एम्स जैसे बड़े अस्पताल में हमेशा जो लोग पहुंचते हैं, जो मरीज पहुंचते हैं, वह अपनी जिंदगी बचाने की उम्मीद से पहुंचते हैं। लेकिन हरीश राणा और उनका परिवार वहां पहुंचा है कि हरीश राणा की जिंदगी अब खत्म होगी। जिंदगी कैसे खत्म होगी? उसका पूरा प्रोसेस क्या है? धीरे-धीरे किस तरीके से हरीश राणा की सांसों की डोर छूटेगी? उसे उसके उस पर बात करने के लिए हमारे साथ डॉक्टर रवि मलिक है। सर बहुत स्वागत आपका क्राइम तक पर। सर ये पूरा प्रोसेस क्या होगा? पैसिव यूथनेसिया जो सुप्रीम कोर्ट ने कहा है, इजाजत दी है। किस तरीके से हरीश राणा की सांसों की डोर धीरे धीरे धीरे छूटेगी? उसका एक पूरा प्रोसेस क्या है?
देखिए सबसे पहले तो हमें यह समझना जरूरी है पैसिव यूथनेजिया होता क्या है? पैसिव यूथनेसिया में क्या है कि जो डॉक्टर्स हैं वो जितनी लाइफ सेविंग ड्रग्स हैं या लाइफ सेविंग जितने मैन्यूअर्स हैं उनको विड्रॉ करते जाएंगे ताकि पेशेंट एक नेचुरल डेथ से जाए। हम बनिस्बत के एक्टिव यूथनेसिया यह होता है कि जिसमें कि हम पेशेंट को मारने के लिए दवाई दी जाती है तो वो यह एक्टिव यूथनेसिया नहीं है। वो बिल्कुल इललीगल है। यह पैसिव यूथनेसिया पैसिव यूथनेसिया के अंदर केवल और केवल डॉक्टर्स विड्रॉ करेंगे। जितनी भी लाइफ सपोर्टिंग उनको हम हाइड्रेशन के लिए दे रहे हैं
या उनको न्यूट्रिशन के लिए दे रहे हैं या कोई भी लाइफ सेविंग ड्रग दे रहे हैं उसको विड्रॉ कर देंगे ताकि पेशेंट अपनी नेचुरल डेथ से जाए। हम यह लाइफ सपोर्टिंग सिस्टम में क्या-क्या हो सकता है जिनको हटाया जाता है? लाइफ सपोर्टिंग सिस्टम के अंदर बहुत सारी चीजें आती हैं। जैसे ऑक्सीजन है, सीप मशीनंस हैं या वेंटिलेटर्स हैं या बीपी बढ़ाने की दवाइयां हैं जो कि शॉक में हम लोग देते हैं। डायलिसिस है। तमाम तरह की दवाइयां हैं और न्यूट्रिशन है। कई बार इस तरह के पेशेंट को हम न्यूट्रिशन नेजोगैस्ट्रिक ट्यूब से देते हैं या इसके अंदर जो हाइड्रेशन है आईवी फ्लूइड्स वगैरह हम देते हैं।
तो ये सब चीजें हैं लाइफ सपोर्ट के लिए दी जाती हैं। लेकिन एक पेशेंट जिसके अंदर कि मेडिकलली रिकवरी इज़ ऑलमोस्ट इंपॉसिबल। मेडिकलली वह रिकवर नहीं कर सकता है। तो उस केस में पैसिवनेसिया का ये डिसीजन आया है। जब ये सारी लाइफ सपोर्ट के लिए जो भी सिस्टम है, जो भी चीजें दी जाती है, जब उसको हटाया जाएगा तो कोई दर्द होगा, कोई परेशानी होगी। ऑब्वियसली हरीश राणा खुद से नहीं बता सकते हैं।
लेकिन ऑब्वियसली डॉक्टर को पता होगा ये चीजें तो उसके लिए फिर कोई दूसरा विकल्प होगा। डेफिनेटली एक सक्षम बोर्ड जो कि प्रोफेशनली क्वालिफाइड है एम्स में वो बैठेगा। एक सिंगल डॉक्टर इसमें डिसीजन नहीं लेगा। पूरा बोर्ड डिसीजन लेगा। हरीश राणा जी के हर जो उसके पैराटर्स हैं उनको देखा जाएगा और उसके हिसाब से धीरे-धीरे करके ये चीजें विड्रॉ की जाएंगी और अगर इसके दौरान उनको बेचैनी होती है,
बहुत ए्जायटी होती है या परेशानी होती है तो उसका भी पूरा ध्यान रखा जाएगा बोर्ड के थ्रू और यह बड़ा ही एक एथिकल वे में और डॉक्यूमेंटेड वे में यह चीज होगी और जिसमें कि धीरे-धीरे करके जो भी लाइफ सपोर्ट की मेडिसिंस हैं या जो भी लाइफ सपोर्ट की न्यूट्रिशन या हाइड्रेशन है वो धीरे-धीरे करके विड्रॉ होंगी। ये पैलिएटिव केयर यूनिट जहां पर हरीश राणा को ये पैसिव इथनेसिया दिया जा रहा है। ये पूरा प्रोसेस किया जा रहा है। यह यूनिट कैसा होता है? क्या वहां बाकी जो जो बेड्स होते हैं उसकी तरह होता है? कुछ अलग होता है इसमें?
