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दिव्या भारती के जाने के बाद जब सेट पर हुआ ऐसा करिश्मा— सहम उठा पूरा बॉलीवुड!

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5 अप्रैल 1993, मुंबई की एक मनहूस रात। वर्सोवा में एक पांच मंजिला इमारत, एक खुली खिड़की और जमीन पर गिरती हुई एक 19 साल की लड़की। उस लड़की का नाम था दिव्या भारती।महज दो साल का फिल्मी करियर, लेकिन एक ऐसा उथल-पुथल भरा दौर कि बॉलीवुड की बड़ी-बड़ी हीरोइनों को भी अपनी कुर्सी हिलती हुई नजर आने लगी थी। ऐसा लगने लगा था कि आने वाले दशक में अकेले वही राज करेंगी। लेकिन उस एक रात ने सब कुछ बदल कर रख दिया। न सिर्फ एक जिंदगी खत्म हुई, बल्कि दर्जनों फिल्में अधूरी रह गईं। करोड़ों रुपये दांव पर लग गए। प्रोड्यूसर्स की रातों की नींद उड़ गई और बॉलीवुड में ऐसा कोहराम मचा जो पहले कभी नहीं देखा गया था।हादसे के महज 48 घंटों के भीतर हिंदी सिनेमा के इतिहास का सबसे बड़ा कास्टिंग फेरबदल शुरू हुआ। एक के बाद एक फिल्में नए चेहरों के पास जाने लगीं। किरदार बदले, गाने बदले और कई सितारों की किस्मत हमेशा के लिए बदल गई। लेकिन जरा सोचिए, अगर 5 अप्रैल 1993 की वह रात कभी न आई होती, तो क्या आज बॉलीवुड वैसा होता जैसा हम जानते हैं?आज हम उसी अधूरी दुनिया में एक सफर करेंगे। उन फिल्मों की जो शुरू तो दिव्या भारती के साथ हुईं लेकिन खत्म किसी और के साथ हुईं। उन किरदारों की जिन्होंने नए सितारों को जन्म दिया और उन फैसलों की जिन्होंने 90 के दशक में बॉलीवुड के इतिहास को हमेशा के लिए बदल दिया। यह सिर्फ एक अभिनेत्री की कहानी नहीं है; यह उस बॉलीवुड की कहानी है जो बनते-बनते हमेशा के लिए बदल गया।इस सफर की पहली फिल्म थी ‘लाडला’।

दिव्या भारती फिल्म ‘लाडला’ की लगभग 90 फीसदी शूटिंग कर चुकी थीं, लेकिन अचानक उनके निधन ने सबको झकझोर दिया. मेकर्स ने श्रीदेवी के साथ फिल्म की दोबारा शूटिंग शुरू की. दिव्या भारती के गुजरने के करीब छह महीने बाद श्रीदेवी औरंगाबाद में एक सीन शूट कर रही थीं, तभी अचानक एक घटना घटी. रवीना टंडन के साथ सेट पर मौजूद सभी लोग हैरान रह गए और गायत्री मंत्र का जाप करने लगे. रवीना टंडन ने एक इंटरव्यू में इस पूरी घटना के बारे में विस्तार से बताया था.श्रीदेवी और दिव्या भारती में काफी समानताएं थीं. दोनों न सिर्फ दिखने में एक जैसी थीं, बल्कि टैलेंट में भी एक-दूसरे को टक्कर देती थीं. श्रीदेवी ने स्क्रिप्ट सुनने के बाद फिल्म के लिए हामी भर दी. फिल्म के लेखक अनीस बज्मी ने एक इंटरव्यू में बताया था कि दिव्या को खोने और फिल्म के अधूरे रहने की वजह से निर्माता सहित कास्ट और क्रू दुखी थे. मैं डायरेक्टर राज कंवल और प्रोड्यूसर नितिन मोहन के साथ बैठा और श्रीदेवी की एक्टिंग क्षमता के अनुरूप कई सीन दोबारा लिखे.

