अंधेरी रात थी। मुंबई की सड़क पर स्ट्रीट लाइट की पीली रोशनी में एक 13 साल का बच्चा नंगे पैर चला जा रहा था। दिन भर 8 कि.मी. पैदल चलने के बाद उसके पैर थक चुके थे। लेकिन रुकने का सवाल ही नहीं था। हाथ में पेंट की बाल्टी और ब्रश थामे वो बच्चा रात-रात भर फिल्मों के बड़े-बड़े पोस्टरों में रंग भरता था। जानते हैं क्यों? सिर्फ इसलिए ताकि महीने के आखिर में उसे ₹35 मिल सके और दिन में कम से कम एक वक्त पेट भरकर भाकरी नसीब हो सके। किसे पता था कि सड़कों पर पोस्टर रंगने वाला भूख से तड़पता और अपमान के घूंट पीता वो सांवला सा लड़का एक दिन जब पर्दे पर आएगा तो पूरे हिंदुस्तान का सिनेमा थर्रा उठेगा। उसकी आंखें जब गुस्से से लाल होंगी तो बड़े-बड़े सुपरस्टार भी सहम जाएंगे। लेकिन दोस्तों जिस इंसान की आवाज में आज बारूद और डायलॉग्स में आग दिखाई देती है ना उस कड़क पहचान के पीछे एक ऐसा दर्द छुपा है जिसे सुनकर आपकी रूह कांप जाएगी।
गरीबी, भूख और धक्कों से भरी जिंदगी तो थी ही लेकिन जब उस इंसान ने अपनी ही पहली औलाद को अपनी आंखों के सामने तड़प-तड़प कर दम तोड़ते देखा तो वो अंदर से ऐसा टूटा कि फिर कभी रो नहीं पाया। आज हम भारतीय सिनेमा के उस बेबाक, सनकी और बेहद स्वाभिमानी कलाकार की बात कर रहे हैं। जिन्हें दुनिया नाना पाटेकर के नाम से जानती है। लेकिन बेहद दुख के साथ यह खबर साझा करनी पड़ रही है कि 75 वर्ष की उम्र में गोवा स्थित अपने घर में नाना पाटेकर अचानक बेहोश पाए गए और अस्पताल में ले जाने पर डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। दिल का दौरा पड़ने से उनका अकस्मात निधन हो गया और उनके जाने से पूरा भारतीय सिनेमा जगत गहरे सदमे में है। तो चलिए सुनते हैं उनके बचपन की कड़वी गरीबी उस भयानक त्रासदी और उनके स्टार बनने तक की पूरी रोंगटे खड़ी कर देने वाली कहानी। सिर्फ आपके अपने चैनल हिंदी रेडियो पर। विश्वनाथ पाटेकर यानी नाना पाटेकर का जन्म 1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के मरुड जंजीरा में एक साधारण मध्यवर्गीय परिवार में हुआ था।
उनके पिता गजानन पाटेकर कपड़े का कारोबार करते थे और साथ ही पेंटिंग भी किया करते थे। जबकि उनकी मां एक ग्रहणी थी। परिवार में तीन भाइयों का भरा पूरा माहौल था। जिनमें नाना के दो बड़े भाई अशोक और दिलीप पाटेकर थे। शुरुआत में परिवार में खुशहाली तो नहीं थी लेकिन किसी तरह दिन कट रहे थे। बचपन से ही नाना को अपने सांवले रंग की वजह से एक अजीब सी हीन भावना और असुरक्षा का सामना करना पड़ता था। उन्हें लगता था कि लोग उन्हें पसंद नहीं करते और उनका रूप रंग ही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी है। इसी हीन भावना से उबरने और अपने पिता का ध्यान अपनी तरफ खींचने के लिए उन्होंने तीसरी कक्षा में ही गांव के नाटक में भाग लेना शुरू कर दिया था। मंच पर जाते ही वो सांवला बच्चा अपने अंदर झिझक भूल जाता था और पूरी जान लगाकर अभिनय करता था। जो चीज कभी उन्हें अपनी कमजोरी लगती थी वही मंच की बदौलत उनकी सबसे बड़ी ताकत बनने लगी। लेकिन जब नाना सिर्फ 13 साल के थे यानी 1964 का वो दौर तब उनके हंसते खेलते परिवार पर दुखों का ऐसा पहाड़ टूटा कि सब कुछ तिनके की तरह बिखर गया। उनके पिता के एक बेहद करीबी कारोबारी साझेदार ने उनके साथ बहुत बड़ा धोखा कर दिया। पिता का पूरा बिजनेस रातोंरात डूब गया।
