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हिरेश राणा को कैसे मिलेगी इच्छा मृत्यु डॉक्टर ने सब कुछ खुलके बताया..

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सबको माफ करते हुए सब से माफी मांगते हुए ठीक है। इंडियन मेडिकल हिस्ट्री में एक ऐसा केस आया जिसने पिछले कुछ दिनों में लोगों को झकझोर के रख दिया। 32 साल का एक युवक हरीश राणा जिसके परिजनों ने उसके इच्छा मृत्यु की मांग की। वो 13 साल से कोमा में था और अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद उसे इच्छा मृत्यु दी जाएगी। यानी उसे पैथी इथोनेशिया दिया जाएगा। वह फिलहाल नई दिल्ली स्थित एम्स में भर्ती है और अब उस प्रक्रिया को शुरू कर दिया गया है। आखिर यह पैथ इथोनेशिया क्या है? क्यों इसकी चर्चा हो रही है? क्या लंबा प्रोसेस है?


और कैसे हरीश राणा को जो है इच्छा मृत्यु दी जाएगी? इस पर विस्तार से बातचीत करने के लिए हमारे साथ डॉक्टर प्रोफेसर संदीप कुमार हैं। आरएमएल के शिक्षा डिपार्टमेंट के सीधा उनसे बातचीत करते हैं। डॉक्टर साहब पहले तो धन्यवाद आपने अपना कीमती समय हमको दिया। ये सर जो हम पिछले कुछ दिनों से देख रहे हैं हरीश राणा जो पूरी चर्चा का केंद्र बने पैथ इथोनेशिया इसको टर्म बार-बार आप कहीं पर भी सर्च करेंगे सबसे ज्यादा अटेंड करता है। थोड़ा सा समझाएं एक आसान भाषा में ये पैथिथोनेशिया क्या है?

देखिए ये जो टर्म है पैसिव यूथनेस यानी कि स्वच्छित मृत्यु की कामना की गई है। स्वच्छित मतलब मरीज की इच्छा। अब इस केस के अंदर मरीज हमारा 13 साल से कोमा में है। वो अपने आप से अपना डिसीजन नहीं ले सकता है। वो अब पैसिव की बात करें तो ये प्रक्रिया कैसे होती है? अगर उनको चरणभ तरीके से हम बताएं कि पहला तो यह है कि परिवार ने इच्छित इच्छा जाहिर की जो परिवार उनको उनका ध्यान रख रहा था

लगभग 13 साल से वो सेवा कर रहा था उनकी 13 साल से और उन्होंने ये पाया कि अब ये पॉसिबल नहीं है कि वो अपनी सामान्य अवस्था में आए या उस दर्द को समझे। उनका जो दर्द है, उनकी जो तकलीफ है, वह 13 साल के लंबे अंतराल पर उन्होंने देखी है। तो हम उनका बड़ा सम्मान करते हैं इस चीज का और यह है कि उन्होंने जब ये डिसाइड किया तो उन्होंने अप्रोच किया उसके लिए जो मेडिकल जो कानून है

जो हमारा लॉ है अब उसमें कि अभी उनको तीन साल का अंतराल लगा इन सब चीजों को कानूनी कान कानूनबद्ध तरीके से प्रोसेस में लाने में। अब सबसे पहली चीज कि मेडिकल यूनिट को अपॉइंट करना। पहले तो यह मेडिकल यूनिट डिसाइड करेगी कि वाकई में मरीज की स्थिति ऐसी है कि वह दोबारा से अपने पूरे अच्छे अह जो हेल्दी जीवन में आ सकता है या नहीं आ सकता। अब यह पॉसिबल नहीं है क्योंकि दिमाग में कुछ इस तरीके के बदलाव हुए हैं जिनको दोबारा से ठीक नहीं किया जा सकता। तो अगर यह मेडिकल बोर्ड यह निर्णय लेता है

कानून की देखरेख में कि इस मरीज को वापस से एक स्वस्थ प्रक्रिया से होके स्वस्थ नहीं किया जा सकता है या कोई दवाई के जरिए या कोई मेडिकल किसी भी मेडिकल प्रोसेस के जरिए तो वो एक डिसीजन लेता है कि ओके ये नहीं किया जा सकता है। ये मरीज की हालत ऐसी है कि दोबारा से इसको स्वस्थ नहीं किया जा सकता। उसके बाद एक और दूसरा मेडिकल बोर्ड अपॉइंट किया जाता है जो इनकी फाइंडिंग्स को दोबारा से निष्क्रश जो निष्पेक्ष रूप से जांचता है कि वाकई में यह पाया गया है इस मेडिकल बोर्ड के द्वारा कि इसकी स्थिति इस तरीके से है कि इतने सालों से देखा गया है