आज जब भी दिव्या भारती की अधूरी फिल्मों का जिक्र होता है, तो इस फिल्म का नाम सबसे पहले लिया जाता है। वजह साफ थी। फिल्म अपने आखिरी चरण में पहुंच चुकी थी। दिव्या भारती अपने ज्यादातर अहम सीन शूट कर चुकी थीं। ‘शीतल जेटली’ का किरदार सिर्फ कागजों पर नहीं, बल्कि कैमरे में कैद हो चुका था। अनिल कपूर के साथ उनके आमने-सामने के सीन, बड़े ड्रामेटिक मोमेंट्स और कई अहम हिस्से शूट किए जा चुके थे।शायद ही किसी ने सोचा होगा कि पूरी फिल्म को नए सिरे से बनाना पड़ेगा। लेकिन हालातों ने मेकर्स के पास कोई और विकल्प नहीं छोड़ा। काफी विचार-विमर्श के बाद यह जिम्मेदारी श्रीदेवी को सौंपी गई। उनके सामने सिर्फ एक किरदार निभाने की चुनौती नहीं थी, बल्कि एक ऐसे चरित्र को दोबारा जीने की जिम्मेदारी थी जिसे दर्शकों ने अभी तक देखा नहीं था।यह तय किया गया कि पहले शूट किए गए पूरे हिस्से को डिलीट कर दिया जाए और फिर से शूटिंग शुरू की जाए। रीशूट के दौरान एक ऐसी घटना घटी जिसकी गूंज आज भी फिल्म इंडस्ट्री में सुनाई देती है।

एक ऑफिस का सीन शूट किया जा रहा था। कैमरा चालू हुआ और श्रीदेवी ने एक डायलॉग बोलना शुरू किया लेकिन एक ही शब्द पर अटक गईं। एक रीटैक, दूसरा रीटैक, तीसरा और देखते ही देखते छह रीटैक हो गए।सेट पर मौजूद लोग हैरान थे, क्योंकि श्रीदेवी जैसी कलाकार के लिए ऐसा होना बेहद असामान्य माना जाता था। तभी शक्ति कपूर ने धीरे से बोलते हुए याद दिलाया कि कुछ महीने पहले इसी सीन को शूट करते समय दिव्या भारती भी इसी लाइन पर कई बार अटकी थीं। यह सुनकर सेट का माहौल बदल गया। कुछ लोगों ने इसे महज एक इत्तेफाक माना, तो कुछ इसे बॉलीवुड की सबसे रहस्यमयी घटनाओं में से एक मानते हैं।कहा जाता है कि कुछ देर के लिए शूटिंग रोक दी गई, एक पूजा रखी गई और उसके बाद ही वह सीन आखिरकार पूरा हुआ। आज भी जब ‘लाडला’ का जिक्र होता है, तो फिल्म की सफलता के साथ-साथ इस अधूरे अध्याय को भी उतनी ही शिद्दत से याद किया जाता है। दर्शकों ने श्रीदेवी की शानदार परफॉर्मेंस देखी। लेकिन सवाल यह है कि अगर यह किरदार दिव्या भारती ने निभाया होता, तो इसका असर कितना अलग होता?अगर मैं आपसे पूछूं कि रवीना टंडन को ‘मस्त-मस्त गर्ल’ किसने बनाया, तो ज्यादातर लोग सीधे जवाब देंगे— “मोहरा: तू चीज बड़ी है मस्त-मस्त”। यह गाना रिलीज होते ही नेशनल हिट बन गया और रवीना टंडन का अंदाज ऐसा छाया कि उनका करियर नई ऊंचाइयों पर पहुंच गया।लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस फिल्म के लिए रवीना पहली पसंद नहीं थीं। ‘रोमा’ का किरदार दिव्या भारती को ध्यान में रखकर लिखा गया था।