पैलिएटिव केयर हम तब देते हैं जनरली पेशेंट्स को कि जब जैसे स्टेज फोर कैंसर है या कोई ऐसी बीमारी है जिसमें कि पेन बहुत हो रहा है पेशेंट को। एंग्जायटी बहुत ज्यादा हो रही है और बीमारी भी लालाज है। उसमें हम पेिलिएटिव केयर देते हैं। पेएटिव केयर का मतलब है कि पेशेंट को हम कंफर्टेबल करते हैं। इसके अंदर हम नींद की दवाइयां भी दे सकते हैं। दर्द की दवाइयां भी दे सकते हैं। दर्द के इंजेक्शन भी दे सकते हैं या एनस्थीसिया के ब्लॉक्स भी दे सकते हैं जिससे कि पेशेंट को पेन बिल्कुल ना हो और उसकी सफरिंग्स जो है वो कम हो।
तो पेिलिएटिव ट्रीटमेंट यह होती है। यह क्यूरेटिव ट्रीटमेंट नहीं है। यह पेिलिएटिव ट्रीटमेंट यह होती है जिसमें कि हम पेशेंट का दुख जो है वो कम करते हैं। तो ये पिलिएटिव वार्ड में इनको रखा गया है। जहां पर कि डॉक्टर्स की जो सक्षम टीम है वो इसको मॉनिटर करके और इस प्रोसेस को जो है वो अंजाम देंगे। इस यूनिट में या फिर ये जो वार्ड होता है क्या कोई अलग मशीन होती है? क्या कोई अलग बेड होता है
या फिर जैसे नॉर्मली बाकी व्स या बाकी यूनिट्स होते हैं उसकी तरह ही होता है। बस ट्रीटमेंट अलग तरीके से होता है। हां इसमें बेसिकली ट्रीटमेंट इसलिए दिया जाता है कि पेशेंट को हम कंफर्टेबल करें। पेशेंट का पेन दूर करें। उसकी ए्जायटी दूर करें। तो इसके अंदर जो है साइकेट्रिस्ट हैं, साइकोथरेपिस्ट हैं, पेन मैनेजमेंट कंसलटेंट्स हैं, एनस्थेटिस्ट हैं जो कि पेन के ब्लॉक्स देते हैं जिनको कि ब्लॉक देने के बाद पेशेंट को पेन बिल्कुल नहीं महसूस होगा।
या एंटी एंजायटी या एंटी डिप्रेसेंट ड्रग्स देते हैं जो कि एंड स्टेज के पेशेंट्स को चाहिए होती हैं क्योंकि उनको बहुत ज्यादा ए्जायटी होती है। तो पेिलिएटिव केयर जो है इन सब चीजों को कंप्राइ करती है। अभी हरीश राणा को डॉक्टर्स 247 मॉनिटर करेंगे। डेफिनेटली वो बिल्कुल मॉनिटरिंग में रहेंगे। उनकी हर चीज पल्स, रेस्पिरेटरी रेट, बीपी, एसपीओ2 हर चीज को मॉनिटर किया जाएगा और डॉक्टर्स की जो सक्षम टीम है
वह बड़े ही एथिकल वे में और बहुत ही संभल के इस चीज को हैंडल करेंगे जिससे कि धीरे-धीरे करके इनकी जो है लाइफ सपोर्ट की चीजों को हम विड्रॉ करें और बिना किसी दिक्कत के यह एक नेचुरल वे से जो है वह जान जाए। और सुप्रीम कोर्ट के इस बात का भी ध्यान रखना है कि बहुत ही सम्मानजनक तरीके से उनकी जो दुखदाई या कष्ट वाली जिंदगी है उसको खत्म करें। डेफिनेटली ये डिसीजन ही इसलिए आया है कि राइट फॉर डिग्निफाइड डेथ भी जो है
बहुत इंपॉर्टेंट है एस पर विद द आर्टिकल 21 ऑफ द कॉन्स्टिट्यूशन ऑफ इंडिया। तो उसके तहत यह डिसीजन आया है पैसिवनेसिया का। तो इसमें बहुत केयरफुली चलने की आवश्यकता है और क्योंकि एम्स के डॉक्टर्स जो है वो बहुत ही स्ट्रांग और सक्षम टीम होती है। दे आर प्रोफेशनली वेल क्वालिफाइड। सो दे विल टेक केयर ऑफ दिस। और कितना वक्त एक अनुमानित वक्त हो सकता है।
इस तरह की चीज में वक्त बताना बहुत बहुत मुश्किल होता है कि कितना वक्त लगेगा। तो वक्त तो वक्त ही बताएगा कितना वक्त लगेगा। लेकिन हफ्ता 10 दिन तो बहुत आम सी बात है जो इतना वक्त लग सकता है लेकिन बहुत सारी चीजों के ऊपर यह डिपेंड करता है कि वो वक्त कितना लगता है।