कि दोबारा से इनके दिमाग को या इनके शरीर को स्वस्थ नहीं किया जा सकता है किसी भी मेडिकल मीन से उसके बाद उसके बाद जब ये ऐसा पाया जाता है तो उसको एक मेडिकल फील्ड मेडिकल जो वहां पे हॉस्पिटल में भर्ती किया जाता है जैसे इनको एम्स में सुविधाएं दी गई। उसमें भी यह ध्यान रखा जाता है कि मरीज को की जो डिग्निटी एक तो यह है कि मरीज को एक तो जब मृत्यु आती है तो किसी भी तरीके के दर्द का सामना ना करें।

दर्द की दवाई दी जाती है। ऐसे स्टेप बाय स्टेप करने के लिए पहले पहले जैसे अगर मरीज वेंटिलेटर पे है या मरीज कुछ ऐसी दवाइयों पे है जो जीवन रक्षक दवाइयां है जिससे उनका ब्लड प्रेशर कंट्रोल में किया जा रहा है। दिल की दवाइयां चल रही हैं। कुछ एंटीबायोटिक्स चल रही है। उनको धीरे-धीरे स्टेप बाय स्टेप कम किया जाता है। उनको खाने खाना दिया जा रहा है नली के नली के जरिए या किसी भी और तरीके से उसको धीरे-धीरे चरणबद्ध तरीके से बंद किया जाता है। और यह पूरा पूरा ध्यान रखा जाता है कि मरीज को दर्द ना हो।

तो इसीलिए इसमें पैिटिव केयर का भी रोल आ जाता है कि वो पेटिव केयर में आपको दवाइयां दी जाती है ताकि मरीज को दर्द ना हो बिल्कुल भी और वो धीरेधी धीरेधीरे मृत्यु की तरफ जाए। ऐसे ही वेंटिलेटर को धीरे-धीरे कम किया जाता है और दर्द की दवाइयों के साथ और ये ध्यान रखा जाता है कि वो धीरे-धीरे मृत्यु की तरफ जाए। सर जैसे कि आपने जो बताया कि धीरे-धीरे पूरी प्रक्रिया को पालन किया जाता है। अब पहले तो हम सर ये समझना चाहते थे कि क्या इसमें जब मरीज शिफ्ट होता है हॉस्पिटल में तो सामान्य वार्ड में उसको करते हैं

या किसी आईसीयू में शिफ्ट करते हैं और वो स्टेप कैसे होते हैं कि पहले क्या करेंगे? उसके बाद सेकंड स्टेप क्या करेंगे? बहुत सियास है। जी एक्चुअली हर एक हॉस्पिटल जैसे हमारा अर्नल हॉस्पिटल में भी हमारे पास पिलेटिव केयर की सुविधाएं हैं। पहले केयर सुविधाएं उन मरीजों को दी जाती हैं जिसके जिसमें जैसे बहुत सारे ऐसे मरीज हैं जो जिनका जो पूरी तरीके से इलाज अगर संभव नहीं है जैसे कैंसर पेशेंट्स हैं हमारे पास है ना उनको काफी ज्यादा दर्द है और ऐसी बीमारियां जिनको जिसमें जीवन को खतरा है लेकिन पूरी तरीके से स्वस्थ नहीं हो सकते हैं

तो उनको पैेटिव केयर वार्ड में रखा जाता है या पैेटिव केयर यूनिट होती है उसमें रख के उनकी सुविधाओं का ध्यान रखा जाता है। सबसे ज्यादा दर्द का निवारण रखा जाता है और साफसाफ सही शब्दों में उनके रिलेटिव्स मरीज को ये बता दिया जाता है कि ये जो दवाइयां हैं ये जीवन को जीवन को आगे बढ़ाने में हेल्प नहीं करेंगी। ये जीवन को जो जो उनका जीवन है उसको दर्द रहित मृत्यु की तरफ लेके जाएंगी। तो ये बहुत जरूरी हो जाता है जब एक मरीज इस स्थिति में होता है कि उसकी मृत्यु आने वाली है। लेकिन हम ये चाहते हैं कि उनकी जो मृत्यु है

