सपने में भी नहीं सोच सकता था कि हनुमान जी का अपमान करने का इतना बड़ा इनाम मिल सकता है। मनोज मुंतीशिर जैसा शख्स आदि पुरुष में जिसने इतनी खराब भाषा बोली थी। पूरे देश ने वो गालियां दी थी भाई ठंडे बस्ते में चला गया था। बात भी सही है। हनुमान जी का अपमान नफरत की आंधी में इतनी लहर मनोज बह गए कि कुछ भी कह देंगे ठंडे बस्ते में चले गए।
लेकिन फिर सत्ता को लगा कि ऐसा गीतकार ऐसा संगीतकार इतने दिनों तक ठंडे बस्ते में नाले में क्यों पड़ा हुआ है? निकालो। लिहाजा ठंडे बस्ते से निकालकर उसको एक बड़ा सा फिल्म का राष्ट्रीय प्रमाण पत्र दे दिया गया।
आज मैं बात करूंगा भारतीय सिनेमा के सबसे प्रतिष्ठित सम्मान राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार। नाम है राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार लेकिन समारोह पहली बार दिल्ली से उठाकर गुजरात के एकता नगर केवड़िया पहुंचा दिया गया। राष्ट्रपति वहां पहुंचे, सितारे वहां पहुंचे, कैमरा वहां पहुंचे और पूरा राष्ट्रीय समारोह स्टच्यू ऑफ यूनिटी की छाया में आयोजित किया गया।
सरकार कह रही है कि राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों को दिल्ली से बाहर देश के अलग-अलग राज्यों और शहरों में ले जाने की नई नीति बनाई गई है। बात सुनने में बहुत सुंदर है। अगर सचमुच हर साल देश के किसी अलग राज्य को अवसर मिलेगा तो कभी केरल, कभी असम, कभी पश्चिम बंगाल, कभी महाराष्ट्र, कभी तमिलनाडु, कभी यूपी में इसका स्वागत होना चाहिए। लेकिन सवाल सरकार के नियत और प्राथमिकता का है।
देश पूछ रहा है कि इस प्रयोग की शुरुआत भी गुजरात से क्यों हुई? क्या देश की हर राष्ट्रीय संस्था, हर बड़ा आयोजन, हर महत्वाकांक्षी परियोजना और हर राजनीतिक प्रतीक अंततः गुजरात में ही स्थापित किया जाएगा? क्या दिल्ली अब केवल सरकार की राजधानी और राष्ट्रीय गौरव का नया स्थाई पता गुजरात बनता जा रहा है? क्रिकेट का सबसे बड़ा स्टेडियम गुजरात में। दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा गुजरात में है।
बड़े राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय आयोजन गुजरात में और अब सात दशकों से अधिक समय से दिल्ली से जुड़ा राष्ट्रीय पुरस्कार गुजरात में है। क्या संयोग इतने नियमित हो सकते हैं? सरकार कहती है एक भारत श्रेष्ठ भारत। लेकिन श्रेष्ठ भारत का अर्थ हर रास्ता गुजरात की ओर कैसे हो गया? भारत केवल गुजरात नहीं है।
गुजरात भारत का एक गौरवशाली राज्य है। लेकिन भारत में राज्य तथा केंद्र शासित प्रदेश भी हैं। उनके शहरों, उनकी संस्कृतियों और उनकी जनता की भी उतनी ही भागीदारी है। यदि अगले वर्ष पुरस्कार श्रीनगर में हो तो उसके बाद चेन्नई में फिर गुवाहाटी, मुंबई, कोलकाता, लखनऊ, भुवनेश्वर या तिरुवनंतपुर में हो तो सरकार की नीति पर विश्वास बढ़ेगा।
