मैं आर्मी चीफ को ये पैगाम देता हूं। मैं वजीर-आजम पाकिस्तान को ये पैगाम देता हूं। कल का जो उलमा के दरमियान पेश आया ए आर्मी चीफ तुमने मेरे जो उलमा की तौहीन की है उनका सजा आपको भुगतना पड़ेगा। हम लोग अभी तो इसराइल के टुकड़े खाने वाले मौलवीने हैं जो बगैर को कबूल करेंगे। ये काफी था एक नसीब ये नालायक और सुनह जन्नत ये कहे कि जिनको अगर ईरान से बहुत मोहब्बत है तो उधर चले जाए और कहते तुम्हें इजराइल से बड़ी दोस्ती है
तुम इजराइल में जाके मरो इस काबिल नहीं हो कि मुसलमान सर जमीन पर मर जाओ आप लोगों की वजह से आप डोनल्ड ट्रंप और अमेरिका के जो इस्टैब्लिशमेंट है उसके कहने पर आप पाकिस्तान के अंदर पाकिस्तान के मफाद के खिलाफ काम करते हो। यहां पर रिजीम चेंज करते हो। जो कुछ इस वक्त मुल्क के अंदर तबाही है ये सिर्फ अमरी गुलामी की वजह से और तुम लोगों की वजह से है।
एक बयान ने पूरे देश में शिया और सुन्नी गुट के बीच विवाद खड़ा कर दिया है। वजह है उनका स्टेटमेंट। जिनको ईरान से बहुत प्यार है वो वहीं चले जाए। ऐसा आसिम मुनीर ने रावलपिंडी में एक इफ्तार पार्टी के दौरान शिया धर्म गुरुओं से कहा है और यही स्टेटमेंट अब पाकिस्तान के लिए सिरदर्द बन गया है। शिया समुदाय से जुड़े लोग मुनीर को खरी-खोटी सुना रहे हैं और यह भी आरोप लगा रहे हैं कि पाकिस्तानी आर्मी अमेरिका के कहने पर देश की सरकार बदल देती है।
माने पाकिस्तान जो बात खुद कभी नहीं मानता गुस्से में आए वहां के शिया धर्म गुरु ही जग जाहिर कर रहे हैं। पर मुनीर के मुंह से यह बात निकली ही क्यों? इसके पीछे की वजह है ईरान। ईरान के सुप्रीम लीडर अयतुल्ला अली खामिनई की मौत के बाद पाकिस्तान में शिया समुदाय के लोगों ने अमेरिका और इजराइल के विरोध में प्रदर्शन किया था। कराची में यूएस एंबेसी के बाहर बड़ी संख्या में शिया समुदाय के लोग जुटे थे।
इस विरोध प्रदर्शन में कई जगहों से हिंसा की खबरें आई थी। 20 लोगों की मौत की भी खबर थी अलजजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक जिसके बाद पाकिस्तानी आर्मी चीफ ने यह चेतावनी दी थी कि दूसरे देश की घटनाओं के आधार पर पाकिस्तान में हिंसा बर्दाश्त नहीं की जाएगी। शिया धर्म गुरुओं ने मुनीर की इस चेतावनी को दिल पर लगा लिया। उनका आरोप था कि ऐसा कहकर मुनीर शिया समुदाय पर हिंसा का सारा ब्लेम डाल रहे हैं।
जिसके बाद मुनीर ने कहा कि अगर ईरान से इतना ही प्यार है तो वहीं चले जाए। ऐसा उनका स्टेटमेंट आया। इस स्टेटमेंट पर शिया धर्म गुरु भी भड़क गए हैं। सुनिए उनका बयान। आप लोगों की वजह से आप डोनल्ड ट्रंप और अमेरिका के जो इस्टैब्लिशमेंट है उसके कहने पर आप पाकिस्तान के अंदर पाकिस्तान के मफाद के खिलाफ काम करते हो। यहां पर रिजीम चेंज करते हो।
जो कुछ इस वक्त मुल्क के अंदर तबाही है ये सिर्फ अमरी गुलामी की वजह से और तुम लोगों की वजह से है। ये हमारी वजह से नहीं है। हम पाकिस्तान के चाहने वाले हैं। पाकिस्तान के बनाने वाले हैं। पाकिस्तान की तामीर और तरक्की में हिस्सा लेने वाले हैं। लिहाजा मैं सिर्फ ये कहना चाहता हूं कि आपको होश के नाखून लेने चाहिए। डॉनल्ड ट्रंप और उसके यार नतन याू अमेरिका और इसराइल की कश्ती डूबने वाली है।
