझा इंडो ईरानियन सभ्यता में मिलती हैं। प्राचीन काल में भी दोनों जगह आयुर्वदिक परंपराओं का बोलबाला था। वक्त के साथ-साथ रास्ते अलग हो गए।
लेकिन उन पुराने रिश्तों की झलक आज भी इतिहास के पन्नों में साफ दिखाई देती है। यही वजह है कि जब हम ईरान और भारत के प्राचीन इतिहास को देखते हैं तो हमें सिर्फ दो अलग-अलग देशों की कहानी नहीं दिखती। बल्कि एक ऐसी साझी विरासत नजर आती है जिसने हजारों साल पहले दोनों सविताओं को एक धागे में पिरो कर रखा। आज के एपिसोड में बस इतना ही