लेकिन यदि राष्ट्रीय आयोजनों को दिल्ली से हटाने का अर्थ केवल उन्हें गुजरात पहुंचाना है तो सवाल उठेंगे और सवाल पूछना गुजरात का विरोध नहीं है। गुजरात किसी एक राजनीतिक दल या किसी एक नेता की निजी संपत्ति नहीं है। गुजरात गांधी और पटेल की धरती है। लेकिन गांधी की धरती का नाम लेकर हर राष्ट्रीय संस्था पर राजनीतिक ब्रांडिंग करना भी गांधी के विचारों का सम्मान नहीं कहा जा सकता। मैंने बेहतरीन लव स्टोरी बनाई सहाया। और पुलिस के बीच भागते हुए एक दंपत्ति की कहानी है। लव स्टोरी है। सेंसर बोर्ड में गया। एक तो सेंसर बोर्ड के सीईओ में मेरे समझ में नहीं आता बिठा दिए जाते हैं। मुंबई में चार साल का इनकम टैक्स का अफसर है राजेंद्र सिंह। मेरे को बुलाया गया।
फोन बाहर रखवा लिया गया। मुझे लगा फोन बाहर रख के अंदर कौन सी डील होती है। बाद में लोग आरोप लगा रहे हैं। मेरे पास कोई सबूत नहीं है कि हर पिक्चर को रिलीज करने से पहले 10 लाख से 20 लाख की बोली लगती है। मुंबई में चर्चा है। मैं पत्रकार था तो मुझसे ये नहीं कहा गया पैसे को लेकिन मुझसे कहा गया इतनी खूबसूरत पिक्चर है।
अगर ये झारखंड की जगह यूपी की शूटिंग होती तो मैं अभी आपको ऑर्डर कर देता। पिक्चर पास कर देता। मैंने कहा आपको आदिवासियों से और जंगल से इतनी नफरत क्यों है? नक्सली और पुलिस के बीच की भागती हुई शूटिंग हम बनारस और इलाहाबाद में नहीं कर सकते। क्या झारखंड इस देश का राज्य नहीं है? केवल गुजरात ही राज्य है? मैं एक उदाहरण दे रहा हूं जिससे आपको सरकार की मंशा समझ आ जाए।
अब आइए राष्ट्रीय पुरस्कारों की सूची पर नजर डालते हैं। 72 राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में से को सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म चलाया गया। इसी फिल्म के लिए यामी गौतम को सबसे अच्छी अभिनेत्री और शाश्वत सचदेव को गीतों के लिए सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक का पुरस्कार दिया गया। वीर सावरकर के लिए रणदीप हुड्डा को सर्वश्रेष्ठ नवोदित निर्देशक का सम्मान मिला।
वो पिक्चर जिसको दर्शक नहीं मिले जिसकी सबसे ज्यादा लोगों ने आलोचना करी उसके लिए साफ इनाम मिल रहा है। कार्तिक आर्यन को चंदू चैंपियन के लिए ममूटी के साथ संयुक्त रूप से सर्वश्रेष्ठ अभिनेता चुना गया और मनोज मुजे जैसे जहरीले गीतकार को मैदान के गीत जाने दो के लिए सर्वश्रेष्ठ गीतकार का पुरस्कार दिया गया। मैं स्पष्ट कर दूं कार्तिक आर्यन को लिए नहीं चंदू चैंपियन के लिए सम्मान मिला है।
उनके अभिनय की स्वतंत्र समीक्षा होनी चाहिए। इसी तरह ममूटी जैसे महान कला को मिला सम्मान भी एक अच्छी पहचान है। विविधता की पहचान है। लेकिन पूरी पुलिस पूरी सूची को एक साथ रखकर देखिए। एक तरफ पार्टी का दूसरी तरफ वीर सावरकर फिर उस राजनीतिक सांस्कृतिक विचारधारा के खुले समर्थक माने जाने वाले मनज मुंशिर जो लगातार अपने बायानों के लिए पूरी दुनिया में बदनाम है। उस आदमी को में फेंक दिया इस देश ने। हनुमान जी की आलोचना करने वालों को देश कैसे स्वीकार कर सकता है? क्या मनोज मुंशीर का नाम सिनेमाई उत्कृष्टता की सूची में दिखाई देना चाहिए? इसमें सत्ता की पसंद और राजनीतिक संदेश की छाया क्लियर दिखाई नहीं दे रही।