जीवन भर की जमा पूंजी चली गई और यहां तक कि मुरुट का उनका घर भी हाथ से निकल गया। पूरा परिवार सड़क पर आ गया और पेट पालने की मजबूरी में उन्हें मुंबई का रुख करना पड़ा। महज 13 साल की नन्ही उम्र में नाना पाटेकर के कंधों पर परिवार की भारी जिम्मेदारी आ गिरी। जिस उम्र में बच्चे खेलते हैं और अपने भविष्य के सपने देखते हैं, उस उम्र में नाना को यह सोचना पड़ रहा था कि अगली सुबह घर में खाना बनेगा या नहीं। नाना स्कूल में पढ़ते जरूर थे, लेकिन स्कूल खत्म होते ही वह रोज 8 कि.मी. पैदल चलकर चूना भट्टी जाते थे और सिनेमा के बड़े-बड़े पोस्टरों को हाथ से रंगने का काम करते थे। इस कड़ी धूप, पसीने और दिन रात की हड़तोड़ मेहनत के बदले उन्हें महीने के सिर्फ ₹35 और दिन में केवल एक वक्त का खाना मिलता था। उस दौर की गरीबी सिर्फ पैसों की तंगी नहीं थी बल्कि वो अपने साथ अपमान और बेबसी का भयानक दर्द लाती थी। कई बार पेट की तड़प मिटाने के लिए वो दोस्तों के घर आप कैसे हैं पूछने के बहाने चले जाते थे। इस उम्मीद में कि शायद कोई तरस खाकर एक रोटी का टुकड़ा उनके आगे करते। बाद में नाना ने अपने एक इंटरव्यू में रुआसे होकर कहा था कि जब इंसान कई दिनों तक भूखा रहता है ना तो उसके लिए एक गर्म भाकरी की खुशबू दुनिया की सबसे खूबसूरत फूल की महक से भी ज्यादा कीमती हो जाती है। उन्होंने कहा था कि इस कड़वे दौड़ ने उन्हें जिंदगी का वो सबक सिखाया जो दुनिया का कोई एक्टिंग स्कूल कभी नहीं सिखा सकता।
इतनी कड़वी गरीबी, भूख और अपमान झेलने के बावजूद नाना के अंदर की जिद और स्वाभिमान कभी कम नहीं हुआ। उन्होंने पढ़ाई नहीं छोड़ी और मुंबई के मशहूर सर जे जे इंस्टिट्यूट ऑफ अप्लाइड आर्ट से अपना डिप्लोमा पूरा किया। उनके अंदर स्केचिंग और पेंटिंग की कमाल की समझ थी। जो उनके पिता से उन्हें विरासत में मिली थी। इसी हुनर की वजह से आगे चलकर वो मुंबई पुलिस के लिए संदिग्ध अपराधियों के स्केच बनाने का काम भी करने लगे थे। जिससे पुलिस को कई मामलों में मदद मिलती थी। डिप्लोमा के बाद उन्होंने एक एडवरटाइजिंग एजेंसी में नौकरी कर ली ताकि घर का खर्च चलता रहे। लेकिन उनके दिल में बसा कलाकार रुकने वाला नहीं था। नौकरी के साथ-साथ उन्होंने मुंबई के प्रतिष्ठित रंगायन थिएटर ग्रुप के साथ काम करना शुरू कर दिया। जहां उन्हें विजय मेहता का मार्गदर्शन मिला। रंगमंच का काम करते हुए उन्होंने संवाद बोलने की टाइमिंग और अपनी कड़क आवाज और बॉडी लैंग्वेज को निखारा। विजय मेहता के निर्देशन में बना मराठी नाटक हमीदा बायची कोठी उनके करियर का पहला बड़ा कमर्शियल टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।
