जब हम किसी मृत शरीर को देखते हैं, किसी ऐसे इंसान को जिसे हम कल तक जानते थे जो कल तक हमारे साथ हंस रहा था, बात कर रहा था और आज वह एक सफ़ेद कफ़न में लिपटा हुआ बिल्कुल शांत पड़ा है। उस दृश्य में एक चीज ऐसी होती है जो हमारा ध्यान अपनी तरफ खींचती है। एक बहुत ही छोटी सी चीज लेकिन बहुत अजीब। हम देखते हैं कि उस मृत शरीर के नाक के दोनों छेदों में और कानों में सफेद रुई ठूंसी हुई है। बचपन से हम यह देखते आ रहे हैं। हमारे बुजुर्ग कहते हैं कि यह रस्म है। यह जरूरी है। हम चुपचाप मान लेते हैं। हम सवाल नहीं करते। उस दुख के माहौल में सवाल करने की हिम्मत भी किस में होती है?
हमें लगता है कि शायद यह कोई मेडिकल प्रक्रिया होगी या शायद यह शरीर को साफ रखने का कोई तरीका होगा। लेकिन क्या आपने कभी उस सन्नाटे में उस सफेद रुई के पीछे छिपे गहरे काले और खौफनाक सच को जानने की कोशिश की है? क्या यह सिर्फ सफाई के लिए है? या फिर उस रुई का काम एक ऐसे दरवाजे को बंद करना है जिसे अगर खुला छोड़ दिया गया तो मरने वाले की आत्मा कभी मुक्त नहीं हो पाएगी। या उससे भी बुरा? क्या उस खुले दरवाजे से कोई दूसरी, कोई बाहरी और भयानक शक्ति उस खाली शरीर में प्रवेश कर सकती है?
गरुड़ पुराण और हमारे प्राचीन तंत्र शास्त्र इस छोटी सी रुई के बारे में जो खुलासे करते हैं, वह किसी भी इंसान की रूह को अंदर तक कंपाने के लिए काफी है। आज के इस वीडियो में हम विज्ञान और अध्यात्म दोनों के नजरिए से इस रहस्य को डिकोड करेंगे। आज हम जानेंगे कि आखिर मरने के तुरंत बाद शरीर के छिद्रों को लॉक करना क्यों जरूरी होता है। अगर किसी शव के नाक कान में रुई नहीं डाली गई तो उसके साथ क्या अनहोनी हो सकती है और इसके पीछे वह कौन सा गुप्त विज्ञान है जिसे हमारे पूर्वज हजारों साल पहले समझ चुके थे। कुर्सी की पेटी बांध लीजिए क्योंकि यह जानकारी आपको किसी स्कूल या कॉलेज की किताब में नहीं मिलेगी। यह ज्ञान श्मशान की राख और पुराने ग्रंथों के पन्नों में दबा हुआ है जिसे आज हम आपके सामने रखने जा रहे हैं।
सबसे पहले बात करते हैं उस पहलू की जिसे हम अपनी नंगी आंखों से देख सकते हैं। यानी विज्ञान और जीव विज्ञान। जब एक इंसान की मौत होती है तो हमें लगता है कि सब कुछ खत्म हो गया। दिल धड़कना बंद हो गया। दिमाग ने काम करना बंद कर दिया। लेकिन शरीर के अंदर एक बहुत बड़ी उथल-पुथल शुरू हो जाती है। मौत एक घटना नहीं बल्कि एक प्रक्रिया है। जैसे ही प्राण शरीर से निकलते हैं, शरीर का रक्षा तंत्र यानी इम्यून सिस्टम पूरी तरह फेल हो जाता है। हमारे शरीर के अंदर अरबों कीटाणु होते हैं जो जिंदा रहते वक्त हमारे दोस्त होते हैं। खाना पचाने में मदद करते हैं। लेकिन मौत के बाद वही कीटाणु गद्दार बन जाते हैं। वह शरीर को अंदर से खाना शुरू कर देते हैं। इसे डीकंपोजशन या अपघटन कहते हैं। और इस प्रक्रिया में शरीर के अंदर तरह-तरह की जहरीली गैसें बनने लगती हैं। मीथेन और हाइड्रोजन सल्फाइड जैसी गैसें शरीर के अंगों को फुलाने लगती है।