आप अमेरिका के नौकर बनने जा रहे हैं। आप इसराइल के नौकर बनने जा रहे हैं। आपको उनसे हमदर्दी है तो आप इस मुल्क से चले जाए। किस किस्म का कुरान आपके से में है?कौन सा कलमा पढ़ते हैं आप? आप हमें धमकाना चाह रहे हैं। आप शिया कौम को धमकाना चाह रहे हैं। यहूद से हमारा कोई रिश्ता नहीं है। अमेरिका से इसराइल से हमारा कोई रिश्ता नहीं है। आप मक्का का तहफुज करें। आप मदीना का तहफुज करें।
वो कुरानों का तहफुज करके बात ना करें। शिया और सुन्नी दोनों ही समुदाय का जुड़ाव इस्लाम से है। बस फर्क बिलीफ का है। ईरान के सुप्रीम लीडर की मौत पर उनका गुस्सा इस हद तक क्यों है और इस समुदाय का पाकिस्तान की राजनीति में कितना रोल है? अब यह समझते हैं। पहले शिया सुन्नी में फर्क समझ लीजिए। यह कहानी शुरू होती है। जब पैगंबर मोहम्मद साहब इस दुनिया से कूच कर गए तब यह विवाद पैदा हो गया कि कौन मुसलमानों का नेतृत्व करेगा।
सुन्नियों ने अबू बकर, उमर, उस्मान और फिर अली को अपना खलीफा मान लिया। जबकि शिया मुसलमान ने खिलाफत को मानने से इंकार कर दिया। शियाओं का कहना है कि जो पहले तीन खलीफा बने वो गलत तरीके से बने। अली को सुन्नियों ने चौथा खलीफा माना। जबकि शिया ने अपना पहला इमाम माना। खिलाफत की जगह शियाओं में इमामत मिली। और फिर इस तरह शियाओं के 12 इमाम हुए।
पहले अली, दूसरे अली के बेटे हसन, तीसरे हुसैन। हुसैन अली के दूसरे बेटे थे। इन सबको सुन्नी भी मानते हैं। लेकिन खिलाफत और इमामत के विवाद में सुन्नी और शिया में मतभेद हो गए। मुस्लिम आबादी में बहुसंख्य सुन्नी मुसलमान हैं। शिया की तादाद कम है। दोनों समुदाय सदियों से एक साथ रहते आए हैं। दोनों की ज्यादातर धार्मिक आस्थाएं और रीति रिवाज भी एक जैसे हैं। त्यौहार भी एक ही हैं।
लेकिन ईरान से लेकर सऊदी अरब, लेबनन से सीरिया और इराक से पाकिस्तान तक इतने संघर्ष हैं कि दोनों समुदायों में तनाव सामने आता रहता है। इन राजनीतिक संघर्षों ने दोनों समुदायों के बीच की खाई को और गहरा किया है। ईरान शिया बहुल देश है जहां शिया समुदाय की आबादी ज्यादा है। इस्लामिक क्रांति के बाद वहां आयतुल्लाह रुल्लाह खुमैनी सुप्रीम लीडर बने और उनके बाद आए अयतुल्लाह अली खामिनी। आयतुल्लाह सिर्फ देश के सुप्रीम लीडर का पद नहीं है बल्कि शिया समुदाय के लोग उन्हें मर्जा-ए तकलीफ का दर्जा देते हैं।
शिया इस्लाम में मर्जा का पद सबसे ऊंचा होता है। लोग उन्हें अपना धार्मिक मार्गदर्शक मानते हैं। दुनिया भर के करोड़ों शिया अपनी रोजमर्रा की जिंदगी इबादत और फैसले के लिए उनके फतवों का पालन करते हैं। यही वजह है कि अली खामिनई की मौत के बाद शिया समुदाय में दुख है और अमेरिका इजराइल के लिए बेहद गुस्सा।
25 करोड़ से अधिक आबादी वाले देश पाकिस्तान में सुन्नी मुसलमानों की संख्या ज्यादा है। वहीं शिया समुदाय की हिस्सेदारी 20% से अधिक है पाकिस्तान में। देश के कई बड़े नेता जैसे खुद जिन्ना, पाकिस्तान के पहले राष्ट्रपति सिकंदर मिर्जा, इनफैक्ट जुल्फिकार अली भुट्टो भी शिया ही थे।
जिन्ना से लेकर भुट्टो तक जिस शिया समुदाय ने पाकिस्तान की नीव और राजनीति को खड़ा किया आज वही समुदाय खुद को अपने ही देश में टारगेट महसूस कर रहा है। बलोचों के साथ तो विवाद है ही और अब शिया समुदाय को नाराज करके पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति क्या मोड़ लेती है यह तो वक्त ही बताएगा। इस पूरे विवाद पर आपकी राय हम कमेंट बॉक्स में देखेंगे। मेरा नाम प्रगति है।