इस नाटक में उस दौर के बड़े स्टार अशोक सराफ मुख्य भूमिका में थे। जब नाटक की टीम अलग-अलग शहरों में जाती थी तो भीड़ मुख्य रूप से अशोक सराफ को देखने आती थी। लेकिन मंच पर जब नाना पाटेकर अपनी तीखी अभिनय शैली के साथ उतरते थे तो पूरा हॉल तालियों से गूंज उठता था। इसके बाद उन्होंने महासागर और पुरुष जैसे चर्चित नाटकों से रंगमंच पर अपना सिक्का जमा लिया। इसी थिएटर के दिनों में उनकी मुलाकात बैंक में काम करने वाली और थिएटर में रुचि रखने वाली नीलकात्त से हुई। दोनों में प्यार हुआ और 1978 में उन्होंने शादी कर ली। शादी के समय नाना के सामने बड़ा धर्म संकट था कि वह एडवरटाइजिंग की पक्की नौकरी करें या थिएटर को अपनाए। थिएटर के एक शो के उन्हें मुश्किल से ₹75 मिलते थे।
जबकि उनकी पत्नी की नौकरी से घर में ₹2500 आते थे। एक ऐसे इंसान के लिए जिसने बचपन में भयानक गरीबी देखी हो। नौकरी छोड़ना बहुत बड़ा जोखिम था। लेकिन नीलकांत ने नाना की प्रतिभा पर अटूट भरोसा दिखाया और उन्हें बिना पैसे की परवाह किए पूरी तरह थिएटर में उतरने का हौसला दिया। 1978 में ही फिल्म गमन से नाना ने हिंदी सिनेमा में अपना पहला कदम रखा। लेकिन फिल्मी दुनिया की डगर उनके लिए बहुत कांटू भरी थी। उनका तीखा चेहरा, सांवला रंग और अजीब सा आक्रामक अंदाज देखकर उस दौर के कई निर्देशकों ने उन्हें सीधे खारिज कर दिया। लेकिन नाना ने हार नहीं मानी और छोटी-मोटी भूमिकाएं स्वीकार करते रहे। लेकिन सफलता के इस शुरुआती दौड़ के बीच नाना पाटेकर की जिंदगी में दुखों का एक और भयानक तूफान आया। जब वो महज 28 साल के थे। तब उनके पिता गजानन पाटेकर का अत्यधिक तनाव की वजह से दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। पिता के निधन के तुरंत बाद भी नाना को अपनी आर्थिक मजबूरियों के कारण नाटक का शो करने जाना पड़ा था।
क्योंकि काम रोकने का मतलब था घर का चूल्हा बंद होना। पिता को खोने का गम अभी भरा भी नहीं था कि 1980 में उनके जीवन में एक ऐसी भयानक त्रासदी आई जिसने उनकी आत्मा को झकझोर कर रख दिया। उनकी पहली संतान उनका बेटा दुर्वासा जन्म से ही कई गंभीर और जन्मजात बीमारियों से ग्रस्त था। उसके होंठ कटे हुए थे और दिल की गंभीर बीमारी की वजह से उसकी आंखों की रोशनी भी धीरे-धीरे जाने लगी थी। नाना ने दिन-रा एक करके अपने नन्हे बच्चे को बचाने की हर मुमकिन कोशिश की। लेकिन बदकिस्मती से 1980 में उस मासूम ने दम तोड़ दिया। अपनी पहली औलाद को अपने आंखों के सामने तड़प कर दम तोड़ते देखना नाना के लिए ऐसा गहरा जख्म था जो कभी नहीं भर सका। उस दौर में बेबसी, गरीबी और कड़वी सच्चाई ने उनके अंदर एक ऐसा दर्द और आक्रोश भर दिया।