जिंदा इंसान के शरीर में मांसपेशियां होती हैं जो हर दरवाजे को कंट्रोल करती हैं। हमारी नाक, हमारे कान, हमारा मल मूत्र मार्ग, सब कुछ मांसपेशियों के नियंत्रण में होता है। हम जब चाहे सांस रोक सकते हैं। जब चाहे मुंह बंद कर सकते हैं। लेकिन मरने के बाद एक अवस्था आती है जिसे प्राइमरी रिलैक्सेशन कहते हैं। सारी मांसपेशियां ढीली पड़ जाती हैं। शरीर का नियंत्रण खत्म हो जाता है। सारे वाल्व खुल जाते हैं। अब जरा सोचिए अंदर गैस बन रही है। दबाव बढ़ रहा है और बाहर के दरवाजे खुले हैं तो क्या होगा? शरीर के अंदर मौजूद तरल पदार्थ जिसे मेडिकल भाषा में पर्ज फ्लूइड कहते हैं वो बाहर निकलने की कोशिश करेगा। यह कोई साधारण पानी नहीं होता। यह सड़े हुए खून, पित्त, आंतों के रस और गले हुए अंगों का एक बदबूदार मिश्रण होता है। अगर नाक और कान खुले रह गए तो यह डरावना और बदबूदार द्रव्य वहां से रिसने लगेगा। गुरुत्वाकर्षण के कारण अगर शव लेटा हुआ है तो पेट और फेफड़ों का पानी ऊपर की तरफ आता है और नाक या मुंह से बाहर गिर सकता है। जरा कल्पना कीजिए उस दृश्य की।
एक परिवार अपने प्रियजन के अंतिम दर्शन कर रहा है। वह उसका चेहरा याद रखना चाहते हैं। वह उसे चूमना चाहते हैं। लेकिन अगर उस चेहरे से नाक से खून और मवाद बह रहा हो तो यह उस परिवार के लिए कितना गहरा सदमा होगा। वह जिंदगी भर उस डरावने चेहरे को भुला नहीं पाएंगे। उनकी यादों में उस व्यक्ति की सौम्य तस्वीर की जगह यह भयानक तस्वीर छप जाएगी। इसलिए विज्ञान कहता है कि रुई एक डांट या प्लग का काम करती है। यह उस रिसाव को रोकती है। यह सुनिश्चित करती है कि अंतिम यात्रा के दौरान शरीर की गरिमा बनी रहे। चेहरा शांत और साफ दिखे। यह एक तरह का फिजिकल बैरियर है
जो अंदर की गंदगी को अंदर ही रोकता है। लेकिन दोस्तों विज्ञान की बात यहीं खत्म नहीं होती। एक और खतरा है जो बाहर से आता है और यह खतरा बहुत ही घिनौना है। जैसे ही जीवन खत्म होता है शरीर से एक विशेष प्रकार की गंध निकलती है। हम इंसान शायद उसे तुरंत महसूस ना कर पाएं क्योंकि हमारी सूंघने की शक्ति सीमित है। लेकिन प्रकृति के सफाई कर्मचारी यानी मक्खियां और कीड़े उसे मीलों दूर से सूंघ लेते हैं। खासकर एक मक्खी होती है जिसे ब्लो फ्लाई कहते हैं। यह मौत की गंध को सबसे पहले पकड़ती है। यह कीड़े किसी खाली घर की तलाश में होते हैं जहां वह अपने अंडे दे सकें और एक मृत शरीर उनके लिए सबसे सुरक्षित और पौष्टिक जगह होती है। नाक और कान के छेद उनके लिए सीधे प्रवेश द्वार हैं। वहां अंधेरा है, नमी है और सीधा रास्ता शरीर के अंदर तक जाता है।
अगर इन छेदों को बंद नहीं किया गया तो मौत के कुछ ही मिनटों या घंटों के बाद सैकड़ों मक्खियां वहां घुस सकती हैं और अंडे दे सकती हैं और आप कल्पना भी नहीं कर सकते कि यह कितनी तेजी से होता है। कुछ ही घंटों में वो अंडे लार्वा बन जाते हैं और बाहर से शांत दिखने वाला शरीर अंदर से कीड़ों का घर बन जाता है। रुई उन कीड़ों के लिए एक दीवार है। यह शरीर की पवित्रता को बचाए रखने का एक भौतिक तरीका है। यह उस शरीर को प्रकृति के इन हमलावरों से कुछ समय के लिए सुरक्षित रखता है जब तक कि उसका अंतिम संस्कार ना हो जाए। लेकिन जैसा कि द आर के नॉलेज के हर वीडियो में हम आपको बताते हैं।