उन्होंने फिल्म साइन कर ली थी और अक्षय कुमार के साथ शुरुआती शूटिंग भी पूरी कर ली थी। सब कुछ तय था, लेकिन तभी हालात बदल गए। दिव्या के जाने के बाद निर्देशक राजीव राय इतने टूट गए थे कि उन्होंने कुछ समय के लिए फिल्म को आगे बढ़ाने का विचार ही छोड़ दिया था। उनका मानना था कि जिस एनर्जी और स्क्रीन प्रेजेंस के साथ यह किरदार लिखा गया था, उसे दोबारा वैसा ही बना पाना मुश्किल होगा।लेकिन फिल्म रुक नहीं सकती थी क्योंकि करोड़ों रुपये दांव पर थे। आखिरकार, शूटिंग फिर से शुरू करने का फैसला किया गया और इस रोल के लिए रवीना टंडन को कास्ट किया गया। और बाकी इतिहास है। ‘मोहरा’ सुपरहिट साबित हुई। ‘तू चीज बड़ी है मस्त-मस्त’ ने रातों-रात रवीना टंडन को एक नई पहचान दी और उन्हें ‘मस्त-मस्त गर्ल’ का खिताब दिलाया।लेकिन इस सफलता के पीछे एक अधूरा पन्ना ऐसा छूट गया जिसका जवाब शायद कभी नहीं मिलेगा। अगर यह रोल दिव्या भारती को मिलता, तो क्या अक्षय कुमार और दिव्या भारती 90 के दशक की सबसे लोकप्रिय ऑन-स्क्रीन जोड़ियों में से एक होते? इस सवाल का जवाब शायद कभी न मिले। लेकिन एक बात पक्की है: ‘मोहरा’ सिर्फ एक सुपरहीट फिल्म नहीं थी, बल्कि उन फिल्मों में से भी एक थी जिसकी किस्मत ने आखिरी मोड़ पर एक बिल्कुल अलग रास्ता पकड़ लिया था।लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। ऐसे कई किरदार थे जो दिव्या भारती से जुड़े थे और बाद में बॉलीवुड की दूसरी अभिनेत्रियों के पास चले गए। 1994 में रिलीज हुईं दो बड़ी फिल्में— ‘दिलवाले’ और ‘विजयपथ’ इसी सिलसिले का हिस्सा थीं।जब ‘दिलवाले’ के निर्देशक हैरी बावेजा ने इस रोमांटिक ड्रामा की योजना बनाई, तो अजय देवगन के गुस्से और सुनील शेट्टी के कड़े तेवर के बीच ‘सपना’ का भोला-भाला और सहमा हुआ किरदार दिव्या भारती को ध्यान में रखकर गढ़ा गया था। दिव्या ने फिल्म के लिए अपनी डेट्स भी पक्की कर ली थीं, लेकिन उनके अचानक निधन के बाद यह रोल रवीना टंडन के हिस्से में आ गया।फिर आई ‘विजयपथ’। आज भी जब हम “रुक रुक रुक अरे बाबा रुक” लाइन्स सुनते हैं, तो सबसे पहले तब्बू का चेहरा सामने आता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस फिल्म के लिए मेकर्स की पहली पसंद तब्बू नहीं, बल्कि दिव्या भारती थीं। कॉस्ट्यूम ट्रायल पूरे हो चुके थे और तैयारियां लगभग अंतिम चरण में थीं।हालांकि, उनके जाने के बाद यह रोल तब्बू को दे दिया गया। उस वक्त तब्बू को ज्यादातर गंभीर भूमिकाओं के लिए जाना जाता था। लेकिन ‘विजयपथ’ ने उनकी पहचान ही बदल दी। फिल्म की सफलता और खासकर गाना “रुम रुक अरे बाबा रुक” ने उन्हें घर-घर में मशहूर कर दिया और इसके बाद तब्बू न सिर्फ एक शानदार अभिनेत्री बनीं, बल्कि बॉलीवुड की सबसे लोकप्रिय हीरोइनों में शुमार हो गईं।लेकिन इन सबके बीच एक सवाल हमेशा बना रहता है— अगर ‘दिलवाले’ और ‘विजयपथ’ में ‘सपना’ और अन्य किरदार दिव्या भारती ने निभाए होते, तो आज इन फिल्मों की यादें कुछ और होतीं? इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है। लेकिन यह तय है कि इन फिल्मों को देखते समय दिव्या भारती की अधूरी मौजूदगी का अहसास हमेशा होता है।