यह किस्सा उतना ही अद्भुत है जितना दर्दनाक। साल 2001 शहीद अरुण खेत्रपाल के पिता ब्रिगेडियर मदन लाल खेत्रपाल की उम्र हो चुकी थी। वो 81 साल के हो चुके थे। रिटायर हो चुके थे। उनकी एक ही इच्छा थी। अपनी जन्मभूमि अपनी जमीन सरगोदा को एक बार फिर से देखना। वो जगह जहां उनका परिवार रहता था। वो जगह जो 1947 में बंटवारे के वक्त पाकिस्तान के हिस्से चली गई थी।
भारतपाकिस्तान के बीच ट्विन ट्रैक डिप्लोमेटिक एफर्ट के तहत यह व्यवस्था हुई। ब्रिगेडियर खेतरपाल पाकिस्तान गए। उनकी मेजबानी के लिए पाकिस्तानी सेना के 13 लैंसर्स के ब्रिगेडियर के एम नासर को जिम्मेदारी दी गई। तीन दिन तक नासर परिवार ने खेतरपाल की खूब मेजबानी की। बिल्कुल हैरान करने वाला आदर सत्कार। ब्रिगेडियर खेतरपाल को सिर आंखों पर बिठाया गया। ब्रिगेडियर हैरान थे।
उन्हें कुछ तो अजीब लग रहा था लेकिन वह समझ नहीं पा रहे थे। फिर आई वापसी की रात। ब्रिगेडियर नासिर ने कहा मैं आपसे एक जरूरी बात करना चाहता हूं और फिर जो बात उन्होंने कही वो हिला देने वाली थी। ब्रिगेडियर नासिर ने कहा सर यह बात कई सालों से आपसे कहना चाहता था लेकिन आपसे संपर्क बनाने का कोई जरिया नहीं मिल रहा था। आखिरकार अब मौका मिला है तो मैं अपने दिल का बोझ हल्का करना चाहता हूं।
16 दिसंबर 1971 को शकरगढ़ सेक्टर के जारपाल के रण में मैं ही अरुण खतरपाल के सामने था। मेरा टैंक उनके सामने था। हम दोनों एक दूसरे के खिलाफ लड़े थे। आमने-सामने थे और वो आखिरी गोला जो आपके बेटे के लिए जानलेवा बना वो मैंने ही दागा था। ब्रिगेडियर खेतरपाल स्तब्ध रह गए। सामने खड़ा था वो आदमी जिसने उनके बेटे को मारा था। लेकिन नासिर की आंखों में पश्चाताप था, दुख था, सम्मान था।
नासिर बोलते रहे। उस वक्त मैं पाकिस्तान का सैनिक था। युद्ध में दुश्मन को मारना मेरा फर्ज था। लेकिन मैंने देखा कि जिस टैंक को मैंने मारा उसमें कितना साहसी कितना प्रतिबद्ध कितना बहादुर नौजवान था। मैं उसे भूल नहीं पाया। युद्ध विराम के बाद जब हम अपने जवानों के शव लेने गए तो मैंने देखा कि भारतीय सैनिक उस टैंक के पुरदे इकट्ठा कर रहे थे। मैं जानना चाहता था वो कौन था। कितना बहादुर था।
जब मुझे पता चला कि वो सिर्फ 21 साल का था। मैं टूट गया। नासिर की आवाज भर्रा गई। उन्होंने कहा मैं माफी मांगता हूं। अगर अरुण मेरा बेटा होता तो मुझे उस पर गर्व होता। ब्रिगेडियर खेतरपाल ने उन्हें गले लगा लिया। यह दो फौजियों का मिलन था। दो पिताओं की समझ थी। युद्ध में दुश्मन होते हैं लेकिन वीरता की कोई सीमा नहीं होती। साहस की कोई राष्ट्रीयता नहीं होती। पाकिस्तानी सेना ने 17 पूर्स को फक्र हिंद का खिताब दिया था।
यानी दुश्मन ने भी सलाम किया था अरुण खेत्रपाल की वीरता को। आज देश भर में अरुण खेत्रपाल को याद किया जाता है। लॉरेंस स्कूल सनावर में उनकी याद में एक स्मारक है। एनडीए में एक ब्लॉक उनके नाम पर है। आईएमए में एक ऑडिटोरियम उनके नाम से है। पुणे में अरुण क्षेत्रपाल चौक है। आज सेकंड लेफ्टिनेंट अरुणपाल हमारे बीच नहीं है। लेकिन उनकी वीरता अमर है।
उनका साहस अमर है। उनका बलिदान अमर है। हर 16 दिसंबर को विजय दिवस पर भारत उन्हें याद करता है। और अब 21 के जरिए नई पीढ़ी भी जानेगी कि 21 साल का एक लड़का कैसे इतिहास रच गया। कैसे वह चट्टान बन गया था। पाकिस्तानी टैंकों के आगे। कैसे उसने अपनी जान दी लेकिन अपनी जमीन नहीं दी.