हमारे पूर्वजों के हर नियम के पीछे सिर्फ विज्ञान नहीं होता। विज्ञान तो बस ऊपरी परत है। असली राज्य तो उसके नीचे अध्यात्म और ऊर्जा विज्ञान की गहराइयों में छिपा होता है। गरुड़ पुराण जो मृत्यु के बाद की दुनिया का Google मैप है वो हमें एक बिल्कुल अलग ही कहानी बताता है। एक ऐसी कहानी जो आत्मा, ऊर्जा और ब्रह्मांडीय यात्रा से जुड़ी है। गरुड़ पुराण के अनुसार मानव शरीर कोई मांस का लोथड़ा नहीं है। यह एक मंदिर है, एक नगर है और इस नगर में नौ दरवाजे हैं। जी हां, नौ मुख्य द्वार। शास्त्रों में इसे नवद्वार पूरी कहा गया है। यह नौ द्वार हैं। दो आंखें, दो कान, दो नाक के छिद्र, एक मुंह और दो नीचे के रास्ते यानी मल और मूत्र मार्ग। जब तक हम जिंदा हैं, प्राण ऊर्जा यानी हमारी आत्मा इन्हीं दरवाजों से दुनिया के संपर्क में रहती है। हम आंखों से देखते हैं, कानों से सुनते हैं, नाक से सांस लेते हैं, मुंह से बोलते हैं। यह ऊर्जा का आदानप्रदान लगातार चलता रहता है।
लेकिन जब मौत का वक्त आता है, जब किराए का यह मकान खाली करने का समय आता है, तो आत्मा को इन्हीं में से किसी एक दरवाजे से बाहर निकलना होता है। लेकिन यहां एक बहुत बड़ा पेंच है। आत्मा किस दरवाजे से निकलती है। यह तय करता है कि उसकी अगली यात्रा कैसी होगी। उसका अगला जन्म कैसा होगा। शास्त्रों में स्पष्ट लिखा है कि अगर आत्मा नीचे के द्वारों से निकलती है यानी मल मूत्र मार्ग से तो वह अधोगति को प्राप्त होती है यानी उसे नर्क या नीच योनियों में जाना पड़ता है। यह उन लोगों के साथ होता है जो जीवन भर वासना और पाप में लिप्त रहे। अगर आत्मा मुंह से निकलती है तो इसका मतलब है कि उसका मोह खानेपीने या बोलने में बहुत ज्यादा था। उसे प्रेत योनि या भटकने वाली अवस्था मिल सकती है। सबसे श्रेष्ठ निकास सबसे उत्तम एग्जिट गेट कौन सा है? वह है दसवां द्वार जो इन नौ दरवाजों से अलग है। इसे ब्रह्मरंद्र कहते हैं। यह हमारे सिर के सबसे ऊपरी हिस्से में तालू के ठीक ऊपर होता है। यह वह जगह है जहां बचपन में हमारा सिर नरम होता है। योगियों और तपस्वीयों के प्राण हमेशा इसी ब्रह्म रंद्र को तोड़कर निकलते हैं।
इसे मोक्ष का द्वार माना जाता है। जो आत्मा यहां से निकलती है, वह सीधे उच्च लोकों में जाती है। अब आप पूछेंगे कि इसका रुई से क्या संबंध है? संबंध बहुत गहरा है। मरने के बाद शरीर के अंदर जो प्राण वायु बची होती है, जो सूक्ष्म ऊर्जा बची होती है, वह बाहर निकलने के लिए छटपटाती है। वो रास्ता ढूंढती है। हमारी कोशिश और हमारे धर्म का उद्देश्य यह होता है कि वो ऊर्जा गलत रास्तों से ना निकले। वो नीचे के रास्तों से ना निकले। वो नाक या कान से ना निकले। बल्कि वह ऊपर की ओर बढ़े और ब्रह्मरंद्र को धक्का दे। इसीलिए जैसे ही किसी की मौत होती है, सबसे पहले उसके मल मूत्र मार्ग को धोकर कपड़े से कसकर बंद किया जाता है।