उसको पूरे सम्मान के साथ वहां तक पहुंचाया जाए। सर ये हरीश के केस में जैसे अब वो एडमिट हो गया और अब जैसा आपने बताया कि धीरे-धीरे जो तमाम चीजें हैं जो मेडिकल ट्रीटमेंट था वो उससे हटाया जाएगा तो सर पहला स्टेप क्या होगा इस केस में दूसरा क्या होगा तीसरा क्या होगा कि जब हम इस प्रक्रिया की तरफ जाएंगे देखिए ये मरीज की हालत के ऊपर निर्भर करता है जैसे अब हरीश जी के केस में उनके जो मां-बाप है उनका एक तो उनके डिसीजन का सम्मान करते हैं हम जब वो उनको लेके आए तो 13 साल से वो उन पे देखरेख कर रहे थे।

अभी यह है कि हर एक मरीज का जैसे मान लो हमारा पेशेंट हमारा वेंटिलेटर पे है या हमारा कुछ ऐसी जीवन रक्षक दवाइयां चल रही है तो हर एक केस अलग हो सकता है। ज्यादातर ऐसे केसेस में यही होता है कि मरीज अगर वेंटिलेटर पे है या जीवन रक्षक दवाइयां चल रही हैं। उनके कुछ हरकत नहीं है, शरीर में कोई हरकत नहीं है, दिमाग में कोई हरकत नहीं है। तो उन सब केसेस के अंदर ये जांचा जाता है मेडिकल यूनिट के द्वारा। जैसे मैंने आपको बताया मैं पहले एक मेडिकल एक कमेट होती है पूरी जांच देख करती है।

उसके बाद एक और मेडिकल कमेटी होती है वो जांच करती है। उसके बाद जब ये दोनों सलाह बना लेते हैं और तो प्रॉपर लीगल तरीके से जैसे इन्होंने सुप्रीम कोर्ट के में पहुंचे और माननीय कोर्ट ने ये लिया वो वो वो सर मैं मेरा सर ये जानना था कि जैसे हरीश अब एम्स में भर्ती तो मेडिकल बोर्ड ने रिकमेंडेशन के बाद सुप्रीम कोर्ट ने आर्डर दिया और अब वो प्रक्रिया शुरू हो गई। अब जब वो कल दो दिन से जब भागती है अब यहां पे प्रक्रिया क्या सबसे पहले वेंटिलेटर को हटाया जाएगा

फिर ऑक्सीजन सपोर्ट हटता है फिर क्या दवाई देना बंद होगा वो और जो जो हटेगा उसको कितनी कितनी उसको मॉनिटर किया जाए क्या होता है ये एक्चुअली जो डॉक्टर्स उनका ध्यान रख रहे हैं वो ये डिसीजन उनका होता है हम है ना तो ये सारा इस बात पे डिपेंड करता है कि उस मरीज की हालत कैसी है तो वो स्टेप बाय स्टेप मैंने जैसे बताया क्योंकि हम जब स्टेप बाय स्टेप कोई चीज़ करते हैं और सारी चीज़ मॉनिटर की जाती है।

मरीज का हार्ट रेट, मरीज की हर हरकत, दिमाग, दिमागी कंडीशन, दवाइयों का जो तरीका है देने का, वेंटिलेटर का है वो धीरे-धीरे होता है और हर एक मरीज में अलग हो सकता है। इनके केस में भी वो अलग हो सकता है और ये सारा डिसीजन जो उनकी देखरेख करने वाली मेडिकल यूनिट है वो ले। अच्छा सर। अब जैसे आपने कहा कि पेन बहुत होता है। तो ये कैसे आइडेंटिफाई डॉक्टर्स करते हैं कि इस मरीज को पेन हो रहा होगा।

अब इसको ये दवा दी जाए जो देखिए मरी देखो जब भी पेशेंट को पेन होता है तो उसके डिफरेंट तरीके से वो एक्सप्रेस करता है। जैसे अगर मरीज बिल्कुल स्वस्थ है तो वो चिल्लाता है। दर्द होता है। लेकिन इस केस में जब मरीज का दिमाग ठीक से निष्प बिल्कुल काम नहीं कर रहा है ठीक से तो कुछ-कुछ हीमोडायनेमिक्स में बदलाव होता है। हार्ट रेट में बीपी में इस तरीके के चेंजेस होते हैं। तो दवाइयां दी जाती है जिससे मरीज को तकलीफ ना हो ज्यादा और दर्द का भी निवारण रहे। सर यह जो पूरा प्रोसेस होगा पैथोनेशिया का ये कितना लंबा होता है?