जो बाद में जब भी वह पर्दे पर आए तो उनके किरदारों में ज्वालामुखी बनकर फटा। तमाम दुखों और व्यक्तिगत त्रासदियों के बावजूद वह रुके नहीं। अभिनेत्री स्मिता पाटिल जो उनकी बहुत पक्की और गहरी दोस्ती थी। नाना को अपनी गाड़ी में बिठाकर मशहूर डायरेक्टर रवि चोपड़ा के पास ले गई। जब उन्हें फिल्म आज की आवाज में एक बहुत ही मामूली और हल्का रोल ऑफर हुआ तो नाना ने अपनी खुददारी दिखाते हुए रवि चोपड़ा के मुंह पर साफ मना कर दिया कि वो ऐसा रोल नहीं करेंगे और गुस्से में उठकर जाने लगे। उनके इस कड़क तेवर को देखकर स्मिता पाटिल भी दंग रह गई। लेकिन नाना का यही स्वाभिमान काम आया। बाद में उन्हें उसी फिल्म में एक दमदार भूमिका मिली और फिल्म इंडस्ट्री की नजर उन पर पड़ी। इसके बाद 1986 में आई फिल्म अंकुश और प्रतिघात जैसी फिल्मों ने पूरे बॉलीवुड में तहलका मचा दिया। पर्दे पर जब नाना चीखते थे तो दर्शकों को लगता था कि यह किसी एक्टर के बनावटी एक्टिंग नहीं बल्कि एक आम इंसान का असली दर्द, गुस्सा और बिखरा हुआ आक्रोश है।
और फिर आया साल 1989 जब निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म परिंदा रिलीज हुई। परिंदा में नाना पाटेकर ने अंडरवर डॉन अन्ना का जो सनकी खतरनाक और खौफनाक किरदार निभाया उसने हिंदी सिनेमा में विलेन की परिभाषा ही बदल कर रख दी। इस बेमिसाल अभिनय के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। सफलता का यह सिलसिला यहीं नहीं रुका। 1992 में आई फिल्म अंगार में उन्होंने अपनी खलनायकी से ऐसा खौफ पैदा किया कि उन्हें फिल्मफेयर का बेस्ट विलेन का अवार्ड मिला और फिर 1994 में आई मेहुल कुमार की ब्लॉकबस्टर फिल्म क्रांतिवीर। क्रांतिवीर में उनके द्वारा निभाया गया प्रताप नारायण तिलक का किरदार भारतीय सिनेमा के इतिहास में हमेशा हमेशा के लिए दर्ज हो गया। यह मुसलमान का खून है। यह हिंदू का खून है।
बता इसमें से कौन सा मुसलमान का है और कौन सा हिंदू का? इस एक दृश्य और उनके धाकड़ संवादों ने पूरे देश के थिएटर में आग लगा दी थी। क्रांतिवीर के लिए नाना पाटेकर को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, फिल्मफेयर अवार्ड और स्क्रीन अवार्ड से नवाजा गया। इसी के साथ नाना पाटेकर भारतीय सिनेमा के पूरे इतिहास में इकलौते ऐसे अभिनेता बन गए जिन्होंने फिल्मफेयर के इतिहास में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता, सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता और सर्वश्रेष्ठ विलेन तीनों ही मुख्य और सबसे बड़ी श्रेणियों में पुरस्कार जीतकर एक कभी ना टूटने वाला इतिहास रच दिया। बचपन में मुरुट की गलियों से निकला वो सांवला बच्चा जो 13 साल के उम्र में 18 कि.मी. पैदल चलकर ₹35 के लिए पोस्टर रंगता था। जो भूख से तड़पता था और जिसने अपनी पहली औलाद को खोने का भयानक दर्द सहा था। आज वो अपनी मेहनत, जिद और जुनून के दम पर पूरे भारतीय सिनेमा के सबसे ऊंचे शिखर पर विराजमान हो चुका था। पहला राष्ट्रीय पुरस्कार और फिल्म फेयर की हैट्रिक बनाने के बाद नाना पाटेकर सिर्फ पर्दों तक सीमित रहने वाले कलाकार नहीं रहे। उनके अंदर समाज के लिए कुछ करने का जुनून बचपन से था क्योंकि उन्होंने खुद कड़वी गरीबी, भूख और अपनों को खोने का दर्द झेला था। जब महाराष्ट्र में भीषण सूखा पड़ा और किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हो रहे थे।