उसके बाद नाक और कानों में रुई डाली जाती है। मुंह को बंद कर दिया जाता है। यह सिर्फ लीकेज रोकने के लिए नहीं है। यह एक आध्यात्मिक ट्रैफिक डायवर्जन है। हम उन आसान रास्तों को ब्लॉक कर रहे हैं। हम उन दरवाजों पर ताला लगा रहे हैं। ताकि जब बची खुची आत्मा या प्राण वायु बाहर निकलने की कोशिश करे तो उसे नाक बंद मिले, कान बंद मिले, मुंह बंद मिले। और उसके पास सिर्फ एक ही रास्ता बचे। ऊपर का रास्ता सिर का रास्ता। यही कारण है कि अंतिम संस्कार के समय कपाल क्रिया की जाती है। जिसका जिक्र हमने पिछले वीडियो में किया था। सिर पर डंडा मारकर हम उस आखिरी दरवाजे को भी खोल देते हैं ताकि फंसी हुई आत्मा वहां से मुक्त हो सके। तो नाक और कान की रुई उस आत्मा को सही दिशा दिखाने का उसे मोक्ष की तरफ धक्का देने का एक तंत्र है। यह आत्मा को भ्रमित होने से बचाता है। लेकिन दोस्तों कहानी अभी भी पूरी नहीं हुई है। अब हम उस हिस्से की तरफ बढ़ते हैं जो सबसे ज्यादा डरावना और रहस्यमई है।
तंत्र शास्त्र और ब्लैक मैजिक का नजरिया। तंत्र विज्ञान कहता है कि यह ब्रह्मांड कभी भी खालीपन को पसंद नहीं करता। जहां भी खाली जगह होती है, वहां कोई ना कोई शक्ति उसे भरने के लिए दौड़ पड़ती है। एक मृत शरीर क्या है? यह एक खाली घर है। एक ऐसा पात्र है जो खाली हो चुका है। उसका मालिक उसे छोड़कर जा चुका है। लेकिन दरवाजे खुले पड़े हैं। श्मशान घाट, मरघट और यहां तक कि वह कमरा जहां शव रखा है। वहां सिर्फ इंसानी दुनिया के लोग नहीं होते। वहां एक अदृश्य दुनिया भी मौजूद होती है। हजारों अतृप्त आत्माएं, पिशाच और नकारात्मक शक्तियां जो शरीर की तलाश में भटक रही हैं। उन्हें मुक्ति नहीं चाहिए। उन्हें भोग चाहिए। उन्हें एक माध्यम चाहिए जिसके जरिए वह फिर से भौतिक सुख भोग सकें। उन्हें एक शरीर चाहिए।
एक ताजा मृत शरीर उनके लिए सोने की खान जैसा होता है क्योंकि उस शरीर के सारे तंत्र अभी भी काम कर सकते हैं। बस उसमें ड्राइवर नहीं है। अगर शरीर के द्वार खुले हैं अगर नाक खुली है, मुंह खुला है, कान खुले हैं, तो यह उन शक्तियों के लिए एक खुला निमंत्रण है। आओ यह घर खाली है। इस पर कब्जा कर लो। आप सोचेंगे कि कब्जा करके क्या होगा? शरीर तो मर चुका है। तंत्र कहता है कि अगर कोई बुरी शक्ति उस शव में प्रवेश कर गई तो वह शव पिशाच बन सकता है। वह बेताल बन सकता है। आपने कई लोक कथाओं में सुना होगा कि लाश उठ बैठी या लाश में हरकत होने लगी। वैज्ञानिक इसे मांसपेशियों का खिंचाव कह सकते हैं। लेकिन तांत्रिक इसे प्रकाया प्रवेश कहते हैं। एक मृत शरीर पर अगर किसी गलत शक्ति का कब्जा हो जाए तो वह उस परिवार के लिए विनाशकारी हो सकता है। वह उस शरीर की बची हुई ऊर्जा का इस्तेमाल करके जीवित लोगों को नुकसान पहुंचा सकती है। इसीलिए रुई डालना एक तांत्रिक सुरक्षा कवच है। प्राचीन काल में और आज भी कई जगहों पर उस रुई को मंत्रों से अभिमंत्रित किया जाता है।