कितने समय तक होता है? क्या कोई समय सीमा होती है? कैसे आइडेंटिफाई करेंगे? क्या ये कब तक इसको ट्रीट मतलब चीजें हटानी है? क्या होगा? ये नहीं ये एक्चुअली ये कोई हार्ड एंड फास्ट नहीं है कि यूथनेसिया आपका आधा घंटा हो गया, एक घंटा हो गया, दो घंटा ऐसा नहीं कहा जा सकता है। ये एक प्रक्रिया है। ये स्टेप बाय स्टेप चलते हैं। ये प्रक्रिया है। उसमें समय भी लग सकता है, कम समय भी लग सकता है और ज्यादा भी लग सकता है। यह पूरी की पूरी जो मेडिकल टीम की देख में होता है तो उसमें एक समय सीमा आप निर्धारित नहीं कर सकते। अच्छा सर क्या इसकी पूरी रिकॉर्डिंग होती है? मतलब क्या जो मेडिकल बोर्ड ने डिसीजन दिया है वो उसको पूरा नीलानी करता है?


क्या कोई रिकॉर्डिंग रिकॉर्डिंग होती है या जो नॉर्मल ट्रीटमेंट वैसे उसका एक्चुअली कोई रिकॉर्डिंग नहीं की जाती है। जितना भी क्योंकि देखो ये सारा का सारा ना ये कॉन्फिडेंशियल रहता है। है ना? अभी कोई भी मरीज बीमार है तो उसकी कॉन्फिडेंशियलिटी मेंटेन करना ये इंस्टिट्यूशन की जिम्मेदारी है। क्या उसके परिवारजन ये चाहते हैं? नहीं। क्या वो मरीज ये चाहता था? नहीं। तो अगर हम लोग इसका ध्यान रखेंगे तो अब जब हम डिग्निटी की बात करते हैं। हम ये बात करते हैं कि उनके आखिरी क्षणों में हम लोगों ने उनका साथ दिया। तो मैं ये उम्मीद करता हूं

मीडिया से भी और बाकी लोगों से भी कि उनके दर्द को समझने की कोशिश की जाए। जो परिवार 13 साल से उस बच्चे का ध्यान रख रहा था। इतनी मेहनत करी उन्होंने। उन्होंने उनको छोटे से देखा है बच्चे को और जब 13 साल से किसी मां-बाप ने ऐसे देखा बच्चे को ऐसी हालत में देखा तो ये उनका राइट है। उनका वो क्षण है जिसमें वो बहुत तकलीफ में है और ये डिसीजन लेना अपने आप में बहुत मुश्किल है।

तो हमें उनका सम्मान करना चाहिए उनके डिसीजन का और हम सब इसके साथ हैं। यानी सर कोई समय सीमा नहीं होती और चरणबद्ध तरीके से जो उनकी इच्छा हुई पूरी प्रक्रिया है हरीश की उसका पालन किया जाएगा और कोई जो डॉक्टरों की टीम है वो उसकी निगरानी करेगी उसकी कोई समय सीमा नहीं उनकी कोई निर्धारित समय सीमा नहीं है ये डिपेंड करता है कि मरीज किस तरह से रिसोंड कर रहा है जब आपने उसको निष्ेश कर जो स्टेप बाय स्टेप हटाने की कोशिश की उसको मरीज किस तरह से रिसोंड कर रहा है

तो वो वैरी कर सकता है पेशेंट टू पेशेंट शुक्रिया ये थे डॉक्टर संदीप कुमार प्रोफेसर एमसीप उन्होंने बताया कि पैथलेशिया क्या होता है और हरीश राणा के केस में किस प्रक्रिया का पालन किया जाएगा जिसके तहत उसे पूरे सम्मान के साथ इस दुनिया से आखिरी या कहें अंतिम विदाई दी जाएगी जिसकी गुहार उसके माता-पिता ने सर्वोच्च न्यायालय से लगाई थी.

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