तब नाना पाटेकर और उनके साथी कलाकार मकरंद अनासपुरे आगे आए। दोनों ने मिलकर नाम फाउंडेशन नाम की सामाजिक संस्था की नींव रखी। नाना ने ना सिर्फ किसानों को वित्तीय सहायता दी बल्कि सूखा प्रभावित गांव में नदियों को गहरा करने, जल संरक्षण के काम और विधवाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए दिन-रा एक कर दिया। जब उन्हें ₹1 लाख के नगद पुरस्कार वाला प्रतिष्ठित राज कपूर पुरस्कार मिला तो नाना ने अपनी जेब में एक रुपया भी नहीं रखा और पूरी की पूरी राशि सूखा राहत कोष के लिए दान कर दी। उनका देशभक्ति का जज्बा सिर्फ समाज सेवा तक सीमित नहीं था। उन्हें इंडियन टेरिटोरियल आर्मी में कैप्टन के पद पर मानद उपाधि से नवाजा गया। जब 1999 में कारगिल युद्ध हुआ तो नाना पाटेकर सिर्फ फिल्मों में आर्मी मैन का रोल करने तक सीमित नहीं रहे बल्कि उन्होंने सीमा पर जाकर सैनिकों के साथ समय बिताया और इस दौरान उन्हें मेजर के पद पर पदोन्नत किया गया। निर्देशन के क्षेत्र में भी उन्होंने अपनी छाप छोड़ी। 1991 में आई फिल्म प्रहार द फाइनल अटैक से उन्होंने निर्देशन में कदम रखा। इस फिल्म की तैयारी के लिए नाना ने खुद भारतीय सेना के मराठा लाइट इनफेंट्री के साथ कड़ा सैन्य प्रशिक्षण लिया।
फिल्म बहुत सराही गई लेकिन इसके बाद नाना ने निर्देशन से दूरी बना ली। बाद में उन्होंने खुलासा किया कि उस वक्त उन्हें अपने परिवार और घर के लिए पैसों की सख्त जरूरत थी। निर्देशन में बहुत समय लगता था और अगर फिल्म ना चले तो निर्देशन के करियर पर बहुत बुरा असर पड़ता था। इसलिए अपने पारिवारिक जिम्मेदारियों को देखते हुए उन्होंने एक्टिंग को ही प्राथमिकता दी। नाना पाटेकर की जिंदगी में एक तरफ यह सादगी और देशभक्ति थी तो दूसरी तरफ उनका तेजतर्रार गुस्सा और बेबाक रवैया था। जिसकी वजह से उनके सेट पर कई बार भयंकर टकराव हुए। फिल्म परिंदा की शूटिंग के दौरान निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा और नाना पाटेकर के बीच किसी सीन को लेकर कहासनी हो गई। दोनों बहुत ही गर्म मिजाज के इंसान थे। इसलिए बात देखते ही देखते इतनी बिगड़ गई कि सेट पर दोनों के बीच हाथापाई तक नौबत आ गई। नौबत यहां तक आ पहुंची थी कि विधु विनोद चोपड़ा ने गुस्से में नाना का कुर्ता तक फाड़ दिया। कमाल की बात यह थी कि उस वक्त भी कैमरा चालू था और इस वास्तविक लड़ाई की आक्रमकता फिल्म के दृश्य में साफ दिखाई दी। सेट पर मौजूद पुलिसकर्मियों ने भी दोनों को लड़ते देखकर बीच-बचाव कराया था। बाद में हालांकि दोनों का गुस्सा शांत हुआ। लेकिन इस घटना ने पूरे बॉलीवुड को हिला कर रख दिया था। इस घटना का असर इतना गहरा था कि जब अमोल पालेकर अपनी फिल्म थोड़ा सा रूमानी हो जाऊं बना रहे थे तो वह नाना को अपनी फिल्म में लेने से डर रहे थे।