और यह सिर्फ ‘लाडला’, ‘मोहरा’, ‘दिलवाले’ या ‘विजयपथ’ तक सीमित नहीं था। ऐसी कई और फिल्में थीं जहां दिव्या भारती की मौजूदगी कैमरे में कैद तो हुई लेकिन कभी दर्शकों तक नहीं पहुंच पाई।उनमें से एक थी ‘कर्तव्य’। बाद में इस फिल्म में संजय कपूर के सामने जूही चावला नजर आईं। लेकिन इस फिल्म से अपना करियर शुरू करने वाली दिव्या भारती थीं। खबरों के मुताबिक, दिव्या फिल्म की लगभग 40 प्रतिशत शूटिंग पूरी कर चुकी थीं। इसके अलावा, मुंबई के मड आइलैंड में संजय कपूर के साथ कई गानों के सीक्वेंस भी फिल्माए जा चुके थे।सालों बाद संजय कपूर ने भावुक होकर याद किया था कि उन्होंने अपने करियर का पहला फिल्मी गाना दिव्या भारती के साथ ही शूट किया था। दिव्या की मौत के बाद शूटिंग रोकनी पड़ी और बाद में जूही चावला के साथ कई हिस्से दोबारा शूट किए गए। हालांकि, दिव्या के साथ शूट किया गया फुटेज कभी दर्शकों तक नहीं पहुंच पाया।’कर्तव्य’ के बाद एक और फिल्म जिसमें आखिरी समय में कास्टिंग बदलनी पड़ी, वह थी के. विश्वनाथ द्वारा निर्देशित ‘धनवान’। इस फिल्म में आखिरकार करिश्मा कपूर ने ‘अंजलि’ का किरदार निभाया, हालांकि यह रोल मूल रूप से दिव्या भारती के लिए ही था। करिश्मा ने इस किरदार को अपनी एक अलग पहचान दी। हालांकि, फिल्म से जुड़े कई लोगों का मानना था कि दिव्या की जन्मजात मासूमियत इस रोल को एक बिल्कुल नया आयाम दे सकती थी।यही सिलसिला ‘धनवान’ के बाद भी जारी रहा। ‘आंदोलन’ में ममता कुलकर्णी का रोल, ‘हलचल’ में काजोल का रोल और ‘बॉडीगार्ड’ में पूजा भट्ट का रोल— ये सभी मूल रूप से दिव्या भारती को ऑफर किए गए थे। इनमें से कुछ फिल्मों के लिए साइनिंग अमाउंट तक दिए जा चुके थे। हालांकि, उनके अचानक निधन के बाद ये रोल दूसरी अभिनेत्रियों के पास चले गए। ‘हलचल’ के साथ एक दिलचस्प इत्तेफाक भी जुड़ा है, क्योंकि इसी फिल्म की शूटिंग के दौरान अजय देवगन और काजोल करीब आए थे, जो आगे चलकर उनकी शादी की वजह बना।कभी-कभी हैरानी होती है कि अगर इन फिल्मों में दिव्या भारती होतीं, तो क्या सिर्फ पर्दे के चेहरे बदलते, या फिर बॉलीवुड की कुछ सबसे यादगार कहानियां आज कुछ और होतीं?कुछ फिल्में ऐसी भी थीं जिनमें रिप्लेसमेंट की नौबत तक नहीं आई। दिव्या भारती की मौत के बाद उन फिल्मों पर काम हमेशा के लिए रोक दिया गया और नए सिरे से किसी अभिनेत्री के साथ उसे पूरा करने की कोशिश नहीं की गई।