सरकार और जी को इसका उत्तर देना चाहिए कि हनुमान जी की आलोचना का क्या इनाम है। अच्छी फिल्म है या खराब फिल्म। इस पर आलोचकों की अलग-अलग राय हो सकती है। लेकिन यह बात सही है कि सत्तारूढ़ सरकार के लिए सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक निर्णयों में से एक है। और में जब लगाई गई थी जो गवर्नर थे सतपाल मलिक।
उन्होंने पहला इंटरव्यू मुझे दिया था शायद और बताया था कि राम माधव और अंबानी किस तरह डील करने पहुंचे थे करोड़ों रुपए की। राम माधव हाशिय में चले गए और सत्यपाल मलिक के पीछे पड़ गई और बेचारे मलिक साहब इस दुनिया में नहीं रहे। अब तीन सेक्टर फिल्म को सबसे फ्यूचर फिल्म, सबसे अच्छी अभिनेत्री, संगीत सहित बड़े सम्मान मिलेंगे।
तो पूछना बिल्कुल जायज है कि जरूरी ने केवल फिल्म की कला देखी या उसके राजनीतिक संदेश ने भी निर्णय को प्रभावित किया? क्या जरी की विस्तृत टिप्पणियां सार्वजनिक की जाएंगी? क्या देश को बताया जाएगा कि को किन कलात्मक तकनीकी और कथात्मक मानकों पर श्रेष्ठ फिल्मों से श्रेष्ठ पाया गया। उसे कितने अंक मिले? किस जरी सदस्य ने क्या मूल्यांकन किया? क्या कोई असहमति दर्ज हुई? राष्ट्रीय पुरस्कार केवल एक ट्रॉफी नहीं। यह सरकार की ओर से जारी भारतीय सिनेमा की श्रेष्ठता का प्रमाण पत्र है। इसलिए उसकी चयन प्रक्रिया को भी संदेह से ऊपर होना चाहिए। फिर मनोज मुंतीश्वर का पुरस्कार।
मैदान में जाने दो गीत के लिए गीतकार सबसे बढ़िया चुना गया। ठीक है। आप गीत की गुणवत्ता पर ध्यान होना चाहिए। लेकिन उस आदमी के सार्वजनिकता और रचनात्मक रिकॉर्ड पर भी चर्चा स्वाभाविक है। आदि पुरुष के संवादों ने देश भर में भारी आक्रोश पैदा किया। भगवान हनुमान से जुड़े चरित्र के मुंह से ऐसे संवाद कहलवाए गए जिन्हें लाखों करोड़ों दर्शकों ने गरिमा और मर्यादा के प्रतिकूल माना। तेज तेरे बाप का आग तेरे बाप की जैसे संवादों पर लोगों ने पूछा क्या राम कथा के पात्र किसी सड़क छाप की भाषा फिल्मों में बोलेंगे? उस समय हिंदू संगठनों से लेकर सामान दर्शक तक ने आपत्ति की।
फिल्म निर्माताओं को संवाद बदलने पड़े। मनोज मुंशी ने सफाई दी पर आलोचना शांत नहीं हुई। जबरदस्त विरोध हुआ। लोगों ने कहा राम और हनुमान के नाम पर बाजार बनाया गया और उसकी भाषा और मर्यादा को सस्ता कर दिया गया। पूरे देश में आलोचना आधी पुरुष फड्डे बस्ते में चली गई। बर्बाद हो गई पिक्चर।
अब सवाल है जब एक लेखक को इतनी बड़ी रचनात्मक चूक पर पूरे देश की आलोचना सुननी पड़ी उसी दौर के आसपास सरकार उसे राष्ट्रीय स्तर पर सर्वश्रेष्ठ गीतकार घोषित करती है तो जनता इसे किस रूप में देखेगी? क्या यह संदेश दे कि आपकी रचनात्मक जवाबदेही से अधिक महत्वपूर्ण आपका राजनीतिक पक्ष है? क्या सत्ता के सांस्कृतिक आख्यान का समर्थन कर देने से पिछली सभी गलतियां खत्म हो जाती है वो भी हनुमान जी को लेकर।
कितना घराबा आज कितनी शर्मनाक बात है। क्या हो गया सरकार को? राष्ट्रीय पुरस्कार देते समय बताना तो पड़ेगा कि जाने दो गीत में ऐसा क्या असाधारणता कि देश की सभी भाषाओं में लिखे गए तमाम गीतों को पीछे छोड़कर उसे सबसे अच्छा चुना गया। क्या यह गीत सचमुच में 2024 में भारतीय भाषाओं में लिखे गए प्रत्येक गीत से श्रेष्ठ था? जीरो ने किन-किन गीतों से उसकी तुलना की?