विदु विनोद चोपड़ा के साथ हुई लड़ाई की खबर सुनकर अमोल पालेकर को लगा कि जिस सीधे और संवेदनशील किरदार के लिए वह एक्टर ढूंढ रहे हैं, नाना का गुस्सा उस पर भारी पड़ जाएगा। लेकिन नाना ने इस बात को एक चुनौती की तरह लिया। दिनों तक रिहर्सल की और खुद को उस किरदार में ढालकर साबित किया कि वह किसी भी तरह का अभिनय कर सकते हैं। ऐसा ही एक टकराव फिल्म दिशा के सेट पर निर्देशक सई पराजपे के साथ हुआ। सई को पहले ही नाना के तीखे स्वभाव के बारे में आगाह किया गया था। शुरुआती दिनों में जब सई का ध्यान शबाना आजमी और ओमपुरी के दृश्यों पर ज्यादा रहा तो नाना को लगा कि उन्हें नजरअंदाज किया जा रहा है। इसके बाद सेट पर छोटी-छोटी बातों पर उनका गुस्सा फूट पड़ा। कभी चप्पलों को लेकर नाराजगी जताई तो कभी डबिंग के वक्त स्क्रिप्ट के पन्ने फेंक दिए। जब तनाव बहुत बढ़ गया तो सई परांजपे ने कड़े शब्दों में कहा कि या तो काम करो या यहां से चले जाओ। नाना गुस्से में सेट छोड़कर चले गए। लेकिन कुछ देर बाद वापस आए और सई से कहा कि आप इसलिए सुरक्षित हैं क्योंकि आप एक महिला हैं। अगले दिन माहौल सामान्य जरूर हुआ लेकिन सई ने इस बात का जिक्र सालों बाद मीडिया के सामने किया। यही आक्रामकता भोपाल में फिल्म राजनीति की शूटिंग के दौरान भी दिखाई दी। प्रकाश झा और नाना बहुत पुराने दोस्त थे। लेकिन एक सीन की शूटिंग के दौरान दोनों के बीच बहस इतनी बढ़ गई कि मामला गाली गलौज तक पहुंच गया।
उस वक्त मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया कि नाना ने गुस्से में प्रकाश झा का कॉलर तक पकड़ लिया और सेट छोड़कर होटल चले गए। हालांकि बाद में फिल्म रिलीज के समय नाना ने प्रकाश झा के काम की तारीफ की। लेकिन दो पुराने दोस्त के बीच सेट पर हुए इस भयंकर झगड़े ने खूब सुर्खियां बटोरी थी। लेकिन दो पुराने दोस्त के बीच सेट पर हुए इस भयंकर झगड़े ने खूब सुर्खियां बटोरी थी। यह गुस्सा सिर्फ सेट तक सीमित नहीं रहा। साल 2005 में मुंबई की सड़क पर एक कार एक्सीडेंट के बाद भयंकर बहस हो गई। एक बिजनेसमैन ने नाना पाटेकर के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई कि नाना ने बहस के दौरान उसे गाली दी, थप्पड़ मारा और अपनी लाइसेंसी रिवाल्वर निकालकर जान से मारने की धमकी दी। इस मामले ने नाना ने भी पलट कर पुलिस में शिकायत दर्ज कराई और कहा कि उस गाड़ी वाले ने उनकी कार को टक्कर मारने की कोशिश की थी और खुद उनसे हाथापाई की थी। रोड रेज का यह मामला उस वक्त पूरे देश में मीडिया की हेडलाइंस बना था। सड़क पर हुए इस हड़कंप और रिवाल्वर वाले विवाद के बाद भी नाना पाटेकर के स्वभाव का तीखापन कम नहीं हुआ। उनका यह अंदाज सिर्फ निर्देशकों या बाहरी लोगों के साथ ही नहीं था। बल्कि कई बार सीन को बिल्कुल असली बनाने के जुनून में उनके साथ काम करने वाले साथी कलाकार भी इसका शिकार हो जाते थे। साल 2007 में जब फिल्म शागिर्द की शूटिंग चल रही थी तब एक सीन के दौरान नाना को अनुराग कश्यप को थप्पड़ मारना था। निर्देशन ने कट बोला लेकिन कैमरे के सामने नाना ने अभिनय करने के बजाय अनुराग कश्यप को सचमुच का इतना जोरदार थप्पड़ जड़ दिया कि सेट पर कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया। नाना का मानना था कि जब तक थप्पड़ असली नहीं होगा तब तक चेहरे पर वह असली दर्द और हावभाव आ ही नहीं सकते। कुछ ऐसा ही वाक्या फिल्म यशवंत की शूटिंग के दौरान अभिनेत्री मधु के साथ भी हुआ। एक बेहद भावुक दृश्य में नाना चाहते थे कि मधु की आंखों में ग्लिसरीन वाले नहीं बल्कि असली आंसू आए।