कुछ प्रोजेक्ट्स अनाउंसमेंट के बाद ही डिब्बाबंद हो गए, तो कुछ की शूटिंग शुरू हो चुकी थी और वक्त के साथ ये फिल्में बॉलीवुड के सबसे चर्चित अनगिनत अधूरे प्रोजेक्ट्स में शुमार हो गईं।’दो कदम’ इनमें सबसे पहले आती है। यह सलमान खान और दिव्या भारती की पहली ऑन-स्क्रीन जोड़ी बनने वाली थी। फिल्म का मुहूर्त हो चुका था और गानों की रिकॉर्डिंग शुरू हो चुकी थी। हालांकि, दिव्या भारती के जाने के बाद यह प्रोजेक्ट आगे नहीं बढ़ पाया और आखिरकार फिल्म बंद हो गई।फिर आई ‘परिणाम’। इसे अक्षय कुमार और दिव्या भारती की एक गंभीर प्रेम कहानी के रूप में योजनाबद्ध किया गया था। ट्रेड मैगजीन में फुल-पेज विज्ञापनों के साथ इसकी घोषणा भी की गई थी। हालांकि, दिव्या भारती के जाने के बाद यह फिल्म कभी फ्लोर पर नहीं आ पाई और वक्त के साथ सिर्फ एक अधूरा ऐलान बनकर रह गई।इसी तरह निर्देशक राजकुमार संतोषी ‘बजरंग’ पर काम कर रहे थे। ‘विश्वात्मा’ में सनी देओल और दिव्या भारती की जोड़ी की सफलता के बाद, संतोषी उसी जोड़ी के साथ एक बड़ी एक्शन ड्रामा की तैयारी कर रहे थे। हालांकि, दिव्या के जाने के बाद यह प्रोजेक्ट भी आगे नहीं बढ़ सका।इन फिल्मों की सबसे खास बात यह थी कि न सिर्फ ये फिल्में अधूरी रहीं, बल्कि वे किरदार, वे गाने और वे कहानियां थीं जिन्हें दर्शक कभी पर्दे पर देख ही नहीं पाए।आज साल 2026 है। 5 अप्रैल 1993 की उस रात को बीते हुए 33 साल से ज्यादा का वक्त बीत चुका है। मुंबई की बारिशें आज भी वैसी ही हैं। वर्सोवा की समंदर की हवाएं आज भी वैसे ही बहती हैं। लेकिन जब भी हम 90 के दशक के सिनेमा के उस सुनहरे दौर को मुड़कर देखते हैं, जब भी कानों में “किसी तन्हा शाम सात समंदर पार” की धुन गूंजती है, तो हर सच्चे सिनेप्रेमी के मन में एक सवाल लाजिमी तौर पर उठता है— अगर 5 अप्रैल 1993 की वह रात न आई होती, तो आज बॉलीवुड कैसा होता?शायद आज दिव्या भारती बॉलीवुड के सबसे बड़े दिग्गजों में गिनी जातीं। जिन फिल्मों को देखकर हम बड़े हुए और जिन्हें आज हम कल्ट क्लासिक्स मानते हैं, उनका रूप कुछ और ही होता। दूसरी अभिनेत्रियां उन फिल्मों में आईं। फिल्म पूरी हुई। दर्शकों ने उन्हें अपनाया। लेकिन एक सवाल हमेशा अधूरा रह जाता है: अगर उन भूमिकाओं को दिव्या भारती ने निभाया होता, तो क्या उनकी यादें आज कुछ और होतीं?आज जब भी आप इन फिल्मों को दोबारा देखें, तो सिर्फ इनकी कहानियों या इनके किरदारों को न देखें। एक पल के लिए उस अभिनेत्री को भी याद करें जिसने इनमें से कई फिल्मों की शुरुआत तो की लेकिन उन्हें कभी पूरा होते नहीं देख पाई।शायद तभी आपको यह एहसास होगा कि दिव्या भारती सिर्फ एक अभिनेत्री से कहीं बढ़कर थीं। वह 90 के दशक के हिंदी सिनेमा की सबसे बड़ी अधूरी कहानी थीं, जो आज भी अनसुनी है। शायद यही वजह है कि तीन दशक बीत जाने के बाद भी दिव्या भारती न सिर्फ अपनी फिल्मों में, बल्कि उन फिल्मों में भी जिंदा हैं जिन्हें वे कभी पूरा नहीं कर पाईं।

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