बॉलीवुड में जब भी 90 के दशक की सबसे सफ़ल, सहज और प्रभावशाली अभिनेत्रियों का ज़िक्र होता है, तो सबसे पहला नाम जो ज़हन में आता है, वह है—काजोल। ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’, ‘कुछ कुछ होता है’ और ‘कभी खुशी कभी ग़म’ जैसी आइकॉनिक फ़िल्मों से करोड़ों दिलों पर राज करने वाली इस अभिनेत्री की एक बात उन्हें दूसरों से बिल्कुल अलग बनाती है। वह यह कि उन्होंने पूरे करियर में कभी भी अपने नाम के साथ सरनेम (उपनाम) का इस्तेमाल नहीं किया।फ़िल्मों के पोस्टरों से लेकर अवॉर्ड शो के स्टेज तक, वह हमेशा सिर्फ़ ‘Kajol’ रहीं। आखिर इसके पीछे की वजह क्या थी? आइए विस्तार से समझते हैं।
1. पारिवारिक परिस्थितियां और बचपन का दौरकाजोल का जन्म दो बेहद प्रतिष्ठित फ़िल्मी परिवारों के मिलन से हुआ था। उनके पिता शोमू मुखर्जी एक प्रसिद्ध फ़िल्म निर्माता-निर्देशक थे और उनकी मां तनुजा हिंदी सिनेमा की दिग्गज अभिनेत्री हैं।हालांकि, जब काजोल बहुत छोटी थीं, तभी उनके माता-पिता के बीच अनबन शुरू हो गई और वे अलग रहने लगे। काजोल का पालन-पोषण मुख्य रूप से उनकी मां तनुजा और नानी शोभना समर्थ (जो खुद अपने ज़माने की बहुत बड़ी स्टार थीं) की देखरेख में हुआ। माता-पिता के इस अलगाव का काजोल के जीवन पर गहरा असर पड़ा। किसी एक परिवार या उपनाम से बंधने के बजाय, उन्होंने खुद को इन सीमाओं से परे रखने का विचार बनाया।
2. खुद की स्वतंत्र पहचान बनाने की चाह90 के दशक में जब काजोल ने 1992 में फ़िल्म ‘बेखुदी’ से अपना बॉलीवुड डेब्यू किया, तब उनके पास ‘मुखर्जी’ जैसा भारी-भरकम सरनेम मौजूद था, जो सिनेमा जगत में बेहद सम्मानित माना जाता था। लेकिन काजोल अपने माता-पिता के नाम के सहारे आगे नहीं बढ़ना चाहती थीं।वह चाहती थीं कि दर्शक उन्हें उनके अभिनय और प्रतिभा से पहचानें, न कि उनके पारिवारिक बैकग्राउंड से। यही कारण था कि उन्होंने फ़िल्मी दुनिया में कदम रखते ही अपना सरनेम हटा दिया और केवल “काजोल” नाम से अपनी शुरुआत की।
3. ‘मोनोनिम’ (Mononym) का आकर्षण और ब्रांड वैल्यूसिनेमा की दुनिया में सिर्फ़ एक नाम से पहचाने जाना (जिसे ‘Mononym’ कहा जाता है) हमेशा से एक अलग प्रभाव छोड़ता आया है। जैसे रेखा, तबू, या हॉलीवुड में मैडोना और चेर।काजोल के लिए भी सिर्फ़ एक नाम इस्तेमाल करना एक बेहतरीन ब्रांडिंग साबित हुआ। यह नाम छोटा, याद रखने में आसान और बेहद प्रभावशाली था। 90 के दशक में ‘काजोल’ नाम ही अपने आप में एक बड़ा ब्रांड बन गया था, जिसे किसी सरनेम के सहारे की ज़रूरत नहीं थी।
4. शादी के बाद का फ़ैसला1999 में काजोल ने बॉलीवुड अभिनेता अजय देवगन से शादी की। आमतौर पर शादी के बाद अभिनेत्रियां अपना सरनेम बदल लेती हैं या जोड़ लेती हैं, लेकिन काजोल ने अपनी पेशेवर (professional) ज़िंदगी में कोई बदलाव नहीं किया।निजी ज़िंदगी और कानूनी दस्तावेज़ों (Passports & Official Papers) में वह ज़रूर काजोल देवगन या काजोल मुखर्जी देवगन लिखती हैं, लेकिन फ़िल्मों के क्रेडिट्स और सार्वजनिक जीवन में आज भी वह केवल ‘काजोल’ ही हैं। उनका मानना है कि जो पहचान उन्होंने दर्शकों के बीच बनाई है, वह वैसे ही रहनी चाहिए।काजोल का यह फ़ैसला दिखाता है कि कोई कलाकार अपने काम और लगन से अपनी पहचान बनाता है, न कि किसी सरनेम की वजह से। बिना किसी उपनाम के भी वह भारतीय सिनेमा के इतिहास की सबसे महान अभिनेत्रियों में से एक के रूप में स्थापित हैं।