सीन के बीच में नाना ने अचानक मधु को एक थप्पड़ मार दिया। मधु उस वक्त इतनी आहत और गुस्से में आ गई कि उन्होंने तुरंत पलट कर नाना को थप्पड़ जड़ दिया। हालांकि सालों बाद मधु ने इस घटना को याद करते हुए साफ किया कि नाना का इरादा उनका अपमान करना नहीं था बल्कि वह सीन में एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया चाहते थे। लेकिन बिना किसी पूर्व सहमति के सेट पर इस तरह का कड़ा तरीका अपनाना किसी भी कलाकार को असहज कर सकता था। लेकिन इन तमाम किस्सों और सेट की लड़ाईयों के बीच एक ऐसा भूचाल आना भी बाकी था जिसने नाना पाटेकर के करियर, उनकी साख और उनकी पूरी जिंदगी को हिला कर रख दिया। इसकी शुरुआत असल में 2008 में फिल्म हॉर्न ओके प्लीज के सेट पर हुई। अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने आरोप लगाया कि एक आइटम सॉन्ग की शूटिंग के दौरान जिसे शुरुआती में उनका सोलो डांस बताया गया था। नाना पाटेकर ने बेवजह अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। तनुश्री का कहना था कि डांस सिखाने और स्टेप बताने के बहाने नाना ने उन्हें अनुचित तरीके से छुआ और असहज किया। जब तनुश्री ने इस बात का विरोध किया और अपनी वैनिटी वैन में चली गई तो सेट के बाहर माहौल बेहद तनावपूर्ण हो गया। उनकी कार को घेर लिया गया और तोड़फोड़ की कोशिश हुई। उस वक्त पुलिस में शिकायत तो दर्ज हुई लेकिन मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। पूरे 10 साल तक यह मामला शांत रहा। फिर आया
साल 2018 जब भारत में हैशटग मी टू आंदोलन की लहर उठी। तनुश्री दत्ता ने एक टीवी इंटरव्यू में 2008 के उस घटना का जिक्र दोबारा किया और सीधे नाना पाटेकर पर यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोप लगाए। इस बयान ने पूरे बॉलीवुड और देश के मीडिया में भूचाल ला दिया। नाना पाटेकर ने इन आरोपों को पूरी तरह से खारिज किया और कहा कि सेट पर दर्जनों लोग मौजूद थे। उन्होंने कभी किसी के साथ ऐसा व्यवहार नहीं किया। पुलिस ने इस मामले की गहन जांच की। सेट पर मौजूद कई गवाहों, डांसर्स और क्रू मेंबर्स के बयान दर्ज किए। लंबी जांच के बाद 2019 में मुंबई पुलिस ने अदालत में 20 समरी क्लोज़र रिपोर्ट दाखिल की। जिसका मतलब था कि नाना के खिलाफ लगाए गए आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं मिले।