कभी-कभी उस रुई को पवित्र जल या गंगाजल में भिगोकर डाला जाता है। यह एक सील है। एक लॉक है। यह घोषणा है। कि यह शरीर अब उपयोग के लिए उपलब्ध नहीं है। इसका उपयोग खत्म हो चुका है। नाक और कान बंद करके हम बाहरी दुनिया और उस शरीर के बीच का संपर्क पूरी तरह काट देते हैं। हम यह सुनिश्चित करते हैं कि ना तो अंदर की चीज बाहर आए और ना ही बाहर की कोई अनजान चीज अंदर जाए। यह एक तरह की आध्यात्मिक घेराबंदी है। एक और बहुत ही दिलचस्प पहलू है जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। सोना यानी गोल्ड का महत्व। आपने देखा होगा कि कई अमीर परिवारों में या पुराने रीति रिवाजों में नाक और कान में सिर्फ रुई नहीं बल्कि सोने के छोटे टुकड़े या मनके भी डाले जाते हैं और मुंह में तुलसी का पत्ता और गंगाजल डाला जाता है। रुई के साथ सोना क्यों? क्या यह अमीरी दिखाने के लिए है? नहीं। अध्यात्म और ज्योतिष के अनुसार सोना एक बहुत ही शुद्ध और उच्च ऊर्जा वाली धातु है। यह गुरु ग्रह यानी बृहस्पति का प्रतीक है। सोना कभी जंग नहीं खाता।
वह हमेशा शुद्ध रहता है। कहा जाता है कि सोने में वातावरण को शुद्ध करने की ताकत होती है। जब शरीर के छिद्रों में सोना रखा जाता है तो वह उन द्वारों पर एक पहरेदार का काम करता है। सोना नकारात्मक ऊर्जा को दूर भगाता है। अगर कोई बुरी शक्ति प्रवेश करने की कोशिश करती है तो सोने का तेज उसे रोक देता है। यह एक एंटीवायरस की तरह काम करता है। इसके अलावा तुलसी का पत्ता भगवान विष्णु को प्रिय है। गरुड़ पुराण कहता है कि जिस मुख में तुलसी होती है, यमदूत उसे हाथ लगाने से भी डरते हैं। तुलसी और गंगाजल शरीर को अंदर से पवित्र करते हैं और रुई और सोना उसे बाहर से सुरक्षित करते हैं। इसीलिए नाक और कान में तुलसी और सोना रखना उस आत्मा के लिए एक वीआईपी पास की तरह होता है। यह यमराज के दूतों को संकेत देता है कि यह व्यक्ति एक पवित्र आत्मा है। इसकी रक्षा की जानी चाहिए। अब जरा मनोविज्ञान यानी साइकोलॉजी की बात करते हैं। मौत के बाद का मनोविज्ञान जो लोग पीछे छूट गए हैं जो परिवार वाले रो रहे हैं उनके लिए यह दृश्य बहुत मायने रखता है।
जब हम किसी को अंतिम विदाई देते हैं तो हम चाहते हैं कि वह सोते हुए लगे। हम चाहते हैं कि उनके चेहरे पर शांति हो। खुला हुआ मुंह, फटी हुई आंखें या नाक से बहता हुआ द्रव्य यह दृश्य बहुत ही विचलित करने वाला होता है। यह बच्चों को डरा सकता है। कमजोर दिल वालों को बीमार कर सकता है। हमारे बुजुर्गों ने यह नियम इसलिए भी बनाए ताकि मरने वाले की एक सुंदर छवि हमारे मन में रहे। जब नाक और कान बंद होते हैं, मुंह को जबड़े के नीचे कपड़ा बांधकर बंद किया जाता है। आंखें बंद की जाती हैं, तो ऐसा लगता है कि वह व्यक्ति बस गहरी नींद में सो रहा है। यह सोते हुए वाली छवि परिवार को सांत्वना देती है। यह उन्हें यह स्वीकार करने में मदद करती है कि अब यह व्यक्ति आराम कर रहा है। उसके कष्ट खत्म हो चुके हैं। अगर शरीर की हालत खराब दिखे तो परिवार का दुख डर में बदल सकता है और डर कभी भी विदाई के लिए अच्छा नहीं होता। एक और गहरा सवाल जो अक्सर लोग पूछते हैं क्या हर किसी के नाक कान में रुई डाली जाती है?