उसके शब्दों में कौन सा अभूतपूर्व काव्यात्मक ऊंचाई सामाजिक संवेदना या भाषाई नवीनता मिली? क्या नवीनता मिलेगी? वो तो चोरी के गीत के लिए वैसे भी बदनाम है मनोज। पुरस्कार उस लेखक की कविता से अधिक उसकी राजनीतिक उपयोगिता को देखकर मिला। यह सवाल इसलिए भी उठता है क्योंकि मनोज मुंतशिर पिछले कई सालों से गीतकार संवाद नहीं रहे। वो चारण रह गए। वो इंसान बनकर रह गए।
वो राजनीतिक, सांस्कृतिक मंचों पर खुलकर हिंदुत्व का चेहरा रखने वाले नफरती चेहरा बन चुके। उन्हें ऐसा करने का पूरा अधिकार है क्योंकि इस देश में ऐसे कई नफरती चिंटू हैं। लेकिन जब वैचारिक रूप से सत्ता के निकट दिखाई देने वाले कलाकार को सरकारी सम्मान मिले तो पारदर्शिता की जिम्मेदारी कई गुना बढ़ जाती है।
मनोज मुंशी को पुरस्कार मिलने का विरोध केवल और केवल उनसे असहमति रखना नहीं होना चाहिए। लेकिन यह भी सवाल होना चाहिए क्या पुरस्कार विशुद्ध रचनात्मक विशेषता का परिणाम है? यदि हां तो सरकार और जरी अपने मूलांकन के आधार सार्वजनिक करने से क्योंगी? कर देना चाहिए। राष्ट्रीय पुरस्कारों की प्रतिष्ठा व्यक्तियों से बड़ी होती है।
यदि चयन निष्पक्ष है तो पारदर्शिता विजेताओं का सम्मान बढ़ाएगी। यदि चयन में सत्ता की चरण वंदना है, नफरत है, जहर है तो पारदर्शिता उसका पर्दाफाश करेगी और यही इस साल के पुरस्कारों की सबसे बड़ी चिंता है। र्वश्रेष्ठ फिल्म सांवरकर को सम्मान मनोज मुंशी को सर्वश्रेष्ठ गीतकार समारोह गुजरात में इन सभी को अलग-अलग देखने पर प्रत्येक के पक्ष में यह तर्क दिया जा सकता है। अलग-अलग तर्क दिए जा सकते हैं।
लेकिन हकीकत यह है कि पूरा फिल्म पुरस्कार एक पॉलिटिकल तस्वीर के अलावा कुछ नहीं बचा। क्या भारतीय सिनेमा की विशेषता का नया पैमाना यह है कि फिल्म सत्ता की विचारधारा को कितना मजबूत करती है? क्या वही कहानी सरकारी सम्मान पाएगी जो सरकारी निर्णयों का महिमा मंडन करेगी।
क्या असहमति, प्रश्न, आदिवासियों की पीड़ा, अल्पसंख्यकों की बेचैनी, सत्ता की या व्यवस्था की विफलता दिखाने वाली फिल्में राष्ट्रीय सम्मान से बाहर होती जाएंगी। देश ने पहले भी देखा है कि सरकार की आलोचना करने वाली फिल्मों को प्रमाण पत्र के लिए संघर्ष करना पड़ता है। कई फिल्म महीनों बोर्ड में रोकी जाती है।
कई दृश्य काटने का दबाव बनाया जाता है। कहीं उसे राष्ट्र विरोधी या हिंसा का महिमा मंडन करने वाला घोषित कर दिया जाता है। दूसरी ओर सरकार की कथा को मजबूत करने वाली फिल्में टैक्स फ्री होती हैं। मंत्रियों की चमचागिरी पाती हैं। मंत्रियों की प्रशंसा पाती हैं। सरकारी प्रचार का हिस्सा बनती है और फिर राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की सूची में चमकती दिखाई देती हैं। यही दोहरा पैमाना राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाता है। भारत में मलयालम, तमिल, मराठी, बंगाली, असमिया, कन्नड़ और छोटी-छोटी भाषाओं में अद्भुत सिनेमा बन रहा है। कम बजट में ऐसी बढ़िया कहानियां सामने आ रही हैं जो मनुष्य की पीड़ा, संघर्ष और जटिलताओं को ईमानदारी से पर्दे पर उतारती हैं।