गवाहों के बयानों के मुताबिक ऐसी कोई घटना नहीं देखी गई थी। तनुश्री ने इस पुलिस रिपोर्ट को अदालत में चुनौती दी। लेकिन मार्च 2025 में मुंबई के मैजिस्ट्रेट अदालत ने तनुश्री की उस याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि घटना के 10 साल बाद शिकायत दर्ज कराने का कोई ठोस कारण नहीं दिया गया और इस तरह कानूनी रूप से यह मामला यहीं समाप्त हो गया। इसी तनुश्री विवाद के दौरान महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना यानी एमएनएस और राज ठाकरे का नाम भी सामने आया था। तनुश्री ने आरोप लगाया था कि 2008 में उनकी गाड़ी पर हमला कराने के लिए राजनीतिक कार्यकर्ताओं को बुलाया गया था। हालांकि राज ठाकरे और उनकी पार्टी ने इन आरोपों को साफ नकार दिया। हालांकि राज ठाकरे और उनकी पार्टी ने इन आरोपों को साफ नकार दिया। दिलचस्प बात यह है कि नाना पाटेकर और राज ठाकरे के बीच रिश्ते हमेशा एक जैसे नहीं रहे। साल 2017 में मुंबई के फुटपाथ पर सामान बेचने वाले फेरी वालों यानी हॉकर्स के मुद्दे पर दोनों आमने-सामने आ गए थे। नाना ने एक कार्यक्रम में कहा था कि गरीब फेरी वालों की रुजी रोटी नहीं छीनी जानी चाहिए और प्रशासन को उनके लिए जगह तय करनी चाहिए। इस बयान पर राज ठाकरे ने नाना की कड़ी आलोचना की थी और कहा था कि नाना को ऐसे मुद्दों पर बोलने से पहले पूरी जानकारी रखनी चाहिए। समय बीता लेकिन विवादों से नाना का नाता कभी पूरी तरह टूटा नहीं। अभी हाल ही में 2023 में जब नाना पाटेकर वाराणसी में एक फिल्म की शूटिंग कर रहे थे, तब एक नया बवंडर खड़ा हो गया। बनारस की गलियों में शूटिंग के दौरान एक सिरफिला प्रशंसक नाना के साथ मोबाइल से सेल्फी लेने के लिए उनके करीब आ गया। नाना ने बिना कुछ सोचे समझे उस प्रशंसक के सिर पर जोर से थप्पड़ मार दिया।
किसी ने इस पूरी घटना का वीडियो रिकॉर्ड कर लिया और कुछ ही घंटों में यह वीडियो सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल गया। लोगों ने नाना के इस रवैया की तीखी आलोचना की। मामला बढ़ता देख नाना पाटेकर को खुद एक वीडियो जारी करके जनता से माफी मांगनी पड़ी। उन्होंने सफाई दी कि उन्हें लगा वो व्यक्ति उनकी फिल्म का ही कोई क्रू मेंबर या जूनियर आर्टिस्ट है जो सीन का हिस्सा है और उसी गलतफहमी में उनसे यह भूल हो गई और फिर आया 2026 का वो काला दिन जब 75 वर्ष की उम्र में गोवा स्थित अपने घर में नाना पाटेकर के अचानक शांत हो जाने की खबर आई। दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया और एक ऐसे युग का अंत हो गया जिसकी मिसाल दोबारा मिलना नामुमकिन है।
अगर नाना पाटेकर की पूरी जीवन यात्रा को देखा जाए तो वह महज एक अभिनेता नहीं थे। वो एक ऐसे इंसान थे जिनकी रगों में गरीबी का दर्द, भूख की तड़प और अपनों को खोने का आक्रोश बहता था। 13 साल की उम्र में 8 कि.मी. पैदल चलकर ₹35 कमाने वाले उस बच्चे ने जब कैमरे के सामने कदम रखा तो उसने एक्टिंग नहीं की। उसने अपनी जिंदगी के उसी कड़वे सच को पर्दे पर उगल दिया।
उनका तेज गुस्सा, उनका बेबाक अंदाज और उनके विवाद शायद उनकी उसी जिद्दी स्वभाव का हिस्सा थे। जिसने उन्हें कभी झुकने नहीं दिया। कलाकार बहुत आएंगे और चले जाएंगे। लेकिन पर्दे पर जबजब कोई इंसान अपनी कड़क आवाज में हक और इंसाफ के लिए चीखेगा तो हिंदुस्तान को सिर्फ और सिर्फ एक ही नाम याद आएगा। विश्वनाथ यानी नाना पाटेकर।