जिस वक्त दुनिया भर में तेल को लेकर अफरातफरी मची है, उसी वक्त आधी दुनिया यह मातम मना रही है कि ईरान ने भारत के तेल टैंकरों को स्ट्रेट ऑफ हॉर्मोस से निकलने की इजाजत कैसे दे दी। लेकिन अब इसी बीच तेल को लेकर एक ऐसी खबर आई है जिसे देखकर आपके होश उड़ जाएंगे। आपने देखा होगा कि जब भारत रूस से बहुत ज्यादा तेल खरीद रहा था उस वक्त भी कांग्रेस को बहुत दिक्कत थी। लेकिन जब भारत ने अपनी जरूरतों के हिसाब से रूसी तेल खरीद को थोड़ा कम कर दिया तब भी कांग्रेस यह बोलती रही कि मोदी ने सरेंडर कर दिया है।
लेकिन आप यह जानकर हैरान हो जाएंगे कि कांग्रेस सरकार ने तेल खरीदा और करीब ₹3 लाख करोड़ से ज्यादा का बिल पीएम मोदी को दे दिया। कांग्रेस के खरीदे हुए तेल का बिल पिछले कई सालों से मोदी सरकार भर रही है। मोदी सरकार अगर यह बिल नहीं चुकाती तो देश सही में बर्बाद हो सकता था। लेकिन अब खबर आई है कि मोदी सरकार ने ₹3 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का यह बिल चुका दिया है।
अब आपके मन में सवाल होगा कि लाखों करोड़ों का तेल तो कांग्रेस ने खरीदा था, लेकिन इसका बिल मोदी क्यों भर रहे हैं? अब आपको बेहद ही आसान भाषा में यह पूरी कहानी समझाते हैं। दरअसल यहां पर सारा खेल ऑयल बॉन्ड्स का है जो यूपीए ने अपने कार्यकाल में जारी किए थे। ऑयल बॉन्ड्स क्या थे उसे उदाहरण के रूप में आप ऐसे समझिए कि अगर यूपीए के समय पेट्रोल की असली बाजार कीमत ₹60 प्रति लीटर थी। लेकिन वोटरों को खुश रखने के लिए सरकार ने इसकी रिटेल कीमत ₹40 तय कर दी। तो इस ₹20 के अंतर का बोझ किसी ना किसी को तो उठाना ही था।
शुरुआत में यह बोझ ऑयल मार्केटिंग कंपनियों पर डाल दिया गया क्योंकि अगर सरकार उस समय तेल कंपनियों को तुरंत इस राशि का नगद भुगतान करती तो इससे राजकोशीय घाटा बहुत ज्यादा बढ़ जाता। इसीलिए सरकार ने तेल कंपनियों को पैसा देने के बजाय ऑयल बॉन्ड्स जारी कर दिए जो असल में एक तरह का कर्ज देने का वादा था। यह वादा बड़ा ही सीधा सा था।
हम आपको आज पैसा नहीं देंगे बल्कि 15 से 20 साल बाद देंगे और लगभग 8% सालाना ब्याज भी देंगे। दूसरे शब्दों में कहें तो यूपीए सरकार ने जानबूझकर सस्ते रखे गए ईंधन की कीमत का बोझ भविष्य की सरकार और भविष्य के टैक्स देने वालों पर डाल दिया। अतीत में मिलने वाला सस्ता पेट्रोल असल में सस्ता नहीं था। उसका बिल तो भविष्य के लिए टाल दिया गया था। यानी यूपीए सरकार ने अपना सारा बिल मोदी सरकार के लिए बचा कर रख लिया। मोदी सरकार जिस पैसे का इस्तेमाल हजारों स्कूलों, अस्पतालों और बड़े-बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए कर सकती थी,
उस पैसे का इस्तेमाल अब कांग्रेस के ऑयल बॉन्ड्स को चुकाने के लिए किया गया है। आपको बता दें कि 2008 के वैश्वीय वित्तीय संकट के दौरान कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगी थी। उस समय यूपीए सरकार ने अचानक ईंधन की कीमतें बहुत ज्यादा बढ़ा दी। एक ही झटके में पेट्रोल की कीमत ₹5 प्रति लीटर और डीजल की कीमत ₹3 प्रति लीटर बढ़ा दी गई। इसके बाद यूपीए सरकार ने 2005 से 2010 के बीच 1.4 लाख करोड़ के ऑयल बॉन्ड जारी कर दिए ताकि तेल मार्केटिंग कंपनियों को हुए नुकसान की भरपाई की जा सके।
अब मोदी सरकार 2014 से ही इन ऑयल बॉन्ड्स के पैसों को चुका रही है। प्रिंसिपल अमाउंट और ब्याज सहित मोदी सरकार 2.36 लाख करोड़ से ज्यादा का भुगतान कर चुकी है। अब मोदी सरकार लगभग पूरी तरह से इन ऑयल बॉन्ड्स से मुक्त हो चुकी है। मोदी सरकार ने भविष्य के लिए इस कर्ज को नहीं टाला।
आप सोचिए कि 2.36 लाख करोड़ से मोदी सरकार क्या-क्या कर सकती थी। लेकिन यह सारा पैसा कांग्रेस के समय खरीदे गए तेल का बिल भरने में निकल गया। हैरानी की बात देखिए कि मोदी सरकार को पुराना कर्ज चुकाना पड़ा। रूस, यूक्रेन और वेस्ट एशिया में चल रही जंग झेलनी पड़ रही है। लेकिन इसके बावजूद मोदी सरकार ने तेल के दामों को बढ़ने नहीं दिया।