आशा भोसले इस दुनिया में नहीं रही लेकिन वह अभी भी अपने गानों से हमेशा जिंदा [संगीत] रहेगी। मगर क्या आप जानते हैं कि जिस आवाज के सब इतने दीवाने [संगीत] हैं, उसने अपनी जिंदगी में दर्द की वो दास्तान जी है जिसे सुनकर दिल कांप उठता है। क्योंकि उनके पति ने सिर्फ उन्हें मारा पीटा ही नहीं बल्कि धक्के मारकर तब घर से बाहर निकाल दिया था जब वो अपने तीसरे बच्चे के साथ प्रेग्नेंट थी। आशा भोसले जब सिर्फ 16 साल की थी तब उन्होंने अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा फैसला ले लिया था घर छोड़कर के
शादी करने का। वो भी अपने से 15 साल बड़े आदमी से। दरअसल उस वक्त उनकी बड़ी बहन लता मंगेशकर कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ रही थी और लता दीदी के पर्सनल सेक्रेटरी हुआ करते थे गणपतराव भोसले। वैसे तो आशा जी का उनसे प्रोफेशनल रिश्ता होना चाहिए था। लेकिन इस मामूली सेक्रेटरी से आशा जी को प्यार हो गया था। पूरा मंगेशकर परिवार इस रिश्ते के सब खिलाफ था। क्योंकि वो तब सिर्फ 16 साल की थी और गणपत राव 31 साल के थे। पर प्यार में अंधी आशा जी ने एक रात चुपके से
घर छोड़ दिया और गणपत राव से जाकर के शादी कर ली थी। उनके इस फैसले से उनकी बहन लता मंगेशकर इतनी नाराज हुई थी कि उन्होंने आशा जी से बात तक करना छोड़ दिया था। आशा जी को लगा था कि उन्होंने जिस प्यार का हाथ थामा है वो उम्र भर उनका साथ निभाएगा और उनका रिश्ता प्यार की एक मिसाल [संगीत] बन जाएगा। लेकिन शादी के कुछ ही हफ्तों बाद असलियत सामने आने लगी। उनके पति के घर की हालत ठीक नहीं थी। उनके पति सिर्फ महीने के ₹100 कमाते थे जो उनके पूरे परिवार के लिए काफी नहीं था। इसलिए ससुराल वाले उनसे बहुत बुरा बर्ताव करते थे।
और यहीं से शुरू हुआ आशा जी की प्रताड़ना का वो दौर जो किसी नरक से कम नहीं था। बताया जाता है कि गणपत राव और उनके घर वाले बेहद रूहवादी और शक करने वाले थे। उन्हें आशा जी का गाना गाना बिल्कुल पसंद नहीं था। लेकिन पैसों की ऐसी लालसा थी कि वह आशा जी को काम पर भी भेजते थे और उन पर जुल्म भी करते थे। घर में पैसों की कमी इसलिए आशा जी के पास गाना गा के पैसे कमाने के अलावा कोई और चारा नहीं बचा था। आशा जी ने एक बार बताया था कि वो अपनी उस शादी में एक मशीन बन गई थी। वो सुबह 5:00 बजे उठती, रियाज करती, घर के [संगीत] लोगों के लिए खाना बनाती, घर के सारे काम करती और फिर अपने महज एक महीने के बच्चे को घर परोता हुआ छोड़ कर के रिकॉर्डिंग के लिए जाती थी।
क्योंकि अगर वह पैसे कमा करके नहीं लाती थी तो घर में कोहरा मच जाता था। उनके साथ मारपीट की जाती थी और घरेलू हिंसा भी होती थी। इतने संघर्ष के बावजूद भी धीरे-धीरे उनका यह रिश्ता खराब होने लगा। उन्होंने खुद बताया था कि शादी में मारपीट और बुरा व्यवहार तो होता ही था। प्रताड़ना लेकिन इस कदर बढ़ गई थी कि उनके पति उन पर हर वक्त शक करते थे। उन्हें मारा पीटा करते थे। इस रिश्ते की हद तो तब हो गई जब साल 1960 में आशा जी अपने तीसरे बच्चे के साथ प्रेग्नेंट थी और उस हालात में उनके ऊपर रहम भी नहीं किया गया। उनके पति और उसके घर वालों ने आशा जी को दो छोटे बच्चों के साथ कोख में पल रही जान के साथ आधी रात को धक्के मार के घर से निकाल दिया था। उस रात आशा जी के पास सर छुपाने को छत नहीं थी।
ना पैसे थे, वह सड़क पर आ गई थी और जिस रिश्ते के लिए उन्होंने घर छोड़ा था, वह रिश्ता भी टूट गया था। लेकिन उनके मायके वालों ने फिर उन्हें अपना लिया। वो वापस अपने मायके आई और वहीं उन्होंने अपने बच्चों को पालना शुरू किया। वो अपने बच्चों की परवरिश के लिए कमाने लगी। लेकिन उस दशक में हिंदी सिनेमा का दौर बदल रहा था और बोल्ड गाने लव सॉन्ग्स की जगह ले रहे थे। इस दौरान कई लोगों ने आशा जी से ऐसा भी कहा कि क्या तुम इस तरह के गाने गाओगी जिस पर वह जवाब देती थी कि मैं अपनी खुशी के लिए नहीं गा रही बल्कि अपने बच्चों को पालने के [संगीत] लिए गा रही हूं। और इस दौर के बाद उन्होंने हिंदी सिनेमा को ऐसे बेहतरीन गाने दिए जिन्हें आज भी हर कोई सुनना पसंद करता है। यह मेरा दिल आओ हुजूर तुमको दम मारो दम। यह सभी उस दौर के गाने हैं जो आज भी हम याद करते हैं। आज भले ही आशा ताई हमारे [संगीत] बीच नहीं है लेकिन उनकी यह कहानी हर उस महिला के लिए एक मिसाल है जो जुल्म सहकर भी फिर से उठ खड़ी होती है और अपनी मेहनत से पूरी दुनिया को अपना दीवाना बना देती है।