नेपाल के प्रधानमंत्री बालिन शाह के काले चश्मे का। किसी यूथ का पहना काला चश्मा आमतौर पर एक फैशन स्टेटमेंट माना जाता है। लेकिन जब यही चश्मा आपकी पहचान बन जाए तो यह सिर्फ चश्मा नहीं रहता। यह एक ब्रांड बन जाता हैऔर नेपाल के प्रधानमंत्री बालिन शाह के मामले में यह ब्रांड इतना बड़ा है कि वो एक रैपर से काठमांडू के मेयर और मेयर से प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंच गए। फील्ड बदला, मंच बदला, भूमिका बदली लेकिन नहीं बदला तो काला चश्मा।
एक दिन पहले संयुक्त राष्ट्र महासभा में दुनिया ने नेपाल के प्रधानमंत्री बालन शाह को सुना और उनके भाषण के साथ एक चीज फिर नोटिस की गई और वो है उनका पहना हुआ काला चश्मा। वो संयुक्त राष्ट्र महासचिव से मिले तब भी उन्होंने काला चश्मा नहीं उतारा। वन टू वन मुलाकातें हो, मीटिंग्स हो, स्पीच हो, कहीं पर रैली हो, हर जगह उनका काला चश्मा यूं ही दिखाई देता। ऐसे में यह क्यूरोसिटी जरूर होगी कि आखिर बालन शाह हर समय काला चश्मा क्यों पहनते हैं?
आखिर बालन शाह का सिग्नेचर लुक उनकी राजनीतिक पहचान में कैसे बदल गया? इसकी कहानी दरअसल बालन शाह की राजनीति से भी पुरानी है। राजनीति में आने से पहले वो नेपाल के एक पॉपुलर रैपर थे। काला चश्मा, काले सूट और अपने अलग अंदाज के साथ उनकी एक खास इमेज बनी। अपनी लोकप्रियता की लहरों पर सवार होकर वो साल 2022 में काठमांडू के मेयर बने।
तो वही काले चश्मे वाला लुक उनकी सार्वजनिक पहचान का हिस्सा बना रहा। और इसी साल मार्च 2026 में पीएम बनने के बाद भी उन्होंने इसे [संगीत] बदला नहीं और यही लुक उनकी मिस्ट्री बढ़ाता है। सबसे दिलचस्प मामला नेपाल की संसद का है। सदन की कार्यवाही के दौरान काला चश्मा पहनने की अनुमति के लिए उन्होंने पिछले महीने ही मेडिकल रिपोर्ट जमा की। रिपोर्ट के आधार पर उन्हें चश्मा पहनने की अनुमति मिली।
यानी जिस चीज की शुरुआत स्टाइल से हुई थी, वह अब सार्वजनिक पद की पहचान तक पहुंच चुकी थी। लेकिन उससे पहले प्रधानमंत्री बनने के बाद उनकी ऑफिशियल फोटो को लेकर भी एक दिलचस्प घटना हुई। चश्मे में बतौर पीएम बालन की जो पहली तस्वीर लगाई गई उस चश्मे पर दाहिनी तरफ उसका ब्रांड दिखाई दे रहा था। इस गलती का पता चलते ही वो तस्वीर हर जगह से हटानी पड़ी।
फिर उस काले चश्मे से ब्रांड को हटाकर फोटो दोबारा रिलीज की गई और यह सब कुछ एक दिन में हुआ। वैसे देश चाहे भारत हो, नेपाल हो, राजनीति में कोई नई चीज नहीं। नेताओं के कपड़े, टोपी, रंग और प्रतीक सब उनकी पहचान बनते हैं।
लेकिन बालन शाह के मामले में दिलचस्प बात यह है कि उनकी पहचान किसी पार्टी के रंग से नहीं बल्कि एक व्यक्तिगत सिग्नेचर से बनी और वही सिग्नेचर काठमांडू की सड़कों से निकलकर नेपाल की संसद, प्रधानमंत्री ऑफिस और अब यूएन तक पहुंच चुका है। तो बालन शाह के काले चश्मे का सीक्रेट शायद चश्मे में नहीं है। राज है उसकी लगातार बनी रही पहचान में जिसने एक साधारण चश्मे को फैशन से पब्लिक इमेज और फिर पॉलिटिकल ब्रांड बना