ज्यादातर हां लेकिन साधु संतों की समाधि के वक्त नियम बदल जाते हैं। आपने देखा होगा कि जब किसी महान संत या योगी का शरीर छूटता है तो उन्हें जलाया नहीं जाता। उन्हें भू समाधि या जल समाधि दी जाती है और अक्सर उनके शरीर के छिदों को उस तरह बंद नहीं किया जाता जैसे आम इंसान का किया जाता है। क्यों? क्योंकि माना जाता है कि योगी ने अपने जीवन काल में ही अपने शरीर के नौ द्वारों पर विजय प्राप्त कर ली थी। उसने जीते जी अपनी प्राण वायु को नियंत्रित कर लिया था। उसने अपनी मर्जी से समाधि अवस्था में अपने प्राण त्यागे हैं। उसकी आत्मा को रास्ता दिखाने की जरूरत नहीं है। उसे पता है कि ब्रह्मरंद्र कहां है। वह पहले ही वहां से निकल चुकी है। योगी का शरीर खाली घर नहीं होता। वह एक सिद्ध मंदिर होता है। वहां भूतों या पिशाचों का डर नहीं होता। क्योंकि उस शरीर का तेज ही इतना ज्यादा होता है कि नकारात्मक शक्तियां उसके पास फटक भी नहीं सकती।
इसीलिए आम इंसान के लिए जो नियम सुरक्षा कवच है एक सिद्ध योगी के लिए उसकी जरूरत नहीं होती। इसके अलावा एक और छोटी लेकिन महत्वपूर्ण बात है आवाज की। जब शरीर को जलाया जाता है तो अंदर की गैसें फैलती हैं। अगर सारे छेद बंद हो और ब्रह्मरंद्र ना खुले तो कभी-कभी शरीर में विस्फोट जैसी आवाज हो सकती है या अजीब तरह की सीटी बजने जैसी आवाज आ सकती है। पुराने जमाने में लोग इसे अपशकुन मानते थे। उन्हें लगता था कि आत्मा रो रही है। रुई और बंधन गैसों के निकलने की प्रक्रिया को थोड़ा धीमा और नियंत्रित करते हैं। हालांकि पूरी तरह नहीं। लेकिन यह प्रक्रिया को थोड़ा कम डरावना बनाते हैं। तो दोस्तों, अगली बार जब आप किसी अंतिम संस्कार में जाएं और उस शांत चेहरे को देखें, उस नाक और कान में लगी सफेद रुई को देखें, तो उसे सिर्फ एक डॉक्टर की पट्टी मत समझिएगा। समझिएगा कि वह रुई एक सीमा रेखा है। जीवन और मृत्यु के बीच की रेखा इस लोक और उस लोक के बीच की दीवार वह एक छोटी सी रुई उस आत्मा की गरिमा उसकी सुरक्षा और उसकी मुक्ति की गारंटी है। वह इस बात का सबूत है कि हमारे पूर्वज शरीर के विज्ञान को भी जानते थे और आत्मा के भूगोल को भी। वो जानते थे कि मौत अंत नहीं बल्कि एक नए सफर की शुरुआत है और हर सफर के लिए तैयारी जरूरी है। जैसे हम घर से निकलते वक्त ताला लगाते हैं वैसे ही शरीर से निकलते वक्त भी ताला लगाना जरूरी है। वरना कोई और घर में घुस सकता है या घर की गुप्त बातें बाहर आ सकती हैं। गरुड़ पुराण की यह बातें हमें डराने के लिए नहीं है। यह हमें जागरूक करने के लिए है। यह हमें बताती हैं कि मानव शरीर एक बहुत ही जटिल यंत्र है। इसका संचालन सिर्फ भोजन और पानी से नहीं बल्कि प्राण और ऊर्जा से होता है।