लेकिन अगर राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की शेष श्रेणियां राजनीतिक रूप से सुविधाजनक हिंदी फिल्मों के लिए आरक्षित दिखाई देने लगे तो क्षेत्रीय और स्वतंत्र फिल्मोंकारों का भरोसा टूटेगा। सरकार को पांच कदम उठाने चाहिए। पहला राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की जी के प्रत्येक सदस्य का पूरा परिचय, उनके चयन का आधार और संभावित हितों का टकराव सार्वजनिक किया जाए। दूसरा हर प्रमुख पुरस्कारों के लिए की लिखित टिप्पणी जारी की जाए कि विजेता को किन-किन सिनेमाई मानकों पर चुना गया। तीसरा अंतिम दौर में पहुंची फिल्में और उन्हें मिले अंकों का वितरण सार्वजनिक किया जाए। चौथा यदि समारोह को अलग-अलग राज्यों में ले जाना है तो अगले पांच सालों का कैलेंडर अभी से घोषित किया जाए।
तभी पता चलेगा कि राष्ट्रीय विकेंद्रीकरण है या केवल गुजरात का केंद्रीयकरण। पांचवा पुरस्कार के चयन को सूचना प्रसारण मंत्रालय के राजनीतिक प्रभाव से मुक्त करने के लिए एक स्वतंत्र और स्थाई व्यवस्था बनाई जाए जिसमें चमचे ना रखे जाए। सिनेमा सरकार का प्रचार विभाग नहीं है। कलाकार सत्ता का पोस्टर बॉय नहीं होता। गीतकार का काम किसी राजनीतिक विचारधारा की जय जयकार करना नहीं होता। मनुष्य की भावनाओं को देना है और राष्ट्रीय पुरस्कार का काम सत्ता के पसंदीदा लोगों को सम्मानित करना नहीं है। भारतीय सिनेमा की वास्तविक उत्कृष्टता की पहचान करना है। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार यदि सरकार की पसंद का प्रमाण पत्र बन गया तो उसकी ट्रॉफी चमकेगी लेकिन उसकी प्रतिष्ठा खत्म हो जाएगी। गुजरात में समारोह होना अपने आप में अपराध नहीं है और बाकी सब भी अपराध नहीं है.
लेकिन कहानी सबको पता है। यह आचरण एक सवाल अवश्य पैदा करता है। लोकतंत्र में संदेह का उत्तर गुस्से से नहीं पारदर्शिता से दिया जाता है। सरकार पता है कि समारोह के लिए गुजरात ही क्यों चुना गया? मैं तो कहता हूं हमेशा माल कमाएगा गुजरात का भाई। घंटा बजाएगा यूपी और बिहार का भाई। ने बताया कि देश की सर्वश्रेष्ठ फिल्म कैसे बन गई। ने यह भी बताया कि जाने दो देश का सर्वश्रेष्ठ गीत क्यों था और यह भी स्पष्ट किया जाए कि सत्ता की विचारधारा के अंकुर फिल्में और कलाकारों को इतनी बड़ी मौजूदगी केवल संयोग है या चयन का नया अघोषित पैमाना। क्योंकि देश किसी एक पार्टी का नहीं है।
संस्कृति किसी एक विचारधारा की नहीं है। भगवान राम और हनुमान किसी गीतकार या फिल्म कंपनी के व्यवसायिक संपत्ति नहीं है। गुजरात किसी सरकार की जागीर नहीं है। और राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार किसी सत्ता का निजी समान समारोह नहीं है। यह पुरस्कार भारत के हैं। भारत की सभी भाषाओं के हैं। भारत की सभी संस्कृतियों के हैं। भारत के उन फिल्मकारों के भी हैं जो सत्ता से सहमत हैं। और उन फिल्मकारों के भी हैं जो सत्ता से सवाल पूछते हैं। जिस दिन राष्ट्रीय सम्मान के लिए कलात्मक योग्यता से पहले राजनीतिक निष्ठा देखी जाने लगेगी उस दिन पुरस्कार पाने वाले तो बहुत होंगे लेकिन सम्मानित कोई नहीं होगा। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि इस बार पुरस्कार किसे मिला?
सवाल यह है कि राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की आत्मा किसके पास गिरवी रख दी गई? मुझे तो अच्छा नहीं लगा कि हनुमान जी को इतना अपमानित करने वाले को, भाषा बोलने वाले को, नफरत फैलाने वाले को कूड़े के ढेर से उठा के फिर से सत्ता के शिखर पर बैठाने की कोशिश की जा रही है।