और जब वो ऊर्जा निकलती है तो उस यंत्र को सही तरीके से शट डाउन करना हमारी जिम्मेदारी है। एक और बात यह रुई हमें यह भी याद दिलाती है कि हमारी इंद्रियां जिन पर हमें इतना घमंड है। हमारा सुनना, हमारा सूंघना यह सब अस्थाई हैं। एक दिन इन कानों में संगीत नहीं रुई होगी। एक दिन इस नाक में फूलों की खुशबू नहीं रुई होगी। यह विचार ही हमारे अहंकार को तोड़ने के लिए काफी है। आप इस बारे में क्या सोचते हैं? क्या आपने कभी अंतिम संस्कार के दौरान किसी अजीब घटना का अनुभव किया है? क्या कभी ऐसा हुआ कि शरीर के साथ कुछ ऐसा हुआ हो जो विज्ञान के नियमों से परे हो? क्या आपके क्षेत्र में, आपके रीति-रिवाजों में इसके अलावा भी कोई और वजह बताई जाती है? नीचे कमेंट्स में अपनी राय और अपने अनुभव जरूर शेयर करें। आपका ज्ञान हमारे और बाकी दर्शकों के लिए बहुत कीमती है। हम हर कमेंट को पढ़ते हैं और उस पर विचार करते हैं। उम्मीद है कि मरने के बाद के इस रहस्य से पर्दा उठाने की हमारी यह कोशिश आपको पसंद आई होगी। हमने कोशिश की कि आपको अंधविश्वास से निकालकर तर्क और विज्ञान की रोशनी में ले जाएं।
लेकिन याद रखिए दुनिया में अभी भी बहुत से ऐसे रहस्य हैं जो हमारी समझ से परे हैं। मृत्यु का दरवाजा एक ऐसा दरवाजा है जिसके उस पार क्या है यह कोई पक्के तौर पर नहीं कह सकता। हम सिर्फ अनुमान लगा सकते हैं और अपने ग्रंथों पर विश्वास कर सकते हैं। अब बारी आपकी है। दी आरकेन नॉलेज का अगला वीडियो किस टॉपिक पर होना चाहिए? क्या आप आत्माओं की दुनिया के बारे में जानना चाहते हैं? क्या आप जानना चाहते हैं कि पितृदोष असल में क्या होता है? और यह हमारी जिंदगी को कैसे बर्बाद करता है? या फिर आप जानना चाहते हैं कि मरने के बाद 13 दिनों तक घर में क्या घटता है या
अपने परिवार के साथ क्योंकि मृत्यु का ज्ञान ही हमें जीवन की कीमत समझाता है। जो लोग मौत से डरते हैं वह जिंदगी से भी डरते हैं और जो मौत को समझ लेते हैं वह जिंदगी को जी लेते हैं। द आरकेन नॉलेज को सब्सक्राइब करें और बेल आइकन दबाएं ताकि जब हम अगला राज खोलें तो सबसे पहले आपको पता चले। हम यहां अंधेरे में नहीं जीते। हम अंधेरे को चीर कर रोशनी लाते हैं। तब तक के लिए सुरक्षित रहें। अपने कर्मों पर ध्यान दें और याद रखें अंत में सिर्फ दो ही चीजें साथ जाएंगी।